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MALAVYAYOGA:VENUS

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MALAVYAYOGA: Malavya Yoga is formed when Venus is present in Kendra [ in 1st, 4th, 7th or 10th house] from Ascendant in any one of the three signs namely Taurus, Libra and Pisces. In Astrology Venus is a female planet represents women, beauty, glamour, luxuries, love, romance, partner, marriage, relationships, comforts, creativity, vehicles, cinema, diplomacy, trade etc.Persons having Malavya yoga are intelligent, healthy, wealthy, charming personality and enjoys large circle of friends and fans. They are fond of sex pleasures and respected by the ruler. They are rich and prosperous in life. They have beautiful and loving partner. They possess strong sense of justice. They have good success in profession and enjoy luxuries and comforts. They get worldwide fame and name. They usually successful in fields which require beauty, charm, creativity like cinema, interior decorator, beauty products, beauty pageants, vehicles industry etc. The person will be in contact with many female in his life but this does not indicate his character is questionable. If this combination (yoga) is afflicted by malefic planets, the person will have wicked and corrupt nature.

posted Jul 6, 2018 by Rajendra Purohit

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|| सम्पूर्ण जीवन ग्रहो के द्वारा संचालित है और ग्रहो की रश्मियों का प्रभाव इंसान के जीवन पर अपना प्रभाव डालकर शुभ अशुभ फल देते है।ग्रहो के रत्न एक ऐसी औषधि है जो ग्रहो को बलवान बनाकर ग्रहो से लाभ दिलाती है और मनोनुकूल फल दिलाने में सहायता करती है लेकिन यह सब शुभ परिणाम तब ही ग्रहो के रत्न पहनकर लिया जा सकते है जब सही ग्रह या ग्रहो का रत्न पहना जाए और रत्न भी शुभ और शुद्ध हो।कुंडली के केंद्र और त्रिकोण ग्रहो के स्वामियों के रत्न पहनना हमेशा ही लाभ देता है इसमें भी त्रिकोण 1,5,9 के स्वामियों के रत्न धन, सम्मान, प्रतिष्ठा, कामयाबी या कामयाबी में कमी होने उसमे वृद्धि, भाग्य का साथ दिलाकर कार्यो को सिद्ध करते है इसके अलावा जो भी ग्रह अपने फल पूरी तरह नही दे पा रहा है और वह ग्रह महत्वपूर्ण फल देने वाला ग्रह है तब उसका रत्न पहनना उस ग्रह के फल दिलाकर काम सिद्ध कराने में मदद करता है जैसे प्रॉपर्टी या घर बनाने में बिघ्न आ रहे हो या मकान बनाने की परिस्थितिया न बन रही हो तब चौथे भाव के स्वमू का रत्न पहनना इस काम मे सफलता दिला सकता है लेकिन चौथे भाव के स्वामी का रत्न हमेशा कुंडली मे उस ग्रह की जांच पड़ताल कराकर ही पहनना चाहिए उसके अलावा रत्न हमेशा कुंडली की जांच कराकर पहनना चाहिए क्योंकि रत्न हमेशा रत्नों के वजन, ग्रहो की शक्ति कितनी है? आदि के अनुसार पहने जाते है।जैसे हमेशा डॉक्टर दवाई भी रोग की स्थिति क्या और कितनी मात्रा में मरीज को है के अनुसार ही दवाई की पावर होती उसी तरह कुंडली मे ग्रह की स्थिति के अनुसार रत्नों के वजन निर्धारित करके रत्न पहनाए जाते जिससे जातक को लाभ मिल सकें, जैसे माना नवे भाव का स्वामी अस्त है और शत्रु राशि का भी है और रत्न नवे भाव के स्वामी कस पहना दिया 7रत्ती का तो यह कभी भी जातक को कोई खास लाभ नहीं देगा क्योंकि 7रत्ती का रत्न ज्यादा वजनदार नही होता ऐसे अस्त और शत्रु राशि मे बैठे ग्रह को कमसे कम सवा 11रत्ती से सवा12रत्ती तक का रत्न पहनाया जाएगा तब ही लाभ देगा क्योंकि अस्त और शत्रु राशि दोनो स्थितियों में ग्रह होने पर बहुत ही ज्यादा कमजोर होता है इसीलिय ज्यादा शक्ति(पावर) के रत्न ही पहनाए जाते है ऐसी स्थिति में।अस्त ग्रह इस ग्रह का हमेशा रत्न पहनना ही फायदा देता है बस अस्त ग्रह 6, 8, 12 भाव का स्वामी न हो और 6, 8, 12भाव का स्वामी होने के साथ 1,5,9 का भी स्वामी है ऐसा ग्रह तो भी रत्न पहना जा सकता है लेकिन रत्न हमेशा उत्तम क्वालिटी का और असली(प्राकृतिक) ही होना चाहिए।। माना किसी जातक की कर्क लग्न की कुंडली है अब यहाँ मंगल योगकारक होता है 5 और 10 भाव का स्वामी होने से तो मंगल 10वे भाव का स्वामी और योगकारक होने नोकरी/ व्यवसाय और सफलता का कारक है लेकिन माना मंगल कुछ कमजोर है या पीड़ित है जिस कारण यह नोकरी अच्छी नही दे पा रहा तो यहाँ मंगल के लिए त्रिकोणी लाल मूंगा पहनने से तुरंत नोकरी/ व्यवसाय/ सफलता के रास्ते मिलकर उसमे तरक्की होगी क्योंकि मूंगा मंगल को बल देकर उसके फलो को बढ़ा देगा।जैसे हम पानी पीकर तुरंत अपने शरीर की पानी की मात्रा को पूरा करके या बढ़ाकर अपने आप को मजबूत महसूस करते है ऐसे ही ग्रह रत्नों के रत्न उनको बल देकर तुरंत फायदा देते है।हमेशा अनुकूल ग्रहो से संबंधित फल मिलने में दिक्क्त या बिघ्न आने पर उनका रत्न पहनना हमेशा लाभ देता है रत्न का वजन, क़्वालिटी अच्छी होनी चाहिए।। रत्न बिना सलाह लिए कभी नही पहनने चाहिए
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कुंडली द्वारा जाने किस जातक का विवाह किस आयु में सम्पन होगा,

