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Directional strength of planets in kundli

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posted Aug 6 by Deepika Maheshwary

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भाव कारक एवं विचारणीय विषय ज्योतिष शास्त्र में 12 राशियां तथा 12 भाव, 9 ग्रह, 27 +1( अभिजीत) = 28 नक्षत्र, बताए गए हैं अर्थात इन्ही भाव, राशि, ग्रह , नक्षत्र में हमारे जीवन का सम्पूर्ण सार छुपा हुआ है केवल आवश्यकता है इस बात को जानने के लिए की कौन राशि, भाव तथा ग्रह का सम्बन्ध हमारे जीवन में आने वाली घटनाओं से है यदि हम इनके सम्बन्ध को जान लेते है तो यह बता सकते है कि हमारे जीवन में कौन सी घटनाएं कब घटने वाली है। । परन्तु इसके लिए सबसे पहले हमें भाव और ग्रह के कारकत्त्व को जानना बहुत जरुरी है क्योकि ग्रह या भाव जिस विषय का कारक होता है अपनी महादशा, अंतरदशा या प्रत्यन्तर दशा में उन्ही विषयो का शुभ या अशुभ फल देने में समर्थ होता है। Importance of Houses | भाव का महत्त्व ज्योतिष जन्मकुंडली में 12 भाव होते है और सभी भाव का अपना विशेष महत्त्व है। आप इस प्रकार समझ सकते है भाव जातक की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूर्ति करता है। व्यक्ति को जो भी आवश्यकता होती है उसको पाने के लिए कोशिश करता है अब निर्भर करता है आपके उसे पाने के लिए कब, कैसे, किस समय और किस प्रकार के साधन का उपयोग किया है। क्योकि उचित समय और स्थान पर किया गया प्रयास ही इच्छापूर्ति में सहायक होता है। भाव इस प्रकार से कार्य करता है जैसे — जब भी कोई जातक यह प्रश्न करता है की मेरे जीवन में धन योग है की नहीं और है तो कब तब इसको जानने के लिए ज्योतिषाचार्य सबसे पहले निर्धारित धन भाव अर्थात 2nd भाव को देखते है तत्पश्चात उस भाव भावेश तथा भावस्थ ग्रह का विश्लेषण कर धन के सम्बन्ध में फल कथन करते है। Bhav Karak in Astrology | भाव कारक एवं विचारणीय विषय Houses Significator Planets | भाव का कारक ग्रह प्रथम भाव- सूर्य दूसरा भाव- गुरू तृतीय भाव – मंगल चतुर्थ भाव – चंद्र पंचम भाव – गुरु षष्ठ भाव – मंगल सप्तम भाव – शुक्र अष्टम भाव – शनि नवम भाव – गुरु दशम भाव – गुरु, सूर्य, बुध और शनि एकादश भाव – गुरु द्वादश भाव – शनि सभी भाव को कोई न कोई विचारणीय विषय प्रदान किया गया है जैसे प्रथम भाव को व्यक्ति का रंग रूप तो दुसरा भाव धन भाव है वही तीसरा भाव सहोदर का है इसी प्रकार सभी भाव को निश्चित विषय प्रदान किया गया है प्रस्तुत लेख में सभी भाव तथा ग्रह के कारकत्व बताने का प्रयास किया गया है। जन्मकुंडली के प्रत्येक भाव से विचारणीय विषय 1st House | प्रथम अथवा तनु भाव जन्मकुंडली में प्रथम भाव से लग्न, उदय, शरीर,स्वास्थ्य, सुख-दुख, वर्तमान काल, व्यक्तित्व, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, जाति, विवेकशीलता, आत्मप्रकाश, आकृति( रूप रंग) मस्तिष्क, उम्र पद, प्रतिष्ठा, धैर्य, विवेकशक्ति, इत्यादि का विचार करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के सम्बन्ध में यह देखना है कि उसका स्वभाव रंगरूप कैसा है तो इस प्रश्न का जबाब प्रथम भाव ही देता है। 2nd House | द्वितीय अथवा धन भाव जन्मकुंडली में दूसरा भाव धन, बैंक एकाउण्ट, वाणी, कुटुंब-परिवार, पारिवारिक, शिक्षा, संसाधन, माता से लाभ, चिट्ठी, मुख, दाहिना नेत्र, जिह्वा, दाँत इत्यादि का उत्तरदायी भाव है।