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जन्मपत्री में मकान योग

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*जन्म कुंडली में मकान बनाने के योग -* *एक अच्छा घर बनाने की इच्छा हर व्यक्ति के जीवन की चाह होती है. व्यक्ति किसी ना किसी तरह से जोड़-तोड़ कर के घर बनाने के लिए प्रयास करता ही है. कुछ ऎसे व्यक्ति भी होते हैं जो जीवन भर प्रयास करते हैं लेकिन किन्हीं कारणो से अपना घर फिर भी नहीं बना पाते हैं. कुछ ऎसे भी होते हैं जिन्हें संपत्ति विरासत में मिलती है और वह स्वयं कुछ भी नहीं करते हैं. बहुत से अपनी मेहनत से एक से अधिक संपत्ति बनाने में कामयाब हो जाते हैं.जन्म कुंडली के ऎसे कौन से योग हैं जो मकान अथवा भूमि अर्जित करने में सहायक होते हैं, उनके बारे में आज इस लेख के माध्यम से जानने का प्रयास करेगें.* *स्वयं की भूमि अथवा मकान बनाने के लिए चतुर्थ भाव का बली होना आवश्यक होता है, तभी व्यक्ति घर बना पाता है.मंगल को भूमि का और चतुर्थ भाव का कारक माना जाता है, इसलिए अपना मकान बनाने के लिए मंगल की स्थिति कुंडली में शुभ तथा बली होनी चाहिए.मंगल का संबंध जब जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति अपने जीवन में कभी ना कभी खुद की प्रॉपर्टी अवश्य बनाता है.* *मंगल यदि अकेला चतुर्थ भाव में स्थित हो तब अपनी प्रॉपर्टी होते हुए भी व्यक्ति को उससे कलह ही प्राप्त होते हैं अथवा प्रॉपर्टी को लेकर कोई ना कोई विवाद बना रहता है.* *मंगल को भूमि तो शनि को निर्माण माना गया है. इसलिए जब भी दशा/अन्तर्दशा में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ/चतुर्थेश से बनता है और कुंडली में मकान बनने के योग मौजूद होते हैं तब व्यक्ति अपना घर बनाता है.चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव घर का सुख देता है.चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर पाप व अशुभ ग्रहो का प्रभाव घर के सुख में कमी देता है और व्यक्ति अपना घर नही बना पाता है.* *चतुर्थ भाव का संबंध एकादश से बनने पर व्यक्ति के एक से अधिक मकान हो सकते हैं. एकादशेश यदि चतुर्थ में स्थित हो तो इस भाव की वृद्धि करता है और एक से अधिक मकान होते हैं.यदि चतुर्थेश, एकादश भाव में स्थित हो तब व्यक्ति की आजीविका का संबंध भूमि से बनता है.* *कुंडली में यदि चतुर्थ का संबंध अष्टम से बन रहा हो तब संपत्ति मिलने में अड़चने हो सकती हैं.जन्म कुंडली में यदि बृहस्पति का संबंध अष्टम भाव से बन रहा हो तब पैतृक संपत्ति मिलने के योग बनते हैं.* *चतुर्थ, अष्टम व एकादश का संबंध बनने पर व्यक्ति जीवन में अपनी संपत्ति अवश्य बनाता है और हो सकता है कि वह अपने मित्रों के सहयोग से मकान बनाएं.चतुर्थ का संबंध बारहवें से बन रहा हो तब व्यक्ति घर से दूर जाकर अपना मकान बना सकता है या विदेश में अपना घर बना सकता है.* *जो योग जन्म कुंडली में दिखते हैं वही योग बली अवस्था में नवांश में भी मौजूद होने चाहिए.भूमि से संबंधित सभी योग चतुर्थांश कुंडली में भी मिलने आवश्यक हैं.चतुर्थांश कुंडली का लग्न/लग्नेश, चतुर्थ भाव/चतुर्थेश व मंगल की स्थिति का आंकलन करना चाहिए. यदि यह सब बली हैं तब व्यक्ति मकान बनाने में सफल रहता है.* *मकान अथवा भूमि से संबंधित सभी योगो का आंकलन जन्म कुंडली, नवांश कुंडली व चतुर्थांश कुंडली में भी देखा जाता है. यदि तीनों में ही बली योग हैं तब बिना किसी के रुकावटों के घर बन जाता है. जितने बली योग होगें उतना अच्छा घर और योग जितने कमजोर होते जाएंगे, घर बनाने में उतनी ही अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.जन्म कुंडली में यदि चतुर्थ भाव पर अशुभ शनि का प्रभाव आ रहा हो तब व्यक्ति घर के सुख से वंचित रह सकता है. उसका अपना घर होते भी उसमें नही रह पाएगा अथवा जीवन में एक स्थान पर टिक कर नही रह पाएगा. बहुत ज्यादा घर बदल सकता है.* *चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को जमीन से संबंधित कोर्ट-केस आदि का सामना भी करना पड़ सकता है.* *वर्तमान समय में चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बनने पर व्यक्ति बैंक से लोन लेकर या किसी अन्य स्थान से लोन लेकर घर बनाता है.* *चतुर्थ भाव का संबंध यदि दूसरे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपनी माता की ओर से भूमि लाभ होता है.* *चतुर्थ का संबंध नवम से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपने पिता से भूमि लाभ हो सकता है।

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ज्योतिष,
posted Feb 10 by anonymous