 

> जब जन्म कुण्डली में सप्तम भाव और सप्तमेश बलवान हो तथा लग्न या द्वितीये भाव अथवा सप्तम भाव या

 

एकादश भाव में सप्तमेश विराजमान हो हो तो ऐसे जातको का विवाह 20 -22 वर्ष की आयु में हो जाता है,

 

>  जब जन्मकुंडली में  सप्तमेश बलवान हो तथा शुक्र केंद्र अथवा त्रिकोण में विराजमान हो तो लड़के  के विवाह का

 

योग 24 -26 वर्ष में बनता है,

 

इसी प्रकार कन्या लड़की की कुण्डली में सप्तमेश बलवान हो गुरु केन्द्र अथवा त्रिकोण में विराजमान हो तो कान्या के

 

विवाह का योग 22 -24 वर्ष में बनता है,

 

> यदि जन्मकुण्डली में चन्द्रमा सातवे स्थान में,शुक्र तथा सप्तमेश एकादश भाव में हो तो जातक का विवाह 27 -28 वे  वर्ष में होता है ,

 

> यदि लड़की की कुण्डली में गुरु चन्द्रमा से सातवे स्थान में हो  तो  उस  कन्या का विवाह बिना किसी बढ़ा के 22 -24 वर्ष के बीच होता है,

 

>यदि जन्मकुंडली में सप्तमेश मित्र राशि स्वराशि,उच्च राशि में सप्तम भाव में बुध के साथ विराजमान हो तो ऐसे

 

जातक का विवाह 28 -30 वर्ष की आयु में सम्पन्न होता है,

 

> यदि जन्म कुण्डली में मंगल लग्न अथवा चतुर्थ अथवा सप्तम या अष्टम अथवा द्वादश में विराजमान हो तो जातक

 

का विवाह 28 से 30 की आयु में सम्पन्न होता है,

 

> यदि जन्म कुंडली में मंगल लग्न चतुर्थ,सप्तम,अष्टम,अथवा द्वादश भाव में हो तथा सप्तमेश नीच,अथवा शत्रु राशि

 

में हो तो ऐसे जातक का विवाह बहुत मुश्किल से अथवा विरोध और परेशानियों के बाद,बड़ी आयु की स्त्री अथवा बड़े

 

आयु के पुरुष से होता है,और वैवाहिक जीवन प्रभावित रहता है विवाह 30 -35 वर्ष में होता है,

 

> यदि जन्म कुण्डली में लग्न भाव,द्वितीये भाव,अथवा सप्तम भाव में नीच या शत्रु राशि का ग्रह विराजमान हो तो

 

जातक के विवाह कार्य में अनेक प्रकार की बाधा आती है,तमाम कोशिशो के बाद भी विवाह 28 -30 वर्ष की आयु के बाद

 

ही हो पाता है,

 

> अगर जन्मकुण्डली में लग्नेश सप्तम भाव में तथा सप्तमेश लग्न में विराजमान हो दोनों ग्रह अपनी अपनी उच्च

 

अथवा मित्र राशि में हो तो ऐसे जातक का विवाह बड़े आराम से 18 -20 वर्ष की आयु में हो जाता है,

 

                                 [ किस ग्रह की दशा में विवाह होगा ] 

 

>सप्तमेश के साथ यदि कोई ग्रह  हो तो  उस ग्रह की दशा अथवा अंतर्दशा में विवाह कार्य पूर्ण होता है,

 

> सप्तम भाव में विराजमान ग्रह जब मित्र राशि,स्वराशि,स्वयग्राही अथवा उच्चराशि में हो तो उसकी दशा अथवा अंतर्दशा में विवाह कार्य पूर्ण होता है,

 

> दशमेश अथवा अष्टमेश मित्र राशि में अथवा उच्च राशि में अथवा सम राशि में में होकर बलवान हो तो उसकी दशा

 

अथवा अंतर्दशा में भी विवाह सम्पन होता है,

 

> लड़के की जन्मकुंडली में शुक्र जिस राशि में स्थित है उस राशि का स्वामी जन्मकुण्डली में त्रिक भाव में यदि न हो तो

 

उस गृह की दशा अथवा अंतर्दशा में जातक का विवाह सम्पन्न हो सकता है,

 

> धन भाव का स्वामी जिस राशि में हो, उस राशि के स्वामी की दशा या  अन्तर्दशा जब आती है तो विवाह कार्य पूर्ण होता है,    

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