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जब कोई दवाई काम न करे :-

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जब कोई दवाई काम न करे तब तांबे के लोटे में जल लेकर उसमे तुलसी के पत्ते डालकर । उसमे देखते हुए भगवान धन्वंतरि द्वारा बताये गए आयुर्वेद ग्रन्थ के इस मंत्र की 10 माला करें चमत्कारिक लाभ होता है ! मंत्र:- ॐ अच्युताय गोविंदाय अनन्ताय नाम भेषजा नश्यन्ति सर्व रोगणि सत्यम् सत्यम् वदाम्यहम्। भगवन के ये 3 नाम सर्व रोग को हरने वाले हैँ ! यह रावण संहिता का चमत्कारी और अनुभूत उपाय है ! पानी रोगी को पिलाएं । सिर्फ ओम अच्च्युताय नमः ओम अनन्ताय नमः ओम गोविन्दाय नमः का ही जाप करके अभिमंत्रित करके भी जल पिलाएं तो कष्ट शीघ्र दूर होंगे जय श्री कृष्णा !

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Mantra for health
posted 4 days ago by Deepika Maheshwary

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हिन्दू धर्म में शुभ-अशुभ का बड़ा महत्व होता हैं। हिन्दू धर्म में किसी भी कार्य को करने से पहले उसका शुभ मूर्हत देखा जाता हैं, ताकि उस काम में सफलता प्राप्त हो। हिन्दू धर्म में सप्ताह के हर वार का अपना महत्व होते हैं। सप्ताह के हर दिन से सम्बंधित कई कार्य हैं जिनमें से कुछ उस दिन के लिए निषेध हैं तो कुछ उस वार के लिए शुभ। आज हम आपको बताने जा रहे हैं वार के अनुसार किये जाने वाले काम जो उस दिन किये जाने चाहिए। तो आइये जानते हैं कौनसे दिन क्या काम करना शुभ। * रविवार : यह सूर्य देव का वार माना गया है। इस दिन नवीन गृह प्रवेश और सरकारी कार्य करना चाहिए। विज्ञान, इंजीनियरिंग, सेना, उद्योग बिजली, मैडिकल एवं प्रशासनिक शिक्षा उत्तम, नवीन वस्त्र धारण, सोने और तांबे की वस्तुओं के नवीन आभूषण धारण करने शुभ होते हैं। * सोमवार : सोमवार के दिन आप कृषि संबंधी कोई भी नया कार्य प्रारंभ करें, फलित ही होगा। कृषि संबंधी कार्य जैसे कि खेती यंत्र खरीदी, बीज बोना, बगीचा, फल के वृक्ष लगाना, आदि इस दिन करें। इसके अलावा वस्त्र तथा रत्न धारण करना, औसत क्रय-विक्रय, भ्रमण-यात्रा, कला कार्य, स्त्री प्रसंग, नवीन कार्य, अलंकार धारण करना, पशुपालन, वस्त्र आभूषण का क्रय-विक्रय हेतु इस दिन शुभ होता है। * मंगलवार : मंगल देव के इस दिन विवाद एवं मुकद्दमे से संबंधित कार्य करने चाहिए। बिजली से संबंधित कार्य, सर्जरी की शिक्षा, शस्त्र विद्या सीखना, अग्नि स्पोर्टस, भूगर्भ विज्ञान, दंत चिकित्सा, मुकदमा दायर करना शुभ है। लेकिन इस दिन भूल कर भी किसी से उधार न लें। * बुधवार : यदि आप किसी को ऋण दे रहे हैं, तो बुधवार को दें। इस दिन दिया हुआ ऋण आपके पास जल्दी वापस आ जाता है। इसके अलावा शिक्षा-दीक्षा विषयक कार्य, विद्यारंभ अध्ययन, सेवावृत्ति, बहीखाता, हिसाब विचार, शिल्पकार्य, निर्माण कार्य, नोटिस देना, गृहप्रवेश, राजनीति विचार शुभ है। * गुरुवार : यूं तो यह दिन सबसे अधिक शुभ माना जाता है, लेकिन इस दिन आप ऐसे कौन से कार्य करें कि वह सफल हों यह जान लीजिए। इस दिन ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा, धर्म संबंधी कार्य, अनुष्ठान, विज्ञान, कानूनी कार्य, नई शिक्षा आरंभ करना, गृह शांति, मांगलिक कार्य, आदि शुभ कार्य साथ ही सफल होते हैं। * शुक्रवार : शुक्र ग्रह से प्रभावित होता है यह दिन। इस दिन सांसारिक कार्य, गुप्त विचार गोष्ठी, प्रेम व्यवहार, मित्रता, वस्त्र, मणिरत्न धारण तथा निर्माण, अर्क, इत्र, नाटक, छायाचित्र फिल्म, संगीत आदि कार्य शुभ भण्डार भरना, खेती करना, हल प्रवाह, धान्या रोपण, आयु ज्ञान शिक्षा शुभ है। * शनिवार : मकान बनाना, गृह प्रवेश, ऑपरेशन, तकनीकी शिल्प कला, मशीनरी संबंधित ज्ञान, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी का ज्ञान सीखना, तेल लगाना विशेष शुभ, मुकदमा दायर करना शुभ है।