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*ॐ श्री परमात्मने नमः ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~: कुंडली में एक से अधिक विवाह का योग कई लोगो के जीवन में सम्बन्ध या विवाह का योग सिर्फ एक ही नहीं होता बल्कि एक से अधिक और कई बार अनेक होता है . कई बार ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति एक सम्बन्ध टूटने के बाद दुसरे सम्बन्ध में पड़ता है परन्तु कई बार तो ऐसी स्थिति होती है कि व्यक्ति एक साथ ही एक से अधिक रिश्तों में रहता है . क्यों होती हैं ऐसी स्थितियां ? कौन से ग्रह और उनकी स्थितियां हैं इसके लिए जिम्मेदार आइये देखते हैं – 1. यदि सप्तमेश अपनी नीच की राशी में हो तो जातक की दो पत्नियां/सम्बन्ध होती हैं. 2. यदि सप्तमेश , पाप ग्रह के साथ किसी पाप ग्रह की राशी में हो और जन्मांग या नवांश का सप्तम भाव शनि या बुध की राशी में हो तो दो विवाह की संभावनाएं होती हैं. 3. यदि मंगल और शुक्र सप्तम भाव में हो या शनि सप्तम भाव में हो और लग्नेश अष्टम भाव में हो तो जातक के तीन विवाह या सम्बन्ध संभव हैं. 4. यदि सप्तमेश सबल हो , शुक्र द्विस्वभाव राशि में हो जिसका अधिपति ग्रह उच्च का हो तो व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियां या बहुत से रिश्ते होंगे . 5. सप्तमेश उच्च का हो या वक्री हो अथवा शुक्र लग्न भाव में सबल एवं स्थिर हो तो जातक की कई पत्नियां/सम्बन्ध होंगी. 6. यदि सप्तम भाव में पाप ग्रह हो, द्वितीयेश पाप ग्रह के साथ हो और लग्नेश अष्टम भाव में हो तो जातक के दो विवाह होंगे. 7. यदि शुक्र जन्मांग या नवांश में किसी पाप ग्रह की युति में अपनी नीच की राशि में हो तो व्यक्ति के दो विवाह निश्चित हैं. 8. यदि सप्तम भाव और द्वितीय भाव में पाप ग्रह हों और इनके भावेश निर्बल हों तो जातक पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह कर लेता है. 9. यदि सप्तम भाव और अष्टम भाव में पाप ग्रह हों मंगल द्वादश भाव में हो और सप्तमेश की सप्तम भाव पर दृष्टि न हो तो जातक की पहली पत्नी की मृत्यु हो जाती है और वह दूसरा विवाह करता है. 10. यदि सप्तमेश और एकादशेश एक ही राशि में हों अथवा एक दुसरे पर परस्पर दृष्टि रखते हों या एक दूसरे से पंचम नवम स्थान में हों तो जातक के कई विवाह होते हैं. 11. यदि सप्तमेश चतुर्थ भाव में हो और नवमेश सप्तम भाव में हो अथवा सप्तमेश और एकादशेश एक दुसरे से केंद्र में हो तो जातक के एक से अधिक विवाह होंगे. यदि द्वितीय भाव और सप्तम भाव में पाप ग्रह हों तथा सप्तमेश के ऊपर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो पति/पत्नी की मृत्यु के कारण जातक को तीन या उससे भी अधिक बार विवाह करना पड़ सकता है . 2.जानिए की शादी तय होकर भी क्यों टूट जाती है- (१)- यदि कुंडली में सातवें घर का स्वामी सप्तमांश कुंडली में किसी भी नीच ग्रह के साथ अशुभ भाव में बैठा हो तो शादी तय नहीं हो पाती है. (२)- यदि दूसरे भाव का स्वामी अकेला सातवें घर में हो तथा शनि पांचवें अथवा दशम भाव में वक्री अथवा नीच राशि का हो तो शादी तय होकर भी टूट जाती है. (३)- यदि जन्म समय में श्रवण नक्षत्र हो तथा कुंडली में कही भी मंगल एवं शनि का योग हो तो शादी तय होकर भी टूट जाती है. (४) यदि मूल नक्षत्र में जन्म हो तथा गुरु सिंह राशि में हो तो भी शादी तय होकर टूट जाती है. किन्तु गुरु को वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए. (५) यदि जन्म नक्षत्र से सातवें, बारहवें, सत्रहवें, बाईसवें या सत्ताईसवें नक्षत्र में सूर्य हो तो भी विवाह तय होकर टूट जाता है. 3.तलाक क्यों हो जाता है- (१)- यदि कुंडली मांगलीक होगी तो विवाह होकर भी तलाक हो जाता है. किन्तु ध्यान रहे किसी भी हालत में सप्तमेश को वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए. (२)- दूसरे भाव का स्वामी यदि नीचस्थ लग्नेश के साथ मंगल अथवा शनि से देखा जाता होगा तो तलाक हो जाएगा. किन्तु मंगल अथवा शनि को लग्नेश अथवा द्वितीयेश नहीं होना चाहिए. (३) यदि जन्म कुंडली का सप्तमेश सप्तमांश कुंडली का अष्टमेश हो अथवा जन्म कुंडली का अष्टमेश सप्तमांश कुंडली का लग्नेश हो एवं दोनों कुंडली में लग्नेश एवं सप्तमेश अपने से आठवें घर के स्वामी से देखे जाते हो तो तलाक निश्चित होगा. (४)- यदि पत्नी का जन्म नक्षत्र ध्रुव संज्ञक हो एवं पति का चर संज्ञक तो तलाक हो जाता है. किन्तु किसी का भी मृदु संज्ञक नक्षत्र नहीं होना चाहिए. (५)- यदि अकेला राहू सातवें भाव में तथा अकेला शनि पांचवें भाव में बैठा हो तो तलाक हो जाता है. किन्तु ऐसी अवस्था में शनि को लग्नेश नहीं होना चाहिए. या लग्न में उच्च का गुरु नहीं होना चाहिए. 4.