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28 जुलाई से सावन का पवित्र महीना शुरू होने जा रहा है इस विशेष मॉस में क्या करे

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श्रावण  मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कुछ विशेष वास्तु अर्पित की जाती है जिसे शिवामुट्ठी कहते है।
1. प्रथम सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी,
2. दूसरे सोमवार को सफेद तिल् एक मुट्ठी,
3. तीसरे सोमवार को खड़े मूँग एक मुट्ठी,
4. चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी और
5. यदि जिस मॉस में पांच सोमवार हो तो पांचवें सोमवार को सतुआ चढ़ाने जाते हैं। 
यदि पांच सोमवार  न हो तो आखरी सोमवार को दो मुट्ठी भोग अर्पित करते है।
माना जाता है कि श्रावण मास में शिव की पूजा करने से सारे कष्ट खत्म हो जाते हैं। महादेव शिव सर्व समर्थ हैं। वे मनुष्य के समस्त पापों का क्षय करके मुक्ति दिलाते हैं। इनकी पूजा से ग्रह बाधा भी दूर होती है।
1. सूर्य से संबंधित बाधा है, तो विधिवत या पंचोपचार के बाद लाल { बैगनी } आक के पुष्प एवं पत्तों से शिव की पूजा करनी चाहिए।
2. चंद्रमा से परेशान हैं, तो प्रत्येक सोमवार शिवलिंग पर गाय का दूध अर्पित करें। साथ ही सोमवार का व्रत भी करें।
3. मंगल से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गिलोय की जड़ी-बूटी के रस से शिव का अभिषेक करना लाभप्रद रहेगा।
4. बुध से संबंधित परेशानी दूर करने के लिए विधारा की जड़ी के रस से शिव का अभिषेक करना ठीक रहेगा।
5. बृहस्पति से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए प्रत्येक बृहस्पतिवार को हल्दी मिश्रित दूध शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।
6. शुक्र ग्रह को अनुकूल बनाना चाहते हैं, तो पंचामृत एवं घृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।
7. शनि से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गन्ने के रस एवं छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करें।
8-9. राहु-केतु से मुक्ति के लिए कुश और दूर्वा को जल में मिलाकर शिव का अभिषेक करने से लाभ होगा।

References

ASTROLOGY JYOTISH
posted Jul 28, 2018 by Pandit Pathak

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मकर संक्रांति का महत्व- आज के दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाते हैं। उत्तरायण में सूर्य रहने के समय को शुभ समय माना जाता है और मांगलिक कार्य आसानी से किए जाते हैं। चूंकि पृथ्वी दो गोलार्धों में बंटी हुई है ऐसे में जब सूर्य का झुकाव दाक्षिणी गोलार्ध की ओर होता है तो इस स्थिति को दक्षिणायन कहते हैं और सूर्य जब उत्तरी गोलार्ध की ओर झुका होता है तो सूर्य की इस स्थिति को उत्तरायण कहते हैं। इसके साथ ही 12 राशियां होती हैं जिनमें सूर्य पूरे साल एक-एक माह के लिए रहते हैं। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे मकर संक्रांति कहते है मकर संक्रांति का पर्व इस बार यानी साल 2019 में 14 जनवरी की बजाए 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। 15 जनवरी से पंचक, खरमास और अशुभ समय समाप्त हो जाएगा और विवाह, ग्रह प्रवेश आदि के शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे। 15 जनवरी यानी मकर संक्रांति के दिन ही प्रयागराज में चल रहे कुंभ महोत्सव का पहला शाही स्नान होगा। शाही स्नान के साथ ही देश विदेश के श्रद्धालु कुंभ के पवित्र त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाना शुरू कर देंगे। मकर संक्रांति के पर्व को देश में माघी, पोंगल, उत्तरायण, खिचड़ी और बड़ी संक्रांति आदि नामों से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही गुजरात में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्वस मनाया जाता है। जानें मकर संक्रांति का मुहूर्त, पूजा विधि और अन्य खास बातें- मकर संक्रांति शुभ मुहूर्त- पुण्य काल मुहूर्त - 07:14 से 12:36 तक (15 जनवरी 