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दुर्गा पूजा शक्ति उपासना का महापर्व हैं। नवरात्र के दिनो में ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए मां दुर्गा की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। शक्ति एवं भक्ति के साथ सांसारिक सुखों को देने के लिए वर्तमान समय में यदि कोई देवता है। तो वह एक मात्र देवी दुर्गा ही हैं। सामान्यतया समस्त देवी-देवता ही पूजा का अच्छा परिणाम देते हैं। हमारे धर्म शास्त्रों के अनुशार: 'कलौ चण्डी विनायकौ’ अर्थातः कलियुग में दुर्गा एवं गणेश हि पूर्ण एवं तत्काल फल देने वाले हैं। तांत्रिक ग्रन्थों के अनुशार: नौरत्नचण्डीखेटाश्च जाता निधिनाह्ढवाप्तोह्ढवगुण्ठ देव्या। अर्थातः नौ रत्न, नौ ग्रहों कि पीड़ा से मुक्ति, नौ निधि कि प्राप्ति, नौ दुर्गा के अनुष्ठान से सर्वथा सम्भव है। इसका तत्पर्य हैं कि नवदुर्गा नवग्रहों के लिए ही प्रवर्तित हुईं हैं। ज्योतिष कि द्रष्टी में नवग्रह संबंधित पीड़ा एवं दैवी आपदाओं से मुक्ति प्राप्त करने का सरल साधन देवी कि आराधना हैं। यदि जन्म कुंडली में चंडाल योग, दरिद्र योग, ग्रहण योग, विष योग, कालसर्प एवं मांगलिक दोष, एवं अन्यान्य योग अथवा दोष एसे हैं, जिस्से व्यक्ति जीवन भर अथक परिश्रम करने के उपरांत भी दुःख भोगता रहता हैं। जिसकी शांति संभवतः अन्य किसी पूजा, अर्चना, साधना, रत्न एवं अन्य उपायो से सरलता से नहीं होती हैं। अथवा पूर्ण ग्रह पीडाए शांत नहीं हो पाती हैं। एसी स्थिती में आदि शक्ति मां भगवती दुर्गा के नव रुपो कि आराधना से व्यक्ति सरलता से विशेष लाभ प्राप्त कर सकता हैं। भगवान राम ने भी इसके प्रभाव से प्रभावित होकर अपनी दश अथवा आठ नहीं बल्कि नवधा भक्ति का ही उपदेश दिया है। अनादि काल से कि देवता, दानव, असुरों से लेकर मनुष्यों में किसी भी प्रकारका संकट होने पर समस्त लोक में मां दुर्गा कि अराधना करने का प्रचलन चला आरहा हैं। क्योकि मां दुर्गा ने सभी देव-दानव-असुर-मनुष्य सभी प्राणी मात्र का उद्धार किया हैं। इसलिये किसी भी प्रकार के जादू-टोना, रोग, भय, भूत, पिशाच्च, डाकिनी, शाकिनी आदि से मुक्ति कि प्राप्ति के लिये मां दुर्गा कि विधि-विधान से पूजा-अर्चना सर्वदा फलदायक रहीं है। दुर्गा दुखों का नाश करने वाली हैं। इसलिए नवरात्रि के दिनो में जब उनकी पूजा पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से कि जाती हैं, तो मां दुर्गा कि प्रमुख नौ शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं, जिससे नवों ग्रहों को नियंत्रित करती हैं, जिससे ग्रहों से प्राप्त होने वाले अनिष्ट प्रभाव से रक्षा होकर ग्रह जनीत पीडाएं शांत हो जाती हैं। दुर्गा कि नव शक्ति को जाग्रत करने हेतु शास्त्रों में नवार्ण मंत्र का जाप करने का विधान हैं। नव का अर्थात नौ एवं अर्ण का अर्थात अक्षर होता हैं। (नव+अर्ण= नवार्ण) इसी कारण नवार्ण नव अक्षरों वाला प्रभावी मंत्र हैं। नवार्ण मंत्र ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नव अक्षरों वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र के हर अक्षर में देवी दुर्गा कि एक-एक शक्ति समायी हुई हैं, जिस का संबंध एक-एक ग्रहों से हैं। 