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ज्योतिष एवं चिकित्सा #MEDICAL ASTROLOGY

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ज्योतिष एवं चिकित्सा ज्योतिष शास्त्र भविष्य दर्शन की आध्यात्मिक विद्या है। भारतवर्ष में चिकित्साशास्त्र (आयुर्वेद) का ज्योतिष से बहुत गहरा संबंध है। होमियोपैथ की उत्पत्ति भी ज्योतिष शास्त्र के आधार पर ही हुआ है I जन्मकुण्डली व्यक्ति के जन्म के समय ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रह नक्षत्रों का मानचित्र होती है, जिसका अध्ययन कर जन्म के समय ही यह बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति को उसके जीवन में कौन-कौन से रोग होंगे। चिकित्सा शास्त्र व्यक्ति को रोग होने के पश्चात रोग के प्रकार का आभास देता है। आयुर्वेद शास्त्र में अनिष्ट ग्रहों का विचार कर रोग का उपचार विभिन्न रत्नों का उपयोग और रत्नों की भस्म का प्रयोग कर किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बताई गई है। अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है। ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव दूर करने के लिये रत्न धारण करने की बिल्कुल सार्थक है। इसके पीछे विज्ञान का रहस्य छिपा है और पूजा विधान भी विज्ञान सम्मत है। ध्वनि तरंगों का प्रभाव और उनका वैज्ञानिक उपयोग अब हमारे लिये रहस्यमय नहीं है। इस पर पर्याप्त शोध किया जा चुका है और किया जा रहा है। आज के भौतिक और औद्योगिक युग में तरह-तरह के रोगों का विकास हुआ है। रक्तचाप, डायबिटीज, कैंसर, ह्वदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, माईग्रेन आदि औद्योगिक युग की देन है। इसके अतिरिक्त भी कई बीमारियां हैं, जिनकी न तो चिकित्सा शास्त्रियों को जानकारी है और न उनका उपचार ही सम्भव हो सका है। ज्योतिष शास्त्र में बारह राशियां और नवग्रह अपनी प्रकृति एवं गुणों के आधार पर व्यक्ति के अंगों और बीमारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जन्मकुण्डली में छठा भाव बीमारी और अष्टम भाव मृत्यु और उसके कारणों पर प्रकाश डालते हैं। बीमारी पर उपचारार्थ व्यय भी करना होता है, उसका विचार जन्मकुण्डली के द्वादश भाव से किया जाता है। इन भावों में स्थित ग्रह और इन भावों पर दृष्टि डालने वाले ग्रह व्यक्ति को अपनी महादशा, अंतर्दशा और गोचर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। इन बीमारियों का कुण्डली से अध्ययन करके पूर्वानुमान लगाकर अनुकूल रत्न धारण करने, ग्रहशांति कराने एवं मंत्र आदि का जाप करने से बचा जा सकता है। जन्म कुंडली मे 12 भावों से रोग विचार जन्म कुंडली के 12 भावों से रोगों की पहचान की जाती और घटनाओं का आंकलन भी किया जाता है. जन्म कुंडली के पहले भाव से लेकर बारहवें भाव तक शरीर के विभिन्न अंगों को देखा जाता है और जिस अंग में पीड़ा होती है तो उस अंग से संबंधित भाव अथवा भावेश की भूमिका रोग देने में सक्षम रहती है अथवा उस भाव से संबंधित दशा में योग बनते हैं. जन्म कुंडली के किस भाव से कौन से रोग का विचार किया जाता है, उन सभी बातों की चर्चा इस लेख के माध्यम से की जाएगी. प्रथम भाव – 1st House In जन्म कुंडली के पहले भाव से सिर दर्द, मानसिक रोग, नजला तथा दिमागी कमजोरी का विचार किया जाता है. इस भाव से व्यक्ति के समस्त स्वास्थ्य का पता लगता है कि वह मानसिक अथवा शारीरिक रुप से स्वस्थ रहेगा अथवा नहीं. दूसरा भाव – 2nd House जन्म कुंडली के दूसरे भाव को मारक भाव भी कहा जाता है. इस भाव से नेत्र रोग, कानों के रोग, मुँह के रोग, नासा रोग, दाँतों के रोग, गले की खराबी आदि का विश्लेषण किया जाता है. तीसरा भाव – 3rd House जन्म कुंडली के तीसरे भाव से कण्ठ की खराबी, गण्डमाला, श्वास, खाँसी, दमा, फेफड़े के रोग, हाथ में होने वाले विकार जैसे लूलापन आदि देखा जाता है. चौथा भाव – 4th House इस भाव से छाती, हृदय एवं पसलियों के रोगों का विचार किया जाता है. मानसिक विकारों अथवा पागलपन आदि का विचार भी इस भाव से किया जाता है. पांचवाँ भाव – 5th House इस भाव से मन्दाग्नि, अरुचि, पित्त रोग, जिगर, तिल्ली तथा गुर्दे के रोगों का विचार किया जाता है. इस भाव से नाभि से ऊपपर का पेट देखा जाता है तो पेट से जुड़े रोग भी यहाँ से देखे जाते हैं. छठा भाव – 6th House इस भाव से नाभि के नीचे का हिस्सा देखा जाता है तो इस स्थान से जुड़े रोगों को इस भाव से देखा जाएगा. कमर को भी इस भाव से देखा जाता है तो कमर से जुड़े रोग भी यहाँ से देखेगें. इस भाव से किडनी से संबंधित रोग भी देखे जाते है. अपेन्डिक्स, आँतों की बीमारी, हर्निया आदि का विचार किया जाता है. सातवाँ भाव – 7th House इस भाव से