2019) महापुण्य काल मुहूर्त - 07:14 से 09:01 तक (15 जनवरी 2019 को) मकर संक्रांति पूजा विधि- मकर संक्रांति के दिन सुबह किसी नदी, तालाब, शुद्ध जलाशय में स्नान करें। इसके बाद नए या साफ वस्त्र पहनकर सूर्य देवता की पूजा करें। इसके बाद ब्राह्मणों, गरीबों को दान करें। इस दिन दान में आटा, दाल, चावल, खिचड़ी और तिल के लड्डू विशेष रूप से लोगों को दिए जाते हैं। इसके बाद घर में प्रसाद ग्रहण करने से पहले आग में थोड़ी सा गुड़ और तिल डालें और अग्नि देवता को प्रणाम करें। मकर संक्रांति पूजा मंत्र ऊं सूर्याय नम: ऊं आदित्याय नम: ऊं सप्तार्चिषे नम: मकर संक्रांति का वैज्ञानिक आधार • तिल के लड्डू में बड़ी मात्रा में गुड फैट पाया जाता है जो हृदय, स्किन और बालों के लिए है फायदेमंद होता है। • एंटीऑक्सीडेंट्स सर्दियों में रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। इसके साथ ही एनीमिया को दूर करने के लिए आयरन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। • तिल में तेल की प्रचुरता रहती है, इसके साथ ही गुड़ की तासीर भी गर्म मानी जाती है। तिल और गुड़ को मिलाकर जो खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं उनकी वजह से हमारी शरीर को जरूरत के हिसाब से गर्मी मिलती रहती है। • ठंड के कारण पाचन शक्ति भी मंद हो जाती है। तिल में पर्याप्त मात्रा में फाइबर होता है, जो पाचन शक्ति को बढ़ाता है। • तिल में कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्प्लेक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्व पाये जाते हैं, जो इस मौसम में शरीर के लिए जरूरी होते हैं। • गुड़ मैग्नीशियम का एक बेहीतरीन स्रोत है। ठंड में शरीर को इस तत्व की बहुत आश्यकता होती है। • मकर संक्रांति के समय नदियों में वाष्पन क्रिया होती है। इससे तमाम तरह के रोग दूर हो सकते हैं।
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बच्चे का पढ़ने में नहीं लग रहा है मन तो एक बार अपनाएं यह वास्तु टिप्स बच्चे भगवान का रूप होते हैं जो कुछ शांत होते हैं तो कुछ शरारती और नटखट जैसे बाल गोपाल थे नटखट और शैतान। अगर बच्चे शैतानी नहीं करेंगे तो कौन करेगा। हांलाकि शैतानी के साथ पढाई भी उतनी ही जरूरी हैं। लेकिन बच्चों का स्वभाव चंचल होने से वे हर घड़ी खेलकूद ही करते रहते हैं। जिससे माता-पिता उनके भविष्य के बारे में फिक्रमंद होते हैं और उनकी पढाई पर जोर देते हैं। तो ऐसे में माता-पिता को कुछ वास्तु उपाय करने चाहिए जिससे बच्चे पढाई से जी न चुराए और समय-समय पर पढाई भी करें। तो आइये जानते हैं कुछ ऐसे ही वास्तु उपयों के बारे में। * बच्चों का अध्ययन कक्ष शौचालय के नीचे नहीं बनाना चाहिए। कमरे में शीशा ऐसी जगह पर न लगाएं जहां पुस्तकों पर उसकी छाया पड़ती हो। ऐसा होने से बच्चों पर पढ़ाई का बोझ बढ़ता है। * घर के जिस कमरे में बैठकर बच्चे पढ़ाई करते हैं, बहुत जरूरी है कि वह कमरा घर के पूर्वी, उत्तर या उत्तर-पूर्वी दिशा में स्थित हो। इस दिशा में बैठकर पढ़ाई करने से बच्चों की एकाग्रता बढ़ती है और उनका दिमाग तेज चलता है। बेहतर होगा अगर कमरे का दरवाजा भी इसी दिशा में खुले तो। * स्टडी टेबल को सदैव उत्तर दिशा में रखने से बच्चे में सकारात्मक ऊर्जा आती है। उसकी स्मरण शक्ति में भी बढ़ौतरी होती है। पढ़ते समय उसका मुख भी उत्तर दिशा की अोर होना चाहिए। जिससे उसकी थकान दूर होकर ऊर्जा का संचार होता है। * पढ़ाई के कमरे में रोशनी और प्राकृतिक उजाले का होना बहुत जरूरी है। अगर ऐसा होता है इसका सकारात्मक प्रभाव बच्चे की पढ़ाई पर साफ नजर आएगा। * अगर आप अपने बच्चों के कमरे का रंग हरा रखेंगे तो इससे उसका मस्तिष्क भी शांत रहेगा और उसका मन भी पढ़ाई में लगेगा। * आपके बच्चे के कमरे में जो भी फर्नीचर हों, ध्यान रखें कि वो कमरे की दीवार से कुछ दूरी पर ही रहें। इससे कमरे में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है। * स्टडी रूम में विद्या की देवी मां सरस्वती का चित्र या प्रतिमा ऐसे स्थान पर लगाएं जहां से बच्चे की नजर उन पर पड़ती रहें। इससे कमरे में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होगा अौर बच्चे पर भी मां की कृपा बनी रहेगी। * जिस बच्चे का मन पढ़ाई में न लगे, वह उत्तर दिशा की ओर पैर करके सोएं। * बच्चे को प्रेरणा देने के लिए स्टडी रूम में दौड़ने वाले घोड़ों या उगते हुए सूरज का चित्र, बच्चे के सर्टिफिकेट और ट्राफी सजाएं। ध्यान रहे किसी भी तरह के हिंसा या दु:ख देने वाली तस्वीर न लगाएं। इससे बच्चे के दिमाग पर बुरा असर पड़ता है।
