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जन्म पत्री में नाजायज संबंध का योग

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जन्म पत्रिका में नाजायज संबंध का योग ********************************** जिस जातक की जन्म पत्रिका मे सप्तम भाव मे शुक्र स्थित होता है तो वह व्यक्ति को अत्याअधिक कामुक बनाता है, यदि सप्तमस्थ शुक्र इस स्थान में अपनी उच्च राशि "मीन" मे हो तो यह योग और प्रबल हो जाता है जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध बनने कि संभावना प्रबल रहती है। जिस्से वैवाहिक जीवन का सुख नष्ट होता है। यदि जन्म कुंड़ली के सप्तम भाव मे सूर्य हो, तो अन्य स्त्री-पुरुष से नाजायज संबंध बनाने वाला जीवनसाथी मिलता है। यदि जन्म कुंड़ली मे शत्रु राशि मे मंगल या शनि हो, अथवा क्रूर राशि मे स्थित होकर सप्तम भाव मे स्थित हो, तो क्रूर, मारपीट करने वाले जीवनसाथी कि प्राप्ति होती है। जन्म कुंड़ली मे सप्तम भाव मे चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य से प्रेम कर अवैध संबंध रखता है। यदि जन्म कुंड़ली मे सप्तम भाव मे राहु होने पर जीवनसाथी धोखा देने वाला कई स्त्री-पुरुष से संबंध रखने वाला व्यभिचारी होता है व विवाह के बाद अवैध संबंध बनाता है। उक्त ग्रह दोष के कारण ऐसा जीवनसाथी मिलता है जिसके कई स्त्री-पुरुष के साथ अवैध संबंध होते है। जो अपने दांपत्य जीवन के प्रति अत्यंत लापरवाह होते है। यदि जन्म कुंड़ली मे सप्तमेश यदि अष्टम या षष्टम भाव मे हो, तो यह पति-पत्नी के मध्य मतभेद पैदा होता है। इस योग के कारणा पति-पत्नी एक दूसरे से अलग भी हो सकते है। इस योग के प्रभाव से पति-पत्नी दोंनो के विवाहेत्तर संबंध बन सकते है। इस लिये जिन पुरुष और कन्या कि कुंडली मे इस तरह का योग बन रहा हो उन्हे एक दूसरे कि भावनाओ का सम्मान करते हुवे अपने अंदर समर्पण कि भावना रखनी चाहिए। *जन्म कुंडली में शुक्र उच्च का होने पर व्यक्ति के कई प्रेम प्रसंगहो सकते हैं, जो कि विवाह के बाद भी जारी रहते हैं। *सप्तम भाव में मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता हैं स्त्री-पुरुष के विवाहेत्तर संबंध भी बनाता है। संतान पक्ष के किये कष्टकारी होता हैं। मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति-पत्नी में दूरियां बढ़ती हैं। *द्वादश भाव में मंगल शैय्या सुख, भोग, में बाधक होता हैं इस दोष के कारण पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम एवं सामंजस्य का अभाव रहता हैं। यदि मंगल पर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हों, तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष और गुप्त रोग उत्पन्न कर सकता हैं। व्यक्ति जीवनसाथी को घातक नुकसान भी कर सकता हैं। *यदि जन्म कुंडली में सप्तम भाव में शुक्र स्थित व्यक्ति को अत्याअधिक कामुक बनाता हैं जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध बनने कि संभावना प्रबल रहती हैं। जिस्से वैवाहिक जीवन का सुख नष्ट होता हैं। *जन्म कुंड़ली मे सप्तम भाव में सूर्य हो, तो अन्य स्त्री-पुरुष से नाजायज संबंध बनाने वाला जीवनसाथी मिलता है। *जन्म कुंड़ली मे शत्रु राशि में मंगल या शनि हो, अथवा क्रूर राशि में स्थित होकर सप्तम भाव में स्थित हो, तो क्रूर, मारपीट करने वाले जीवनसाथी कि प्राप्ति होती हैं। *जन्म कुंड़ली मे सप्तम भाव में चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य से प्रेम कर अवैध संबंध रखता है। *जन्म कुंड़ली मे सप्तम भाव में राहु होने पर जीवनसाथी धोखा देने वाला कई स्त्री-पुरुष से संबंध रखने वाला व्यभिचारी होता हैं व विवाह के बाद अवैध संबंध बनाता है। उक्त ग्रह दोष के कारणा ऐसा जीवनसाथी मिलता हैं जिसके कई स्त्री-पुरुष के साथ अवैध संबंध होते हैं। जो अपने दांपत्य जीवन के प्रति अत्यंत लापरवाह होते हैं। जन्म कुंड़ली मे सप्तमेश यदि अष्टम या षष्टम भाव में हों, तो यह पति-पत्नी के मध्य मतभेद पैदा होता हैं। इस योग के कारणा पति-पत्नी एक दूसरे से अलग भी हो सकते हैं। इस योग के प्रभाव से पति-पत्नी दोंनो के विवाहेत्तर संबंध बन सकते हैं। इस लिये जिन पुरुष और कन्या कि कुंडली में में इस तरह का योग बनरहा हों उन्हें एक दूसरे कि भावनाओं का सम्मान करते हुवे अपने अंदर समर्पण कि भावना रखनी चाहिए। Astro.Ishwer Dutt babluji38@gmail.com
posted 4 days ago by anonymous

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*ॐ श्री परमात्मने नमः ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~: कुंडली में एक से अधिक विवाह का योग कई लोगो के जीवन में सम्बन्ध या विवाह का योग सिर्फ एक ही नहीं होता बल्कि एक से अधिक और कई बार अनेक होता है . कई बार ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति एक सम्बन्ध टूटने के बाद दुसरे सम्बन्ध में पड़ता है परन्तु कई बार तो ऐसी स्थिति होती है कि व्यक्ति एक साथ ही एक से अधिक रिश्तों में रहता है . क्यों होती हैं ऐसी स्थितियां ? कौन से ग्रह और उनकी स्थितियां हैं इसके लिए जिम्मेदार आइये देखते हैं – 1. यदि सप्तमेश अपनी नीच की राशी में हो तो जातक की दो पत्नियां/सम्बन्ध होती हैं. 