प्रमेह, मधुमेह, प्रदर, उपदंश, पथरी, (मतान्तर से मधुमेह तथा पथरी को छठे भाव से भी देखा जाता है) गर्भाशय के रोग, बस्ति में होने वाले रोगों का विचार किया जाता है. आठवाँ भाव – 8th House जन्म कुंडली के आठवें भाव को गुप्त स्थान भी माना जाता है इसलिए इस भाव से गुप्त रोग अर्थात जनेन्द्रिय से जुड़े रोग हो सकते हैं. वीर्य-विकार, अर्श, भगंदर, उपदंश, संसर्गजन्य रोग, वृषण रोग तथा मूत्रकृच्छ का विचार किया जाता है. नवम भाव – 9th House कुंडली के नवम भाव से स्त्रियों के मासिक धर्म संबंधी रोग देखे जाते हैं. यकृत दोष, रक्त विकार, वायु विकार, कूल्हे का दर्द तथा मज्जा रोगों का विचार किया जाता है. दशम भाव – 10th House जन्म कुंडली के दशम भाव से गठिया, कम्पवात, चर्म रोग, घुटने का दर्द तथा अन्य वायु विकारों का आंकलन किया जाता है. एकादश भाव – 11th House कुंडली के एकादश भाव से पैर में चोट, पैर की हड्डी टूटना, पिंडलियों में दर्द, शीत विकार तथा रक्त विकार देखे जाते हैं. बारहवाँ भाव – 12th House कुंडली के इस भाव से असहिष्णुता अर्थात एलर्जी, कमजोरी, नेत्र विकार, पोलियो, शरीर में रोगों के प्रति प्रतिरोध की क्षमता की कमी का विचार किया जाता है. जन्म कुंडली में राशि व उनसे होने वाले रोग मेष – Aries : सेलेब्रिटीज और हाई क्लास के लोगों को उनकी जीवनशैली के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर इस राशि के लोग स्वस्थ रहते हैं क्योंकि उनका स्वामी ग्रह मंगल होता है, जो रोगों से लड़ने में सहायक सिद्ध होता है। मगर फिर भी इन्हें सिर से संबंधित कष्टों के होने का डर रह सकता है। जैसे सिरदर्द, लकवा, मिर्गी, अनिद्रा। इन्हें चोट और दुर्घटना से भी संभलकर रहने की जरूरत होती है। वृषभ – Taurus : वृषभ इस राशि के लोग आराम पसंद होते हैं। अपनी जीवनशैली के कारण इन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना होता है। वृद्धवस्था में इन्हें अधिक परेशानी होती है। जीवनशैली संतुलित रखकर यह रोग को अपके काफी हद तक दूर रह सकते हैं। इस राशि के लोगों के गले, वॉकल कॉर्ड और थॉयराइड ग्लैंड्स पर वृषभ का स्वामित्व होता है। मेडिकल एस्ट्रोलॉजी के अनुसार, उनके गले में परेशानी होने के साथ ही थॉयराइड, टॉन्सिल, पायरिया, लकवा, जीभ एवं हड्डियों के रोग की आशंका रहती है। हालांकि, ग्रह अच्छे बैठे हों, तो वे शानदार गायक बनते हैं। मिथुन – Gemini : ये लोग बातें करते हुए हाथों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। इनके इशारों की अपनी लैंग्वेज होती है।राशि के लोग ज्यादातर कलात्मक क्षेत्र से जुड़े होते हैं, जिनमें मन-मस्तिष्क के बेहतर तालमेल की जरूरत होती है। जब कभी इनके ऊपर अशुभ ग्रह का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो इनके कमजोर पाचन तंत्र को भी वह प्रभावित करता है और इससे संबंधित रोग की आशंका रहती है। इन्हें सिरदर्द व रक्तचाप संबंधी बीमारियों का भी सामना करना पड़ सकता है। जीभ और श्वास संबंधी रोग की भी आशंका रहती है। इन्हें नर्वस सिस्टम से संबंधित परेशानी होने का खतरा अधिक होता है, जिसमें उन्हें सांस लेने में परेशानी और घबराहट की समस्या हो सकती है। कर्क – Cancer : इन्हें अपने भोजन का खास ध्यान रखने की आवश्यकता होती है। इन्हें चटपटा भोजन काफी पसंद होता है जिससे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह काफी कल्पनाशील प्रकृति के भी होते हैं। इन्हें हृदय, फेफड़ों, स्तन और रक्त संबंधी समस्याओं के प्रति सजग रहने की जरूरत होती है। छाती, स्तन और पेट पर इस राशि का अधिकार होता है। इन्हें अपच की परेशानी होती है और खान-पान संबंधी अन्य परेशानियां भी हो सकती हैं, जो पेट से जुड़ी हुई हों। सिंह – Leo : शेर जैसे दिल वाले इस राशि के लोगों को दिल की परेशानी सिंह राशि के जातक स्वभाव से काफी संवेदनशील होते हैं। इसलिए अपने मन के मुताबिक चीजें न होने की वजह से इन्हें मानसिक रोग होने की आशंका रहती है। इसके अलावा इस राशि के लोगों को रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बीमारी या चोट लगने का भी खतरा रहता है। इस राशि के लोगों को दिन में एक दो बार तो उल्टा खड़ा होना चाहिए, ताकि उनके खून का दौड़ाव सही हो सके और वे रीढ़ की हड्डी को फिर से सही रख सकें। कन्या – Virgo : इस राशि के लोगों को कब्ज की परेशानी हो सकती है। हड्डी, मांसपेशियों, फेफड़ो, पाचन तंत्र और आंत से संबंधित बीमारियां होने की आशंका होती है। इन्हें अपने खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इनका शरीर लगातार गैर-जरूरी चीजों को बाहर करने में ही लगा रहता है। तुला – Libra : इस राशि के जातक संतुलन बनाना अच्छी तरह जानते हैं। जीवन