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मकर सक्रांति का महत्व एव पूजा विधि

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मकर संक्रांति का महत्व- आज के दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाते हैं। उत्तरायण में सूर्य रहने के समय को शुभ समय माना जाता है और मांगलिक कार्य आसानी से किए जाते हैं। चूंकि पृथ्वी दो गोलार्धों में बंटी हुई है ऐसे में जब सूर्य का झुकाव दाक्षिणी गोलार्ध की ओर होता है तो इस स्थिति को दक्षिणायन कहते हैं और सूर्य जब उत्तरी गोलार्ध की ओर झुका होता है तो सूर्य की इस स्थिति को उत्तरायण कहते हैं। इसके साथ ही 12 राशियां होती हैं जिनमें सूर्य पूरे साल एक-एक माह के लिए रहते हैं। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे मकर संक्रांति कहते है मकर संक्रांति का पर्व इस बार यानी साल 2019 में 14 जनवरी की बजाए 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। 15 जनवरी से पंचक, खरमास और अशुभ समय समाप्त हो जाएगा और विवाह, ग्रह प्रवेश आदि के शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे। 15 जनवरी यानी मकर संक्रांति के दिन ही प्रयागराज में चल रहे कुंभ महोत्सव का पहला शाही स्नान होगा। शाही स्नान के साथ ही देश विदेश के श्रद्धालु कुंभ के पवित्र त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाना शुरू कर देंगे। मकर संक्रांति के पर्व को देश में माघी, पोंगल, उत्तरायण, खिचड़ी और बड़ी संक्रांति आदि नामों से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही गुजरात में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्वस मनाया जाता है। जानें मकर संक्रांति का मुहूर्त, पूजा विधि और अन्य खास बातें- मकर संक्रांति शुभ मुहूर्त- पुण्य काल मुहूर्त - 07:14 से 12:36 तक (15 जनवरी 2019) महापुण्य काल मुहूर्त - 07:14 से 09:01 तक (15 जनवरी 2019 को) मकर संक्रांति पूजा विधि- मकर संक्रांति के दिन सुबह किसी नदी, तालाब, शुद्ध जलाशय में स्नान करें। इसके बाद नए या साफ वस्त्र पहनकर सूर्य देवता की पूजा करें। इसके बाद ब्राह्मणों, गरीबों को दान करें। इस दिन दान में आटा, दाल, चावल, खिचड़ी और तिल के लड्डू विशेष रूप से लोगों को दिए जाते हैं। इसके बाद घर में प्रसाद ग्रहण करने से पहले आग में थोड़ी सा गुड़ और तिल डालें और अग्नि देवता को प्रणाम करें। मकर संक्रांति पूजा मंत्र ऊं सूर्याय नम: ऊं आदित्याय नम: ऊं सप्तार्चिषे नम: मकर संक्रांति का वैज्ञानिक आधार • तिल के लड्डू में बड़ी मात्रा में गुड फैट पाया जाता है जो हृदय, स्किन और बालों के लिए है फायदेमंद होता है। • एंटीऑक्सीडेंट्स सर्दियों में रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। इसके साथ ही एनीमिया को दूर करने के लिए आयरन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। • तिल में तेल की प्रचुरता रहती है, इसके साथ ही गुड़ की तासीर भी गर्म मानी जाती है। तिल और गुड़ को मिलाकर जो खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं उनकी वजह से हमारी शरीर को जरूरत के हिसाब से गर्मी मिलती रहती है। • ठंड के कारण पाचन शक्ति भी मंद हो जाती है। तिल में पर्याप्त मात्रा में फाइबर होता है, जो पाचन शक्ति को बढ़ाता है। • तिल में कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्प्लेक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्व पाये जाते हैं, जो इस मौसम में शरीर के लिए जरूरी होते हैं। • गुड़ मैग्नीशियम का एक बेहीतरीन स्रोत है। ठंड में शरीर को इस तत्व की बहुत आश्यकता होती है। • मकर संक्रांति के समय नदियों में वाष्पन क्रिया होती है। इससे तमाम तरह के रोग दूर हो सकते हैं।
posted Jan 14 by Rakesh Periwal

