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इन फूलों के प्रयोग से बदल सकती है आपकी किस्मत-----

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यदि आप भी उनमें से हैं जिन्हें कड़ी मेहनत के वाबजूद भी जीवन में वो मुकाम नहीं मिल पाया जिसकी आपने उम्मीद की थी तो यकीन मानिये आपको इस खबर को पढ़ने की बेहद आवश्यकता है। आज हम आपको कुछ ऐसे सुगंधित फूलों के प्रयोग के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका प्रयोग आप अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में करके अपने सोये हुए भाग्य को जगा सकते हैं। आईये जानते है कौन से हैं वो फूल जिनका प्रयोग कर आप अपने भाग्य को जगा सकते हैं। गुलाब: गुलाब के फूलों का प्रयोग अापने आज तक अलग-अलग रूपों में किया होगा, लेकिन यदि इस फूल का प्रयोग आप खासतौर से अपनी सोई किस्मत को जगाने के लिए करें तो इससे आपको काफी लाभ मिल सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, गुलाब का फूल सूर्य और मंगल के प्रभाव को शुभ बनाने वाला होता है। यदि आप अपने किसी काम में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो मंगलवार के दिन हनुमान जी को सात गुलाब के फूल चढ़ाने से आपको लाभ मिल सकता है। किसी भी प्रकार के मनवांछित फल प्राप्त करने के लिए यदि दुर्गा माँ को प्रतिदिन ग्यारह गुलाब के फूल चढ़ाये जाएं तो इससे भी आपको बेहद लाभ मिल सकता है। आर्थिक तंगी से निजात पाने के लिए यदि लक्ष्मी माता और विष्णु जी को पांच गुलाब के फूल अर्पित किये जाएं तो आपको अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। गेंदा: गेंदे का फूल मुख्य रूप से बृहस्पति ग्रह के प्रभाव को शुभ बनाता है। रोजाना यदि एक गेंदे के फूल को गंगाजल के साथ पीसकर उसके लेप को माथे पर लगाया जाए तो इससे आप दूसरों को प्रभावित कर पाने में सफल हो सकते हैं। इसके साथ ही लक्ष्मीनारायण को रोजाना गेंदे के फूल की दो माला चढ़ाने से आपको वैवाहिक जीवन में सफलता प्राप्त हो सकती है। गुड़हल: ऐसी मान्यता है की इस फूल का प्रयोग आप जीवन में महावरदान पाने के लिए कर सकते हैं। जीवन में अपने मन के अनुसार फल पाने के लिए रोजाना 25 गुड़हल फूलों की माला माँ दुर्गा को चढ़ाने से लाभ मिल सकता है। यदि आप जीवन में शत्रुओं से परेशान हैं तो काली माँ को रोजाना पांच गुड़हल फूल की माला चढ़ाने से शत्रुओं से मुक्ति पा सकते हैं। आक: सोमवार के दिन विशेष रूप से आक का फूल शिवजी को चढ़ाने से आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिल सकती है। इसके साथ ही यदि बुध ग्रह के हानिकारक प्रभाव से ग्रसित हों तो बुधवार के दिन गणेश जी को पांच आक के फूल जरूर अर्पित करें।

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इन फूलों के प्रयोग से बदल सकती है आपकी किस्मत-----
posted Jul 21 by Deepika Maheshwary

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रावण संहिता के प्राचीन तांत्रिक उपाय, जो चमका सकते है आपकी किस्मत हम बात करेंगे रावण संहिता के प्राचीन तांत्रिक उपाय, जो चमका सकते है आपकी किस्मत रावण एक असुर था, लेकिन वह सभी शास्त्रों का जानकार और प्रकाण्ड विद्वान भी था। रावण ने ज्योतिष और तंत्र शास्त्र संबंधी ज्ञान के लिए रावण संहिता की रचना की थी।रावण संहिता में ज्योतिष और तंत्र शास्त्र के माध्यम से भविष्य को जानने के कई रहस्य बताए गए हैं। इस संहिता में बुरे समय को अच्छे समय में बदलने के लिए भी चमत्कारी तांत्रिक उपाय बताए हैं। जो भी व्यक्ति इन तांत्रिक उपायों को अपनाता है उसकी किस्मत बदलने में अधिक समय नहीं लगता है। रावण एक असुर था, लेकिन वह सभी शास्त्रों का जानकार और प्रकाण्ड विद्वान भी था। रावण ने ज्योतिष और तंत्र शास्त्र संबंधी ज्ञान के लिए रावण संहिता की रचना की थी। रावण संहिता में ज्योतिष और तंत्र शास्त्र के माध्यम से भविष्य को जानने के कई रहस्य बताए गए हैं। इस संहिता में बुरे समय को अच्छे समय में बदलने के लिए भी चमत्कारी तांत्रिक उपाय बताए हैं। जो भी व्यक्ति इन तांत्रिक उपायों को अपनाता है उसकी किस्मत बदलने में अधिक समय नहीं लगता है। .