में संतुलन बनाने के लिए तुला इतने जुनूनी हो सकते हैं कि वे भीतर के संतुलन को खो सकते हैं। उन्हें त्वचा और पीठ के दर्द की परेशानी हो सकती है। राशि के जातकों को आंत से लेकर जांघ तक शरीर के विभिन्न हिस्सों से संबंधित रोगों के होने की आशंका रहती है। इसके अलावा यह अस्थमा, एलर्जी, फ्लू जैसी परेशानियों का भी सामना कर सकते हैं। वृश्चिक – Scorpius : इस राशि के लोग अंतरंग संबंधों को लेकर काफी सक्रिय होते हैं। लिहाजा इनके प्रजनन अंग और यौन बीमारियों के होने की आशंका अधिक होती है। इस राशि के जातकों को यूटीआई, यीस्ट इंफेक्शन, और बैक्टीरियल इंफेक्शन से ग्रस्त होने , पाचन संबंधी रोगों के होने की आशंका रहती है। जिस वजह से कुछ लोग अपने अवसाद को मिटाने के लिए संयमित खानपान नहीं कर पाते हैं, जिसका सीधा असर इनके वजन पर पड़ता है। आमतौर पर इन्हें अनिद्रा, प्रजनन, मूत्र, रक्त संबंधी रोगों के प्रति सचेत रहना चाहिए। धनु – Sagittarius : इन्हें पार्टी करना और घूमना काफी पसंद होता है। वे हमेशा बाहर जाते हैं धनु राशि के लोग जीवन में बड़ी से बड़ी परेशानियों का हंसकर सामना करने में यकीन करते हैं। और नई जगहों की तलाश में हमेशा लगे रहते हैं। इन्हें कूल्हों, जांघों और लिवर से संबंधित परेशानी हो सकती है। मकर – Capricornus : मकर इनकी राशि में सूर्य कमजोर रहने के चलते जीवन में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। इन्हें लगता है कि सारी दुनिया का बोझ इन्हीं के कंधों पर है और ये उसी तरह काम करते हैं।मगर, उनकी इसी आदत के चलते हृदय रोग, जोड़ों, घुटनों या पैरों की हड्डी टूटने या गंभीर चोट आने का खतरा भी रहता है। इस राशि के लोगों की त्वचा भी काफी संवेदनशील होती है। कुंभ – Aquarius : इस राशि के लोगों को किसी भी तरह के संक्रमण होने का खतरा अधिक रहता है। जिस वजह से आमतौर पर इन्हें रक्त, गले संबंधी इन्फेक्शन से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इस राशि के लोगों को श्वास, टखने, पैर, कान और नर्वस सिस्टम संबंधी रोग होने की आशंका रहती है। मीन – Pisces : इस राशि के लोग नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने वाले होते हैं, जिससे उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित हो सकती है। ये लोग ड्रग्स, शराब या अन्य किसी नशे के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। इन लोगों को पैरों और लसीका तंत्र से संबंधित परेशानी हो सकती है। रक्त और आंख संबंधी रोगों के प्रति सचेत रहने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा इनके फेफड़े कमजोर होने के चलते अस्थमा, एलर्जी या फ्लू की शिकायत भी रह सकती है। बदलते मौसम में इन्हें अपना खास ध्यान रखने की जरूरत होती है। जन्म कुंडली में ग्रहो से संबंधित होने वाले रोग व उपाय चिकित्सा ज्योतिष में हर ग्रह शरीर के किसी ना किसी अंग से संबंधित होता है. कुंडली में जब संबंधित ग्रह की दशा होती है और गोचर भी प्रतिकूल चल रहा होता है तब उस ग्रह से संबंधित शारीरिक समस्याओं व्यक्ति को होकर गुजरना पड़ सकता है. आइए ग्रह और उनसे संबंधित शरीर के अंग व होने वाले रोगों के बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं. सूर्य | Sun Planet सूर्य को हड्डी का मुख्य कारक माना गया है. इसके अधिकार क्षेत्र में पेट, दांई आँख, हृदय, त्वचा, सिर तथा व्यक्ति का शारीरिक गठन आता है. जब जन्म कुंडली में सूर्य की दशा चलती है तब इन्हीं सभी क्षेत्रों से संबंधित शारीरिक कष्ट व्यक्ति को प्राप्त होते हैं. यदि जन्म कुंडली में सूर्य निर्बली है तभी इससे संबंधित बीमारियाँ होने की संभावना बनती है अन्यथा नहीं. इसके अतिरिक्त व्यक्ति को तेज बुखार, कोढ़, दिमागी परेशानियाँ व पुराने रोग होने की संभावनाएँ सूर्य की दशा/अन्तर्दशा में होने की संभावना बनती है. चंद्रमा | Moon Planet चंद्रमा को मुख्य रुप से मन का कारक ग्रह माना गया है. यह ह्रदय, फेफड़े, बांई आँख, छाती, दिमाग, रक्त, शरीर के तरल पदार्थ, भोजन नली, आंतो, गुरदे व लसीका वाहिनी का भी कारक माना गया है. इनसे संबंधित बीमारियों के अतिरिक्त गर्भाशय के रोग हो सकते हैं. नींद कम आने की बीमारी हो सकती है. बुद्धि मंद भी चंद्रमा के पीड़ित होने पर हो सकती है. दमा, अतिसार, खून आदि की कमी चंद्रमा के अधिकार में आती है. जल से होने वाले रोगों की संभावना बनती है. बहुमूत्र, उल्टी, महिलाओ में माहवारी आदि की गड़बड़ भी चंद्रमा के कमजोर होने पर हो सकती हैं. अपेन्डिक्स, स्तनीय ग्रंथियों के रोग, कफ तथा सर्दी से जुड़े रोग हो सकते हैं. अंडवृद्धि भी चंद्रमा के कमजोर होने पर होती है. मंगल | Mars Planet मंगल के अधिकार