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हिंदू धर्म वेद................. *महासंयोग लेकर आ रहा है, इस बार नवरात्रि का पर्व।* इस बार नवरात्रि महासंयोग लेकर आ रही है। मां जगदंबा पालकी में बैठकर आएंगी और पालकी में ही बैठकर जाएंगी। नवरत्रि के 9 दिन सुख समृद्धिदायक होंगे। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा दिनांक, 21 सितम्बर गुरुवार को शारदीय नवरात्र का आरंभ होगा। शारदीय नवरात्र शक्ति मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पर्व 21 सितम्बर से शुरू होकर 29 सितम्बर को समाप्त होगा। इस बार मां दुर्गा का आगमन पालकी से होगा व गमन पालकी पर ही होगा, जो अति शुभ है। देवीपुराण में नवरात्रि में भगवती के आगमन व प्रस्थान के लिए वार अनुसार वाहन बताये गए हैः इस बार माता का आगमन व गमन जनजीवन के लिए हर प्रकार की सिद्धि देने वाला है। इस बार गुरुवार के दिन हस्त नक्षत्र में घट स्थापना के साथ शक्ति उपासना का पर्व काल शुरु होगा। *गुरुवार के दिन हस्त नक्षत्र में यदि देवी आराधना का पर्व शुरू हो, तो यह देवीकृपा व इष्ट साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।* देवी भागवत में नवरात्रि के प्रारंभ व समापन के वार अनुसार माताजी के आगमन प्रस्थान के वाहन इस प्रकार बताए गए हैं। *आगमन वाहन* रविवार व सोमवार को हाथी। शनिवार व मंगलवार को घोड़ा। गुरुवार व शुक्रवार को पालकी। बुधवार को नौका आगमन। प्रस्थान वाहन रविवार व सोमवार भैंसा। शनिवार और मंगलवार को सिंह। बुधवार व शुक्रवार को गज हाथी। गुरुवार को नर वाहन पर प्रस्थान। *सर्वार्थसिद्धि योग में मनेगा इस बाल दशहरा।* 21 सितम्बर घटस्थापना, गुरुवार व हस्त नक्षत्र योग। 22सितम्बर द्वितीया, रवियोग। 23 सितम्बर तृतीया, रवियोग,सर्वार्थसिद्धि। 24 सितम्बर चतुर्थी, रवियोग। 25 अक्टूबर चतुर्थी, रवियोग, सर्वार्थसिद्धि। 26 सितम्बर षष्ठी, रवियोग। 27 सितम्बर सप्तमी,रवियोग। 28 सितम्बर दुर्गाअष्टमी महापूजा। 29 अक्टूबर महानवमी रवियोग। 30 सितम्बर विजयादशमी, रवियोग, सर्वार्थसिद्धि योग। माँ दुर्गा की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ सर्वोत्तम है . . भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से ''वेद'' अनादि है, उसी प्रकार ''सप्तशती'' भी अनादि है . .। दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है . दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं . . दुर्गा सप्तशती के सभी तेरह अध्याय अलग अलग इच्छित मनोकामना की सहर्ष ही पूर्ति करते है . .। प्रथम अध्याय: - इसके पाठ से सभी प्रकार की चिंता दूर होती है एवं शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु का भी भय दूर होता है शत्रुओं का नाश होता है . .। द्वितीय अध्याय:- इसके पाठ से बलवान शत्रु द्वारा घर एवं भूमि पर अधिकार करने एवं किसी भी प्रकार के वाद विवाद आदि में विजय प्राप्त होती है . .। तृतीय अध्याय: - तृतीय अध्याय के पाठ से युद्ध एवं मुक़दमे में विजय, शत्रुओं से छुटकारा मिलता है . .। चतुर्थ अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से धन, सुन्दर जीवन साथी एवं माँ की भक्ति की प्राप्ति होती है .। पंचम अध्याय: - पंचम अध्याय के पाठ से भक्ति मिलती है, भय, बुरे स्वप्नों और भूत प्रेत बाधाओं का निराकरण होता है . .। छठा अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से समस्त बाधाएं दूर होती है और समस्त मनवाँछित फलो की प्राप्ति होती है . .। सातवाँ अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से ह्रदय की समस्त कामना अथवा किसी विशेष गुप्त कामना की पूर्ति होती है .। आठवाँ अध्याय: - अष्टम अध्याय के पाठ से धन लाभ के साथ वशीकरण प्रबल होता है . .। नौवां अध्याय:- नवम अध्याय के पाठ से खोये हुए की तलाश में सफलता मिलती है, संपत्ति एवं धन का लाभ भी प्राप्त होता है .। दसवाँ अध्याय:- इस अध्याय के पाठ से गुमशुदा की तलाश होती है, शक्ति और संतान का सुख भी प्राप्त होता है . । ग्यारहवाँ अध्याय:- ग्यारहवें अध्याय के पाठ से किसी भी प्रकार की चिंता से मुक्ति , व्यापार में सफलता एवं सुख-संपत्ति की प्राप्ति होती है .। बारहवाँ अध्याय:- इस अध्याय के पाठ से रोगो से छुटकारा, निर्भयता की प्राप्ति होती है एवं समाज में मान-सम्मान मिलता है .। तेरहवां अध्याय:- तेरहवें अध्याय के पाठ से माता की भक्ति एवं सभी इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है . .। *मनुष्य की इच्छाएं अनंत है और इन्ही की पूर्ति के लिए दुर्गा सप्तशती से सुगम और कोई भी मार्ग नहीं है . . इसीलिए नवरात्र में विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करने का विधान है।* ज्योतिर्विद अभय पाण्डेय वाराणसी 9450537461
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शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते है. नवरात्रि में देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है. इन नौ दिनों में भक्तों नियमों के साथ मां की पूजा करते हैं. इसबार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ेगी, जिसके कारण नवरात्र में देवी आराधना के लिए पूरे 9 दिन मिलेंगे. प्रतिपदा तिथि को माता के प्रथम स्वरूप शैल पुत्री के साथ ही कलश स्थापना के लिए भी अति महत्त्वपूर्ण दिन होता है. कलश स्थापना या कोई भी शुभ कार्य शुभ समय एवं तिथि में किया जाना शुभ माना जाता है, इसलिए इस दिन कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. नवरात्र के 9 दिनों में मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और हर स्वरूप सौभाग्य का प्रतीक होता है. इन शुभ दिनों में मां की हर रोज पूजा की जाती है और ज्यादातर लोग 9 दिन का व्रत भी रखते हैं. वैसे तो मां को श्रद्धा भाव से लगाए गए हर भोग को ग्रहण करती हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में मां के हर स्वरूप का अलग भोग लगता है. कलश स्था‍पना की तिथि और शुभ मुहूर्त कलश स्था‍पना की तिथि: 17 अक्टूबर 2020 कलश स्था‍पना का शुभ मुहूर्त: 17 अक्टूबर 2020 को सुबह 06 बजकर 23 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक। कुल अवधि: 03 घंटे 49 मिनट अभिजीत मुहूर्त सभी शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम होता है। जो मध्यान्ह 11:43 से 12:29 तक होगा। शुभ का चौघड़िया सुबह 07:49 से 09:14 तक होगा जिसने कलश स्थापना की जा सकती है स्थिर लग्न कुम्भ दोपहर 2:30 से 3:55 तक होगा, साथ ही शुभ चौघड़िया भी इस समय प्राप्त होगी, अतः यह अवधि कलश स्थापना हेतु अतिउत्तम है। जानिए कैसे करें नवरात्रि पर कलश पूजन सभी प्राचीन ग्रंथों में पूजन के समय कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. सभी मांगलिक कार्यों में कलश अनिवार्य पात्र है. दुर्गा पूजन में कलश की स्थापना करने के लिए कलश पर रोली से स्वास्तिक और त्रिशूल अंकित करना चाहिए और फिर कलश के गले पर मौली लपेट दें. जिस स्थान पर कलश स्थापित किया जाता है पहले उस स्थान पर रोली और कुमकुम से अष्टदल कमल बनाकर पृथ्वी का स्पर्श करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- ओम भूरसि रस्यादितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धात्रीं। पृथिवीं यच्छ पृथिवी दृह पृथ्वीं माहिसीः।। ओम आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्तिवन्दवः। पुनरूर्जानि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।
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