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जन्मपत्री में मकान योग

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*जन्म कुंडली में मकान बनाने के योग -* *एक अच्छा घर बनाने की इच्छा हर व्यक्ति के जीवन की चाह होती है. व्यक्ति किसी ना किसी तरह से जोड़-तोड़ कर के घर बनाने के लिए प्रयास करता ही है. कुछ ऎसे व्यक्ति भी होते हैं जो जीवन भर प्रयास करते हैं लेकिन किन्हीं कारणो से अपना घर फिर भी नहीं बना पाते हैं. कुछ ऎसे भी होते हैं जिन्हें संपत्ति विरासत में मिलती है और वह स्वयं कुछ भी नहीं करते हैं. बहुत से अपनी मेहनत से एक से अधिक संपत्ति बनाने में कामयाब हो जाते हैं.जन्म कुंडली के ऎसे कौन से योग हैं जो मकान अथवा भूमि अर्जित करने में सहायक होते हैं, उनके बारे में आज इस लेख के माध्यम से जानने का प्रयास करेगें.* *स्वयं की भूमि अथवा मकान बनाने के लिए चतुर्थ भाव का बली होना आवश्यक होता है, तभी व्यक्ति घर बना पाता है.मंगल को भूमि का और चतुर्थ भाव का कारक माना जाता है, इसलिए अपना मकान बनाने के लिए मंगल की स्थिति कुंडली में शुभ तथा बली होनी चाहिए.मंगल का संबंध जब जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति अपने जीवन में कभी ना कभी खुद की प्रॉपर्टी अवश्य बनाता है.* *मंगल यदि अकेला चतुर्थ भाव में स्थित हो तब अपनी प्रॉपर्टी होते हुए भी व्यक्ति को उससे कलह ही प्राप्त होते हैं अथवा प्रॉपर्टी को लेकर कोई ना कोई विवाद बना रहता है.* *मंगल को भूमि तो शनि को निर्माण माना गया है. इसलिए जब भी दशा/अन्तर्दशा में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ/चतुर्थेश से बनता है और कुंडली में मकान बनने के योग मौजूद होते हैं तब व्यक्ति अपना घर बनाता है.चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव घर का सुख देता है.चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर पाप व अशुभ ग्रहो का प्रभाव घर के सुख में कमी देता है और व्यक्ति अपना घर नही बना पाता है.* *चतुर्थ भाव का संबंध एकादश से बनने पर व्यक्ति के एक से अधिक मकान हो सकते हैं. एकादशेश यदि चतुर्थ में स्थित हो तो इस भाव की वृद्धि करता है और एक से अधिक मकान होते हैं.यदि चतुर्थेश, एकादश भाव में स्थित हो तब व्यक्ति की आजीविका का संबंध भूमि से बनता है.* *कुंडली में यदि चतुर्थ का संबंध अष्टम से बन रहा हो तब संपत्ति मिलने में अड़चने हो सकती हैं.जन्म कुंडली में यदि बृहस्पति का संबंध अष्टम भाव से बन रहा हो तब पैतृक संपत्ति मिलने के योग बनते हैं.* *चतुर्थ, अष्टम व एकादश का संबंध बनने पर व्यक्ति जीवन में अपनी संपत्ति अवश्य बनाता है और हो सकता है कि वह अपने मित्रों के सहयोग से मकान बनाएं.चतुर्थ का संबंध बारहवें से बन रहा हो तब व्यक्ति घर से दूर जाकर अपना मकान बना सकता है या विदेश में अपना घर बना सकता है.* *जो योग जन्म कुंडली में दिखते हैं वही योग बली अवस्था में नवांश में भी मौजूद होने चाहिए.भूमि से संबंधित सभी योग चतुर्थांश कुंडली में भी मिलने आवश्यक हैं.चतुर्थांश कुंडली का लग्न/लग्नेश, चतुर्थ भाव/चतुर्थेश व मंगल की स्थिति का आंकलन करना चाहिए. यदि यह सब बली हैं तब व्यक्ति मकान बनाने में सफल रहता है.* *मकान अथवा भूमि से संबंधित सभी योगो का आंकलन जन्म कुंडली, नवांश कुंडली व चतुर्थांश कुंडली में भी देखा जाता है. यदि तीनों में ही बली योग हैं तब बिना किसी के रुकावटों के घर बन जाता है. जितने बली योग होगें उतना अच्छा घर और योग जितने कमजोर होते जाएंगे, घर बनाने में उतनी ही अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.जन्म कुंडली में यदि चतुर्थ भाव पर अशुभ शनि का प्रभाव आ रहा हो तब व्यक्ति घर के सुख से वंचित रह सकता है. उसका अपना घर होते भी उसमें नही रह पाएगा अथवा जीवन में एक स्थान पर टिक कर नही रह पाएगा. बहुत ज्यादा घर बदल सकता है.* *चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को जमीन से संबंधित कोर्ट-केस आदि का सामना भी करना पड़ सकता है.* *वर्तमान समय में चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बनने पर व्यक्ति बैंक से लोन लेकर या किसी अन्य स्थान से लोन लेकर घर बनाता है.* *चतुर्थ भाव का संबंध यदि दूसरे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपनी माता की ओर से भूमि लाभ होता है.* *चतुर्थ का संबंध नवम से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपने पिता से भूमि लाभ हो सकता है।