पति पत्नी का चरित्र- (१)- यदि कुंडली में बारहवें शुक्र तथा तीसरे उच्च का चन्द्रमा हो तो चरित्र भ्रष्ट होता है. (२)- यदि सातवें मंगल तथा शुक्र एवं पांचवें शनि हो तो चरित्र दोष होता है. (३)- नवमेश नीच तथा लग्नेश छठे भाव में राहू युक्त हो तो निश्चित ही चरित्र दोष होता है. (४)- आर्द्रा, विशाखा, शतभिषा अथवा भरनी नक्षत्र का जन्म हो तथा मंगल एवं शुक्र दोनों ही कन्या राशि में हो तो अवश्य ही पतित चरित्र होता है. (५)- कन्या लग्न में लग्नेश यदि लग्न में ही हो तो पंच महापुरुष योग बनता है. किन्तु यदि इस बुध के साथ शुक्र एवं शनि हो तो नपुंसकत्व होता है. (६)- यदि सातवें राहू हो तथा कर्क अथवा कुम्भ राशि का मंगल लग्न में हो तो या लग्न में शनि-मंगल एवं सातवें नीच का कोई भी ग्रह हो तो पति एवं पत्नी दोनों ही एक दूसरे को धोखा देने वाले होते है. 5.विवाह नही होगा अगर- यदि सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है। यदि सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है। यदि सप्तमेश नीच राशि में है। यदि सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है। जब चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों। जब शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों। जब शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों। जब शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो। जब कभी शुक्र, बुध, शनि ये तीनो ही नीच हों। जब पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों। जब सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो। 6. शुभ ग्रह हमेशा शुभ नहीं होते(पति पत्नी में अलगाव के ज्योतिषीय कारण )— ज्योतिषीय नियम है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल का ह्वास और शुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल की समृद्धि होती है। जैसे, मानसागरी में वर्णन है कि केन्द्र भावगत बृहस्पति हजारों दोषों का नाशक होता है। किन्तु, विडंबना यह है कि सप्तम भावगत बृहस्पति जैसा शुभ ग्रह जो स्त्रियों के सौभाग्य और विवाह का कारक है, वैवाहिक सुख के लिए दूषित सिद्ध हुआ हैं। यद्यपि बृहस्पति बुद्धि, ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण एक अति शुभ और पवित्र ग्रह है, मगर कुंडली में सप्तम भावगत बृहस्पति वैवाहिक जीवन के सुखों का हंता है। सप्तम भावगत बृहस्पति की दृष्टि लग्न पर होने से जातक सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान, स्वाभिमानी और कर्मठ तथा अनेक प्रगतिशील गुणों से युक्त होता है, किन्तु ‘स्थान हानि करे जीवा’ उक्ति के अनुसार यह यौन उदासीनता के रूप में सप्तम भाव से संबन्धित सुखों की हानि करता है। प्राय: शनि को विलंबकारी माना जाता है, मगर स्त्रियों की कुंडली के सप्तम भावगत बृहस्पति से विवाह में विलंब ही नहीं होता, बल्कि विवाह की संभावना ही न्यून होती है। यदि विवाह हो जाये तो पति-पत्नी को मानसिक और दैहिक सुख का ऐसा अभाव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता हैं। वैद्यनाथ ने जातक पारिजात, अध्याय 14, श्लोक 17 में लिखा है, ‘नीचे गुरौ मदनगे सति नष्ट दारौ’ अर्थात् सप्तम भावगत नीच राशिस्थ बृहस्पति से जातक की स्त्री मर जाती है। कर्क लग्न की कुंडलियों में सप्तम भाव गत बृहस्पति की नीच राशि मकर होती है। व्यवहारिक रूप से उपयरुक्त कथन केवल कर्क लग्न वालों के लिए ही नहीं है, बल्कि कुंडली के सप्तम भाव अधिष्ठित किसी भी राशि में बृहस्पति हो, उससे वैवाहिक सुख अल्प ही होते हैं। एक नियम यह भी है कि किसी भाव के स्वामी की अपनी राशि से षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान पर स्थिति से उस भाव के फलों का नाश होता है। सप्तम से षष्ठ स्थान पर द्वादश भाव- भोग का स्थान और सप्तम से अष्टम द्वितीय भाव- धन, विद्या और परिवार तथा उनसे प्राप्त सुखों का स्थान है। यद्यपि इन भावों में पाप ग्रह अवांछनीय हैं, किन्तु सप्तमेश के रूप में शुभ ग्रह भी चंद्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र किसी भी राशि में हों, वैवाहिक सुख हेतु अवांछनीय हैं। चंद्रमा से न्यूनतम और शुक्र से अधिकतम वैवाहिक दुख होते हैं। दांपत्य जीवन कलह से दुखी पाया गया, जिन्हें तलाक के बाद द्वितीय विवाह से सुखी जीवन मिला। पुरुषों की कुंडली में सप्तम भावगत बुध से नपुंसकता होती है। यदि इसके संग शनि और केतु की युति हो तो नपुंसकता का परिमाण बढ़ जाता है। ऐसे पुरुषों की स्त्रियां यौन सुखों से मानसिक एवं दैहिक रूप से अतृप्त रहती हैं, जिसके कारण उनका जीवन अलगाव या तलाक हेतु संवेदनशील होता है। सप्तम भावगत बुध के संग चंद्रमा, मंगल, शुक्र और राहु से अनैतिक यौन क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, जो वैवाहिक सुख की नाशक है। ‘‘यदि सप्तमेश बुध पाप ग्रहों से युक्त हो, नीचवर्ग में हो, पाप ग्रहों से दृष्ट होकर पाप स्थान में स्थित हो तो मनुष्य की स्त्री पति और कुल की नाशक होती है।’’