में रक्त, मज्जा, ऊर्जा, गर्दन, रगें, गुप्तांग, गर्दन, लाल रक्त कोशिकाएँ, गुदा, स्त्री अंग तथा शारीरिक शक्ति आती है. मंगल यदि कुंडली में पीड़ित हो तब इन्हीं से संबंधित रोग मंगल की दशा में हो सकते हैं. इसके अतिरिक्त सिर के रोग, विषाक्तता, चोट लगना व घाव होना सभी मंगल से संबंधित हैं. आँखों का दुखना, कोढ़, खुजली होना, रक्तचाप होना, ऊर्जाशक्ति का ह्रास होना, स्त्री अंगों के रोग, हड्डी का चटक जाना, फोडे़-फुंसी, कैंसर, टयूमर होना, बवासीर होना, माहवारी बिगड़ना, छाले होना, आमातिसार, गुदा के रोग, चेचक, भगंदर तथा हर्णिया आदि रोग हो सकते हैं. यह रोग तभी होगें जब कुंडली में मंगल पीड़ित अवस्था में हो अन्यथा नहीं. बुध | Mercury Planet बुध के अधिकार क्षेत्र में छाती, स्नायु तंत्र, त्वचा, नाभि, नाक, गाल ब्लैडर, नसें, फेफड़े, जीभ, बाजु, चेहरा, बाल आदि आते हैं. बुध यदि कुंडली में पीड़ित है तब इन्हीं क्षेत्रो से संबंधित बीमारी होने की संभावना बली होती है. इसके अलावा छाती व स्नायु से जुड़े रोग हो सकते हैं. मिर्गी रोग होने की संभावना बनती है. नाक व गाल ब्लैडर से जुड़े रोग हो सकते हैं. टायफाईड होना, पागलपन, लकवा मार जाना, दौरे पड़ना, अल्सर होना, कोलेरा, चक्कर आना आदि रोग होने की संभावना बनती है. बृहस्पति | Jupiter Planet बृहस्पति के अन्तर्गत जांघे, चर्बी, मस्तिष्क, जिगर, गुरदे, फेफड़े, कान, जीभ, स्मरणशक्ति, स्पलीन आदि अंग आते हैं. कुंडली में बृहस्पति के पीड़ित होने पर इन्हीं से संबंधित बीमारियाँ होने की संभावना बनती है. कानों के रोग, बहुमूत्र, जीभ लड़खड़ाना, स्मरणशक्ति कमजोर हो जाना, पेनक्रियाज से जुड़े रोग हो सकते हैं. स्पलीन व जलोदर के रोग, पीलिया, टयूमर, मूत्र में सफेद पदार्थ का आना, रक्त विषाक्त होना, अजीर्ण व अपच होना, फोड़ा आदि होना सभी बृहस्पति के अन्तर्गत आते हैं. डायबिटिज होने में बृहस्पति की भूमिका होती है. शुक्र | Venus Planet शुक्र के अन्तर्गत चेहरा, आंखों की रोशनी, गुप्तांग, मूत्र, वीर्य, शरीर की चमक व आभा, गला, शरीर व ग्रंथियों में जल होना, ठोढ़ी आदि आते हैं. शुक्र के पीड़ित होने व इसकी दशा/अन्तर्दशा आने पर इनसे संबंधित बीमारियाँ हो सकती है. किडनी भी शुक्र के ही अधिकार में आती है इसलिए किडनी से संबंधित रोग भी हो सकते हैं. आँखों की रोशनी का कारक शुक्र होता है इसलिए इसके पीड़ित होने पर नजर कमजोर हो जाती है. यौन रोग, गले की बीमारियाँ, शरीर की चमक कम होना, नपुंसकता, बुखार व ग्रंथियों में रोग होना, सुजाक रोग, उपदंश, गठिया, रक्त की कमी होना आदि रोग शुक्र के पीड़ित होने पर होते हैं. शनि | Saturn Planet शनि के अधिकार क्षेत्र में टांगे, जोड़ो की हड्डियाँ, मांस पेशियाँ, अंग, दांत, त्वचा व बाल, कान, घुटने आदि आते हैं. शनि के पीड़ित होने व इसकी दशा होने पर इन्हीं से संबंधित रोग हो सकते हैं. शारीरिक कमजोरी होना, मांस पेशियों का कमजोर होना, पेटदर्द होना, अंगों का घायल होना, त्वचा व पाँवों के रोग होना, जोड़ो का दर्द, अंधापन, बाल रुखे होना, मानसिक चिन्ताएँ होना, लकवा मार जाना, बहरापन आदि शनि के पीड़ित होने पर होता है. राहु | Rahu Planet राहु के अधिकार में पांव आते है, सांस लेना आता है, गरदन आती है. फेफड़ो की परेशानियाँ होती है. पाँवो से जुड़े रोग हो सकते हैं. अल्सर होता है, कोढ़ हो सकता है, सांस लेने में तकलीफ हो सकती है. फोड़ा हो सकता है, मोतियाबिन्द होता है, हिचकी भी राहु के कारण होती है. हकलाना, स्पलीन का बढ़ना, विषाक्तता, दर्द होना, अण्डवृद्धि आदि रोग राहु के कारण होते हैं. यह कैंसर भी देता है. केतु | Ketu Planet इसके अधिकार में उदर व पंजे आते हैं. फेफड़ो से संबंधित बीमारियाँ देता है. बुखार देता है, आँतों में कीड़े केतु के कारण होते हैं. वाणी दोष भी केतु की वजह से ही होता है. कानों में दोष भी केतु से होता है. आँखों का दर्द, पेट दर्द, फोड़े, शारीरिक कमजोरी, मस्तिष्क के रोग, वहम होना, न्यून रक्तचाप सभी केतु की वजह से होने वाले रोग होते हैं. केतु के कारण कुछ रोग ऎसे भी होते हैं जिनके कारणों का पता कभी नहीं चल पाता है. शास्त्रों के कुछ प्रमुख सूत्र : कुंडली में ग्रहों की स्थिति पूरे जीवन में होने वाले रोगों की जानकारी देती हैं। जीवन में होने वाले रोगों को जानने के लिए ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए हमारे शास्त्रों मे कई सूत्र दिए हैं। जिनमें से कुछ प्रमुख सूत्र इस प्रकार से हैं : ज्योतिष में रोग विचार : ★ षष्ठ स्थान ★ ग्रहों की स्थिति ★ राशियां ★ कारकग्रह भावों का विश्लेषण : ◆ प्रथम भाव : प्रथम भाव से शारीरिक कष्टों की एवं स्वास्थ्य का विचार होता है। ◆ द्वितीय भाव : द्वितीय भाव आयु का व्ययसूचक हैं। ◆ तृतीय भाव : तृतीय भाव से आयु का विचार होता है। ◆ षष्ठ भाव : स्वास्थ्य , रोग के लिए । षष्ठ भाव का कारक मंगल, बुध । ◆ सप्तम भाव : सप्तम भाव आयु का व्ययसूचक हैं। ◆ अष्टम भाव : अष्टम भाव का कारक गृह शनि एवं मंगल हैं। इस भाव से आयु एवं मृत्यु के कारक रोग का विचार होता है। ◆ द्वादश भाव : द्वादश भाव रोग शारीरिक शक्ति की हानि के साथ साथ रोगों का उपचार स्थल भी है। भाव स्वामी की स्थिति से रोग : षष्ठ, अष्टम एवं द्वादश भाव के स्वामी जिस भाव में होते है उससे संबद्ध अंग में पीड़ा हो सकती है। किसी भी भाव का स्वामी ६, ८ या १२वें में स्थित हो तो उस भाव से सम्बंधित अंगों में पीड़ा होती है। रोगों के कारण : ■ यदि लग्न एवं लग्नेश की स्थिति अशुभ हो। ■ यदि चंद्रमा का क्षीर्ण अथवा निर्बल हो या चन्द्रलग्न में पाप ग्रह बैठे हों । ■ यदि लग्न, चन्द्रमा एवं सूर्य तीनों पर ही पाप अथवा अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो। ■ यदि पाप ग्रह का शुभ ग्रहों की अपेक्षा अधिक बलवान हों।

References

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posted Mar 15 by Rakesh Periwal

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कुंडली मे कुछ विशेष योग- 1. रज्जू योग- सब गृह चर राशियों में हो तो रज्जु योग होता है। इस योग में उत्पन्न मनुष्य भ्रमणशील, सुन्दर, परदेश जाने में सुखी, क्रूर, दुष्ट स्वभाव एवं स्थानांतर में उन्नति करने वाला होता है। 2. मुसल योग- समस्त गृह स्थिर राशियों में हो तो मुसल योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक मानी, ज्ञानी, धनी, राजमान्य, प्रसिद्ध, बहुत, पुत्रवाला, एम्.एल.ऐ एवं शासनाधिकारी होता है। 3. माला योग- बुध, गुरु और शुक्र ४|७|१० वें स्थान में हो और शेष ग्रह इन स्थानों से भिन्न स्थानों में हो तो माला योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, भोजनादि से सुखी, अधिक स्त्रियों से प्रेम करने वाला एवं एम्.पी होता है। पंचायत के निर्वाचन में भी उसे पूर्ण सफलता मिलती है। 4. गदा योग- समीपस्थ दो केंद्र १|४ या ७|१० में समस्त ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है। इस योग वाला जातक धनी, धर्मात्मा, शास्त्राग्य, संगीतप्रिय और पुलिस बिभाग में नौकरी प्राप्त करता है। इस योग वाले जातक का भाग्योदय २८ वर्ष की अवस्था में होता है। 5. शकत योग- लग्न और सप्तम में समस्त ग्रह हों तो शकट योग होता है। इस योग वाला रोगी, मुर्ख, ड्राईवर, स्वार्थी एवं अपना काम निकलने में बहुत प्रवीन होता है। 6. पक्षी योग- चतुर्थ और दशम भाव में समस्त ग्रह हो तो विहंग पक्षी होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक राजदूत, गुप्तचर, भ्रमणशील, कलहप्रिय एवं सामान्यत: धनी होता है। शुभग्रह उक्त स्थान में हो और पापग्रह ३|६|११ वें स्थान में हो तो जातक न्यायाधीश और मंडलाधिकारी होता है। 7. श्रृंगाटक योग- समस्त ग्रह १|५|९ वें स्थान में हो तो श्रृंगाटक योग होता है। इस योग वाला जातक सैनिक, योद्धा, कलहप्रिय, राजकर्मचारी, सुन्दर पत्निवाला एवं कर्मठ होता है। वीरता के कार्यों में इसे सफलता प्राप्त होती है। इस योगवाले का भाग्य २३ वर्ष की अवस्था से उदय हो जाता है। 8. वज्र योग- समस्त शुभग्रह लग्न और सप्तम स्थान में हो अथवा समस्त पापग्रह चतुर्थ और दशम भाव में स्थित हो तो वज्र योग होता है। इस योग वाला वार्धक्य अवस्था में सुखी, शुर-वीर, सुन्दर, भाग्यवाला, पुलिस या सेना में नौकरी करने वाला होता है। 9. कमल योग- समस्त ग्रह १|४|७|१० वें स्थान में हो तो कमल योग होता है। इस योग का जातक धनी, गुनी, दीर्घायु, यशस्वी, सुकृत करने वाला, विजयी, मंत्री या राज्यपाल होता है। कमल योग बहुत ही प्रभावक योग है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति शासनधिकारी अवश्य बनता है। यह सभी के ऊपर शासन करता है। बड़े-बड़े व्यक्ति उससे सलाह लेते है। 10. शक्ति योग- सप्तम भाव से आगे के चार भावो में समस्त ग्रह हों, तो शक्ति योग होता ही। इस योग के होने से जातक धनहीन, निष्फल जीवन, दुखी, आलसी, दीर्घायु, दीर्घसूत्री, निर्दय और छोटा व्यापारी होता ही। शक्तियोग में जन्म लेने वाला व्यक्ति छोटे स्तर की नौकरी भी करता ही। 11. छत्र योग- सप्तम भाव से आगे के सात स्थानों में समस्त ग्रह हो तो छत्र योग होता है। इस योग वाला व्यक्ति धनी, लोकप्रिय, राजकर्मचारी, उच्चपदाधिकारी, सेवक, परिवार के व्यक्तियों का भरण-पोषण करने वाला एवं अपने कार्य में ईमानदार होता है। 