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देश के इन 42 स्थानों पर श्राद्ध कर्म से पितरों को मिलती है शांति बरेली। पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म और पिंडदान का विशेष महत्व है। भारतवर्ष में पितृ दोष शांति के लिए 42 तीर्थों को मुख्य माना गया है। शास्त्रों के अनुसार किया गया पिंडदान और श्राद्ध कर्म सबसे ज्यादा मान्य है। इन 42 प्रमुख स्थानों पर श्राद्ध करने पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। 1. देव प्रयाग, उत्तराखंड- यह भागीरथी एवं अलखनन्दा का संगम है। यहां पितृों के निमित्त श्राद्ध तर्पण आदि किया जाता है। 2. त्रियूगीनारायण या सरस्वती कुंड, उत्तराखंड - रूद्र प्रयाग के समीप इस तीर्थ पर भगवान नारायण, भू-देवी एवं लक्ष्मी देवी विराजमान हैं। यहां सरस्वती नदी पर स्थित रूद्र कुण्ड स्नान, विष्णु कुण्ड मार्जन, ब्रह्मकुण्ड आश्वन और सरस्वती कुण्ड तर्पण के लिए हैं। 3. मदमहेश्वर या मध्यमेश्वर, उत्तराखंड- केदारधाम पर स्थित इस तीर्थ पर भगवान शंकर की नाभि प्रतिष्ठित है। यह तीर्थ पंच केदार में शामिल द्वितीय केदार है। 4. रूद्रनाथ - यह तीर्थ पंच केदार में से एक तुंगनाथ के समीप स्थित है। 5. बद्रीनाथ (ब्रह्म कपाल शिला) - अलखनन्दा नदी के किनारे ब्रह्म कपाल (कपाल मोचन) तीर्थ है। यहां पिण्डदान किया जाता है। 6. हरिद्वार (हरि की पैड़ी) - यहां सप्त गंगा, त्रि-गंगा और शक्रावर्त में विधिपूर्वक देव ऋषि एवं पितृ तर्पण करने वाला पुण्यलोक में प्रतिष्ठित होता है। तदन्तर कनखल में पवित्र स्नान किया जाता है। 7. कुरू क्षेत्र (पेहेवा) - पंजाब के अम्बाला जिले में सरस्वती के दाहिने तट पर स्थित इस तीर्थ को अधिक पुण्यमय माना जाता है। 8. पिण्डास्क (हरियाणा) - इसे पिण्ड तारक तीर्थ भी कहते हैं। यहां स्नान करके पितृ तर्पण किया जाता है। 9. मथुरा (ध्रुवघाट) - मथुरा में यमुना किनारे 24 प्रमुख घाटों में से एक ध्रुव घाट है। इसके पास धु्रव टीले पर छोटे मंदिर में ध्रुव जी का विग्रह है। इसे पितृ तर्पण के लिए प्रधान माना जाता है। 10. नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश) - बालामऊ जंक्शन के पास नैमिषारण्य में तपस्या, श्राद्ध, यज्ञ, दान इत्यादि की पूजा एंव क्रिया सात जन्मों के पापों को दूर करती है। 11. धौतपाप (हत्याहरण तीर्थ) - निमिषारण्य से लगभग 13 किमी दूर गोमती नदी के किनारे स्थित इस तीर्थ पर स्नान एवं श्राद्ध तर्पण करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। 12. बिठूर (ब्रह्मावर्त) - कानपुर के निकट बिठूर नामक स्थान है, यहां गंगा जी के कई घाटों में प्रमुख ब्रह्मा घाट है। 13. प्रयागराज, इलाहाबाद- यहां श्राद्ध एवं पितृ तर्पण करने से बहुत अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। 14. काशी (मणिकर्णिका घाट) - यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी हुई है और प्रलय में भी इसका नाश नहीं होता है। यहां श्राद्ध एवं पितृ तर्पण करने से पितृ तृप्त होकर सभी सुख प्रदान करते हैं। 15. अयोध्या - सप्त पुरियों में अयोध्या को प्रथम पुरी माना गया है। यहां सरयू नदी पर पितृ तर्पण एवं श्राद्ध करने से पितृ तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं। 16. गया, बिहार - यह भारत का प्रमुख पितृ तीर्थ है। पुराणों के अनुसार पितृ कामना करते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र हो जो गया जाकर उनका श्राद्ध करे। गया में पिण्डदान से पितृों को अक्षय तृप्ति प्रदान होती है। 