सप्तम भाव के अतिरिक्त द्वादश भाव भी वैवाहिक सुख का स्थान हैं। चंद्रमा और शुक्र दो भोगप्रद ग्रह पुरुषों के विवाह के कारक है। चंद्रमा सौन्दर्य, यौवन और कल्पना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण उत्पन्न करता है। दो भोगप्रद तत्वों के मिलने से अतिरेक होता है। अत: सप्तम और द्वादश भावगत चंद्रमा अथवा शुक्र के स्त्री-पुरुषों के नेत्रों में विपरीत लिंग के प्रति कुछ ऐसा आकर्षण होता है, जो उनके अनैतिक यौन संबन्धों का कारक बनता है। यदि शुक्र -मिथुन या कन्या राशि में हो या इसके संग कोई अन्य भोगप्रद ग्रह जैसे चंद्रमा, मंगल, बुध और राहु हो, तो शुक्र प्रदान भोगवादी प्रवृति में वृद्धि अनैतिक यौन संबन्धों की उत्पत्ति करती है। ऐसे व्यक्ति न्यायप्रिय, सिद्धांतप्रिय और दृढ़प्रतिज्ञ नहीं होते बल्कि चंचल, चरित्रहीन, अस्थिर बुद्धि, अविश्वासी, व्यवहारकुशल मगर शराब, शबाब, कबाब, और सौंदर्य प्रधान वस्तुओं पर अपव्यय करने वाले होते हैं। क्या ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन सुखी रह सकता है? कदापि नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों की भांति शुभ ग्रहों की विशेष स्थिति से वैवाहिक सुख नष्ट होते हैं।
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कुंडली मे कुछ विशेष योग- 1. रज्जू योग- सब गृह चर राशियों में हो तो रज्जु योग होता है। इस योग में उत्पन्न मनुष्य भ्रमणशील, सुन्दर, परदेश जाने में सुखी, क्रूर, दुष्ट स्वभाव एवं स्थानांतर में उन्नति करने वाला होता है। 2. मुसल योग- समस्त गृह स्थिर राशियों में हो तो मुसल योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक मानी, ज्ञानी, धनी, राजमान्य, प्रसिद्ध, बहुत, पुत्रवाला, एम्.एल.ऐ एवं शासनाधिकारी होता है। 3. माला योग- बुध, गुरु और शुक्र ४|७|१० वें स्थान में हो और शेष ग्रह इन स्थानों से भिन्न स्थानों में हो तो माला योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, भोजनादि से सुखी, अधिक स्त्रियों से प्रेम करने वाला एवं एम्.पी होता है। पंचायत के निर्वाचन में भी उसे पूर्ण सफलता मिलती है। 4. गदा योग- समीपस्थ दो केंद्र १|४ या ७|१० में समस्त ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है। इस योग वाला जातक धनी, धर्मात्मा, शास्त्राग्य, संगीतप्रिय और पुलिस बिभाग में नौकरी प्राप्त करता है। इस योग वाले जातक का भाग्योदय २८ वर्ष की अवस्था में होता है। 5. शकत योग- लग्न और सप्तम में समस्त ग्रह हों तो शकट योग होता है। इस योग वाला रोगी, मुर्ख, ड्राईवर, स्वार्थी एवं अपना काम निकलने में बहुत प्रवीन होता है। 6. पक्षी योग- चतुर्थ और दशम भाव में समस्त ग्रह हो तो विहंग पक्षी होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक राजदूत, गुप्तचर, भ्रमणशील, कलहप्रिय एवं सामान्यत: धनी होता है। शुभग्रह उक्त स्थान में हो और पापग्रह ३|६|११ वें स्थान में हो तो जातक न्यायाधीश और मंडलाधिकारी होता है। 7. श्रृंगाटक योग- समस्त ग्रह १|५|९ वें स्थान में हो तो श्रृंगाटक योग होता है। इस योग वाला जातक सैनिक, योद्धा, कलहप्रिय, राजकर्मचारी, सुन्दर पत्निवाला एवं कर्मठ होता है। वीरता के कार्यों में इसे सफलता प्राप्त होती है। इस योगवाले का भाग्य २३ वर्ष की अवस्था से उदय हो जाता है। 8. वज्र योग- समस्त शुभग्रह लग्न और सप्तम स्थान में हो अथवा समस्त पापग्रह चतुर्थ और दशम भाव में स्थित हो तो वज्र योग होता है। इस योग वाला वार्धक्य अवस्था में सुखी, शुर-वीर, सुन्दर, भाग्यवाला, पुलिस या सेना में नौकरी करने वाला होता है। 9. कमल योग- समस्त ग्रह १|४|७|१० वें स्थान में हो तो कमल योग होता है। इस योग का जातक धनी, गुनी, दीर्घायु, यशस्वी, सुकृत करने वाला, विजयी, मंत्री या राज्यपाल होता है। कमल योग बहुत ही प्रभावक योग है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति शासनधिकारी अवश्य बनता है। यह सभी के ऊपर शासन करता है। बड़े-बड़े व्यक्ति उससे सलाह लेते है। 10. शक्ति योग- सप्तम भाव से आगे के चार भावो में समस्त ग्रह हों, तो शक्ति योग होता ही। इस योग के होने से जातक धनहीन, निष्फल जीवन, दुखी, आलसी, दीर्घायु, दीर्घसूत्री, निर्दय और छोटा व्यापारी होता ही। शक्तियोग में जन्म लेने वाला व्यक्ति छोटे स्तर की नौकरी भी करता ही। 