1. नवार्ण मंत्र का प्रथम बीज मंत्र ऐं हैं, ऐं से प्रथम नवरात्र को दुर्गा कि प्रथम शक्ति शैल पुत्री कि उपासना कि जाती हैं। जिस में सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 2. नवार्ण मंत्र का द्वितीय बीज मंत्र ह्रीं हैं, ह्रीं से दूसरे नवरात्र को दुर्गा कि द्वितीय शक्ति ब्रह्मचारिणी कि उपासना कि जाती हैं। जिस में चंद्र ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 3. नवार्ण मंत्र का तृतीय बीज मंत्र क्लीं हैं, क्लीं से तीसरे नवरात्र को दुर्गा कि तृतीय शक्ति चंद्रघंटा कि उपासना कि जाती हैं। जिस में मंगल ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 4. नवार्ण मंत्र का चतुर्थ बीज मंत्र चा हैं, चा से चौथे नवरात्र को दुर्गा कि चतुर्थ शक्ति कूष्माण्डा कि उपासना कि जाती हैं। जिस में बुध ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 5. नवार्ण मंत्र का पंचम बीज मंत्र मुं हैं, मुं से पाँचवे नवरात्र को दुर्गा कि पंचम शक्ति स्कंदमाता कि उपासना कि जाती हैं। जिस में बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 6. नवार्ण मंत्र का षष्ठ बीज मंत्र डा हैं, डा से छठे नवरात्र को दुर्गा कि छठी शक्ति कात्यायनी कि उपासना कि जाती हैं। जिस में शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 7. नवार्ण मंत्र का सप्तम बीज मंत्र यै हैं, यै से सातवें नवरात्र को दुर्गा कि सप्तम शक्ति कालरात्रि कि उपासना कि जाती हैं। जिस में शनि ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 8. नवार्ण मंत्र का अष्टम बीज मंत्र वि हैं, वि से आठवें नवरात्र को दुर्गा कि अष्टम शक्ति महागौरी कि उपासना कि जाती हैं। जिस में राहु ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। 9. नवार्ण मंत्र का नवम बीज मंत्र चै हैं, चै से नवमें नवरात्र को दुर्गा कि नवम शक्ति सिद्धिदात्री कि उपासना कि जाती हैं। जिस में केतु ग्रह को नियंत्रित करने वाली शक्ति समाई हुई हैं। इस नवार्ण मंत्र दुर्गा कि नवो शक्तियाँ व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार कि प्राप्ति में भी सहायक सिद्ध होती हैं। जप विधान प्रतिदिन स्नान इत्यादिसे शुद्ध होकर नवार्ण मंत्र का जाप 108 दाने कि माला से कम से कम तीन माला जाप अवश्य करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के अनुशार नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों मंत्र के पहले ॐ अक्षर जोड़कर भी कर सकते हैं ॐ लगाने से भी यह नवार्ण मंत्र के समान हि फलदायक सिद्ध होता हैं। इसमें लेस मात्र भी संदेह नहीं हैं। अतः मां भगवती दुर्गा कि कृपा प्राप्ति एवं नवग्रहो के दुष्प्रभावो से रक्षा प्राप्ति हेतु नवार्ण मंत्र का जाप पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से कर सकते हैं।