2. यदि सप्तमेश , पाप ग्रह के साथ किसी पाप ग्रह की राशी में हो और जन्मांग या नवांश का सप्तम भाव शनि या बुध की राशी में हो तो दो विवाह की संभावनाएं होती हैं. 3. यदि मंगल और शुक्र सप्तम भाव में हो या शनि सप्तम भाव में हो और लग्नेश अष्टम भाव में हो तो जातक के तीन विवाह या सम्बन्ध संभव हैं. 4. यदि सप्तमेश सबल हो , शुक्र द्विस्वभाव राशि में हो जिसका अधिपति ग्रह उच्च का हो तो व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियां या बहुत से रिश्ते होंगे . 5. सप्तमेश उच्च का हो या वक्री हो अथवा शुक्र लग्न भाव में सबल एवं स्थिर हो तो जातक की कई पत्नियां/सम्बन्ध होंगी. 6. यदि सप्तम भाव में पाप ग्रह हो, द्वितीयेश पाप ग्रह के साथ हो और लग्नेश अष्टम भाव में हो तो जातक के दो विवाह होंगे. 7. यदि शुक्र जन्मांग या नवांश में किसी पाप ग्रह की युति में अपनी नीच की राशि में हो तो व्यक्ति के दो विवाह निश्चित हैं. 8. यदि सप्तम भाव और द्वितीय भाव में पाप ग्रह हों और इनके भावेश निर्बल हों तो जातक पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह कर लेता है. 9. यदि सप्तम भाव और अष्टम भाव में पाप ग्रह हों मंगल द्वादश भाव में हो और सप्तमेश की सप्तम भाव पर दृष्टि न हो तो जातक की पहली पत्नी की मृत्यु हो जाती है और वह दूसरा विवाह करता है. 10. यदि सप्तमेश और एकादशेश एक ही राशि में हों अथवा एक दुसरे पर परस्पर दृष्टि रखते हों या एक दूसरे से पंचम नवम स्थान में हों तो जातक के कई विवाह होते हैं. 11. यदि सप्तमेश चतुर्थ भाव में हो और नवमेश सप्तम भाव में हो अथवा सप्तमेश और एकादशेश एक दुसरे से केंद्र में हो तो जातक के एक से अधिक विवाह होंगे. यदि द्वितीय भाव और सप्तम भाव में पाप ग्रह हों तथा सप्तमेश के ऊपर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो पति/पत्नी की मृत्यु के कारण जातक को तीन या उससे भी अधिक बार विवाह करना पड़ सकता है . 2.जानिए की शादी तय होकर भी क्यों टूट जाती है- (१)- यदि कुंडली में सातवें घर का स्वामी सप्तमांश कुंडली में किसी भी नीच ग्रह के साथ अशुभ भाव में बैठा हो तो शादी तय नहीं हो पाती है. (२)- यदि दूसरे भाव का स्वामी अकेला सातवें घर में हो तथा शनि पांचवें अथवा दशम भाव में वक्री अथवा नीच राशि का हो तो शादी तय होकर भी टूट जाती है. (३)- यदि जन्म समय में श्रवण नक्षत्र हो तथा कुंडली में कही भी मंगल एवं शनि का योग हो तो शादी तय होकर भी टूट जाती है. (४) यदि मूल नक्षत्र में जन्म हो तथा गुरु सिंह राशि में हो तो भी शादी तय होकर टूट जाती है. किन्तु गुरु को वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए. (५) यदि जन्म नक्षत्र से सातवें, बारहवें, सत्रहवें, बाईसवें या सत्ताईसवें नक्षत्र में सूर्य हो तो भी विवाह तय होकर टूट जाता है. 3.तलाक क्यों हो जाता है- (१)- यदि कुंडली मांगलीक होगी तो विवाह होकर भी तलाक हो जाता है. किन्तु ध्यान रहे किसी भी हालत में सप्तमेश को वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए. (२)- दूसरे भाव का स्वामी यदि नीचस्थ लग्नेश के साथ मंगल अथवा शनि से देखा जाता होगा तो तलाक हो जाएगा. किन्तु मंगल अथवा शनि को लग्नेश अथवा द्वितीयेश नहीं होना चाहिए. (३) यदि जन्म कुंडली का सप्तमेश सप्तमांश कुंडली का अष्टमेश हो अथवा जन्म कुंडली का अष्टमेश सप्तमांश कुंडली का लग्नेश हो एवं दोनों कुंडली में लग्नेश एवं सप्तमेश अपने से आठवें घर के स्वामी से देखे जाते हो तो तलाक निश्चित होगा. (४)- यदि पत्नी का जन्म नक्षत्र ध्रुव संज्ञक हो एवं पति का चर संज्ञक तो तलाक हो जाता है. किन्तु किसी का भी मृदु संज्ञक नक्षत्र नहीं होना चाहिए. (५)- यदि अकेला राहू सातवें भाव में तथा अकेला शनि पांचवें भाव में बैठा हो तो तलाक हो जाता है. किन्तु ऐसी अवस्था में शनि को लग्नेश नहीं होना चाहिए. या लग्न में उच्च का गुरु नहीं होना चाहिए. 4.पति पत्नी का चरित्र- (१)- यदि कुंडली में बारहवें शुक्र तथा तीसरे उच्च का चन्द्रमा हो तो चरित्र भ्रष्ट होता है. (२)- यदि सातवें मंगल तथा शुक्र एवं पांचवें शनि हो तो चरित्र दोष होता है. (३)- नवमेश नीच तथा लग्नेश छठे भाव में राहू युक्त हो तो निश्चित ही चरित्र दोष होता है. (४)- आर्द्रा, विशाखा, शतभिषा अथवा भरनी नक्षत्र का जन्म हो तथा मंगल एवं शुक्र दोनों ही कन्या राशि में हो तो अवश्य ही पतित चरित्र होता है. (५)- कन्या लग्न में लग्नेश यदि लग्न में ही हो तो पंच महापुरुष योग बनता है. किन्तु यदि इस बुध के साथ शुक्र एवं शनि हो तो नपुंसकत्व होता है. (६)- यदि सातवें राहू हो तथा कर्क अथवा कुम्भ राशि का मंगल लग्न में हो तो या लग्न में शनि-मंगल एवं सातवें नीच का कोई भी ग्रह हो तो पति एवं पत्नी दोनों ही एक दूसरे को धोखा देने वाले होते है. 5.विवाह नही होगा अगर- यदि सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है। यदि सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है। यदि सप्तमेश नीच राशि में है। यदि सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है। जब चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों। जब शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों। जब शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों। जब शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो। जब कभी शुक्र, बुध, शनि ये तीनो ही नीच हों। जब पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों। जब सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो। 