References

ज्योतिष,
posted Feb 10 by anonymous

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कुंडली मे कुछ विशेष योग- 1. रज्जू योग- सब गृह चर राशियों में हो तो रज्जु योग होता है। इस योग में उत्पन्न मनुष्य भ्रमणशील, सुन्दर, परदेश जाने में सुखी, क्रूर, दुष्ट स्वभाव एवं स्थानांतर में उन्नति करने वाला होता है। 2. मुसल योग- समस्त गृह स्थिर राशियों में हो तो मुसल योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक मानी, ज्ञानी, धनी, राजमान्य, प्रसिद्ध, बहुत, पुत्रवाला, एम्.एल.ऐ एवं शासनाधिकारी होता है। 3. माला योग- बुध, गुरु और शुक्र ४|७|१० वें स्थान में हो और शेष ग्रह इन स्थानों से भिन्न स्थानों में हो तो माला योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, भोजनादि से सुखी, अधिक स्त्रियों से प्रेम करने वाला एवं एम्.पी होता है। पंचायत के निर्वाचन में भी उसे पूर्ण सफलता मिलती है। 4. गदा योग- समीपस्थ दो केंद्र १|४ या ७|१० में समस्त ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है। इस योग वाला जातक धनी, धर्मात्मा, शास्त्राग्य, संगीतप्रिय और पुलिस बिभाग में नौकरी प्राप्त करता है। इस योग वाले जातक का भाग्योदय २८ वर्ष की अवस्था में होता है। 5. शकत योग- लग्न और सप्तम में समस्त ग्रह हों तो शकट योग होता है। इस योग वाला रोगी, मुर्ख, ड्राईवर, स्वार्थी एवं अपना काम निकलने में बहुत प्रवीन होता है। 6. पक्षी योग- चतुर्थ और दशम भाव में समस्त ग्रह हो तो विहंग पक्षी होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक राजदूत, गुप्तचर, भ्रमणशील, कलहप्रिय एवं सामान्यत: धनी होता है। शुभग्रह उक्त स्थान में हो और पापग्रह ३|६|११ वें स्थान में हो तो जातक न्यायाधीश और मंडलाधिकारी होता है। 7. श्रृंगाटक योग- समस्त ग्रह १|५|९ वें स्थान में हो तो श्रृंगाटक योग होता है। इस योग वाला जातक सैनिक, योद्धा, कलहप्रिय, राजकर्मचारी, सुन्दर पत्निवाला एवं कर्मठ होता है। वीरता के कार्यों में इसे सफलता प्राप्त होती है। इस योगवाले का भाग्य २३ वर्ष की अवस्था से उदय हो जाता है। 8. वज्र योग- समस्त शुभग्रह लग्न और सप्तम स्थान में हो अथवा समस्त पापग्रह चतुर्थ और दशम भाव में स्थित हो तो वज्र योग होता है। इस योग वाला वार्धक्य अवस्था में सुखी, शुर-वीर, सुन्दर, भाग्यवाला, पुलिस या सेना में नौकरी करने वाला होता है। 9. कमल योग- समस्त ग्रह १|४|७|१० वें स्थान में हो तो कमल योग होता है। इस योग का जातक धनी, गुनी, दीर्घायु, यशस्वी, सुकृत करने वाला, विजयी, मंत्री या राज्यपाल होता है। कमल योग बहुत ही प्रभावक योग है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति शासनधिकारी अवश्य बनता है। यह सभी के ऊपर शासन करता है। बड़े-बड़े व्यक्ति उससे सलाह लेते है। 