यदि यह देखना है कि जातक अपने जीवन में धन कमायेगा या नहीं तो इसका उत्तर यही भाव देता है। 3rd House | तृतीय अथवा सहज भाव यह भाव जातक के लिए पराक्रम, छोटा भाई-बहन, धैर्य, लेखन कार्य, बौद्धिक विकास, दाहिना कान, हिम्मत, वीरता, भाषण एवं संप्रेषण, खेल, गला कन्धा दाहिना हाँथ, का उत्तरदायी भाव है। यदि यह देखना है कि जातक अपने भाई बहन के साथ कैसा सम्बन्ध है तो इस प्रश्न का जबाब यही भाव देता है। 4rth House | चतुर्थ अथवा कुटुंब भाव यह भाव जातक के जीवन में आने वाली सुख, भूमि, घर, संपत्ति, वाहन, जेवर, गाय-भैस, जल, शिक्षा, माता, माता का स्वास्थ्य, ह्रदय, पारिवारिक प्रेम छल, उदारता, दया, नदी, घर की सुख शांति जैसे विषयों का उत्तरदायी भाव है। यदि किसी जातक की कुंडली में यह देखना है कि जातक का घर कब बनेगा तथा घर में कितनी शांति है तो इस प्रश्न का उत्तर चतुर्थ भाव से मिलता है। 5th House | पंचम अथवा संतान भाव जन्मकुंडली में पंचम भाव से संतान सुख, बुद्धि, शिक्षा, विद्या, शेयर संगीत मंत्री, टैक्स, भविष्य ज्ञान, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्द,प्रेम, सत्कर्म, पेट,शास्त्र ज्ञान यथा वेद उपनिषद पुराण गीता, कोई नया कार्य, प्रोडक्शन, प्राण आदि का विचार करना चाहिए। यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक की पढाई या संतान सुख कैसा है तो इस प्रश्न का जबाब पंचम अर्थात संतान भाव ही देगा अन्य भाव नहीं । Bhav Karak in Astrology | भाव कारक एवं विचारणीय विषय 6th House | षष्ठ अथवा रोग भाव जन्मकुंडली में षष्ठ भाव से रोग,दुख-दर्द, घाव, रक्तस्राव, दाह, अस्त्र, सर्जरी, डिप्रेशन,शत्रु, चोर, चिंता, लड़ाई झगड़ा, केश मुक़दमा, युद्ध, दुष्ट, कर्म, पाप, भय, अपमान, नौकरी आदि का विचार करना चाहिए। यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक का स्वास्थ्य कैसा रहेगा या केश में मेरी जीत होगी या नहीं तो इस प्रश्न का जबाब षष्ठ भाव ही देगा अन्य भाव नहीं । 7th House | सप्तम अथवा विवाह भाव जन्मकुंडली में सप्तम भाव से पति-पत्नी, ह्रदय की इच्छाए ( काम वासना), मार्ग,लोक, व्यवसाय, साझेदारी में कार्य, विवाह ( Marriage) , कामेच्छा, लम्बी यात्रा आदि पर विचार किया जाता है। इस भाव को पत्नी वा पति अथवा विवाह भाव भी कहा जाता है । यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक की पत्नी वा पति कैसा होगा या साझेदारी में किया गया कार्य सफल होगा या नही का विचार करना हो तो इस प्रश्न का जबाब सप्तम भाव ही देगा अन्य भाव नहीं । 8th House | अष्टम अथवा मृत्यु भाव जन्मकुंडली में अष्टम भाव से मृत्यु, आयु, मांगल्य ( स्त्री का सौभाग्य – पति का जीवित रहना), परेशानी, मानसिक बीमारी ( Mental disease) , संकट, क्लेश, बदनामी, दास ( गुलाम), बवासीर रोग, गुप्त स्थान में रोग, गुप्त विद्या, पैतृक सम्पत्ति, धर्म में आस्था और विश्वास, गुप्त क्रियाओं, तंत्र-मन्त्र अनसुलझे विचार, चिंता आदि का विचार करना चाहिए। इस भाव को मृत्यू भकव भी कहा जाता है यदि किसी की मृत्यु का विचार करना है तो यह भाव बताने में सक्षम है। 9th House | नवम अथवा भाग्य भाव जन्मकुंडली में निर्धारित नवम भाव से हमें भाग्य, धर्म,अध्यात्म, भक्ति, आचार्य- गुरु, देवता, पूजा, विद्या, प्रवास, तीर्थयात्रा, बौद्धिक विकास, और दान इत्यादि का विचार करना चाहिए। इस स्थान को भाग्य स्थान तथा त्रिकोण भाव भी कहा जाता है। यह भाव पिता( उत्तर भारतीय ज्योतिष) का भी भाव है इसी भाव को पिता के लिए लग्न मानकर उनके जीवन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी की जाती है। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा में भाग्य का क्या रोल है क्या जितना मेहनत कर रहा हूँ उसके अनुरूप भाग्यफल भी मिलेगा । क्या मेरे तरक्की में भाग्य साथ देगा इत्यादि प्रश्नों का उत्तर इसी भाव से मिलता है। 10th House | दशम अथवा कर्म भाव जन्मकुंडली में निर्धारित दशम भाव से राज्य, मान-सम्मान, प्रसिद्धि, नेतृत्व, पिता( दक्षिण भारतीय ज्योतिष), नौकरी, संगठन, प्रशासन, जय, यश, यज्ञ, हुकूमत, गुण, आकाश, स्किल, व्यवसाय, नौकरी तथा व्यवसाय का प्रकार, इत्यादि का विचार इसी भाव से करना चाहिए। कुंडली में दशम भाव को कर्म भाव भी कहा जाता है । यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक कौन सा काम करेगा, व्यवसाय में सफलता मिलेगी या नहीं , जातक को नौकरी कब मिलेगी और मिलेगी तो स्थायी होगी या नहीं इत्यादि का विचार इसी भाव से किया जाता है। 11th House | एकादश अथवा लाभ भाव जन्मकुंडली में निर्धारित एकादश भाव से लाभ, आय, संपत्ति, सिद्धि, वैभव, ऐश्वर्य, कल्याण, बड़ा भाई-बहन,बायां कान, वाहन, इच्छा, उपलब्धि, शुभकामनाएं, धैर्य, विकास और सफलता इत्यादि पर विचार किया जाता है। यही वह भाव है जो जातक को उसकी इच्छा की पूर्ति करता है । इससे लाभ का विचार किया जाता है किसी कार्य के होने या न होने से क्या लाभ या नुकसान होगा उसका फैसला यही भाव करता है। वस्तुतः यह भाव कर्म का संचय भाव है अर्थात आप जो काम कर रहे है उसका फल कितना मिलेगा इसकी जानकारी इसी भाव से प्राप्त की जा सकती है। 12th House | द्वादश वा व्यय भाव जन्मकुंडली में निर्धारित द्वादश भाव से व्यय, हानि, रोग, दण्ड, जेल, अस्पताल, विदेश यात्रा, धैर्य, दुःख, पैर, बाया नेत्र, दरिद्रता, चुगलखोर,शय्या सुख, ध्यान और मोक्ष इत्यादि का विचार करना चाहिए । इस भाव को रिफ भाव भी कहा जाता है। जीवन पथ में आने वाली सभी प्रकार क़े नफा नुकसान का लेखा जोखा इसी भाव से जाना जाता है। यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक विदेश यात्रा (abroad Travel) करेगा या नहीं यदि करेगा तो कब करेगा, शय्या सुख मिलेगा या नहीं इत्यादि का विचार इसी भाव से किया जाता है।
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2019 में भारत का भविष्य कैसा होगा , कौन बनेगा प्रधानमंत्री , आर्थिक सिस्टम, शेयर बाजार कैसा होगा , ज्योतिष के अनुसार जानेंगे 2019 में भारत का भविष्य कैसा होगा , किसानों की हालात , फ़ौज की ताकत , उधोग जगत की क्या हालत होगी । श्री राम मंदिर का निर्माण शुरू होगा या नही , बहुत सारे प्रश्न सभी के जहन में है , ज्योतिष वेदों का नेत्र है , ऋषियों की खोज है , खगोलीय ग्रहों ,नक्षत्रों का प्रभाव को सूत्रों द्वारा जानेंगे । नए साल में आपको अपने लिए भी जानना है घर, गाड़ी, नोकरी ,व्यापर ,शादी , बच्चे और भी जीवन से ज़ुड़े आपके प्रश्नो को जानने के लिए भारतीय ज्योतिष के विद्वानों द्वारा इस वेबसाइट में आप पढते रहे आर्टिकल , ऐप डाऊनलोड करे, अपने सुनहरे भविष्य में आपके लिये क्या विशेष करना चाहिए , ग्रहों के दोष निवारण के लिये क्या उपाय करें , सभी जानकारी मिलेगी www.futurestudyonline.com https://goo.gl/YzQXe1 click above and log in with your birth details for consultation by the expert astrologer. read daily report www.futurestudyonline.com
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13.हस्त (Delta Carvi)