6. शुभ ग्रह हमेशा शुभ नहीं होते(पति पत्नी में अलगाव के ज्योतिषीय कारण )— ज्योतिषीय नियम है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल का ह्वास और शुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल की समृद्धि होती है। जैसे, मानसागरी में वर्णन है कि केन्द्र भावगत बृहस्पति हजारों दोषों का नाशक होता है। किन्तु, विडंबना यह है कि सप्तम भावगत बृहस्पति जैसा शुभ ग्रह जो स्त्रियों के सौभाग्य और विवाह का कारक है, वैवाहिक सुख के लिए दूषित सिद्ध हुआ हैं। यद्यपि बृहस्पति बुद्धि, ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण एक अति शुभ और पवित्र ग्रह है, मगर कुंडली में सप्तम भावगत बृहस्पति वैवाहिक जीवन के सुखों का हंता है। सप्तम भावगत बृहस्पति की दृष्टि लग्न पर होने से जातक सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान, स्वाभिमानी और कर्मठ तथा अनेक प्रगतिशील गुणों से युक्त होता है, किन्तु ‘स्थान हानि करे जीवा’ उक्ति के अनुसार यह यौन उदासीनता के रूप में सप्तम भाव से संबन्धित सुखों की हानि करता है। प्राय: शनि को विलंबकारी माना जाता है, मगर स्त्रियों की कुंडली के सप्तम भावगत बृहस्पति से विवाह में विलंब ही नहीं होता, बल्कि विवाह की संभावना ही न्यून होती है। यदि विवाह हो जाये तो पति-पत्नी को मानसिक और दैहिक सुख का ऐसा अभाव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता हैं। वैद्यनाथ ने जातक पारिजात, अध्याय 14, श्लोक 17 में लिखा है, ‘नीचे गुरौ मदनगे सति नष्ट दारौ’ अर्थात् सप्तम भावगत नीच राशिस्थ बृहस्पति से जातक की स्त्री मर जाती है। कर्क लग्न की कुंडलियों में सप्तम भाव गत बृहस्पति की नीच राशि मकर होती है। व्यवहारिक रूप से उपयरुक्त कथन केवल कर्क लग्न वालों के लिए ही नहीं है, बल्कि कुंडली के सप्तम भाव अधिष्ठित किसी भी राशि में बृहस्पति हो, उससे वैवाहिक सुख अल्प ही होते हैं। एक नियम यह भी है कि किसी भाव के स्वामी की अपनी राशि से षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान पर स्थिति से उस भाव के फलों का नाश होता है। सप्तम से षष्ठ स्थान पर द्वादश भाव- भोग का स्थान और सप्तम से अष्टम द्वितीय भाव- धन, विद्या और परिवार तथा उनसे प्राप्त सुखों का स्थान है। यद्यपि इन भावों में पाप ग्रह अवांछनीय हैं, किन्तु सप्तमेश के रूप में शुभ ग्रह भी चंद्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र किसी भी राशि में हों, वैवाहिक सुख हेतु अवांछनीय हैं। चंद्रमा से न्यूनतम और शुक्र से अधिकतम वैवाहिक दुख होते हैं। दांपत्य जीवन कलह से दुखी पाया गया, जिन्हें तलाक के बाद द्वितीय विवाह से सुखी जीवन मिला। पुरुषों की कुंडली में सप्तम भावगत बुध से नपुंसकता होती है। यदि इसके संग शनि और केतु की युति हो तो नपुंसकता का परिमाण बढ़ जाता है। ऐसे पुरुषों की स्त्रियां यौन सुखों से मानसिक एवं दैहिक रूप से अतृप्त रहती हैं, जिसके कारण उनका जीवन अलगाव या तलाक हेतु संवेदनशील होता है। सप्तम भावगत बुध के संग चंद्रमा, मंगल, शुक्र और राहु से अनैतिक यौन क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, जो वैवाहिक सुख की नाशक है। ‘‘यदि सप्तमेश बुध पाप ग्रहों से युक्त हो, नीचवर्ग में हो, पाप ग्रहों से दृष्ट होकर पाप स्थान में स्थित हो तो मनुष्य की स्त्री पति और कुल की नाशक होती है।’’सप्तम भाव के अतिरिक्त द्वादश भाव भी वैवाहिक सुख का स्थान हैं। चंद्रमा और शुक्र दो भोगप्रद ग्रह पुरुषों के विवाह के कारक है। चंद्रमा सौन्दर्य, यौवन और कल्पना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण उत्पन्न करता है। दो भोगप्रद तत्वों के मिलने से अतिरेक होता है। अत: सप्तम और द्वादश भावगत चंद्रमा अथवा शुक्र के स्त्री-पुरुषों के नेत्रों में विपरीत लिंग के प्रति कुछ ऐसा आकर्षण होता है, जो उनके अनैतिक यौन संबन्धों का कारक बनता है। यदि शुक्र -मिथुन या कन्या राशि में हो या इसके संग कोई अन्य भोगप्रद ग्रह जैसे चंद्रमा, मंगल, बुध और राहु हो, तो शुक्र प्रदान भोगवादी प्रवृति में वृद्धि अनैतिक यौन संबन्धों की उत्पत्ति करती है। ऐसे व्यक्ति न्यायप्रिय, सिद्धांतप्रिय और दृढ़प्रतिज्ञ नहीं होते बल्कि चंचल, चरित्रहीन, अस्थिर बुद्धि, अविश्वासी, व्यवहारकुशल मगर शराब, शबाब, कबाब, और सौंदर्य प्रधान वस्तुओं पर अपव्यय करने वाले होते हैं। क्या ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन सुखी रह सकता है? कदापि नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों की भांति शुभ ग्रहों की विशेष स्थिति से वैवाहिक सुख नष्ट होते हैं।