10. शक्ति योग- सप्तम भाव से आगे के चार भावो में समस्त ग्रह हों, तो शक्ति योग होता ही। इस योग के होने से जातक धनहीन, निष्फल जीवन, दुखी, आलसी, दीर्घायु, दीर्घसूत्री, निर्दय और छोटा व्यापारी होता ही। शक्तियोग में जन्म लेने वाला व्यक्ति छोटे स्तर की नौकरी भी करता ही। 11. छत्र योग- सप्तम भाव से आगे के सात स्थानों में समस्त ग्रह हो तो छत्र योग होता है। इस योग वाला व्यक्ति धनी, लोकप्रिय, राजकर्मचारी, उच्चपदाधिकारी, सेवक, परिवार के व्यक्तियों का भरण-पोषण करने वाला एवं अपने कार्य में ईमानदार होता है। 12. चक्र योग- लग्न से आरम्भ कर एकांतर से छह स्थानों में-प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम और एकादश भाव में सभी ग्रह हो तो चक्र योग होता है। इस योग वाला जातक राष्ट्रपति या राज्यपाल होता है। चक्र योग राजयोग का ही रूप है, इसके होने से व्यक्ति राजनीति में दक्ष होता है और उसका प्रभुत्व बीस वर्ष की अवस्था के पश्चात बढने लगता है। 13. समुद्र योग- द्वितीय भाव से एकांतर कर छह राशियों में २|४|६|१०|१२ वें स्थान में समस्त ग्रह हो तो समुद्र योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, रहमानी, भोगी, लोकप्रिय, पुत्रवान और वैभवशाली होता है। 14. पाश योग- पांच राशियों में समस्त ग्रह हो तो पाश योग होता है। इस योग के होने से जातक बहुत परिवारवाला, प्रपंची, बन्धनभागी, काराग्रह का अधिपति, गुप्तचर, पुलिस या सेना की नौकरी करने वाला होता है। 15. वीणा योग- सात राशियों में समस्त ग्रह स्थित हो तो वीणा योग होता है। इस योगवाला जातक गीत,नृत्य, वाध से स्नेह करता है। धनी, नेता और राजनीति में सफल संचालक बनता है। 16. गजकेसरी योग- लग्न अथवा चन्द्रमा से यदि गुरु केंद्र में हो और केवल शुभग्रहो से दृष्ट या युत हो तथा अस्त, नीच और शत्रु राशी में गुरु न हो तो गजकेसरी योग होता है। इस योगवाला जातक मुख्यमंत्री बनता है। 17. पर्वत योग- यदि सप्तम और अष्टम भाव में कोई ग्रह नही हो अथवा ग्रह हो भी तो कोई शुभग्रह हो तथा सब शुभग्रह केंद्र में हो तो पर्वत नामक योग होता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति भाग्यवान, वक्ता, शास्त्रग्य, प्राध्यापक, हास्य-व्यंग्य लेखक, यशस्वी, तेजस्वी और मुखिया होता है। मुख्यमंत्री बनाने वाले योगों में भी पर्वत योग की गणना है। 18. मृदंग योग- लग्नेश वली हो और अपने उच्च या स्वगृह में हो तथा अन्य ग्रह केंद्र स्थानों में स्थित हो तो मृदंग योग होता है। इस योग के होने से व्यक्ति शासनाधिकारी होता है। 