इस नक्षत्र में पांच तारे हैं जो हाथ के पंजे की आकृति के समान दिखाई देते हैं। तिर्यकमुखी तथा लघु प्रकृति वाले हस्त नक्षत्र के स्वामी सूर्यदेव हैं। 

इस नक्षत्र को लक्ष्मीदायी अर्थात् सौभाग्य देने वाला माना गया है। इस नक्षत्र को व्यापार, वाणिज्य तथा यज्ञ, हवन आदि के लिए विशेष 

फलदायी माना गया है परन्तु इस नक्षत्र में विवाह तथा अन्य समस्त धर्मकार्य भी किए जाते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जब 

सूर्य हस्त नक्षत्र में हो तब यदि वर्षा होती है, उस समय फसल बहुत अच्छी होती है।

14.चित्रा (Spica)

अन्य नक्षत्रों के समान चित्रा अनेक तारों का समूह पुंज न होकर अकेला तारा है जो मोती जैसा चमकता है। इसके स्वामी त्वष्टा है। 

यह मृदु, मैत्री स्वभाव वाला तिर्यकमुखी नक्षत्र है। इस नक्षत्र को शुभ मानकर इसमें साझेदारी का व्यापार आरंभ करना, मैत्री संबंध बनाना, 

विवाह करना, राजनैतिक संबंध बनाना आदि कार्यों को करने की आज्ञा दी गई है।

15.स्वाति (Alpha Bootes)

यह नक्षत्र एक गणतारा प्रवाल सदृश है जिसके स्वामी वायुदेव हैं। यह तिर्यकमुखी चर नक्षत्र है तथा इसे विवाह नक्षत्रों में प्रमुख माना जाता है। 

स्वाति नक्षत्र में होने वाली वर्षा फसलों के लिए अमृत के समान मानी गई है। इस नक्षत्र में विवाह के अतिरिक्त यात्रा संबंधी, वाहनों का 

क्रय-विक्रय, प्रिटिंग संबंधी कार्य शुभ माने गए हैं।

16.विशाखा (Alpha Librae)

चार तारों के समूह से बना विशाखा नक्षत्र अधोमुखी, मिश्र तथा साधारण प्रकृति का माना गया है। इसके स्वामी इन्द्राग्नि है। 

इस नक्षत्र में अग्नि संबंधी सभी कार्य करना उत्तम बताया गया है। इस नक्षत्र में विद्युत तथा दूरसंचार संबंधी कार्य आरंभ करने पर 

सफलता मिलती है।

17.अनुराधा (Delta Scorpii)

इस नक्षत्र में चार या छह तारे रथ के आकार सदृश दिखाई देते हैं। यह मैत्रीसंज्ञक नक्षत्र है जिसे विवाह के लिए अति उत्तम बताया गया है। 

इस नक्षत्र में विवाह के अतिरिक्त सुगंधित पदार्थों का व्यवसाय, हाथी, घोड़ी, ऊंट अथवा वाहन संबंधी कार्य भी किए जा सकते हैं। 