17. बोधगया, बिहार - यहां भगवान बुद्ध का विशाल मंदिर है। यहां पितृ तर्पण एवं श्राद्धकर्म का विशेष महत्व है। 18. राजगृह, बिहार - यह हिन्दू, बौद्ध एवं जैन तीनों धर्मों का तीर्थ स्थल है। यहां पुरूषोत्तम मास में श्राद्ध करने से पितृ तृप्त होते हैं। 19. परशुराम कुण्ड, असम - पूर्वकाल में इसे श्राद्धकर्म के लिए बहुत पवित्र माना जाता था। 20. याजपुर, ओडिशा - यहां श्राद्ध एवं तर्पण आदि का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि यहां ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था। 21. भुवनेश्वर, ओडिशा - यहां काशी के समान अत्यधिक शिव मंदिर हैं। इसे उत्कल-वाराणसी और गुप्त काशी भी कहा जाता है। श्राद्ध एवं पितृ तर्पण के लिए यह पवित्र स्थान है। 22. जगन्नाथपुरी, ओडिशा - भारत के पावन चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी है। यह क्षेत्र श्राद्ध एवं पितृकर्म के लिए अत्यन्त पावन माना जाता है। 23. उज्जैन, मध्यप्रदेश - यहां बहती शिप्रा नदी भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न मानी जाती है, जिस पर कई घाट पर मंदिर बने हैं, महाकाल के इस स्थान पर श्राद्ध करने से पितृ पूर्ण तृप्त होते हैं। 24. अमर कण्टक, मध्यप्रदेश - ऐसा माना जाता है कि सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का एक सप्ताह में तथा गंगा का जल छूते ही पवित्र कर देता है। 25. नासिक, महाराष्ट्र - यहां बहने वाली गोदावरी नदी भारत की प्रसिद्ध सात नदियों में से एक है। यहां पितृों की संतुष्टि हेतु स्नान तर्पण आदि कर्म किये जाते हैं। 26. त्र्यम्बकेश्वर, महाराष्ट्र - यहां महर्षि गौतम ने तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया था। पितृ दोष शान्ति का यह प्रमुख स्थान है। 27. पंढरपुर महाराष्ट्र- यहां भीमा नदी है, जिसे चन्द्रभागा भी कहा जाता है। यहां भगवान श्री बिट्ठल का प्रसिद्ध मंदिर भी है, जोकि पितृकर्म के लिए अत्यन्त श्रेष्ठ माना गया है। 28. लोहार्गल, सीकर राजस्थान - यहां देशभर के लोग अस्थि विसर्जन के लिए आते हैं। यहां मुख्य तीन पर्वत से निकलने वाली सात धारायें हैं। 29. पुष्कर, अजमेर राजस्थान - यहां अधिकतर लोग हरिद्वार आदि तीर्थ में अस्थि विसर्जन के बाद पुष्कर में आकर पिण्डदान करते हैं। 30. तिरूपति, तमिलनाडू - यह श्राद्ध के लिए अत्यन्त पवित्र माना जाता है। यहां कपिल तीर्थ में स्नान, बैंकटाचल पर बालाजी दर्शन के बाद ऊपर के अन्य तीर्थ दर्शन के बाद तिरूपति में गोविन्दराज आदि के दर्शन किये जाते हैं। 31. शिवकांची, सर्वतीर्थ सरोवर तमिलनाडू - मोक्षदायिनी सप्त पुरियों में शामिल कांची हरिहरात्मकपुरी है। इसके शिवकांची और विष्णुकांची दो भाग हैं। भगवान शिव और विष्णु का क्षेत्र एंव शक्ति सति स्थान होने के कारण इसे अत्यन्त पावन पितृ तीर्थ माना गया है। 32. कुम्भ कोणम, केरल - कावेरी नदी के तट पर स्थित यहां मुख्य तीर्थ महामघम सरोवर है। 33. रामेश्वरम, लक्ष्मणतीर्थ - यहां पर पिण्डदान करने से पितृगण पूर्ण रूप से संतुष्ट होते हैं। 34. दर्भशयनम् - यहां भगवान राम ने दर्भशय्या पर शयन किया था। इसे भी श्राद्ध आदि के लिए मुख्य तीर्थ माना जाता है। 35. सिद्धपुर, गुजरात- यहां श्राद्ध करने से पितृों को पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है। 