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मकर संक्रांति के दिन शुभ मुहूर्त में स्नान और दान करके पुण्य कमाने का महत्व माना जाता है। मकर संक्रांति हिंदुओं का प्रमुख पर्व माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार पौष माह में जब सूर्य मकर राशि में आता है तब ये पर्व मनाया जाता है। संक्रांति हिंदुओं का प्रमुख पर्व माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार पौष माह में जब सूर्य मकर राशि में आता है तब ये पर्व मनाया जाता है। समय सूर्य धनु रशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। मकर संक्रांति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारंभ होती है। भारत के कई स्थानों पर इसे उत्तरायणी के नाम से भी जाना जाता है। मकर संक्रांति का पर्व इस वर्ष 14 जनवरी को है। संक्रांति के दिन शुभ मुहूर्त में स्नान और दान करके पुण्य कमाने का महत्व माना जाता है। इस दिन भगवान को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर इस दिन मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए खिचड़ी दान करने की परंपरा भी माना जाती है। मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ा का प्रसाद बांटा जाता है। कई स्थानों पर पतंगे उड़ाने की परंपरा भी है। इस पर्व को पूरे भारत में विभिन्न रुपों में मनाया जाता है। उत्तर भारत के पंजाब और हरियाणा में इसे लोहड़ी के रुप में मनाया जाता है। इसी के साथ तमिलनाडु में इस प्रमुख रुप से पोंगल के नाम से जाना जाता है।मकर संक्रांति के दिन गंगास्नान का महत्व माना जाता है। पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल प्रयाग में माघ मेला लगता है और संक्रांत के स्नान को महास्नान कहा जाता है। इस दिन हुए सूर्य गोचर को अंधकार से प्रकाश की तरफ बढ़ना माना जाता है। माना जाता है कि प्रकाश लोगों के जीवन में खुशियां लाता है। इसी के साथ इस दिन अन्न की पूजा होती है और प्रार्थना की जाती है कि हर साल इसी तरह हर घर में अन्न-धन भरा रहे। मकर सक्रांति से सौर वर्ष के अनुसार माघ स्नान प्रारम्भ होता है। पंजाब हरियाणा और हिमाचल उतराखंड में जहाँ पर महीने का आरम्भ सक्रांति से होता है, वहां पर इसका बहुत महत्व होता है। पौष मास में जहाँ धर्म कर्म बंद हो जाता है, मतलब खर मास के बाद ये माघ का महीना आने पर पूजा पाठ शादी विवाह मुंडन यज्ञोपवीत जैसे शुभ कृत्य पुनः शुरू होते है। लेकिन इस बार शुक्र अस्त होने से ये कृत्य शुक्र उदय होने पर अर्थात फरबरी की 5 तारीख के बाद शुरू होंगे। इस महीने में लकड़ी, कोयले और गर्म वस्त्र दान करने का बहुत महात्मय होता है। शास्त्रो में भी लिखा है "माघे ताप दानम्" अर्थात माघ के महीने में अग्नि का दान या गर्म वस्त्रो का दान परम कल्याणकारी होता है। इसलिय माघ में ये वस्तुए दान करनी चाहिए। और माघ माहात्म्य का श्रवण करना चाहिए। जो लोग तीर्थ स्नान नही कर सकते उनको घर में ही गंगा जल और तिल मिश्रित पानी से सूर्योदय के पूर्व स्नानं करके सूर्योदय के समय सूर्य नारायण भगवन को जल अर्पित करना चाहिए। इसी कामना के साथ आपको मकर सक्रांति और सूर्य उत्तरायण की बहुत बहुत बधाई हो ज्योतिषाचार्य, पंडित दलीप गौतम
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श्रावण  मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कुछ विशेष वास्तु अर्पित की जाती है जिसे शिवामुट्ठी कहते है।
1. प्रथम सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी,
2. दूसरे सोमवार को सफेद तिल् एक मुट्ठी,
3. तीसरे सोमवार को खड़े मूँग एक मुट्ठी,
4. चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी और
5. यदि जिस मॉस में पांच सोमवार हो तो पांचवें सोमवार को सतुआ चढ़ाने जाते हैं। 
यदि पांच सोमवार  न हो तो आखरी सोमवार को दो मुट्ठी भोग अर्पित करते है।
माना जाता है कि श्रावण मास में शिव की पूजा करने से सारे कष्ट खत्म हो जाते हैं। महादेव शिव सर्व समर्थ हैं। वे मनुष्य के समस्त पापों का क्षय करके मुक्ति दिलाते हैं। इनकी पूजा से ग्रह बाधा भी दूर होती है।
1. सूर्य से संबंधित बाधा है, तो विधिवत या पंचोपचार के बाद लाल { बैगनी } आक के पुष्प एवं पत्तों से शिव की पूजा करनी चाहिए।
2. चंद्रमा से परेशान हैं, तो प्रत्येक सोमवार शिवलिंग पर गाय का दूध अर्पित करें। साथ ही सोमवार का व्रत भी करें।
3. मंगल से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गिलोय की जड़ी-बूटी के रस से शिव का अभिषेक करना लाभप्रद रहेगा।
4. बुध से संबंधित परेशानी दूर करने के लिए विधारा की जड़ी के रस से शिव का अभिषेक करना ठीक रहेगा।
5. बृहस्पति से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए प्रत्येक बृहस्पतिवार को हल्दी मिश्रित दूध शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।
6. शुक्र ग्रह को अनुकूल बनाना चाहते हैं, तो पंचामृत एवं घृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।
7. शनि से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गन्ने के रस एवं छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करें।
8-9. राहु-केतु से मुक्ति के लिए कुश और दूर्वा को जल में मिलाकर शिव का अभिषेक करने से लाभ होगा।