अनुराधा नक्षत्र में चिकित्सा कार्य, सर्जरी आदि करने से रोगी के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है।

18.ज्येष्ठा (Alpha Scorpii)

ज्येष्ठा गण्डान्त का नक्षत्र है जिसके स्वामी इन्द्र हैं। इस नक्षत्र के अंत की तीन घटियां दोषपूर्ण होती है जबकि चतुर्थ चरण में किसी भी 

शुभ कार्य को करने के निषेधाज्ञा है। ज्येष्ठा नक्षत्र को राज्याभिषेक, पदग्रहण, शपथग्रहण, शासकीय कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु उत्तम 

माना गया है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के लिए गण्डान्त दोष हेतु शांतिकर्म करवाना चाहिए।

19.मूल (Lambda Saggittarii)

इस नक्षत्र में ग्यारह या बारह तारे माने जाते हैं। यह भी गण्डान्त नक्षत्र है जिसका स्वामी निर्ऋति नामक राक्षस है।

 इस नक्षत्र में विवाह के अतिरिक्त अन्य सभी शुभ कार्यों को करने की मनाही है। परन्तु इस नक्षत्र में उग्र व क्रूर कार्य तथा अस्त्र-शस्त्रों 

का अभ्यास आदि किए जा सकते हैं। मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के लिए शांति का अनुष्ठान करवाना चाहिए।

20.पूर्वाषाढ़ा (Delta Saggittarii)

चार तारों के समूह से बना पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र जलकर्म हेतु अति उत्तम माना गया है। इस नक्षत्र में तालाब, कुआं खोदना, नहर बनाना, 

तेल की लाइन बिछाना आदि कार्य किए जाते हैं। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में उग्र कर्म तथा अग्नि कर्म भी किए जा सकते हैं।

21.उत्तराषाढ़ा (Sigma Saggittarii)

दो तारों के समूह से बना उत्तारषाढ़ा नक्षत्र ध्रुव-स्थिर प्रकृति वाला ऊर्ध्वमुखी नक्षत्र है। इस नक्षत्र के स्वामी विश्वेदेव हैं। 

इसे बुद्धिप्रदाता नक्षत्र भी माना गया है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में ध्वज, पताका, छत, तोरण, पुल/पुलिया बनवाना, मुकुट आदि का निर्माण करना, 

हल चलाना, बीज बोना, वाहन चलाना, रेलवे लाइन बिछाना आदि कार्य प्रशस्त हैं।

22.अभिजित् (Vega)

आकाश के सर्वाधिक चमकदार नक्षत्रों में एक अभिजित् अकेला ऐसा नक्षत्र है जो आकाशगंगा से बाहर है, अतः इसे मुहूर्त के अतिरिक्त 

अन्य कार्यों हेतु नहीं गिना जाता। 

अभिजित् नक्षत्र में तीन तारे त्रिकोणाकृति में दिखआई देते हैं। इस नक्षत्र को प्रतीक्षालय (यात्रागार) के निर्माण हेतु उचित माना गया है।

23.श्रवण (Alpha Aquilae)

यह नक्षत्र तीन तारों से मिलकर बना है जो विष्णु के तीन पगों के आकार में माने गए हैं। श्रवण नक्षत्र के स्वामी भगवान विष्णु है। 

यह ऊर्ध्वमुखी नक्षत्र है। इसमें यज्ञशाला का निर्माण, जनेऊ संस्कार, कृषिकार्य, कथावाचन, प्रवचन, धर्मग्रन्थों का लेखन, विवाह आदि, 

वाहन की सवारी, पहाड़ों की यात्रा, तीर्थयात्रा, दूरसंचार साधानों का उपयोग आदि करना शुभ माना गया है।

24. धनिष्ठा (Beta Delphini)

मृदंग के आकार सदृश दिखाई देने वाले चार तारों के समूह से बना धनिष्ठा नक्षत्र शुभ नक्षत्रों में माना गया है। इस नक्षत्र को विद्यारंभ हेतु