12. चक्र योग- लग्न से आरम्भ कर एकांतर से छह स्थानों में-प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम और एकादश भाव में सभी ग्रह हो तो चक्र योग होता है। इस योग वाला जातक राष्ट्रपति या राज्यपाल होता है। चक्र योग राजयोग का ही रूप है, इसके होने से व्यक्ति राजनीति में दक्ष होता है और उसका प्रभुत्व बीस वर्ष की अवस्था के पश्चात बढने लगता है। 13. समुद्र योग- द्वितीय भाव से एकांतर कर छह राशियों में २|४|६|१०|१२ वें स्थान में समस्त ग्रह हो तो समुद्र योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, रहमानी, भोगी, लोकप्रिय, पुत्रवान और वैभवशाली होता है। 14. पाश योग- पांच राशियों में समस्त ग्रह हो तो पाश योग होता है। इस योग के होने से जातक बहुत परिवारवाला, प्रपंची, बन्धनभागी, काराग्रह का अधिपति, गुप्तचर, पुलिस या सेना की नौकरी करने वाला होता है। 15. वीणा योग- सात राशियों में समस्त ग्रह स्थित हो तो वीणा योग होता है। इस योगवाला जातक गीत,नृत्य, वाध से स्नेह करता है। धनी, नेता और राजनीति में सफल संचालक बनता है। 16. गजकेसरी योग- लग्न अथवा चन्द्रमा से यदि गुरु केंद्र में हो और केवल शुभग्रहो से दृष्ट या युत हो तथा अस्त, नीच और शत्रु राशी में गुरु न हो तो गजकेसरी योग होता है। इस योगवाला जातक मुख्यमंत्री बनता है। 17. पर्वत योग- यदि सप्तम और अष्टम भाव में कोई ग्रह नही हो अथवा ग्रह हो भी तो कोई शुभग्रह हो तथा सब शुभग्रह केंद्र में हो तो पर्वत नामक योग होता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति भाग्यवान, वक्ता, शास्त्रग्य, प्राध्यापक, हास्य-व्यंग्य लेखक, यशस्वी, तेजस्वी और मुखिया होता है। मुख्यमंत्री बनाने वाले योगों में भी पर्वत योग की गणना है। 18. मृदंग योग- लग्नेश वली हो और अपने उच्च या स्वगृह में हो तथा अन्य ग्रह केंद्र स्थानों में स्थित हो तो मृदंग योग होता है। इस योग के होने से व्यक्ति शासनाधिकारी होता है। 19. कूर्म योग- शुभग्रह ५|६|७ वें भाव में और पापग्रह १|३|११ वें स्थान में अपने-अपने उच्च में हो तो कूर्म योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति राज्यपाल, मंत्री, धीर, धर्मात्मा, मुखिया और नेता होता है। 20. लक्ष्मी योग- लग्नेश बलवान हो और भाग्येश अपने मूल-त्रिकोण, उच्च या स्वराशी में स्थित होकर केन्द्रस्थ हो तो लक्ष्मी योग होता है। इस योगवाला जातक पराक्रमी, धनी, मंत्री, राज्यपाल एवं गुनी होता है। 21. कलानिधि योग- बुध शुक्र से युत या दृष्ट गुरु २|५ वें भाव में हो या बुध शुक्र की राशि में स्थिति हो तो कलानिधि योग होता है। इस योगवाला गुनी, राजमान्य, सुखी, स्वस्थ, धनी, और विद्वान होता है। 22. केमद्रुम योग- यदि चन्द्रमा के साथ में या उससे द्वितीय, द्वादश स्थान में तथा लग्न से केंद्र में सूर्य को छोड़कर अन्य कोई ग्रह नही हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति दरिद्र और निन्दित होता है। 23. धन-सुख योग- दिन में जन्म होने पर चन्द्रमा अपने या अधिमित्र के नवांश में स्थित हो और उसे गुरु देखता हो तो धन सुख होता है। इसी प्रकार रात्रि में जन्म प्र्ताप्वादी पर चन्द्रमा को शुक्र देखता हो तो धन-सुख योग होता है। यह अपने नामानुसार फल देता है। 24. विशिष्ट योग- जिसके जन्मकाल में बुध सूर्य के साथ अस्त होकर भी अपने ग्रह में हो अथवा अपने मूला त्रिकोण में हो तो जातक विशिष्ट विद्वान होता है। 25. भास्कर योग- यदि सूर्य से द्वितीय भाव में बुध हो। बुध से एकादश भाव में चन्द्रमा और चन्द्रमा से त्रिकोण में वृहस्पति स्थिति हो तो भास्कर योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला मनुष्य पराक्रमी, प्रभुसदृश, रूपवान, गन्धर्व विधा का ज्ञाता, धनी, गणितग्य, धीर और समर्थ होता है। यह योग २४ वर्ष की अवस्था से घटित होने लगता है। 26. इन्द्र योग- यदि चंद्रमा से तृतीय स्थान में मंगल हो और मंगल से सप्तम शनि हो। शनि से सप्तम शुक्र हो और शुक्र से सप्तम गुरु हो तो इन्द्रसंज्ञक योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक प्रसिद्ध शीलवान, गुणवान, राजा के समान धनी, वाचाल और अनेक प्रकार के धन, आभूषण प्राप्त करने वाला होता है। 27. मरुत योग- यदि शुक्र से त्रिकोण में गुरु हो, गुरु से पंचम चंद्रमा और चन्द्रमा से केंद्र में सूर्य हो तो मरुत योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य वाचाल, विशाल ह्रदय, स्थूल उदार, शास्त्र का ज्ञाता, क्रय-विक्रय में निपुण, तेजस्वी, किसी आयोग का सदस्य होता है।
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हनुमान जन्मोत्सव विशेष 〰️〰️