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हिन्दू धर्म में यूँ तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जिसका पालन हर किसी को करना चाहिए लेकिन उनमें से भी कुछ ही ऐसी बातें होती है जिसका पालन लोग कर पाते हैं। लेकिन जब बात आती है ईश्वर भक्ति की तो विशेष रूप से इस दौरान भूलकर भी कोई ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए जिसके दुष्परिणाम आपको बाद में झेलने पड़े। पूजा पाठ के लिए अक्सर लोग कुछ ख़ास बर्तनों का प्रयोग करते हैं, आज कल बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो पूजा के लिए स्टील के बर्तनों का प्रयोग करते हैं, जबकि उन्हें ऐसा भूलकर भी नहीं करना चाहिए। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर क्यों स्टील के बर्तनों को पूजा पाठ के लिए वर्जित माना जाता है। आइये जानते हैं क्या है इसके पीछे की मुख्य वजह। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा पाठ के लिए हर किसी को ख़ास नियमों का पालन जरूर करना चाहिए। खासतौर से जो नियम हमारे शास्त्रों में बताये गए हैं उसकी अवहेलना भूलकर भी नहीं करनी चाहिए। ईश्वर की पूजा अर्चना के लिए विशेष रूप से स्टील के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना गया है। माना जाता है कि ईश्वर की पूजा के लिए प्रयोग किये जाने वाले विभिन्न धातुओं का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। पूजा के लिए इन धातुओं के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना जाता है आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विशेष रूप से हिन्दू धर्म में पूजा पाठ के दौरान स्टील, एल्मुनियम और लोहे के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। अगर आप इन धातु से बने ईश्वर की मूर्ती की भी पूजा करते हैं तो उसका फल आपको ना के बराबर ही मिलता है। आपके मन में ये सवाल जरूर उठ रहा होगा की आखिर इस धातु के बर्तनों को अशुभ क्यों माना जाता है। बता दें कि स्टील के बर्तन मानव निर्मित होते हैं इसलिए उसका प्रयोग वर्जित माना गया है। एल्मुनियम के बर्तनों में जल्द कालिख लग जाती है इसलिए उसे भी वर्जित माना जाता है। बात रही लोहे के बर्तनों की तो उनमें जंग लग जाने की वजह से पूजा के प्रयोग के लिए वर्जित माना गया है। पूजा के लिए इन बर्तनों का प्रयोग माना जाता है शुभ हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा पाठ के लिए जिन बर्तनों को शुभ माना जाता है वो खासतौर से प्राकृतिक धातु के बने होने चाहिए। इसलिए पूजा के दौरान पीतल, तांबा, सोना और चांदी के बर्तनों का प्रयोग करना शुभ फलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ईश्वर को प्रसाद चढ़ाने या जलाभिषेक करते समय केवल इन्हीं धातुओं से बने बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए। बहरहाल अब आप जान चुके होंगें की आखिर क्यों स्टील आदि के धातुओं का प्रयोग पूजा-पाठ के दौरान करना वर्जित माना जाता है। अगर आप भी आजतक पूजा के लिए स्टील के बर्तनों का प्रयोग करते आ रहे हैं तो इसे तत्काल रूप से बंद कर दें।