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पंचम भाव– जन्म कुंडली में पंचम भाव मुख्य रूप से संतान और ज्ञान का भाव होता है। ऋषि पाराशर के अनुसार इसे सीखने के भाव के तौर पर भी देखा जाता है। यह भाव किसी भी बात को ग्रहण करने की मानसिक क्षमता को दर्शाता है कि, कैसे आप आसानी से किसी विषय के बारे में जान सकते हैं। पंचम भाव गुणात्मक संभावनाओं को भी प्रकट करता है। कुंडली में पंचम भाव को निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है। सम्राट की निशानी, कर, बुद्धि, बच्चे, पुत्र, पेट, वैदिक ज्ञान, पारंपरिक कानून, पूर्व में किये गये पुण्य कर्म कुंडली में पंचम भाव से क्या देखा जाता है बुद्धिमता, लगाव, आत्मन बच्चे, प्रसिद्धि, संचित कर्म पद का बोध पंचम भाव से लगाया जाता है ज्योतिष विद्या से संबंधित पुस्तकों में पंचम भाव प्रश्नज्ञान में भट्टोत्पल कहते हैं कि मंत्रों का उच्चारण या धार्मिक भजन, आध्यात्मिक गतिविधियां, बुद्धिमता और साहित्यिक रचनाएँ पंचम भाव से प्रभावित होती हैं। पंचम भाव प्रथम संतान की उत्पत्ति, खुशियां, समाज और सामाजिक झुकाव का प्रतिनिधित्व करता है। यह भाव स्वाद और प्रशंसा, कलात्मक गुण, नाट्य रुपांतरण, मनोरंजन, हॉल और पार्टी, रोमांस, प्यार, प्रेम प्रसंग, सिनेमा, मनोरंजन का स्थान, रंगमंच आदि को दर्शाता है। यह भाव सभी प्रकार की वस्तुओं और भौतिक सुखों जैसे- खेल, ओपेरा, ड्रामा, संगीत, नृत्य और मनोरंजन को दर्शाता है। उत्तर कालामृत के अनुसार पंचम भाव कुंडली में एक महत्वपूर्ण भाव होता है क्योंकि यह उच्च नैतिक मूल्य, मैकेनिकल आर्ट, विवेक, पुण्य और पाप के बीच भेदभाव, मंत्रों के द्वारा प्रार्थना, वैदिक मंत्र और गीतों का उच्चारण, धार्मिक प्रवृत्ति, गहरी सोच, गहन शिक्षा और ज्ञान, विरासत में मिला उच्च पद, साहित्यिक रचना, त्यौहार, संतुष्टि, पैतृक संपत्ति, वेश्या के साथ संबंध और चावल से निर्मित उपहार को दर्शाता है। ऋषि पाराशर के अनुसार, पंचम भाव, दशम भाव से अष्टम पर स्थित होता है इसलिए पंचम भाव उच्च पद और प्रतिष्ठा में गिरावट को दर्शाता है। इससे पूर्व जन्म में किये जाने वाले पुण्य कर्मों का पता चलता है। यह भाव प्राणायाम, आध्यात्मिक कार्य, मंत्र-यंत्र, इष्ट देवता, शिष्य और धार्मिक कार्यक्रमों के लिए आमंत्रण को दर्शाता है। यह भाव मानसिक चेतना से आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति को प्रकट करता है। काल पुरुष कुंडली में पंचम भाव पर सिंह राशि का नियंत्रण रहता है और इसका स्वामी सूर्य है। पंचम भाव की विशेषताएँ पंचम भाव विशेष विषयों में उच्च शिक्षा, फैलोशिप, पोस्ट ग्रेजुएशन, लेखन, पढ़ना, वाद-विवाद, रिसर्च, मानसिक खोज और कौशल को दर्शाता है। इस भाव से सट्टेबाजी में होने वाले लाभ, शेयर बाजार, जुआ, मैच फिक्सिंग और लॉटरी से जुड़े मामलों को भी देखा जाता है। पंचम भाव के संबंध में जातक परिजात में उल्लेख मिलता है कि यह बुद्धिमता, पुत्र, धर्म, शासक या राजा को दर्शाता है। तीर्थयात्रा को द्वितीय, पंचम, सप्तम और एकादश भाव से देखा जाता है। पंचम भाव प्रेम-प्रसंग, किस प्रेम-प्रसंग में सफलता मिलेगी, लाइसेंस, वैध और तर्कसंगत आकर्षण, बलात्कार, अपहरण आदि को दर्शाता है। यह भाव दो लोगों के बीच शारीरिक और चुंबकीय व्यक्तित्व को आकर्षित करता है। यह भाव पेट की चर्बी और ह्रदय का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अलावा यह दायें गाल, ह्रदय का दायां भाग या दायें घुटने को भी दर्शाता है। मेदिनी ज्योतिष में पंचम भाव बुद्धिमता, संवेदना की स्थिरता, सांप्रदायिक सौहार्द, लोगों में सट्टेबाजी की प्रवृत्ति, निवेश, स्टॉक एक्सचेंज, बच्चे, आबादी, विश्वविद्यालय, लोगों के नैतिक मूल्य आदि बातों को दर्शाता है। यह भाव जन्म दर और उससे संबंधित रुचि, मनोरंजन स्थल, सिनेमा, रंगमंच, कला, स्पोर्ट्स, सभी प्रकार के मनोरंजन और खुशियों को प्रदर्शित करता है। यह भाव राजदूत, सरकार के प्रतिनिधि और विदेशों में स्थित राजनयिकों पर शासन करता है। यह मानव संसाधन मंत्रालय, शिक्षा, स्कूल, संभावनाओं पर आधारित देश की अर्थव्यवस्था, लोगों की खुशियां या दुःख, शिक्षा से संबंधित सुविधाएँ, कला और देश की कलात्मक रचना आदि का बोध कराता है। पंचम भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध पंचम भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध हो सकता है। जैसे कि पंचम भाव संतान, कला, मीडिया, सृजनात्मकता, रंगमंच प्रस्तुति, सिनेमा, मनोरंजन से संंबंधित अन्य साधन, रोमांस और अस्थाई आश्रय या निवास से संबंधित होता है। पंचम भाव चतुर्थ भाव से द्वितीय स्थान पर होता है। तृतीय भाव हमारे अहंकार, अपरिपक्व व्यवहार और सोचने-समझने की शक्ति व ज्ञान को दर्शाता है लेकिन असल में इनका निर्धारण कुंडली में पंचम भाव से होता है। पंचम भाव उन बिन्दुओं को दर्शाता है, जिनसे जीवन में आप कुछ सीखते हैं। चतुर्थ भाव शुरुआती शिक्षा का कारक होता है, यह प्राथमिक शिक्षा, निवास और भवन को दर्शाता है। पंचम भाव गणित, विज्ञान, कला आदि से संबंधित होता है। इससे तात्पर्य है कि आप किस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त करेंगे। शेयर बाजार, सट्टे से लाभ, सिनेमा, अचानक होने वाला धन लाभ और हानि कुंडली में पंचम भाव से देखा जाता है। पंचम भाव राजनीति, मंत्री, मातृ भूमि से लाभ की प्राप्ति, स्थाई और पारिवारिक संपत्ति को दर्शाता है। आपके पास कितना धन होगा यह कुंडली में चतुर्थ भाव से देखा जाता है। वहीं आपके परिवार के पास कितना धन होगा यह पंचम भाव से जाना जाता