19. कूर्म योग- शुभग्रह ५|६|७ वें भाव में और पापग्रह १|३|११ वें स्थान में अपने-अपने उच्च में हो तो कूर्म योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति राज्यपाल, मंत्री, धीर, धर्मात्मा, मुखिया और नेता होता है। 20. लक्ष्मी योग- लग्नेश बलवान हो और भाग्येश अपने मूल-त्रिकोण, उच्च या स्वराशी में स्थित होकर केन्द्रस्थ हो तो लक्ष्मी योग होता है। इस योगवाला जातक पराक्रमी, धनी, मंत्री, राज्यपाल एवं गुनी होता है। 21. कलानिधि योग- बुध शुक्र से युत या दृष्ट गुरु २|५ वें भाव में हो या बुध शुक्र की राशि में स्थिति हो तो कलानिधि योग होता है। इस योगवाला गुनी, राजमान्य, सुखी, स्वस्थ, धनी, और विद्वान होता है। 22. केमद्रुम योग- यदि चन्द्रमा के साथ में या उससे द्वितीय, द्वादश स्थान में तथा लग्न से केंद्र में सूर्य को छोड़कर अन्य कोई ग्रह नही हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति दरिद्र और निन्दित होता है। 23. धन-सुख योग- दिन में जन्म होने पर चन्द्रमा अपने या अधिमित्र के नवांश में स्थित हो और उसे गुरु देखता हो तो धन सुख होता है। इसी प्रकार रात्रि में जन्म प्र्ताप्वादी पर चन्द्रमा को शुक्र देखता हो तो धन-सुख योग होता है। यह अपने नामानुसार फल देता है। 24. विशिष्ट योग- जिसके जन्मकाल में बुध सूर्य के साथ अस्त होकर भी अपने ग्रह में हो अथवा अपने मूला त्रिकोण में हो तो जातक विशिष्ट विद्वान होता है। 25. भास्कर योग- यदि सूर्य से द्वितीय भाव में बुध हो। बुध से एकादश भाव में चन्द्रमा और चन्द्रमा से त्रिकोण में वृहस्पति स्थिति हो तो भास्कर योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला मनुष्य पराक्रमी, प्रभुसदृश, रूपवान, गन्धर्व विधा का ज्ञाता, धनी, गणितग्य, धीर और समर्थ होता है। यह योग २४ वर्ष की अवस्था से घटित होने लगता है। 26. इन्द्र योग- यदि चंद्रमा से तृतीय स्थान में मंगल हो और मंगल से सप्तम शनि हो। शनि से सप्तम शुक्र हो और शुक्र से सप्तम गुरु हो तो इन्द्रसंज्ञक योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक प्रसिद्ध शीलवान, गुणवान, राजा के समान धनी, वाचाल और अनेक प्रकार के धन, आभूषण प्राप्त करने वाला होता है। 27. मरुत योग- यदि शुक्र से त्रिकोण में गुरु हो, गुरु से पंचम चंद्रमा और चन्द्रमा से केंद्र में सूर्य हो तो मरुत योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य वाचाल, विशाल ह्रदय, स्थूल उदार, शास्त्र का ज्ञाता, क्रय-विक्रय में निपुण, तेजस्वी, किसी आयोग का सदस्य होता है।
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उच्च सफलता के योग-