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ग्रह-दशा फल नियम (1) ग्रह कब ? कैसे ? कितना ? फल देते हैं इस बात का निर्णय दशा अन्तर्दशा से किया जाता है। (2) दशा कई प्रकार की हैं, परन्तु सब में शिरोमणि विंशोत्तरी ही है। (3) सबसे पहले कुंडली में देखिये की तीनो लग्नों ( चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, और लग्न ) में कौन- सी दो लग्नों के स्वामी अथवा तीनो ही लग्नों के स्वामी परस्पर मित्र हैं। कुंडली के शुभ अशुभ ग्रहों का निर्णय बहुमत से निश्चित लग्नों के आधार पर करना चाहिए । उदाहरण के लिए यदि लग्न कुंभ है; सूर्य धनु में चंद्र वृश्चिक में है तो ग्रहों के शुभ-अशुभ होने का निर्णय वृश्चिक अथवा धनु लग्न से किया जायेगा अर्थात गुरु, सूर्य, चंद्र और मंगल ग्रह शुभ अथवा योगकारक होंगे और शुक्र , बुध तथा शनि अनिष्ट फलदायक होंगे। (4) यदि उपर्युक्त नियमानुसार महादशा का ग्रह शुभ अथवा योगकारक बनता है तो वह शुभ फल करेगा । इसी प्रकार यदि अन्तर्दशा का ग्रह भी शुभ अथवा योगकारक बनता है तो फल और भी शुभ होगा। (5) स्मरण रहे की अन्तर्दशा के स्वामी का फल दशानाथ की अपेक्षा मुख्य है- अर्थात यदि दशानाथ शुभ ग्रह न भी हो परंतु भुक्तिनाथ शुभ है तो फल शुभ होगा। (6) यदि भुक्तिनाथ दशानाथ का मित्र हो और दशानाथ से शुभ भावों ( दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवें, दशवें और ग्यारहवें ) में स्थित हो तो और भी शुभ ही फल देगा। (7) यदि दशानाथ निज शुभ स्थान से भी अच्छे स्थान ( दूसरे, चौथे आदि ) में स्थित है तो और भी शुभ फल करेगा। (8) परंतु सबसे आवश्यक यह है की शुभ भुक्तिनाथ में अच्छा बल होना चाहिए। यदि शुभ भुक्तिनाथ केंद्र स्थान में स्थित है, उच्च राशि अथवा स्वक्षेत्र में स्थित है अथवा मित्र राशि में स्थित है और भाव मध्य में है, किसी पापी ग्रह से युक्त या दृष्ट नहीं, बल्कि शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट है, वक्री है तथा राशि के बिलकुल आदि में अथवा बिल्कुल अंत में स्थित नहीं है, नवांश में निर्बल नहीं है , तो भुक्तिनाथ जिस शुभ भाव का स्वामी है उसका उत्तम फल करेगा अन्यथा यदि ग्रह शुभ भाव का स्वामी है परंतु छठे, आठवे, बारहवें आदि नेष्ट (अशुभ) स्थानों में स्थित है, नीच अथवा शत्रु राशि का है, पापयुक्त अथवा पापदृष्ट है, राशि के आदि अथवा अंत में है, नवांश में निर्बल है, भाव संधि में है, अस्त है, अतिचारी है तो शुभ भाव का स्वामी होता हुआ भी बुरा फल करेगा। (9) जब तिन ग्रह एकत्र हों और उनमे से एक नैसर्गिक पापी तथा अन्य दो नैसर्गिक शुभ हों और यदि दशा तथा भुक्ति नैसर्गिक शुभ ग्रहों की हो तो फल पापी ग्रह का होगा। उदाहरण के लिए यदि लग्न कर्क हो , मंगल, शुक्र तथा गुरु एक स्थान में कहीं हों, दशा गुरु की भुक्ति शुक्र की हो तो फल मंगल का होगा। यह फल अच्छा होगा क्यों की मंगल कर्क लग्न वालों के लिए योगकारक होता है। (10) जब दशानाथ तथा भुक्तिनाथ एक भाव में स्थित हों तो उस भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं (11) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ एक ही भाव को देखते हों तो दृष्ट भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं। (12) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ परस्पर शत्रु हों, एक दूसरे से छठे, आठवें स्थित हों और भुक्तिनाथ लग्न से भी छठे , आठवें, बारहवें स्थित हो तो जीवन में संघर्ष, बाधायें, विरोध, शत्रुता, स्थान च्युति आदि अप्रिय घटनाएं घटती हैं। (13) लग्न से दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, ग्यारहवें तथा बारहवें भावों के स्वामी अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देते हैं यदि महादशा नाथ स्वामी इनमे से किसी भाव का स्वामी होकर इन्ही में से किसी अन्य के भाव में स्थित हो अपनी महादशा में रोग देने को उद्धत होगा ऐसा ही भुक्ति नाथ के बारे में समझना चाहिए। ऐसी दशा-अन्तर्दशा आयु के मृत्यु खंड में आये तो मृत्यु हो जाती है। (14) गुरु जब चतुर्थ तथा सप्तम अथवा सप्तम तथा दशम का स्वामी हो तो इसको केंद्राधिपत्य दोष लगता है। ऐसा गुरु यदि उपर्युक्त द्वितीय, षष्ठ आदि नेष्ट भावों में निर्बल होकर स्थित हो अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देता है। (15) राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। इनका स्वतंत्र फल नहीं है। ये ग्रह यदि द्वितीय, चतुर्थ, पंचम आदि शुभ भावों में स्थित हों और उन भावों के स्वामी भी केंद्रादि स्थिति तथा शुभ प्रभाव के कारण बलवान हों तो ये छाया ग्रह अपनी दशा भुक्ति में शुभ फल देते हैं। (16) राहु तथा केतु यदि शुभ अथवा योगकारक ग्रहों के प्रभाव में हों और वह प्रभाव उनपर चाहे युति अथवा दृष्टि द्वारा पड़ रहा हो तो छाया ग्रह अपनी दशा- अन्तर्दशा में उन शुभ अथवा योगकारक ग्रहों का फल करेंगे