36. द्वारकापुरी, गुजरात - श्रीकृष्ण का धाम होने के कारण यहां श्राद्ध करने से पितृों को पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है। 37. नारायणसर, गुजरात - यहां आदि नारायण, लक्ष्मी नारायण, गोबर्धनन्नाथ आदि के मंदिर हैं। अतः नारायण सरोवर के पास पितृों की तृप्ति का तीर्थ स्थान है। 38. प्रभास-पाटण, वेरावल - यहां अग्निकुण्ड, ज्योर्तिलिंगसोमनाथ, अहिल्याबाई इत्यादि कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। इस क्षेत्र से प्राची त्रिवेणी संगम पर भालक तीर्थ भी है। जहां श्री कृष्ण को पैर में बाण लगा था। 39. शूलपाणी, गुजरात - नरवदा तट के मुख्य तीर्थों में शामिल शूलपाणी तीर्थ पर शूलपाणी महादेव का मंदिर है। इसके अलावा पिंडदान के लिए चाणोद, श्रीरंगम, और रीवा भी प्रमुख स्थान हैं।

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वैसे तो अगर पर्यावरण के दृष्टिकोण से देखा जाए तो घर के आस पास पेड़ पौधे का होना अच्छा माना जाता है। लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ ऐसे भी पेड़ पौधे हैं जिनका आपके घर आस-पास होना अशुभ फलदायी माना जाता है। आज हम आपको कुछ ऐसी ही पेड़-पौधों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें अपने घर के आसपास आपको नहीं लगाना चाहिए और यदि ये आपके घर के पास हों भी तो आपको ख़ास तौर से सावधान हो जाने की जरुरत पड़ सकती है। घर के आस-पास ना रहने दें इन पेड़-पौधों को हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घर के मुख्य द्वार के सामने पीपल, बरगद, नीम और बांस के पेड़ों को लगाना वर्जित माना जाता है। इसके साथ ही साथ गूलर, आम, बहेड़ा और इमली आदि के पेड़ों को भी घर से कुछ दूरी पर ही लगाना चाहिए। ऐसा माना जाता है इन पेड़ों की छाया घर पर पड़ने से घर में रहने वाले सदस्यों के जीवन पर अशुभ प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा ऐसा माना जाता है कि पूर्व दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में पाकड़, पश्चिम दिशा में बबूल और उत्तर दिशा में केला और गूलर के पेड़ भूल से भी नहीं लगवाने चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि पूर्व दिशा में कोई फलदार पेड़ लगाया जाता है तो इससे संतान को चोट पहुंच सकती है, या कोई अप्रिय घटना हो सकती है। इसके अलावा पश्चिम दिशा में बबूल या अन्य कोई कांटेदार पेड़ लगाने शत्रु पक्ष मजबूत हो सकता है। दक्षिण दिशा में पीपल, बरगद और नीम का पेड़ लगाने से धन से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसके अलावा इन दिशाओं में ऐसे पेड़ पौधे लगाने से परिवार में शोक की खबर और विभिन्न प्रकार की बीमारियों से भी व्यक्ति ग्रसित हो सकता है। ऐसी मान्यता है कि कांटेदार पेड़ के घर के आस पास होने से परिवार में सदस्यों के बीच दुश्मनी की भावना जागृत हो सकती है। हालांकि कांटेदार पौधों में गुलाब का पौधा एक अपवाद है, इसे घर के आँगन में बखूबी लगाया जा सकता है। इन पेड़ों के प्रभाव के बारे में भी जरूर जान लें सबसे पहले आपको बता दें कि घर के परिसर में जामुन और अमरुद के पेड़ छोड़कर अन्य कोई पेड़ नहीं लगाया जाना चाहिए। इसके अलावा घर के आस पास गुलमोहर और कटहल के पेड़ लगाने से आपस में शत्रुता की भावना बढ़ती है और परिवार में कलह की स्थिति उत्पन्न होती है। लिहाजा सभी पेड़-पौधे के लगाए जाने के लिए उचित दिशा और घर से एक विशेष दूरी का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