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भारतीय ज्योतिष कुण्डली निर्माण विधि भारतीय ज्योतिष में सूर्योदय से ही दिन बदलता है। अंग्रेजी तारीख अथवा दिन रात १२ बजे से प्रारम्भ होकर अगली रात में १२ बजे तक चलता है। अंग्रेजी में रात १२ से दिन में १२ बजे दोपहर तक ए.एम. (दिन) तथा दोपहर १२ बजे से रात १२ बजे तक पी.एम. (रात) लिखा जाता है। अंग्रेजी कैलेन्डर के अनुसार रात १२ बजे से दिन बदल जाता है। इसीलिये अंग्रेजी तारीख भी रात १२ बजे से बदल जाती है। इसलिए कुण्डली बनाते समय इसका ध्यान रखना चाहिए। रात में १२ बजे के बाद जो बालक पैदा होगा, उसके लिए अगली तारीख जैसे दिन में २० अप्रैल है, और लड़का रात १ बजे पैदा हुआ है तो २१ अप्रैल ए.एम. लिखा जायेगा। इसलिए कुण्डली बनाते समय पञ्चाङ्ग में २० अप्रैल की ही तिथि - नक्षत्र आदि लिखना चाहिये। आजकल कुण्डली में अंग्रेजी तारीख भी लिखी जाती है, अत: कुण्डली में २०/२१ अप्रैल रात्रि १ बजे लिखना चाहिए। जिससे भ्रम न हो सके। नक्षत्र कुण्डली में दिन के बाद नक्षत्र लिखा जाता है। कुल २७ नक्षत्र होते हैं - १. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी, ५. मृगशिरा, ६. आद्र्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्य, ९. अश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वा फाल्गुनी, १२. उत्तरा फाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाती, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढ़ा, २१. उत्तराषाढ़ा, २२. श्रवण, २३. धनिष्ठा, २४. शतभिषा, २५. पूर्वाभाद्रपद, २६. उत्तरा भाद्रपद तथा २७. रेवती। अभिजित नक्षत्र - यह अलग से कोई नक्षत्र नही होता है। बल्कि उत्तराषाढ़ा की अन्तिम १५ घटी तथा श्रवण की प्रारम्भ की ४ घटी के योग कुल १९ घटी का अभिजित नक्षत्र माना जाता है, किन्तु यह कुण्डली में न लिखा जाता है और न पञ्चाङ्गों में ही लिखा रहता है। नक्षत्र को ``ऋक्ष'' अथवा ``भ'' भी कहते हैं। जैसे गताक्र्ष में ऋक्ष है, जिसका अर्थ है, गतऋक्ष (नक्षत्र)। इसी तरह ``भयात'' में ``भ'' का अर्थ नक्षत्र है। पञ्चाङ्गों में प्रतिदिन का नक्षत्र तथा उसका मान (कब तक है) घटी-पल में लिखा रहता है। जिसे देखकर कुण्डली में लिखना चाहिये। चरण प्रत्येक नक्षत्र में ४-४ चरण होते हैं। कुल २७ नक्षत्र में २७×४ कुल १०८ चरण होंगे। बालक का राशि नाम निकालने के लिए नक्षत्र का चरण निकालना जरूरी है। योग कुण्डली में नक्षत्र के बाद योग लिखा जाता है। योग - सूर्य चन्द्रमा के बीच ८०० कला के अन्तर पर एक योग बनता है। कुल २७ योग होते हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं — १. विष्कुम्भ, २. प्रीति, ३. आयुष्मान, ४. सौभाग्य, ५. शोभन, ६. अतिगण्ड, ७. सुकर्मा, ८. धृति, ९. शूल, १०. गण्ड, ११. वृद्धि, १२. ध्रुव, १३. व्याघात, १४. हर्षण, १५. वङ्का, १६. सिद्धि, १७. व्यतिपात, १८. वरियान, २०. परिघ, २१. सिद्ध, २२. साध्य, २३. शुभ, २४. शुक्ल, २५. ब्रह्म, २६. ऐन्द्र तथा २७. वैधृति। पञ्चाङ्ग में योग के आगे घटी-पल लिखा रहता है। जिसका अर्थ है, सूर्योदय के बाद कब तक वह योग रहेगा। जिस तरह तिथि नक्षत्र का क्षय तथा वृद्धि होती है, उसी तरह योग का भी क्षय तथा वृद्धि होती है। जब दो दिन सूर्योदय में एक ही योग हो तो उस योग की वृद्धि होगी। जब दोनों दिन सूर्योदय के समय जो योग नहीं है, तो उस योग का क्षय माना जाता है। तिथि, नक्षत्र, योग का जो क्षय कहा गया है, उससे यह नहीं समझना चाहिए कि उस तिथि अथवा नक्षत्र अथवा योग का लोप हो गया है। वह तिथि, नक्षत्र, योग उस दिन रहेगा। केवल सूर्योदय के पूर्व समाप्त हो जायेगा। करण कुण्डली में योग के बाद करण लिखा जाता है। कुल ११ करण होते हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं — १. वव, २. वालव, ३. कौलव, ४. तैतिल, ५. गर, ६. वणिज, ७. विष्टि या भद्रा, ८. शकुनि, ९. चतुष्पद, १०. नाग, ११. किस्तुघ्न। इसमें १ से ७ तक के ७ करण चर संज्ञक हैं। जो एक माह में लगभग ८ आवृत्ति करते हैं। अन्त का चार - ८ से ११ तक शकुनि, चतुष्पद, नाग तथा विंâस्तुघ्न - करण स्थिर संज्ञक हैं। स्थिर करण सदा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध से प्रारम्भ होते हैं। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आधी तिथि के बाद शकुनि करण। अमावस्या के पूर्वार्ध में चतुष्पद करण। अमावस्या के उत्तरार्ध में नाग करण। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में िंकस्तुघ्न करण होता है। इसीलिए यह स्थिर संज्ञक है। एक तिथि में २ करण होते हैं। तिथि के आधे भाग पूर्वार्ध में १ करण तथा तिथि के आधे भाग उत्तरार्ध में दूसरा करण होता है। अर्थात `तिथि अर्धं करणं' अर्थात तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं या सूर्य चन्द्रमा के बीच १२ अंश के आधे ६ अंश को करण कहते हैं। कुण्डली में जन्म के समय जो करण हो, वही लिखा जाता है। हंसक अथवा तत्त्व षड्वर्गीय कुण्डली में ``हंसक'' लिखा रहता है। अत: हंसक जानने की विधि दी जा रही है। हंसक को तत्त्व भी कहते हैं। कुल ४ तत्त्व अथवा हंसक होते हैं — १. अग्नि तत्त्व, २. भूमि तत्त्व, ३. वायु तत्त्व तथा ४. जल तत्त्व। ये तत्त्व राशि के अनुसार होते हैं जैसे — १. मेष राशि - अग्नि तत्त्व २. वृष राशि - भूमि तत्त्व ३. मिथुन राशि - वायु तत्त्व ४. कर्वâ राशि - जल तत्त्व ५. सिंह राशि - अग्नि तत्त्व ६. कन्या राशि - भूमि तत्त्व ७. तुला राशि - वायु तत्त्व ८. वृश्चिक राशि - जल तत्त्व ९. धनु राशि - अग्नि तत्त्व १०. मकर राशि - भूमि तत्त्व ११. कुम्भ राशि - वायु तत्त्व १२. मीन राशि - जल तत्त्व जातक की जो जन्म राशि हो, उसी के तत्त्व को हंसक के खाने में लिखना चाहिए। युंजा परिचय षड्वर्गीय कुण्डली में ``युंजा'' भी लिखा होता है। कुल २७ नक्षत्र होते हैं। ६ नक्षत्र का पूर्वयुंजा १२ नक्षत्र का मध्यभाग के मध्ययुंजा तथा ९ नक्षत्र का परभाग अन्त्ययुंजा होता है। इसे ही युंजा कहते हैं। पूर्वभाग के ६ नक्षत्र रेवती, अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी तथा मृगशिरा पूर्वयुंजा - मध्यभाग के १२ नक्षत्र- आद्र्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा तथा अनुराधा मध्ययुंजा एवं परभाग के ९ नक्षत्र - ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतमिषा, पूर्वाभाद्रपद तथा उत्तराभाद्रपद पर या अन्त्ययुंजा होता है। जातक का जन्म नक्षत्र जिस भाग में पड़े वही भाग कुण्डली में लिखना चाहिए। वर्ग विचार षड्वर्गीय कुण्डली में ``वर्ग स्थिते'' लिखा रहता है। इसका अर्थ है, जातक की जन्म राशि का नाम किस वर्ग में आता है। कुल ८ वर्ग होते हैं। इसमें जो अक्षर आते हैं, वह इस प्रकार हैं — स्वामी १. अ - वर्ग - अ, ई, उ, ए, ओ गरुड २. क - वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ मार्जार ३. च - वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ सिंह ४. ट - वर्ग - ट, ठ, ड, ढ़, ण श्वान ५. त - वर्ग - त, थ, द, ध, न सर्प ६. प - वर्ग - प, फ, ब, भ, म मूषक ७. य - वर्ग - य, र, ल, व मृग ८. श - वर्ग - श, ष, स, ह मेष अपने से पंचम वर्ग से वैर, चतुर्थ से मित्रता तथा तीसरे से समता होती है। जातक की जन्म की राशि का पहला अक्षर जिस वर्ग में पड़े वही वर्ग लिखना चाहिए। जैसे- राशि नाम-पन्नालाल का पहला अक्षर प है, जो प वर्ग में पड़ता है। अत: कुण्डली में प वर्ग लिखना चाहिए। वर्ग-गण-नाड़ी पञ्चाङ्गों में - प्रत्येक नक्षत्र के नीचे, राशि, वर्ण, वश्य, योनि, राशिस्वामी, गण तथा नाड़ी का नाम लिखा रहता है। उसे देखकर जातक का जो जन्म नक्षत्र हो, उसके नीचे लिखे वर्ण, गण-नाड़ी आदि लिखना चाहिए। पञ्चाङ्गों में राशि स्वामी के लिए ``राशीश'' लिखा रहता है। राशि स्वामी, राशीश तथा राशिपति - का एक ही अर्थ है। उस राशि का ग्रह अर्थात् राशि का स्वामी ग्रह ही राशीश कहा जाता है। कृत्तिका