11. छत्र योग- सप्तम भाव से आगे के सात स्थानों में समस्त ग्रह हो तो छत्र योग होता है। इस योग वाला व्यक्ति धनी, लोकप्रिय, राजकर्मचारी, उच्चपदाधिकारी, सेवक, परिवार के व्यक्तियों का भरण-पोषण करने वाला एवं अपने कार्य में ईमानदार होता है। 12. चक्र योग- लग्न से आरम्भ कर एकांतर से छह स्थानों में-प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम और एकादश भाव में सभी ग्रह हो तो चक्र योग होता है। इस योग वाला जातक राष्ट्रपति या राज्यपाल होता है। चक्र योग राजयोग का ही रूप है, इसके होने से व्यक्ति राजनीति में दक्ष होता है और उसका प्रभुत्व बीस वर्ष की अवस्था के पश्चात बढने लगता है। 13. समुद्र योग- द्वितीय भाव से एकांतर कर छह राशियों में २|४|६|१०|१२ वें स्थान में समस्त ग्रह हो तो समुद्र योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, रहमानी, भोगी, लोकप्रिय, पुत्रवान और वैभवशाली होता है। 14. पाश योग- पांच राशियों में समस्त ग्रह हो तो पाश योग होता है। इस योग के होने से जातक बहुत परिवारवाला, प्रपंची, बन्धनभागी, काराग्रह का अधिपति, गुप्तचर, पुलिस या सेना की नौकरी करने वाला होता है। 15. वीणा योग- सात राशियों में समस्त ग्रह स्थित हो तो वीणा योग होता है। इस योगवाला जातक गीत,नृत्य, वाध से स्नेह करता है। धनी, नेता और राजनीति में सफल संचालक बनता है। 16. गजकेसरी योग- लग्न अथवा चन्द्रमा से यदि गुरु केंद्र में हो और केवल शुभग्रहो से दृष्ट या युत हो तथा अस्त, नीच और शत्रु राशी में गुरु न हो तो गजकेसरी योग होता है। इस योगवाला जातक मुख्यमंत्री बनता है। 17. पर्वत योग- यदि सप्तम और अष्टम भाव में कोई ग्रह नही हो अथवा ग्रह हो भी तो कोई शुभग्रह हो तथा सब शुभग्रह केंद्र में हो तो पर्वत नामक योग होता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति भाग्यवान, वक्ता, शास्त्रग्य, प्राध्यापक, हास्य-व्यंग्य लेखक, यशस्वी, तेजस्वी और मुखिया होता है। मुख्यमंत्री बनाने वाले योगों में भी पर्वत योग की गणना है। 18. मृदंग योग- लग्नेश वली हो और अपने उच्च या स्वगृह में हो तथा अन्य ग्रह केंद्र स्थानों में स्थित हो तो मृदंग योग होता है। इस योग के होने से व्यक्ति शासनाधिकारी होता है। 19. कूर्म योग- शुभग्रह ५|६|७ वें भाव में और पापग्रह १|३|११ वें स्थान में अपने-अपने उच्च में हो तो कूर्म योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति राज्यपाल, मंत्री, धीर, धर्मात्मा, मुखिया और नेता होता है। 20. लक्ष्मी योग- लग्नेश बलवान हो और भाग्येश अपने मूल-त्रिकोण, उच्च या स्वराशी में स्थित होकर केन्द्रस्थ हो तो लक्ष्मी योग होता है। इस योगवाला जातक पराक्रमी, धनी, मंत्री, राज्यपाल एवं गुनी होता है। 21. कलानिधि योग- बुध शुक्र से युत या दृष्ट गुरु २|५ वें भाव में हो या बुध शुक्र की राशि में स्थिति हो तो कलानिधि योग होता है। इस योगवाला गुनी, राजमान्य, सुखी, स्वस्थ, धनी, और विद्वान होता है। 22. केमद्रुम योग- यदि चन्द्रमा के साथ में या उससे द्वितीय, द्वादश स्थान में तथा लग्न से केंद्र में सूर्य को छोड़कर अन्य कोई ग्रह नही हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति दरिद्र और निन्दित होता है। 23. धन-सुख योग- दिन में जन्म होने पर चन्द्रमा अपने या अधिमित्र के नवांश में स्थित हो और उसे गुरु देखता हो तो धन सुख होता है। इसी प्रकार रात्रि में जन्म प्र्ताप्वादी पर चन्द्रमा को शुक्र देखता हो तो धन-सुख योग होता है। यह अपने नामानुसार फल देता है। 24. विशिष्ट योग- जिसके जन्मकाल में बुध सूर्य के साथ अस्त होकर भी अपने ग्रह में हो अथवा अपने मूला त्रिकोण में हो तो जातक विशिष्ट विद्वान होता है। 25. भास्कर योग- यदि सूर्य से द्वितीय भाव में बुध हो। बुध से एकादश भाव में चन्द्रमा और चन्द्रमा से त्रिकोण में वृहस्पति स्थिति हो तो भास्कर योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला मनुष्य पराक्रमी, प्रभुसदृश, रूपवान, गन्धर्व विधा का ज्ञाता, धनी, गणितग्य, धीर और समर्थ होता है। यह योग २४ वर्ष की अवस्था से घटित होने लगता है। 26. इन्द्र योग- यदि चंद्रमा से तृतीय स्थान में मंगल हो और मंगल से सप्तम शनि हो। शनि से सप्तम शुक्र हो और शुक्र से सप्तम गुरु हो तो इन्द्रसंज्ञक योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक प्रसिद्ध शीलवान, गुणवान, राजा के समान धनी, वाचाल और अनेक प्रकार के धन, आभूषण प्राप्त करने वाला होता है। 27. मरुत योग- यदि शुक्र से त्रिकोण में गुरु हो, गुरु से पंचम चंद्रमा और चन्द्रमा से केंद्र में सूर्य हो तो मरुत योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य वाचाल, विशाल ह्रदय, स्थूल उदार, शास्त्र का ज्ञाता, क्रय-विक्रय में निपुण, तेजस्वी, किसी आयोग का सदस्य होता है।