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ग्रह योग जो छप्पर फाड़ के देते हैं धन यदि आप Rich बनने का सपना देखते हैं, तो अपनी जन्म कुण्डली में इन ग्रह योगों को देखकर उसी अनुसार अपने प्रयासों को गति दें। १ यदि लग्र का स्वामी दसवें भाव में आ जाता है तब जातक अपने माता-पिता से भी अधिक धनी होता है। २ मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है। ३ जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है। ४ शनि ग्रह को छोड़कर जब दूसरे और नवे भाव के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठे होते हैं तब व्यक्ति को धनवान बना देते हैं। ५ जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बना देते हैं। ६ दूसरे भाव का स्वामी यदि ८ वें भाव में चला जाए तो व्यक्ति को स्वयं के परिश्रम और प्रयासों से धन पाता है। ७ यदि दसवें भाव का स्वामी लग्र में आ जाए तो जातक धनवान होता है। ८ सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होने पर व्यक्ति अपार धन पाता है। विशेषकर जब सूर्य और राहू के ग्रहयोग बने। ९ छठे, आठवे और बारहवें भाव के स्वामी यदि छठे, आठवे, बारहवें या ग्यारहवे भाव में चले जाए तो व्यक्ति को अचानक धनपति बन जाता है। १० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति खेल, जुंए, दलाली या वकालात आदि के द्वारा धन पाता है। ११ मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से, खेती से या भवन से आय प्राप्त होती है, जो निरंतर बढ़ती है। १२ गुरु जब कर्क, धनु या मीन राशि का और पांचवे भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति पुत्र और पुत्रियों के द्वारा धन लाभ पाता है। १३ राहू, शनि या मंगल और सूर्य ग्यारहवें भाव में हों तब व्यक्ति धीरे-धीरे धनपति हो जाता है। १४ बुध, शुक और शनि जिस भाव में एक साथ हो वह व्यक्ति को व्यापार में बहुत ऊंचाई देकर धनकुबेर बनाता है १५ दसवें भाव का स्वामी वृषभ राशि या तुला राशि में और शुक्र या सातवें भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति को विवाह के द्वारा और पत्नी की कमाई से बहुत धन लाभ होता है। १६ शनि जब तुला, मकर या कुंभ राशि में होता है, तब आंकिक योग्यता जैसे अकाउण्टेट, गणितज्ञ आदि बनकर धन अर्जित करता है। १७ बुध, शुक्र और गुरु किसी भी ग्रह में एक साथ हो तब व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धनवान होता है। जिनमें पुरोहित, पंडित, ज्योतिष, प्रवचनकार और धर्म संस्था का प्रमुख बनकर धनवान हो जाता है। १८ कुण्डली के त्रिकोण घरों या चतुष्कोण घरों में यदि गुरु, शुक्र, चंद्र और बुध बैठे हो या फिर ३, ६ और ग्यारहवें भाव में सूर्य, राहू, शनि, मंगल आदि ग्रह बैठे हो तब व्यक्ति राहू या शनि या शुक या बुध की दशा में अपार धन प्राप्त करता है। १९ गुरु जब दसर्वे या ग्यारहवें भाव में और सूर्य और मंगल चौथे और पांचवे भाव में हो या ग्रह इसकी विपरीत स्थिति में हो व्यक्ति को प्रशासनिक क्षमताओं के द्वारा धन अर्जित करता है। २० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में केतु को छोड़कर अन्य कोई ग्रह बैठा हो, तब व्यक्ति व्यापार-व्यवसार द्वारा अपार धन प्राप्त करता है। यदि केतु ग्यारहवें भाव में बैठा हो तब व्यक्ति विदेशी व्यापार से धन प्राप्त करता है।