है। पंचम भाव बुद्धिमता, अहंकार और आपके बड़े भाई-बहनों की संवाद क्षमता को दर्शाता है। आपकी माता का धन और उन्हें होने वाले लाभ, बच्चों से जुड़े खर्च, आपके जीवनसाथी और भाई-बहनों की इच्छा व उन्हें प्राप्त होने वाले लाभ का बोध भी पंचम भाव से होता है। यह भाव अंतर्ज्ञान और जीवनसाथी के परिवार की छवि के प्रभाव को भी दर्शाता है। यह भाव धर्म, दर्शन, धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं का सबसे उच्च भाव है। यह दर्शाता है कि आपके पिता और गुरु से आप किस प्रकार ज्ञान प्राप्त करेंगे। ज्योतिष शास्त्र की पुस्तकों में पंचम भाव कर्म या नौकरी का अंत और शुरुआत को दर्शाता है। इसका मतलब है कि आप नौकरी खो देंगे और आपको नई नौकरी मिलेगी या जॉब के लिए नये अवसर मिलेंगे। पंचम भाव बॉस की गुप्त संपत्तियाँ, इच्छाओं का अंत, बड़े भाई-बहनों के जीवनसाथी, दादी की सेहत, मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति की राह में आने वाली कठिनाइयों को दर्शाता है।
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चतुर्थ भाव– जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव को प्रसन्नता या सुख का भाव कहा जाता है। इसे माता के भाव के तौर पर भी जाना जाता है। यह भाव आपके निजी जीवन, घर में आपकी छवि, माता के साथ आपके संबंध, परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आपके संबंध, आपकी सुख-सुविधाएँ और स्कूली व शुरुआती शिक्षा से संबंधित होता है। चतुर्थ भाव का महत्व और विशेषताएँ चतुर्थ भाव मानसिक शांति, पारिवारिक जीवन, निजी रिश्तेदार, घर, समृद्धि, उल्लास, सुविधाएँ, जमीन और पैतृक संपत्ति, छोटी-छोटी खुशियां, शिक्षा, वाहन और गर्दन व कंधों से संबंध रखता है। ज्योतिष में चतुर्थ भाव से क्या देखा जाता है? माता सुख-सुविधा वाहन अचल संपत्ति घर चतुर्थ भाव को लेकर ज्योतिषीय व्याख्या प्रसन्नज्ञान में भट्टोत्पल कहते हैं कि मूल्यवान जड़ी-बूटी, खजाना, छिद्र और गुफाओं को दर्शाता है। ज्योतिष विद्वानों के अनुसार, चतुर्थ भाव माता का भाव होता है। यह भाव घर, निवास, पारिवारिक जीवन और व्यक्ति के सामान्य जीवन को दर्शाता है। यह भाव घर-परिवार से जुड़ी गुप्त बातों का बोध कराता है। काल पुरुष कुंडली में चतुर्थ भाव पर कर्क राशि का नियंत्रण रहता है और इस राशि का स्वामी ग्रह चंद्रमा होता है। उत्तर-कालामृत में कालिदास कहते हैं चतुर्थ भाव माता, तेल, स्नान, रिश्ते, जाति, वाहन, छोटी नाव, कुएँ, पानी, दूध, गाय, भैंस, मक्का और वृद्धि आदि को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त आर्द्र भूमि में उत्पादन, दवाई, विश्वास, झूठे आरोप, तंबू, तालाब की खुदाई या जन कल्याण के लिए इसका इस्तेमाल, हवेली, कला, घर में मनोरंजन, पैतृक संपत्ति, चोरी हुई संपत्ति का पता लगाने की कला, वैदिक और पवित्र ग्रन्थों का विकास आदि। चतुर्थ भाव जमीन या अचल संपत्ति को भी दर्शाता है, साथ ही किराये या लीज पर ली गई जमीन या वस्तुएँ। यह भाव वाहन सुख और अन्य व्यक्तियों के माध्यम से मिलने वाले वाहन सुख को भी प्रकट करता है। कुंडली में चतुर्थ भाव सभी प्रकार की संपत्ति को प्रभावित करता है (संपत्ति जैसे- क्षेत्र, चारागाह, रियल इस्टेट, खेत, बिल्डिंग, गार्डन, माइंस और स्मारक आदि) चतुर्थ भाव व्यक्ति की शिक्षा और शैक्षणिक योग्यता का बोध कराता है इसलिए इससे व्यक्ति की शुरुआती शिक्षा और कॉलेज की पढ़ाई के बारे में जाना जाता है। चतुर्थ भाव पैतृक घर जहां व्यक्ति का जन्म हुआ है, घर या जन्मभूमि से दूर जाने की संभावना, भूमिगत स्थान, प्राचीन स्मारक, आर्किटेक्चर, वाहन, घोड़े, हाथी और व्यक्ति का माँ के साथ संबंधों को दर्शाता है। चतुर्थ भाव सुख, विजय और आराम, पवित्र स्थान, नैतिक गुण, धार्मिक आचरण, स्तन, छाती, विद्रोह, मन, बुद्धिमता, व्यक्ति की योग्यता, हाई स्कूल और कॉलेज की शिक्षा आदि को व्यक्त करता है। मेदिनी ज्योतिष में चतुर्थ भाव राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन, माइंस, गार्डन, सार्वजनिक इमारतें, फसलें, कृषि, खनिज, जमीन, शांति, राजनीतिक स्थिरता, प्राकृतिक आपदाएँ, शैक्षणिक संस्थान, स्कूल, कॉलेज, कानून और व्यवस्था, घर व अन्य समुदायों से सद्भाव को दर्शाता है। इसे सिंहासन भाव भी कहा जाता है। इस भाव को राष्ट्र के लोगों के जीने की स्थिति, रियल इस्टेट, हाउसिंग, फार्मिंग और उत्पादन से भी जोड़कर देखा जाता है। यह भाव मातृभूमि, राष्ट्रवाद, झंडा और राजा के सिंहासन को भी दर्शाता है। इससे मौसम की स्थिति, ज्वालामुखी विस्फोट, भूकंप, बाढ़, सुनामी, भू-स्खलन, वनों में आग या अन्य प्राकृतिक आपदाओं को भी देखा जाता है। पश्चिमी ज्योतिष में चतुर्थ भाव का विचार कैबिनेट (मंत्रिमंडल) के तौर पर किया जाता है। वहीं वैदिक ज्योतिष में मंत्रिमंडल को प्रथम भाव से देखा जाता है। चतुर्थ भाव भौगोलिक मंत्रालय को भी दर्शाता है। यह किसी भी प्रकार सहमति या समझौते को निरस्त करने का निर्धारण भी करता है। चतुर्थ भाव का अन्य भावों से अंतर्संबंध चतुर्थ भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध हो सकता है। यह हमारे निजी जीवन या अफेयर को दर्शाता है, साथ ही आपके छोटे भाई-बहनों का धन, संचार में वृद्धि, यात्रा