 श्रेष्ठ बताया गया है। 

इस नक्षत्र में बीज बोना, वाहन प्रयोग, यात्रा, जनेऊ संस्कार, रोजगार, वाणिज्य, व्यवसाय आदि कार्य प्रशस्त है।

25.शतभिषा (Lambda Aquarii)

शतभिषा नक्षत्र के स्वामी वरुण देव है। यह नक्षत्र मैत्री कार्य, वाणिज्य, व्यापार, चुनाव-प्रचार, प्रचार-प्रसार, क्रय-विक्रय, कृषि कार्य, यात्रा, 

गौशाला, गजशाला, अश्वशाला, गैरेज आदि के निर्माण तथा प्रवेश के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक

 वाद-विवाद में कुशल, विद्वान तथा प्रभावशाली वक्ता होता है।

26. पूर्वाभाद्रपदा (Alpha Pegasi)

उग्र तथा क्रूर स्वभाव वाले पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र के स्वामी अजैकपात् नामक देव है। इस नक्षत्र को जलसंबंधी कार्यों हेतु यथा कुआं, तालाब, 

नहर, तड़ाग, पानी की टंकी, टैंक, जल पात्र आदि के निर्माण तथा उपयोग हेतु प्रशस्त बताया गया है। इस नक्षत्र को ‘पूर्वाप्रौष्ठपदा’ भी कहा जाता है।

27.उत्तराभाद्रपदा (Gamma Pegasi)

दो तारों के समूह से बने उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र के स्वामी अहिर्बुध्न्य है। यह विवाह का नक्षत्र है जिसमें स्थिर कार्य, कृषि कार्य, कूप, तालाब, 

तड़ाग आदि का निर्माण, मैत्री संबंध बनाना, अश्वशाला का निर्माण, वाहन प्रयोग, संन्यासग्रहण, वानप्रस्थग्रहण, गृहत्याग आदि कार्य 

किए जाते हैं। उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र को ‘उत्तरप्रौष्ठपदा’ भी कहा जाता है।

28.रेवती (Zeeta Piscium) 32 तारों वाले रेवती नक्षत्र को ‘पौष्ण’ भी कहा जाता है, इसके देवता पूषा है। रेवती नक्षत्र में धार्मिक कार्य,

 विवाह, मैत्रीकर्म आदि कार्य करना शुभ होता है। रेवती नक्षत्र में कृषि कार्य, मकान बनाना, यात्रा करना, देवप्रतिमा की प्रतिष्ठा करना 

आधि कार्य श्रेष्ठ बताए गए हैं, परन्तु धनिष्ठा के उत्तरार्ध से रेवतीपर्यन्त तक के नक्षत्र पंचक कहलाते हैं 

जिनमें कोई भी शुभ कार्य नहीं करने की आज्ञा दी गई है।

 
 
  
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पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है। पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है। सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है। पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की यदि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टि पूर्ण पंचम भाव पर पड़ रही हो तो पुत्र अवश्य होता है। पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो एवं सभी ग्रहों में बलवान हो तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है। पंचम स्थान पर स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होगी। जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान लड़की होगी। एक नियम यह भी है कि सप्तमांश कुंडली में चँद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो एवं उसके साथ जीतने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी। संतान सुख कैसे होगा, इसके लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा। पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा। पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें हो तो संतान संबंधित शुभ फल देता है। यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो तो संतान सुख नहीं होता। यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है या अलग हो जाती है। यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है। द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है। पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है। पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है। पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है। सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती। इस प्रकार तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ (राहु, शनि, केतु) के साथ हो तो संतान नहीं होती। पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो पुत्र संतान सुख नहीं होता। पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है। यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो तो चांडाल योग बनता है और संतान में बाधा डालता है यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो। यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती। नीच का राहु भी संतान नहीं देता। राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है। पंचम स्थान में पड़ा चँद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है। यदि योग लग्न में न हों तो चँद्र कुंडली देखना चाहिए। यदि चँद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें। पंचम स्थान पर राहु या केतु हो तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती। यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य ऑपरेशन द्वारा संतान देता है। पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो और शनि की दृष्टि पड़ रही हो तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है।
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