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सरकारी जॉब योग- 1. जन्म-कुंडली में दशम स्थान जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें। 2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं। 3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। 4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है। 5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है। 6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है। 7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है। 8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है। 9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है। 10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है। 11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है। 12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है। 13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है । 14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है । 15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है । 16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है । 17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है । 18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है । 19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो, 20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो। 21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो. 22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो। 23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो। 24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो। 25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा। 26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे मैं जान सकते हैं। 27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है। 28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम्‌ भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है। 29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है। 30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए। 31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए। 32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए। 33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता 34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं। कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम: 1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में 2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में 3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में 4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में 5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में 6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में 7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से । 8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है। 9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है। 10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है। 11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में : जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है। 12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में । 13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है 14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है। 15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।
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ग्रह योग जो छप्पर फाड़ के देते हैं धन यदि आप Rich बनने का सपना देखते हैं, तो अपनी जन्म कुण्डली में इन ग्रह योगों को देखकर उसी अनुसार अपने प्रयासों को गति दें। १ यदि लग्र का स्वामी दसवें भाव में आ जाता है तब जातक अपने माता-पिता से भी अधिक धनी होता है। २ मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है। ३ जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है। ४ शनि ग्रह को छोड़कर जब दूसरे और नवे भाव के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठे होते हैं तब व्यक्ति को धनवान बना देते हैं। ५ जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बना देते हैं। ६ दूसरे भाव