1. जन्म-कुंडली में दशम स्थान

जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें।

2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न

जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं।

3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है।

5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है।

6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है।

8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है।

9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है।

10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है।

12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है ।

16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है ।

17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो,

20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो।

21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो.

22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो।

23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो।

24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो।

25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा।

26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे मैं जान सकते हैं।

27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है।

28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम्‌ भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है।

29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है।

30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए।

31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए।

32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए।

33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता

34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं।

कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम:

1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में

2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में

3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में

4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में

5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में

6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में

7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से ।

8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है।

9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है।

10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है।

11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में :

जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है।

12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में ।

13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है

14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है।

15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।

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ग्रहो के कमजोर होने पर जीवन पर होने वाले प्रभाव*** : सूर्य सबसे पहले बात करते हैं सूर्य ग्रह की। सामाजिक अपयश, पिता के साथ कलह या वैचारिक मतभेद, आंख, हृदय या पेट का कोई रोग होना इस बात को दर्शाता है कि जातक की कुंडली में सूर्य अशुभ स्थिति में है। जीवन में असंतुष्ट रहना और मुंह में कमजोर चंद्रमा घर में पानी के नल्कों या कुंओं का सूख जाना, पालतू दुधारू पशु की मृत्यु हो जाना, माता को कष्ट होना, मन में बार-बार आत्महत्या करने के विचारों का जन्म लेना भी कमजोर चंद्रमा की ओर इशारा करता है। मंगल आए दिन कोई ना कोई दुर्घटना होना, घर के बिजली के समान जल्दी खराब हो जाना, विशेषकर जिस कमरे में व्यक्ति रहता है वहां मौजूद बिजली के उपकरणों का कम समय में ही खराब हो जाना, मंगल दोष की वजह से होता है। मंगल के दोषी होने पर रक्त समस्या, भाई से विवाद और अत्याधिक क्रोध जैसी स्थिति जन्म लेती है। बुध ज्योतिष विद्या में बुध को व्यापार और स्वास्थ्य का कारक बताया गया है। जिस व्यक्ति की कुंडली में बुध अशुभ या कमजोर स्थिति में होता है उस व्यक्ति के दांत कमजोर रहते हैं। उसकी सूंघने की शक्ति कम हो जाती है और एक समय के बाद उसे गुप्त रोग होने की संभावना भी प्रबल हो जाती है। बृहस्पति अगर किसी विद्यार्थी को पढ़ाई में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, किसी के असमय बाल झड़ने शुरू हो गए हैं, अपमान का शिकार होना पड़ रहा है, व्यापार की स्थिति बदतर होती जा रही है, घर में कलह का माहौल बन गया है तो निश्चित तौर पर यह कमजोर बृहस्पति की ओर इशारा करता है। शुक्र ज्योतिष के अनुसार शुक्र ग्रह मौज-मस्ती, भोग-विलास और आलीशान जीवन व्यतीत करवाता है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र सही नहीं है तो उस व्यक्ति के मन में भटकाव अवश्य रहेगा। वह अपने हाथ से धन का नाश करता है, उसे चर्म रोग और स्वप्न दोष होने की संभावना रहती है। शनि शनि धीमी गति का ग्रह है, अगर किसी की कुंडली में शनि पीड़ित या कमजोर होता है तो उस व्यक्ति का हर कार्य बहुत आराम से होता है। अगर आपके मकान का कोई हिस्सा गिर गया है या टूट गया है तो यह कमजोर शनि की ओर इशारा करता है। वाहन से दुर्घटना या धड़ के निचले हिस्से, विषेकर जांघों के हिस्से में परेशानी कमजोर शनि की वजह से होती है। राहु शक, संदेह, मानसिक परेशानियां, आपसी तालमेल में रुकावट, बात-बात पर क्रोधित हो जाना, गुस्से एमं अपशब्द या गाली-गलौज करना, ये सब राहु के परिणाम हैं। कुंडली में राहु के अशुभ होने से हाथ के नाखून टूटने लगते हैं और पेट से संबंधित परेशानियां लग जाती हैं वाहन से दुर्घटना, मस्तिष्क की पीड़ा, दिमागी संतुलन बिगड़ जाना, भोजन या किसी खाद्य पदार्थ में अकसर बाल दिखना, सामाजिक मानहानि होना, ये सभी राहु ग्रह के दुष्प्रभाव हैं। केतु जब किसी व्यक्ति की कुंडली में केतु अशुभ फलदायी होता है तो उसे आर्थिक नुकसान के साथ-साथ चर्म रोग भी हो सकता है। वह व्यक्ति खुद अपने लिए ही गलत धारण बना लेता है जो उसे नुकसान पहुंचाती है।
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प्रेम विवाह के लिए कुंडली में आवश्यक होते हैं ये योग

प्रेम विवाह के लिए कुंडली में आवश्यक होते हैं ये योग

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आजकल अधिकतर युवा वर्ग ये जानना चाहता है कि उसका प्रेम विवाह होगा या नहीं, अगर आप भी इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहते हैं तो अपनी कुंडली में छिपे इस प्रेम विवाह योग के बारे में जानें। अगर आपकी कंडली में प्रेम विवाह योग है तो आपके प्रेम विवाह को कोई नहीं रोक सकता है। चलिए आपको बताते हैं किन योगों के कुडली में होने से प्रेम विवाह होता है...