नक्षत्र के नीचे १/३ लिखा है। मृगशिरा नक्षत्र में २-२ लिखा है। अत: यदि अपना जन्म नक्षत्र कृत्तिका का प्रथम चरण है, तो मेष राशि, क्षत्रिय वर्ण, भौम राशीश होगा। यदि कृत्तिका २-३-४ चरण है, तो वृष राशि, वैश्य वर्ण तथा शुक्र राशीश होगा। इसी तरह सर्वत्र समझना चाहिए। राशि और उसके स्वामी कुल २७ नक्षत्र होते हैं। १-१ नक्षत्र में ४-४ चरण होते हैं। ९-९ चरण की १-१ राशि होती है। कुल १२ राशियां हैं - जो इस प्रकार हैं — १. मेष, २. वृष, ३. मिथुन, ४. कर्वâ, ५. सिंह, ६. कन्या, ७. तुला, ८. वृश्चिक, ९. धनु, १०. मकर, ११. कुम्भ तथा १२. मीन इन १२ राशियों के स्वामी इस प्रकार है — १. मेष - मंगल, २. वृष - शुक्र, ३. मिथुन - बुध, ४. कर्वâ - चन्द्र, ५. िंसह - सूर्य, ६. कन्या - बुध, ७. तुला - शुक्र, ८. वृश्चिक - मंगल, ९. धनु - गुरु, १०. मकर - शनि, ११. कुम्भ - शनि तथा १२. मीन - गुरु। राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। ये दोनों किसी राशि के स्वामी नहीं होते हैं।
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*दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्व* = माँ दुर्गा की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ सर्वोत्तम है . . भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से ''वेद'' अनादि है, उसी प्रकार ''सप्तशती'' भी अनादि है . . = दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है . दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं . . दुर्गा सप्तशती के सभी तेरह अध्याय अलग अलग इच्छित मनोकामना की सहर्ष ही पूर्ति करते है . . = प्रथम अध्याय: - इसके पाठ से सभी प्रकार की चिंता दूर होती है एवं शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु का भी भय दूर होता है शत्रुओं का नाश होता है . . = द्वितीय अध्याय:- इसके पाठ से बलवान शत्रु द्वारा घर एवं भूमि पर अधिकार करने एवं किसी भी प्रकार के वाद विवाद आदि में विजय प्राप्त होती है . . = तृतीय अध्याय: - तृतीय अध्याय के पाठ से युद्ध एवं मुक़दमे में विजय, शत्रुओं से छुटकारा मिलता है . . = चतुर्थ अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से धन, सुन्दर जीवन साथी एवं माँ की भक्ति की प्राप्ति होती है . = पंचम अध्याय: - पंचम अध्याय के पाठ से भक्ति मिलती है, भय, बुरे स्वप्नों और भूत प्रेत बाधाओं का निराकरण होता है . . = छठा अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से समस्त बाधाएं दूर होती है और समस्त मनवाँछित फलो की प्राप्ति होती है . . = सातवाँ अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से ह्रदय की समस्त कामना अथवा किसी विशेष गुप्त कामना की पूर्ति होती है . = आठवाँ अध्याय: - अष्टम अध्याय के पाठ से धन लाभ के साथ वशीकरण प्रबल होता है . . = नौवां अध्याय:- नवम अध्याय के पाठ से खोये हुए की तलाश में सफलता मिलती है, संपत्ति एवं धन का लाभ भी प्राप्त होता है . = दसवाँ अध्याय:- इस अध्याय के पाठ से गुमशुदा की तलाश होती है, शक्ति और संतान का सुख भी प्राप्त होता है . ., = ग्यारहवाँ अध्याय:- ग्यारहवें अध्याय के पाठ से किसी भी प्रकार की चिंता से मुक्ति , व्यापार में सफलता एवं सुख-संपत्ति की प्राप्ति होती है . = बारहवाँ अध्याय:- इस अध्याय के पाठ से रोगो से छुटकारा, निर्भयता की प्राप्ति होती है एवं समाज में मान-सम्मान मिलता है . = तेरहवां अध्याय:- तेरहवें अध्याय के पाठ से माता की भक्ति एवं सभी इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है . . = मनुष्य की इच्छाएं अनंत है और इन्ही की पूर्ति के लिए दुर्गा सप्तशती से सुगम और कोई भी मार्ग नहीं है . . इसीलिए नवरात्र में विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करने का विधान है . .
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कैसे करें दुर्गा-सप्‍तशती का पाठ