करने की क्षमता, वस्त्र, फर्नीचर, घर के अंदर की कलात्मक वस्तुएँ, कार, ऑर्किटेक्चर की पढ़ाई, पेशेवर और वाणिज्यिक स्थान को भी दर्शाता है। यह भाव निकटवर्ती रिश्ते और रिश्तेदारों के साथ संबंध व उनके घर आने का बोध कराता है। सामान्य रूप से यह सभी प्रकार के रिश्तों और रिश्तेदारों का प्रतिनिधित्व करता है, जो आपके घर आया करते हैं। छोटे भाई-बहनों के संसाधन, बच्चों को खोने का भय, आपके बच्चे कहां दान करते हैं, वह स्थान जहां वे धन दान करते हैं। यह सभी कुंडली में चतुर्थ भाव से देखा जाता है। चतुर्थ भाव विवाह के बाद आपके परिवार यानि बीवी और बच्चे आदि को दर्शाता है, साथ ही संयुक्त संपत्ति में आपका भाग्य, ससुराल पक्ष के लोगों का भाग्य, बिजनेस में की जाने वाली संभावनाओं से होने वाला नुकसान, आपके अंकल को होने वाला लाभ, कर्ज से मुक्ति, रोग और शत्रु, विरोधियों से होने वाला लाभ आदि का बोध होता है। चतुर्थ भाव आपके जीवनसाथी के करियर और प्रोफेशन का बोध भी कराता है। समाज में आपके जीवनसाथी की छवि या प्रतिष्ठा, आपके ससुराल पक्ष के लोगों के गुरु, ससुराल पक्ष के लोगों की शिक्षा और उनके द्वारा की जाने वाली लंबी दूरी की यात्राओं को भी व्यक्त करता है। चतुर्थ भाव आपके पिता और गुरु के जीवन में होने वाले बड़े परिवर्तन या मृत्यु, पिता की सर्जरी, धन के संबंध में पिता और गुरु से संबंधित गुप्त तथ्य, आपके नैतिक मूल्यों में होने वाले बड़े बदलाव, उच्च शिक्षा या लंबी यात्राओं को व्यक्त करता है। यह भाव आपके जीवनसाथी के अधिकारी और बॉस के साथ कानूनी साझेदारी का बोध भी कराता है। यह भाव स्वास्थ्य, कर्ज और बड़े भाई-बहनों के विरोधी, इच्छाओं की पूर्ति, कानूनी कार्रवाई शत्रुओं के माध्यम से पूरी होने वाली इच्छाओं को व्यक्त करता है। चतुर्थ भाव आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आपकी आस्था को दर्शाता है। आपके अंदर मौजूद संवेदना, संपत्ति को खरीदने या बेचने को लेकर आपके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों का बोध कराता है। यदि किसी व्यक्ति का चतुर्थ भाव पीड़ित है तो उस व्यक्ति को यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
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तृतीय भाव जन्म कुंडली में तृतीय भाव को वीरता और साहस का भाव कहा जाता है। यह हमारी संवाद शैली और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किये जाने वाले प्रयासों को दर्शाता है। किसी भी तरह के कार्य को करने की इच्छाशक्ति का निर्धारण भी इस भाव से देखा जाता है। यह भाव आपके छोटे भाई-बहनों से भी संबंधित होता है। तृतीय भाव को विभिन्न माध्यमों से भी व्यक्त किया जाता है। धैर्य भाव: बुरे विचार, स्तन, कान, विशेषकर दायां कान, वीरता, पराक्रम, भाई-बहन, मानसिक शक्ति तृतीय भाव का महत्व और विशेषता तृतीय भाव भाई-बहन, बुद्धिमत्ता, पराक्रम, कम दूरी की यात्राएँ, पड़ोसी, नज़दीकी रिश्तेदार, पत्र और लेखन आदि का प्रतिनिधित्व करता है। तृतीय भाव से किसी भी व्यक्ति के साहस, पराक्रम, छोटे भाई-बहन, मित्र, धैर्य, लेखन, यात्रा और दायें कान का विचार किया जाता है। यह भाव दायें कान व स्तन, दृढता, वीरता और शौर्य को भी दर्शाता है। अष्टम भाव से अष्टम होने की वजह से तृतीय भाव जातक की आयु और चतुर्थ भाव से द्वादश होने के कारण माता की आयु का विचार भी इसी भाव से किया जाता है। ज्योतिष में तृतीय भाव से क्या देखा जाता है? पराक्रम छोटे भाई-बहन कम दूरी की यात्राएँ लेखन कला मित्रता आयु तृतीय भाव की ज्योतिषीय व्याख्या ‘सत्याचार्य’ के अनुसार किसी व्यक्ति की मानसिक शक्ति, दृढ़ संकल्प और भाषा के बारे में जानने के लिए यह भाव देखा जाता है। ‘सर्वार्थ चिन्तामणि’ के अनुसार, यह भाव कुंडली में किसी भी व्यक्ति के लिए दवाई, मित्र, शिक्षा और कम दूरी की यात्राओं को दर्शाता है। ‘ऋषि पाराशर’ ने तृतीय भाव की व्याख्या करते हुए लिखा है कि, यह साहस और वीरता का भाव है। यह हमारी मानसिक क्षमता व स्थिरता, याददाशत और दिमागी प्रवृत्ति आदि को व्यक्त करता है। यह भाव मुख्य रूप से शिक्षा या ज्ञान प्राप्ति के लिए किये गये प्रयासों व झुकाव को दर्शाता है। काल पुरुष कुंडली में तृतीय भाव पर मिथुन राशि का नियंत्रण रहता है और इसका स्वामी बुध ग्रह होता है। तृतीय भाव छोटे भाई-बहन, कजिन, प्रियजन, कर्ज से मुक्ति और पड़ोसियों के बारे में बताता है। सहज स्थान होने की वजह से यह भाव व्यक्ति को मिलने वाली मदद और अपने कार्य को पूरा करने के लिए मिलने वाली सहायता को दर्शाता है। उत्तर कालामृत में कालिदास कहते हैं कि तृतीय भाव युद्ध, सड़क के किनारे वाला स्थान, मानसिक भ्रम की स्थिति, दुःख, सैनिक, कंठ, भोजन, कान, शुद्ध भोजन, संपत्ति का विभाजन, अंगुली और अंगूठे के बीच का स्थान, महिला सेवक, छोटे वाहन की यात्रा और धर्म को लेकर प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी को दर्शाता है। ‘जातक परिजात’ में कहा गया है कि, तृतीय भाव छोटे भाई-बहनों के कल्याण, प्रतिष्ठान, कान, चुनिंदा गहने, वस्त्र, स्थिरता, वीरता, शक्ति, जड़ युक्त खाद्य पदार्थ और फल आदि को दर्शाता है। तृतीय भाव साहस, छोटी दूरी की यात्रा (साइकिल, ट्रेन, नदी, झील और वायु मार्ग के माध्यम से) का संकेत करता है। यह सभी प्रकार के पत्राचार, लेखन, अकाउंटिंग, गणित, समाचार, संचार के माध्यम जैसे- पोस्ट ऑफिस, लेटर बॉक्स, टेलीफोन, टेलीग्राफ, टेलीप्रिंट, टेलीविजन, टेली कम्युनिकेशन, रेडियो, रिपोर्ट, सिग्नल, एयर मेल आदि का प्रतिनिधित्व करता है। तृतीय भाव किताब और प्रकाशन से संबंधित भी होता है, अतः इस भाव के प्रभाव से कोई भी व्यक्ति भविष्य में संपादक, रिपोर्टर, सूचना अधिकारी और पत्रकार बन सकता है। यह भाव निवास परिवर्तन, बेचैनी, बदलाव और परिवर्तन, पुस्तकालय, बुक स्टोर, भाव-राव, हस्ताक्षर (कॉन्ट्रेक्ट या समझौते पर) मध्यस्थता आदि का कारक भी होता है। इसके अलावा यह भाव हाथ, बांह, श्वसन और तंत्रिका तंत्र को भी दर्शाता है। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार तृतीय भाव परिवहन, टेलीकम्युनिकेशन, पोस्टल सर्विसेज, पड़ोसी देश और अन्य देशों के साथ संधियों को व्यक्त करता है। वहीं नाड़ी ज्योतिष के अनुसार तृतीय भाव जातक के माता-पिता के पुनर्विवाह को भी दर्शाता है, यदि तृतीय भाव में एक से ज्यादा ग्रह स्थित हों। प्रश्न ज्योतिष के अनुसार तृतीय भाव संचार के सभी माध्यमों को दर्शाता है। चाहे वह पत्र, पोस्टल डिलीवरी, टेलीफोन, फैक्स या इंटरनेट हो। तृतीय भाव का अन्य भावों से अंतर्संबंध वैदिक ज्योतिष में तृतीय भाव का संबंध संचार, संवाद, हाथों की मूवमेंट, शारीरिक पुष्टता, स्वयं के द्वारा की जाने वाली लंबी दूरी की यात्रा को दर्शाता है। यदि आप कोई काम अपने हाथों में लेकर उसे पूरा करते हैं, तो इसका बोध कुंडली में तृतीय भाव के माध्यम से किया जाता है। यह ड्राइविंग, कला, मीडिया, एंटरटेनमेंट, रोड, लेखन और आदेश, जो आप अपने नजदीकी रिश्तेदार या भाई-बहनों को संदेश के रूप में देते हैं। किसी भी कार्य को करने की क्षमता या यात्रा के बारे में तृतीय भाव से देखा जाता है। यह भाव धन बढ़ोत्तरी के लिए किये जाने वाले प्रयासों को भी दर्शाता है। यह माता का भाव भी होता है। यद्यपि चतुर्थ भाव माता का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए कुंडली में तृतीय भाव से भी माता के संबंध में अध्ययन किया जाता है। यह भाव जीवन में खुशियों का अभाव या घर की खुशियों की कमी को भी दर्शाता है। यह आशा, कामना और बच्चों की इच्छा (विशेषकर पहली संतान), वृद्धि, सफलता, बच्चों को मिलने वाले पुरस्कार, जॉब, करियर, प्रशासनिक सेवा, बच्चों का व्यावसायिक लोन, वीरता और शत्रुओं से सामना करने का साहस, धर्म, गुरुजन और जीवनसाथी के सलाहकार को भी दर्शाता है। तृतीय भाव बड़े परिवर्तन और ससुराल पक्ष में किसी की मृत्यु का बोध भी कराता है। यह अष्टम भाव से अष्टम पर स्थित होता है इसलिए मृत्यु जैसे विषयों का अनुभव कराता है। यह आपके जीवनसाथी के गुरु और जीवनसाथी के पिता का बोध भी कराता है। यह भाव कर्ज, बीमारी, आपके बड़े भाई-बहनों के बच्चे, आध्यात्मिक कर्मों के संचय को भी दर्शाता है। क्या आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी, क्या आप विदेश यात्रा पर जाएंगे, क्या आप अस्पताल में भर्ती होंगे आदि ये सभी बाते तृतीय भाव द्वारा व्यक्त की जाती है।
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प्रथम भाव जन्म कुंडली में प्रथम भाव यानि लग्न का विशेष महत्व है। हिन्दू ज्योतिष शास्त्र की उत्पत्ति ऋग्वेद से हुई है, इसलिए इसे वैदिक ज्योतिष कहा गया है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली में कुल 12 भाव होते हैं और हर भाव की अपनी विशेषताएँ और महत्व होता है। इनमें प्रथम भाव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह मनुष्य के व्यक्तित्व, स्वभाव, आयु, यश, सुख और मान-सम्मान आदि बातों का बोध कराता है। प्रथम भाव को लग्न या तनु भाव भी कहा जाता है। हर व्यक्ति के जीवन का संपूर्ण दर्शन लग्न भाव पर निर्भर करता है। लग्न का महत्व और विशेषताएँ जब कोई भी व्यक्ति जन्म लेता है तो उस समय विशेष में आकाश में स्थित राशि, नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति के प्रभाव को ग्रहण करता है। दूसरे शब्दों में जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर जो राशि उदय होती है, वही व्यक्ति का लग्न बन जाता है। लग्न के निर्धारण के बाद ही कुंडली का निर्माण होता है। जिसमें ग्रहों की निश्चित भावों, राशि और नक्षत्रों में स्थिति का पता चलता है। इसलिए बिना लग्न के जन्म कुंडली की कल्पना नहीं की जा सकती है। ज्योतिष में प्रथम भाव से क्या देखा जाता है? प्रथम भाव का कारक सूर्य को कहा जाता है। इस भाव से व्यक्ति की शारीरिक संरचना, रुप, रंग, ज्ञान, स्वभाव, बाल्यावस्था और आयु आदि का विचार किया जाता है। प्रथम भाव के स्वामी को लग्नेश का कहा जाता है। लग्न भाव का स्वामी अगर क्रूर ग्रह भी हो तो, वह अच्छा फल देता है। शारीरिक संरचना: प्रथम भाव से व्यक्ति की शारीरिक बनावट और कद-काठी के बारे में पता चलता है। यदि प्रथम भाव पर जलीय ग्रहों का प्रभाव अधिक होता है तो व्यक्ति मोटा होता है। वहीं अगर शुष्क ग्रहों और राशियों का संबंध लग्न पर अधिक रहता है तो जातक दुबला होता है। स्वभाव: किसी भी व्यक्ति के स्वभाव को समझने के लिए लग्न का बहुत महत्व है। लग्न