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इंसान के जन्म से मृत्यु तक हृदय लगातार धड़कता रहता है। हृदय की यह गतिशीलता ही इंसान को सक्रिय बनाए रखती है। हृदय का पोषण रक्त और ऑक्सीजन के द्वारा होता है। हमारे शरीर को जीवंत बनाए रखने के लिए हृदय शरीर में लगातार रक्त का प्रवाह करता है। मनुष्य का हृदय एक दिन में लगभग एक लाख बार और एक मिनट में औसतन 60 से 90 बार धड़कता है। हृदय का काम शरीर में रक्त का प्रवाह करना है, इसलिए हृदय का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। आपका हृदय जितना स्वस्थ होगा आपका जीवन उतना ही सुख पूर्वक गुजरेगा। हालांकि आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में कई लोगों को हृदय से संबंधित रोग हो रहे हैं क्योंकि खुद के लिए भी अब लोगों के पास वक्त नहीं है। यही वजह है कि हृदय रोगों का कारण ज्यादातर अव्यवस्थित दिनचर्या या खराब खान-पान होता है, परंतु बहुत से ऐसे ज्योतिषीय कारण भी होते हैं जिनकी वजह से लोगों को हृदय से संबंधित रोग घेर लेते हैं। हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण---- आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताएँगे कि हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण क्या हैं। इसके साथ ही हम आपको कुछ ऐसे ज्योतिषीय उपचार भी बताएंगे जिनकी मदद से आप हृदय रोगों से खुद को बचा सकते हैं। तो आइए अब विस्तार से जानते हैं हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण और उनके उपचार:- चतुर्थ, पंचम भाव और इन भावों के स्वामियों की स्थिति जैसा कि हम सब जानते हैं कि इंसान के शरीर में हृदय बायीं ओर होता है और यह शरीर का वह अंग है जो रक्त को पूरे शरीर में पहुंचाता है। अब अगर ज्योतिष शास्त्र के नजरिये से देखा जाए तो कुंडली में स्थित बारह राशियों में से चतुर्थ राशि यानि कर्क राशि को हृदय का स्थान और पंचम राशि सिंह को इसके सूचक के रुप में देखा जाता है। हृदय से संबंधित किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए जातक की कुंडली में चतुर्थ, पंचम भाव और इन भावों के स्वामियों की स्थिति पर विचार किया जाता है। चौथे और पांचवे भावाें के स्वामियों पर यदि अशुभ ग्रहों की दृष्टि है या वो अशुभ ग्रहों के साथ हैं तो हृदय से जुड़े रोग हो सकते हैं। कुंडली में सूर्य की स्थिति ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य को हृदय का कारक माना जाता है। आपकी जन्म कुंडली में सूर्य का संबंध मंगल, शनि अथवा राहु-केतु के अक्ष में होने पर जातक को हृदय संबंधी विकार होते हैं। सूर्य अगर किसी नीच राशि में स्थित हो तो भी हृदय रोग हो सकते हैं। अगर सूर्य आपकी कुंडली में षष्ठम, अष्टम और द्वादश भावों के स्वामियों से संबंध बना रहा है तो हृदय विकार होने की पूरी संभावना रहती है। इसके अलावा सूर्य के पाप कर्तरी योग में होने पर भी हृदय से जुड़े रोग होते हैं। पाप कर्तरी योग कुंडली में तब बनता है जब किसी भाव के दोनों ओर पाप ग्रह स्थित हों। सिंह राशि के पीड़ित होने पर जिस जातक की कुंडली में सिंह राशि पीड़ित होती है अथवा उस पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है तो जातक को हृदय रोग घेर सकते हैं। इसके साथ ही कुंडली के चतुर्थ और पंचम भाव के पीड़ित होने अथवा उन पर नैसर्गिक पाप