देवी स्‍थापना – कलश स्‍थापना

दुर्गा सप्‍तशती एक महान तंत्र ग्रंथ के रूप में उपल्‍बध जाग्रत शास्‍त्र है। इसलिए दुर्गा सप्‍तशती के पाठ को बहुत ही सावधानीपूर्वक सभी जरूरी नियमों व विधि का पालन करते हुए ही करना चाहिए क्‍योंकि यदि इस पाठ को सही विधि से व बिल्‍कुल सही तरीके से किया जाए, तो मनचाही इच्‍छा भी नवरात्रि के नौ दिनों में ही जरूर पूरी हो जाती है, लेकिन यदि नियमों व विधि का उल्‍लंघन किया जाए, तो दुर्घटनाओं के रूप में भयंकर परिणाम भी भोगने पडते हैं और ये दुर्घटनाऐं भी नवरात्रि के नौ दिनों में ही घटित होती हैं।

इसलिए किसी अन्‍य देवी-देवता की पूजा-आराधना में भले ही आप विधि व नियमों पर अधिक ध्‍यान न देते हों, लेकिन यदि आप नवरात्रि में दुर्गा पाठ कर रहे हैं, तो पूर्ण सावधानी बरतना व विधि का पूर्णरूपेण पालन करना जरूरी है।