का स्वामी यदि ८ वें भाव में चला जाए तो व्यक्ति को स्वयं के परिश्रम और प्रयासों से धन पाता है। ७ यदि दसवें भाव का स्वामी लग्र में आ जाए तो जातक धनवान होता है। ८ सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होने पर व्यक्ति अपार धन पाता है। विशेषकर जब सूर्य और राहू के ग्रहयोग बने। ९ छठे, आठवे और बारहवें भाव के स्वामी यदि छठे, आठवे, बारहवें या ग्यारहवे भाव में चले जाए तो व्यक्ति को अचानक धनपति बन जाता है। १० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति खेल, जुंए, दलाली या वकालात आदि के द्वारा धन पाता है। ११ मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से, खेती से या भवन से आय प्राप्त होती है, जो निरंतर बढ़ती है। १२ गुरु जब कर्क, धनु या मीन राशि का और पांचवे भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति पुत्र और पुत्रियों के द्वारा धन लाभ पाता है। १३ राहू, शनि या मंगल और सूर्य ग्यारहवें भाव में हों तब व्यक्ति धीरे-धीरे धनपति हो जाता है। १४ बुध, शुक और शनि जिस भाव में एक साथ हो वह व्यक्ति को व्यापार में बहुत ऊंचाई देकर धनकुबेर बनाता है १५ दसवें भाव का स्वामी वृषभ राशि या तुला राशि में और शुक्र या सातवें भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति को विवाह के द्वारा और पत्नी की कमाई से बहुत धन लाभ होता है। १६ शनि जब तुला, मकर या कुंभ राशि में होता है, तब आंकिक योग्यता जैसे अकाउण्टेट, गणितज्ञ आदि बनकर धन अर्जित करता है। १७ बुध, शुक्र और गुरु किसी भी ग्रह में एक साथ हो तब व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धनवान होता है। जिनमें पुरोहित, पंडित, ज्योतिष, प्रवचनकार और धर्म संस्था का प्रमुख बनकर धनवान हो जाता है। १८ कुण्डली के त्रिकोण घरों या चतुष्कोण घरों में यदि गुरु, शुक्र, चंद्र और बुध बैठे हो या फिर ३, ६ और ग्यारहवें भाव में सूर्य, राहू, शनि, मंगल आदि ग्रह बैठे हो तब व्यक्ति राहू या शनि या शुक या बुध की दशा में अपार धन प्राप्त करता है। १९ गुरु जब दसर्वे या ग्यारहवें भाव में और सूर्य और मंगल चौथे और पांचवे भाव में हो या ग्रह इसकी विपरीत स्थिति में हो व्यक्ति को प्रशासनिक क्षमताओं के द्वारा धन अर्जित करता है। २० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में केतु को छोड़कर अन्य कोई ग्रह बैठा हो, तब व्यक्ति व्यापार-व्यवसार द्वारा अपार धन प्राप्त करता है। यदि केतु ग्यारहवें भाव में बैठा हो तब व्यक्ति विदेशी व्यापार से धन प्राप्त करता है।
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इंसान के जन्म से मृत्यु तक हृदय लगातार धड़कता रहता है। हृदय की यह गतिशीलता ही इंसान को सक्रिय बनाए रखती है। हृदय का पोषण रक्त और ऑक्सीजन के द्वारा होता है। हमारे शरीर को जीवंत बनाए रखने के लिए हृदय शरीर में लगातार रक्त का प्रवाह करता है। मनुष्य का हृदय एक दिन में लगभग एक लाख बार और एक मिनट में औसतन 60 से 90 बार धड़कता है। हृदय का काम शरीर में रक्त का प्रवाह करना है, इसलिए हृदय का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। आपका हृदय जितना स्वस्थ होगा आपका जीवन उतना ही सुख पूर्वक गुजरेगा। हालांकि आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में कई लोगों को हृदय से संबंधित रोग हो रहे हैं क्योंकि खुद के लिए भी अब लोगों के पास वक्त नहीं है। यही वजह है कि हृदय रोगों का कारण ज्यादातर अव्यवस्थित दिनचर्या या खराब खान-पान होता है, परंतु बहुत से ऐसे ज्योतिषीय कारण भी होते हैं जिनकी वजह से लोगों को हृदय से संबंधित रोग घेर लेते हैं। हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण---- आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताएँगे कि हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण क्या हैं। इसके साथ ही हम आपको कुछ ऐसे ज्योतिषीय उपचार भी बताएंगे जिनकी मदद से आप हृदय रोगों से खुद को बचा सकते हैं। तो आइए अब विस्तार से जानते हैं हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण और उनके उपचार:- चतुर्थ, पंचम भाव और इन भावों के स्वामियों की स्थिति जैसा कि हम सब जानते हैं कि इंसान के शरीर में हृदय बायीं ओर होता है और यह शरीर का वह अंग है जो रक्त को पूरे शरीर में पहुंचाता है। अब अगर ज्योतिष शास्त्र के नजरिये से देखा जाए तो कुंडली में स्थित बारह राशियों में से चतुर्थ राशि यानि कर्क राशि को हृदय का स्थान और पंचम राशि सिंह को इसके सूचक के रुप में देखा जाता है। हृदय से संबंधित किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए जातक की कुंडली में