मनुष्य के विचारों की शक्ति को दर्शाता है। यदि चतुर्थ भाव, चतुर्थ भाव का स्वामी, चंद्रमा, लग्न व लग्न भाव के स्वामी पर शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है तो व्यक्ति दयालु और सरल स्वभाव वाला होता है। वहीं इसके विपरीत अशुभ ग्रहों के प्रभाव से व्यक्ति क्रूर प्रवृत्ति का होता है। आयु और स्वास्थ्य: प्रथम भाव व्यक्ति की आयु और सेहत को दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब लग्न, लग्न भाव के स्वामी के साथ-साथ सूर्य, चंद्रमा, शनि और तृतीय व अष्टम भाव और इनके स्वामी मजबूत हों तो, व्यक्ति को दीर्घायु एवं उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। वहीं यदि इन घटकों पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो या कमजोर हों, तो यह स्थिति व्यक्ति की अल्पायु को दर्शाती है। बाल्यकाल: प्रथम भाव से व्यक्ति के बचपन का बोध भी होता है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार यदि लग्न के साथ लग्न भाव के स्वामी और चंद्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो व्यक्ति को बाल्यकाल में शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं। वहीं शुभ ग्रहों के प्रभाव से बाल्यावस्था अच्छे से व्यतीत होती है। मान-सम्मान: प्रथम भाव मनुष्य के मान-सम्मान, सुख और यश को भी दर्शाता है। यदि लग्न, लग्न भाव का स्वामी, चंद्रमा, सूर्य, दशम भाव और इनके स्वामी बलवान अवस्था में हों, तो व्यक्ति को जीवन में मान-सम्मान प्राप्त होता है। वैदिक ज्योतिष के पुरातन ग्रन्थों में प्रथम भाव “उत्तर-कालामृत” के अनुसार, “प्रथम भाव मुख्य रूप से मनुष्य के शरीर के अंग, स्वास्थ्य, प्रसन्नता, प्रसिद्धि समेत 33 विषयों का कारक होता है।” प्रथम भाव को मुख्य रूप से स्वयं का भाव कहा जाता है। यह मनुष्य के शरीर और शारीरिक संरचना का प्रतिनिधित्व करता है। यह हमारे शरीर के ऊपरी हिस्से जैसे चेहरे की बनावट, नाक-नक्शा, सिर और मस्तिष्क आदि को प्रकट करता है। काल पुरुष कुंडली में प्रथम भाव मेष राशि को दर्शाता है, जिसका स्वामी ग्रह मंगल है। सत्याचार्य के अनुसार, कुंडली में प्रथम भाव अच्छे और बुरे परिणाम, बाल्यकाल में आने वाली समस्याएँ, हर्ष व दुःख और देश या विदेश में निवेश की संभावनाओं को प्रकट करता है। नाम, प्रसिद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का विचार भी लग्न से किया जा सकता है। उच्च शिक्षा, लंबी यात्राएँ, पढ़ाई के दौरान छात्रावास में जीवन, बच्चों के अनजान और विदेशी लोगों से संपर्कों (विशेषकर पहली संतान के) का बोध भी लग्न से किया जाता है। ‘प्रसन्नज्ञान’ में भट्टोत्पल कहते हैं कि जन्म, स्वास्थ्य, हर्ष, गुण, रोग, रंग, आयु और दीर्घायु का विचार प्रथम भाव से किया जाता है। प्रथम भाव से मानसिक शांति, स्वभाव, शोक, कार्य की ओर झुकाव, दूसरों का अपमान करने की प्रवृत्ति, सीधा दृष्टिकोण, संन्यास, पांच इंद्रियां, स्वप्न, निंद्रा, ज्ञान, दूसरों के धन को लेकर नजरिया, वृद्धावस्था, पूर्वजन्म, नैतिकता, राजनीति, त्वचा, शांति, लालसा, अत्याचार, अहंकार, असंतोष, मवेशी और शिष्टाचार आदि का बोध होता है। मेदिनी ज्योतिष में लग्न से पूरे देश का विचार किया जाता है, जो कि राज्य, लोगों और स्थानीयता को दर्शाता है। प्रश्न ज्योतिष में प्रथम भाव प्रश्न पूछने वाले को दर्शाता है। प्रथम भाव का अन्य भावों से अंतर्संबंध प्रथम भाव अन्य भावों से भी अंतर्संबंध बनाता है। यह पारिवारिक धन की हानि को भी दर्शाता है। यदि आप विरासत में मिली संपत्ति को स्वयं के उपभोग के लिए इस्तेमाल करते हैं, अतः यह संकेत करता है कि आप अपने धन की हानि कर रहे हैं। इससे आपके स्वास्थ्य के बारे में भी पता चलता है, अतः आप विरासत में मिले धन को इलाज पर भी खर्च कर सकते हैं। यह मुख्य रूप से अस्पताल के खर्च, कोर्ट की फीस और अन्य खर्चों को दर्शाता है। यह भाव भाई-बहनों की उन्नति और स्वयं अपने प्रयासों, कौशल और संवाद के जरिये तरक्की करने का बोध कराता है। प्रथम भाव करियर, सम्मान, माता की सामाजिक प्रतिष्ठा, आपके बच्चों की उच्च शिक्षा, आपके बच्चों के शिक्षक, आपके बच्चों की लंबी दूरी की यात्राएँ, बच्चों का भाग्य, आपके शत्रुओं की हानि और उन पर आपकी विजय को प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त यह कर्ज और बीमारी को भी दर्शाता है। यह भाव आपके जीवनसाथी और उसकी इच्छाओं के बारे में दर्शाता है। इसके अतिरिक्त यह भाव आपके ससुराल पक्ष के लोगों की सेहत और जीवनसाथी की सेहत को भी प्रकट करता है। ठीक इसी प्रकार प्रथम भाव पिता के व्यवसाय से जुड़ी संभावनाओं को दर्शाता, पिता के भाग्य, पिता के बच्चों (यानि आप) और उनकी शिक्षा के बारे में बताता है। लग्न भाव आपकी खुशियां और समाज में आपकी प्रतिष्ठा को भी दर्शाता है। वहीं कार्यस्थल पर अपने कौशल से वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा मिलने वाली प्रशंसा को भी प्रकट करता है। यह बड़े भाई-बहनों के प्रयास और उनकी भाषा, स्वयं के प्रयासों द्वारा अर्जित आय का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह भाव धन संचय के अलावा व्यय को भी दर्शाता है।
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