ग्रहों अथवा त्रिक (6-8-12) भाव के स्वामी ग्रह का प्रभाव होने पर भी हृदय से जुड़ी परेशानियां आ सकती हैं। चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामियों के दूषित होने पर चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामी यदि अशुभ ग्रहों से युति बनाकर दूषित हो रहे हैं तो भी हृदय रोग होने की संभावनाएं रहती हैं। यदि चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामी तीव्र गति से चलने वाले ग्रहों से दूषित हो रहे हैं तो रोग ज्यादा दिन तक नहीं चलता या रोग बहुत गंभीर नहीं होता। वहीं अगर चतुर्थ, पंचम भाव धीमे चलने वाले ग्रहों से दूषित है तो रोग लंबे समय तक चल सकता है और रोग गंभीर भी हो सकता है। उपरोक्त ग्रह स्थिति होने पर इन ग्रहों की दशा और अंतर्दशा के दौरान हृदय रोग की संभावना बनी रहती है। इसलिए ऐसे जातकों को ग्रहों की दशा और अंतर्दशा के दौरान सावधान रहना चाहिए। सूर्य ग्रह को प्रबल करने के लिए सूर्य ग्रह की शांति के उपाय हृदय रोग के ज्योतिषीय उपचार ज्योतिष एक ऐसा विज्ञान है जिसके द्वारा जीवन में आने वाली परेशानियों को तो हल किया ही जाता है, साथ ही साथ ज्योतिष शास्त्र हमें स्वस्थ जीवन जीने के लिए भी कई महत्वपूर्ण सुझाव उपलब्ध करता है। ज्योतिष शास्त्र की मदद से आप आने वाली मुश्किलों का भी पहले ही आकलन कर सकते हैं और जिन समस्याओं से आप जूझ रहे हैं उनका भी हल पा सकते हैं। ऐसे में आज हम आपको बताएँगे कि कैसे हम ज्योतिषीय उपचारों का इस्तेमाल करके हृदय संबंधी विकारों या रोगों से बच सकते हैं। हृदय रोग से जुड़े ज्योतिषीय उपचार नीचे दिए गए हैं:- सूर्य को जल चढ़ाएँ हृदय को स्वस्थ रखने के लिए आपकी कुंडली में सूर्य का अनुकूल अवस्था में होना बहुत जरूरी है। यदि आपकी कुंडली में सूर्य की स्थिति अनुकूल नहीं है तो आपको प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल भरकर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भी आपको हृदय से जुड़े विकारों को दूर करने में मदद मिलेगी। चतुर्थ और पंचम भाव के अपने स्वामी ग्रहों को करें मजबूत हृदय रोगों से बचने के लिए आपको अपनी कुंडली के चतुर्थ और पंचम भाव के स्वामी ग्रहों को जानकर उनको मजबूत करना चाहिए। इसके लिए आप उन ग्रहों के बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं या उन ग्रहों से संबंधित रत्नों को धारण कर सकते हैं। सूर्य के बीज मंत्र का करें जाप हृदय रोगों से मुक्ति पाने के लिए सूर्य देव के बीज मंत्र का नियमित पाठ करना भी लाभकारी होता है। सूर्य का बीज मंत्र नीचे दिया गया है: “मंत्र – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः” अपने इष्ट देव की करें पूजा अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करना भी आपके लिए शुभ फलदायी रहता है और इससे हृदय से जुड़ी परेशानियां दूर हो जाती हैं। लेकिन आपको इस बात का ख़ास ख्याल रखना है कि इष्ट देव की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाए। इसमें किसी भी तरह की चूक न हो। इसके अतिरिक्त श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करें अथवा भगवान विष्णु की उपासना करें। श्वेतार्क वृक्ष सिंचित करें श्वेतार्क वृक्ष लगाएँ और उसको जल से सिंचित करें इससे आपको लाभ होगा। यह वृक्ष हृदय रोगों को दूर करता है! **************
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