जन्म कुंडली में विवाह कारक ग्रह पंचम के साथ संबंध बनाता हो अथवा 5 का 2, 7, 11 से संबंध हो तो प्रेम विवाह होता है।

सप्तम भाव का सब लॉर्ड पंचम भाव का प्रबल कार्येश हो तो प्रेम विवाह अवश्य होता है।

जिस जातक के दोनों हाथों पर हृदय रेखा में द्वीप चिन्ह हो और शुक्र रेखा स्वास्थ्य रेखा को काटकर ऊपर जाए, निश्चय ही ऐसे व्यक्ति का अवैध प्रेम संबंध होता है।

जिस जातक के हाथ की हृदय रेखा या बुध क्षेत्र पर जाए, उसका किसी निकट संबंधी या रिश्तेदार से प्रेम संबंध होता है।

 

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ग्रहों के कारक तत्व सभी ग्रह के कारक उस ग्रह के प्रभावों को प्रदर्शित करने में सहायक होते हैं. नौ ग्रहों में से जब कोई भी ग्रह अपने प्रभाव देता है तो उसे समझने के लिए उसके कारकों पर दृष्टि डालनी आवश्यक होती है. सूर्य ग्रह | Sun Planet आत्मा, स्वयं शक्ति, सम्मान, राजा, पिता, राजनीति हडिड्यों, चिक्तित्सा विज्ञान, स्वास्थ्य, ह्रदय, पेट. पित्त , दायीं आँख, रक्त प्रवाह में बाधा गर्मी तथा बिजली इत्यादि का कारक है सूर्य. चंद्र ग्रह | Moon Planet चंद्रमा मन, माता. मानसिक स्थिति, मनोबल, द्रव्य वस्तुओं, चित्त की प्रसन्नता, जलाश्य, यात्रा, सुख शंति, धन संपत्ति का शरीर के तरल पदार्थ, रक्त बायीं आँख, छाती, दिमागी परेशानी, महिलाओं में मासिक चक्र इत्यादि का कारक होता है. मंगल ग्रह | Mars Planet मंगल साहस, वीरता, शौर्य, शक्ति, क्रोध सेनापति, युद्ध, शत्रु अस्त्र-शस्त्र, दुर्घटनाओं, भूमि, अचल संपत्ति, छोटे भाई बहनों, वैज्ञानिक डाक्टर्स, यान्त्रिक कार्यों, पुलिस, सेना, सिर, जानवरों द्वारा काटना, दुर्घटना, जलना, घाव, शल्य क्रिया, आपरेशन, उच्च रक्तचाप, गर्भपात इत्यादि का कारक होता है. बुध ग्रह | Mercury Planet बुध ग्रह बुद्धि चातुर्य, वाणी, मनोविनोद, शिक्षा, गणित, लेखन, तर्क-वितर्क, मुद्रण, ज्योतिष विज्ञान, नृत्य एवं नाटक, वनस्पति, व्यापार, मध्यस्थता कराने वाला, मामा, मित्र, संबंधियों, गला, नाक, कान, फेफड़े, आवाज इत्यादि का कारक है. गुरू ग्रह | Jupiter Planet बृहस्पति जी ज्ञान, विद्वता, शिक्षा, धार्मिक कार्यों, श्रेष्ठजनों का, भक्ति, प्राचीन साहित्य, धन संपत्ति, मान सम्मान, पूर्वजों, पुत्र, बडे़ भाई, फल वाले वृक्षों, शरीर में चर्बी, मधुमेह, चिरकालीन बीमारियों, कान, बैंक, आयकर, खंजाची, राजस्व, मंदिर, धर्मार्थ संस्थाएं, कानूनी क्षेत्र, जज, न्यायाल्य, वकील, लेखापरीक्षक, सम्पादक, प्राचार्य, शिक्षाविद, अध्यापक, शेयर बाजार, पूंजीपति, मंत्री, दार्शनिक, निगम पार्षद, ज्योतिषी, वेदो और शास्त्रों इत्यादि का कारक बनता है. शुक्र ग्रह | Venus Planet शुक्र ग्रह वैवाहिक संबंधों, पत्नि, इन्द्रिय भोग विलास, यौन विषय, सभी प्रकार की सुख स्म्पत्ति, आभूषणों, सुंदरता, सुगंधित वस्तुओं, पुष्पों, सजावत के सामा, कलात्मकता, डिजाइनर वस्तुओं, श्वेत रंग के पदार्थों