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बुध केतु युति बुध जो बुद्धिमत्ता का ग्रह है वाणी संवाद लेखन, तर्क शक्ति, और व्यवसायिक चातुर्य भी बुध के ही अधिपत्य में आते है। व्यक्ति अगर बुद्धि चातुर्य के साथ साथ अच्छा लेखक है , बहुत अच्छा वक्ता है और साथ ही उसकी भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ है , तो वो अपनी इन क्षमताओं का उपयोग अच्छे व्यक्तिगत और व्यवसायिक सम्बन्ध बनाने में कर सकता है। बुध प्रधान व्यक्ति हाजिर जवाब होने के साथ साथ अच्छा मित्र भी होता है क्योंकि वो सम्बन्धो को निभाना जानता है। केतु एक विभाजित करने वाला ग्रह , एक संत की तरह जो अकेले रहता है , सुख सुविधाओं और भोग -विलास से पूर्णतः दूर , रिश्तों और उनमे संवाद की जंहा कोई आवश्यकता नहीं। केतु का स्वभाव बुध से पूर्णतः विपरीत है , केतु जब भी किसी ग्रह के साथ होता है तो उसे उसके फल देने से भटकाता है ,बुध का प्रमुख फल बुद्दि (मति) प्रदान करना है , इसलिए बुध – केतु योग को मति भ्रम योग कहते है। केतु और बुध की युति का भी फल इसी प्रकार बुद्धि को भ्रमित करने वाला होता है , हालांकि किस राशि और कुंडली के किस भाव में ये योग बना है इस बात पर भी फल निर्भर करता है। इस योग में बुध के प्रभाव दूषित हो जाते है जैसे बुध की प्रबल होने की परिस्थिति में कोई व्यक्ति बहुत अच्छा वक्ता है तो केतु के साथ आने की परिस्थिति में अर्थ हीन , डींगे हांकने वाला और आवश्यकता से अधिक बोलने वाला हो सकता है , कई बार उसके व्यक्तव्य उसी के लिए परेशानी खड़ी करने वाले हो सकते है (वाणी पर नियंत्रण होना) , यही हाल उसकी वाणिज्यिक योजनाओं का हो सकता है , उसके समीकरण और योजनाएं सत्य से परे हो सकते है जो उसके लिए परेशानी का कारन बन सकते है, या कहे बुद्धि की भ्रमित होने की परिस्थिति का निर्मित होना । उदहारण के लिए आर्थिक परिस्थिति को जांचे बिना व्यापारिक योजना बनाना और आर्थिक स्थिति का ध्वस्त होना । विचारधारा का संकुचित होना पर सोचा का अत्यधिक संवेदनशील होना , हमेशा अज्ञात भय रहना और वाणी पर नियंत्रण न होना बुध केतु योग में बुध बहुत कमजोर हो तो व्यक्ति कम बोलने वाला , संकोची और अपने पक्ष या मन की बात को स्पष्ट रूप से नहीं रख पाने वाला होगा। ऐसे लोग बड़े एकाकी होते है , आपसी रिश्तों में संवाद की कमी के चलते और संकोच के कारन अपनी योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं कर पाते साथ ही व्यापारिक का क्रियान्वयन भी नहीं हो पता। रिश्तों में कई बार धोखा होने की सम्भावना बनी रहती है , विशेषकर व्यवसायिक। बुध केतु युति में आर्थिक उतार चढाव बहुत बार देखा गया है , जिसका कारण बिना परिस्थितियों को समझे निवेश या खर्च करना होता है और व्यापारिक दृष्टिकोण का आभाव। कई बार ये लोग मीत व्ययी और कई बार अति व्ययी हो जाते है , बहुत सी परिस्थितियों में जब बुध अत्यन्त ही कमजोर और दुःस्थान में हो तब ये योग गम्भीर एकाकीपन गम्भीर मानसिक अवसाद जेल योग (या लम्बे समय तक हास्पिटल /सुधार ग्रह तक में रहने की नौबत ला देता है। इस योग की वजह से व्यक्ति दूसरों की बात और सलाह को स्वीकार करने या समझने की परिस्थिति से अत्यन्त दूर होता है जो उसकी आर्थिक परेशानी और एकाकीपन का कारन भी बनता है। इस दुर्योग से बचने के बहुत से तरीके हो सकते है परन्तु मेरी सोच में सबसे सटीक उपाय है , अधिक से अधिक सामाजिक होने की चेष्टा करना और दूसरों की सलाह ले कर आगे बढ़ना , साथ ही धन के निवेश या कोई भी योजना बनते समय सतर्क रहना। बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश की आराधना इस दुर्योग से बचाने का कार्य करती है, अतः विघ्न हर्ता बुद्धि के दाता श्रीगणेश की आराधना करते रहे।
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