दुर्गा-सप्‍तशती पाठ शुरू करते समय सर्व प्रथम पवित्र स्थान (नदी किनारे की मिट्टी) की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं। हमारे द्वारा किया गया दुर्गा पाठ किस मात्रा में और कैसे स्‍वीकार हुआ, इस बात का पता इन जौ या गेंहू के अंकुरित होकर बडे होने के अनुसार लगाया जाता है। यानी यदि जौ/गेहूं बहुत ही तेजी से अंकुरित होकर बडे हों, तो ये इसी बात का संकेत है कि हमारा दुर्गा पाठ स्‍वीकार्य है जबकि यदि ये जौ/गेहूं अंकुरित न हों, अथवा बहुत धीमी गति से बढें, तो तो ये इसी बात की और इशारा होता है कि हमसे दुर्गा पाठ में कहीं कोई गलती हो रही है।
फिर उसके ऊपर कलश को पंचोपचार विधि से स्थापित करें।
कलश के ऊपर मूर्ति की भी पंचोपचार विधि से प्रतिष्ठा करें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों ओर त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र, पुस्तक तथा शालीग्राम को विराजित कर विष्णु का पूजन करें।
पूजन सात्विक होना चाहिए क्‍योंकि सात्विक पूजन का अधिक महत्‍व है। जबकि कुछ स्‍थानों पर असात्विक पूजन भी किया जाता है जिसके अन्‍तर्गत शराब, मांस-मदिरा आदि का प्रयोग किया जाता है।
फिर नवरात्र-व्रत के आरंभ में स्वस्ति वाचक शांति पाठ कर हाथ की अंजुली में जल लेकर दुर्गा पाठ प्रारम्‍भ करने का संकल्प करें।
फिर सर्वप्रथम भगवान गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह एवं वरुण का विधि से पूजन करें।
फिर प्रधानदेवी दुर्गा माँ का षोड़शोपचार पूजन करें।
फिर अपने ईष्टदेव का पूजन करें। पूजन वेद विधि या संप्रदाय निर्दिष्ट विधि से होना चाहिए।
दुर्गा-सप्‍तशती पाठ विधि

विभन्‍न भारतीय धर्म-शास्‍त्रों के अनुसार दुर्गा सप्‍तशती का पाठ करने की कई विधियां बताई गर्इ हैं, जिनमें से दो सर्वाधिक प्रचलित विधियाें का वर्णन निम्‍नानुसार है:

इस विधि में नौ ब्राह्मण साधारण विधि द्वारा पाठ करते हैं। यानी इस विधि में केवल पाठ किया जाता है, पाठ करने के बाद उसकी समाप्ति पर हवन आदि नहीं किया जाता।

इस विधि में एक ब्राह्मण सप्तशती का आधा पाठ करता है। (जिसका अर्थ है- एक से चार अध्याय का संपूर्ण पाठ, पांचवे अध्याय में ‘देवा उचुः- नमो दैव्ये महादेव्यै’ से आरंभ कर ऋषिरुवाच तक, एकादश अध्याय का नारायण स्तुति, बारहवां तथा तेरहवां अध्याय संपूर्ण) इस आधे पाठ को करने से ही संपूर्ण पाठ की पूर्णता मानी जाती है। जबकि एक अन्य ब्राह्मण द्वारा षडंग रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है।

पाठ करने की दूसरी विधि अत्यंत सरल मानी गई है। इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ (प्रथम अध्याय), दूसरे दिन दो पाठ (द्वितीय व तृतीय अध्याय), तीसरे दिन एक पाठ (चतुर्थ अध्याय), चौथे दिन चार पाठ (पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय), पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ (नवम व दशम अध्याय), छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ (द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय) करने पर सप्तशती की एक आवृति होती है। इस विधि में आंठवे दिन हवन तथा नवें दिन पूर्णाहुति किया जाता है।

अगर आप एक ही बार में पूरा पाठ नही कर सकते है, तो आप त्रिकाल संध्‍या के रूप में भी पाठ को तीन हिस्‍सों में वि‍भाजित करके कर सकते है।

चूंकि ये विधियां अपने स्‍तर पर पूर्ण सावधानी के साथ करने पर भी गलतियां हो जाने की सम्‍भावना रहती है, इसलिए बेहतर यही है कि ये काम आप किसी कुशल ब्राम्‍हण से करवाऐं।

Arvind Shukla .8571064245

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