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कौन सा ग्रह सबसे बलशाली है कुंडली मे मुख्य ग्रह की बहुत ही विशेषता है। अगर कुंडली मे मुख्य ग्रह मजबूत है तो आपको दूसरें ग्रहों के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है। मुख्य ग्रह के मजबुत होने पर आपकी सारी समस्याओं का हल हो जाता है। प्रत्येक कुण्डली में एक विशेष ग्रह होता है, जो कुण्डली का प्राण होता है। इस ग्रह के कमजोर होने पर व्यक्ति कों सफलता नहीं मिलती है, अगर मिलती भी है तो बड़ी मुशकीलों का सामना करना पड़ता है। ये आपको लग्न के अनुसार बताया जा रहा है :- (1) मेष लग्न :- इस लग्न का मुख्य ग्रह सूर्य है। इस लग्न में सूर्य चमत्कारी परिणाम देता है। अगर कुण्डली में सूर्य मजबुत हो तो हर तरह की सफलता पाई जा स्कती है। सूर्य मजबुत होने पर स्वास्थ हमेशा अच्छा बना रहता है। (2) वृष लग्न :– इस ग्रह का मुख्य ग्रह शनि है। इस लग्न में शनि सबकुछ होता है। अगर शनि मजबुत हो तो सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है। इस लग्न में शनि धन , सेहत , वैभव , और रिशतों का वरदान् देता है। अगर शनि मजबुत हो तो कोई भी बीमारी बड़ा रुप धारण नहीं कर सकती है। (3) मिथुन लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह बुध होता है। इस लग्न का स्वामी भी बुध होता है। बुध आर्थिक– मजबुती देता है और व्यक्ति की सोच कों बेहतर रखता है। अगर बुध कमजोर हो तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ! व्यक्ति ठीक समय पर निर्णय नहीं लें पाता है और ज़िन्दगी ढह जाती है और कोई भी सफलता नहीं मिलती है। (4) कर्क लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह मंगल है। कर्क लग्न सबसे बड़ा राजसी लग्न होता है। इस लग्न में सबसे बड़ी शक्ती मंगल के पास होती है। अगर मंगल मजबुत हो तो सफलता मिलती रहती है।दुर्घटना और सेहत की समस्या से बचाव होता है ! व्यक्ति कों कम प्रयास में ही सफलता मिलती है ! इस लग्न में अगर मंगल– अच्छा ना हो तो व्यक्ति का विकास नहीं होता है। (5) सिहृं लग्न :– इस लग्न में दो मुख्य ग्रह होतें है मंगल और गुरू। इस लग्न की ताकत दोनों ग्रहों में विभाजित हो जाती है ! अगर दोनों ग्रह अच्छें हो तो जीवन में आने वालें उतार – चढ़ावं से बचें रहेंगे। मंगल और गुरू के मजबुत होने पर जीवन में संघर्ष कम हो जाता है ! मजबुत होने पर व्यक्ति की ताकत और प्रभाव कों बड़ाता है। (6) कन्या लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह शुक्र है। शुक्र इस लग्न में सबसे ज्यादा बेहतर परिणांम देता है। शुक्र के मजबुत होने पर वैभव एवं रिश्तों का वरदान मिलता है ,अगर शुक्र अच्छा हो तो ग्लैमर मिलता है और सुख सफलतां मिलती है। (7) तुला लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह शनि होता है। अगर शनि मजबुत हो तो व्यक्ति अपुर्व सफलता प्राप्तं करता है। जीवंन में किसी भी चीज का अभाव नहीं रहता है। शनि के मजबुत होने पर व्यक्ति समाज में विशिष्ठ स्थान पाता है। (8) वृशिचक लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह गुरू है। गुरु के मजबुत होने पर धन ,मान ,स्वास्थ ,संतान और ज्ञान का वरदान मिलता है ! गुरू के कमजोर होने पर सफलता नहीं मिलती है। (9) धनु लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह मंगल है। इस लग्न में सारी शक्ति मंगल के पास होती है। मंगल मजबुत होने पर जीवंन् में संघर्ष कम हो जाता है। मुकदमों और विवादों से छुटकारा मिलता है। धनु लग्न .में शनि का दुष्प्रभाव जल्दी हो जाता है ! मंगल मजबुत होनें पर ये शनि के दुष्प्रभाव से बचाता है। (10) मकर लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह शुक्र है। शुक्र मजबुत होने पर विद्या ,बुद्धि ,धन का लाभ देता है। ये करियर का लाभ देता है। मजबुत होने पर स्वास्थ और संतान की समस्या से बचाव करता है। इस लग्न वालों कों शराब और नशें से परहेज करना चाहिऐं ! (11) कुम्भ लग्न :– इस लग्न में मुख्य दो ग्रह होतें है बुध और शुक्र। शुक्र ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ! अगर शुक्र माइंड रीडर अच्छा हो तो नाम ,यश , ग्लैमर मिलता है ! व्यक्ति करियर की उचाईयों कों छुता है ! शुक्र हर तरह की मानसिक समस्याओं से छुटकारा दिलता है। (12) मीन लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह चन्द्र होता माइंड रीडर है। इस लग्न की सारी ताकत चन्द्र के पास होती है ! चन्द्र मजबुत होने पर व्यक्ति ज्ञानी ,शानदार और सफल होता है ! चन्द्र अच्छा करियर देता है ! चन्द्र मजबुत होने पर अच्छी संपति का वरदान भी मिलता है |
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