का, सुन्दर शरीर, बडी आंखे दिखने में आकर्षक, घुंघराले बाल, काव्यात्मक, गाना बजाना, काले बाल, विलासिता, व्यभिचार, शराब, नशीले पदार्थों, कफमय कम खाने वाला, छोटी कद-काठी, दिखने में युवा, गुप्त रोग, आँख, आंतें , अपेंडिक्स, मधुमेह इत्यादि का कारक बनता है. शनि ग्रह | Saturn Planet शनि ग्रह जीवन, आयु, मृत्यु, दुख, दरिद्रता, अनादर, निर्धनता, चापलुस, बीमारी, अनुचित व्यवहार, निम्न स्तर के कार्य, प्राकृतिक आपदाओं, मृत्यु, बुढापे, रोग, पाप, भय, गोपनीयता, कारावास, नौकरी, विज्ञान नियम, तेल-खनिज, कामगार, मजदूर सेवक, सेवाभाव, दासता, कृषि, त्याग, उंचाई से गिरना, अपमान, अकाल, ऋण, कठोर परिश्रम, अनाज के काले दाने, लकडी, विष, टांगें, राख, अपंगता, आत्मत्याग, बाजू, ड्कैती, अवरोध, लकडी, ऊन, यम अछूत, इस्पात, कार्यो में देरी लाना. सेवा विभाग, तेल, खनिज पदार्थों, भूमि से निकलने वाले पदार्थ, विदेशी भाषा, लोभ लालच, अहंकार, चोरी, निर्मम कार, लगंडापन, बुढा़पा, पांव, पंजे की नसें, लसीका तंत्र, लकवा, उदासी, थकान इत्यादि का कारक होता है. राहु ग्रह | Rahu Planet राहु ग्रह पितामह, दादा, विदेश यात्रा, समाज एवं जाती से अलग लोगों, सर्प, सर्प का काटना, त्वचा रोगों, खुजली, हड्डियां , जहर फैलाना, सर्प दंश, क्रानिक बीमारियां, डर विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्राओं, निष्ठुर वाणी युक्त, विदेश में जीवन, अकाल, इच्छाएं, त्वचा पर दाग, चर्म रोग, सरीसृप, सांप और सांप का जहर, महामारी, अनैतिक महिला से संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, दर्द और सूजन,डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों का आदी, जहाज के साथ जलमण्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय, आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग, खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना. जासूसी, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है. केतु ग्रह | Ketu Planet केतु ग्रह रंग बिरंगे धब्बे वाले पशु-पक्षिओं का, कुत्ते, मुर्गा सींग वाले पशु, काला जादु, घाव, जीवाणु, वैराग्य एवं मोक्ष, हकलाना, पहचानने में दिक्कत, आंत, परजीवी, उन्माद, कारावास, विदेशी भूमि में जमीन, कोढ, दासता, आत्महत्या, नाना, दादी, आंखें, तुनकमिजाज, तुच्छ और जहरीली भाषा, लम्बा कद, धुआं जैसा रंग, निरन्तर धूम्रपान करने वाला,घाव, शरीर पर दाग, छरहरा और पतला, दुर्भावपूर्ण अपराधी, गिरा हुआ, साजिश, अलौकिक, दर्शनशास्त्र, वैराग्य, आकस्मिक मृत्यु, बुरी आत्मा, कीडों के कारण होने वाले रोग, विषैला काटना, धर्म, ज्योतिष, अन्तिम उद्वार, औषधियों का प्रयोग करने वाला, मिलावट करके अशुद्ध करने वाला, गिरफ्तारी, दिवालिया, चोट, मैथुन, अपहरण, खून, विष, सजा, कृमि, चोट, अग्निकाण्ड, हत्या और कृपणता इत्यादि का कारक बनता है.
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