चतुर्थ, पंचम भाव और इन भावों के स्वामियों की स्थिति पर विचार किया जाता है। चौथे और पांचवे भावाें के स्वामियों पर यदि अशुभ ग्रहों की दृष्टि है या वो अशुभ ग्रहों के साथ हैं तो हृदय से जुड़े रोग हो सकते हैं। कुंडली में सूर्य की स्थिति ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य को हृदय का कारक माना जाता है। आपकी जन्म कुंडली में सूर्य का संबंध मंगल, शनि अथवा राहु-केतु के अक्ष में होने पर जातक को हृदय संबंधी विकार होते हैं। सूर्य अगर किसी नीच राशि में स्थित हो तो भी हृदय रोग हो सकते हैं। अगर सूर्य आपकी कुंडली में षष्ठम, अष्टम और द्वादश भावों के स्वामियों से संबंध बना रहा है तो हृदय विकार होने की पूरी संभावना रहती है। इसके अलावा सूर्य के पाप कर्तरी योग में होने पर भी हृदय से जुड़े रोग होते हैं। पाप कर्तरी योग कुंडली में तब बनता है जब किसी भाव के दोनों ओर पाप ग्रह स्थित हों। सिंह राशि के पीड़ित होने पर जिस जातक की कुंडली में सिंह राशि पीड़ित होती है अथवा उस पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है तो जातक को हृदय रोग घेर सकते हैं। इसके साथ ही कुंडली के चतुर्थ और पंचम भाव के पीड़ित होने अथवा उन पर नैसर्गिक पाप ग्रहों अथवा त्रिक (6-8-12) भाव के स्वामी ग्रह का प्रभाव होने पर भी हृदय से जुड़ी परेशानियां आ सकती हैं। चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामियों के दूषित होने पर चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामी यदि अशुभ ग्रहों से युति बनाकर दूषित हो रहे हैं तो भी हृदय रोग होने की संभावनाएं रहती हैं। यदि चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामी तीव्र गति से चलने वाले ग्रहों से दूषित हो रहे हैं तो रोग ज्यादा दिन तक नहीं चलता या रोग बहुत गंभीर नहीं होता। वहीं अगर चतुर्थ, पंचम भाव धीमे चलने वाले ग्रहों से दूषित है तो रोग लंबे समय तक चल सकता है और रोग गंभीर भी हो सकता है। उपरोक्त ग्रह स्थिति होने पर इन ग्रहों की दशा और अंतर्दशा के दौरान हृदय रोग की संभावना बनी रहती है। इसलिए ऐसे जातकों को ग्रहों की दशा और अंतर्दशा के दौरान सावधान रहना चाहिए। सूर्य ग्रह को प्रबल करने के लिए सूर्य ग्रह की शांति के उपाय हृदय रोग के ज्योतिषीय उपचार ज्योतिष एक ऐसा विज्ञान है जिसके द्वारा जीवन में आने वाली परेशानियों को तो हल किया ही जाता है, साथ ही साथ ज्योतिष शास्त्र हमें स्वस्थ जीवन जीने के लिए भी कई महत्वपूर्ण सुझाव उपलब्ध करता है। ज्योतिष शास्त्र की मदद से आप आने वाली मुश्किलों का भी पहले ही आकलन कर सकते हैं और जिन समस्याओं से आप जूझ रहे हैं उनका भी हल पा सकते हैं। ऐसे में आज हम आपको बताएँगे कि कैसे हम ज्योतिषीय उपचारों का इस्तेमाल करके हृदय संबंधी विकारों या रोगों से बच सकते हैं। हृदय रोग से जुड़े ज्योतिषीय उपचार नीचे दिए गए हैं:- सूर्य को जल चढ़ाएँ हृदय को स्वस्थ रखने के लिए आपकी कुंडली में सूर्य का अनुकूल अवस्था में होना बहुत जरूरी है। यदि आपकी कुंडली में सूर्य की स्थिति अनुकूल नहीं है तो आपको प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल भरकर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भी आपको हृदय से जुड़े विकारों को दूर करने में मदद मिलेगी। चतुर्थ और पंचम भाव के अपने स्वामी ग्रहों को करें मजबूत हृदय रोगों से बचने के लिए आपको अपनी कुंडली के चतुर्थ और पंचम भाव के स्वामी ग्रहों को जानकर उनको मजबूत करना चाहिए। इसके लिए आप उन ग्रहों के बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं या उन ग्रहों से संबंधित रत्नों को धारण कर सकते हैं। सूर्य के बीज मंत्र का करें जाप हृदय रोगों से मुक्ति पाने के लिए सूर्य देव के बीज मंत्र का नियमित पाठ करना भी लाभकारी होता है। सूर्य का बीज मंत्र नीचे दिया गया है: “मंत्र – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः” अपने इष्ट देव की करें पूजा अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करना भी आपके लिए शुभ फलदायी रहता है और इससे हृदय से जुड़ी परेशानियां दूर हो जाती हैं। लेकिन आपको इस बात का ख़ास ख्याल रखना है कि इष्ट देव की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाए। इसमें किसी भी तरह की चूक न हो। इसके अतिरिक्त श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करें अथवा भगवान विष्णु की उपासना करें। श्वेतार्क वृक्ष सिंचित करें श्वेतार्क वृक्ष लगाएँ और उसको जल से सिंचित करें इससे आपको लाभ होगा। यह वृक्ष हृदय रोगों को दूर करता है! **************
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