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शिक्षा में ज्योतिष का महत्व

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आज के युग में सभी अपना व अपने परिवार का शिक्षा का स्तर उच्च रखने की इच्छा रखते हैं I आज के समय में सभी माता पिता या अभिभावक भी अपने बच्चो की शिक्षा को लेकर  चिन्तित रहते हैं और उन्हें अच्छी शिक्षा देने की कोशिश करते हैं I प्राचीन समय में गुरुकुल हुआ करते थे तथा ब्राह्मण का कार्य शिक्षा प्रदान करना था I विद्यार्थी आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे I लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे शिक्षा के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है, वर्तमान समय में तो शिक्षा का स्वरुप बहुत बदल गया है I आज अच्छी आजीविका पाने के लिए अच्छी शिक्षा ग्रहण करना आवश्यक समझा जाता है I आज के समय की मांग व क्षमतानुसार तथा मानसिकता के अनुसार शिक्षा प्राप्त करानी चाहिए जो आगे चलकर जीवन निर्वाह व राष्ट्र की प्रगति के लिए सहायक सिद्ध हो सके I आधुनिक समय में बच्चा शिक्षा कुछ पाता है और आगे चलकर व्यवसाय कुछ कुछ ओर करता  है I ज्योतिष्य गणना  के आधार पर बच्चे की शिक्षा के क्षेत्र में सहायता की जा सकती है I शिक्षा किस क्षेत्र में प्राप्त करने के लिए कुंडली के अनुसार शिक्षा से जुड़े भावों पर विचार करना आवश्यक है, जिससे की उसी क्षेत्र में सफलता मिल सके I कुण्डली के दूसरे, चतुर्थ तथा पंचम भाव से शिक्षा का प्रत्यक्ष रुप में संबंध होता है I 

इन भावों पर विस्तार से विचार करके ही शिक्षा क्षेत्र को चुने ताकि सफलता प्राप्त हो सकेI 

द्वितीय भाव को कुटुम्ब भाव भी कहते हैं I बच्चा पांच वर्ष तक के सभी संस्कार अपने परिवारिक वातावरण से पाता है I पांच वर्ष तक जो संस्कार बच्चे के पड़ जाते हैं, वही अगले जीवन का आधार बनते हैंI इसलिए दूसरे भाव से परिवार से मिली शिक्षा अथवा संस्कारों का पता चलता है I इसी भाव से पारीवारिक वातावरण के बारे में भी पता चलता है I बच्चे की प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में इस भाव की मुख्य भूमिका है I जिन्हें बचपन में औपचारिक रुप से शिक्षा नहीं मिल पाती है, वह भी जीवन में सफलता इसी भाव से पाते हैं I  इस प्रकार बच्चे के आरंभिक संस्कार दूसरे भाव से देखे जाते हैं I 

चतुर्थ भाव कुण्डली का सुख भाव भी कहलाता है I  आरम्भिक शिक्षा के बाद स्कूल की पढा़ई का स्तर इस भाव से देखा जाता है I इस भाव के आधार पर ज्योतिषी भी बच्चे की शिक्षा का स्तर बताने में सक्षम होता है I  वह बच्चे का मार्गदर्शन, विषय चुनने में कर सकता है I चतुर्थ भाव से उस शिक्षा की नींव का आरम्भ माना जाता है, जिस पर भविष्य की आजीविका टिकी होती है अक्षर के ज्ञान से लेकर स्कूल तक की शिक्षा का आंकलन इस भाव से किया जाता है I 

पंचम भाव को शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण भाव माना गया है I इस भाव से मिलने वाली शिक्षा आजीविका में सहयोगी होती है I  वह शिक्षा जो नौकरी करने या व्यवसाय करने के लिए उपयोगी मानी जाती है, उस पर विचार  पंचम भाव से किया जाता है I  आजीविका के लिए सही विषयों के चुनाव में इस भाव की महत्वपूर्ण भूमिका है I

शिक्षा प्रदान करने वाले ग्रह बुध को बुद्धि का कारक ग्रह माना गया है I गुरु ग्रह को ज्ञान व गणित का कारक ग्रह माना गया है जिस बच्चे की कुंडली में गुरु अच्छी स्थिति में हो उसका गणित अच्छा होता है I बच्चे की कुण्डली में बुध तथा गुरु दोनों अच्छी स्थिति में है तो शिक्षा का स्तर भी अच्छा होगा I  इन दोनों ग्रहों का संबंध केन्द्र या त्रिकोण भाव से है तब भी शिक्षा क स्तर अच्छा होगा I इसके आलावा कुंडली में पंचमेश की स्थिति क्या है,  इस पर भी विचार करना अति आवश्यक होता है I इस के अतिरिक वर्ग कुण्डलियों से शिक्षा से जुडे़ भाव तथा ग्रहों का विचार करना भी आवश्यक है लेकिन इन भावों के स्वामी और शिक्षा से जुडे़ ग्रहों की वर्ग कुण्डलियों में स्थिति कैसी है,  इसका पर विशेष आंकलन करना  बहुत आवश्यक है I कई बार जन्म कुण्डली में सारी स्थिति बहुत अच्छी होती है, लेकिन फिर भी शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा नहीं होता है, क्योंकि वर्ग कुण्डलियों में संबंधित भाव तथा ग्रह कमजोर अवस्था में स्थित हो सकते हैं I  

शिक्षा के लिए नवाँश कुण्डली तथा चतुर्विंशांश कुण्डली का विचार अवश्य करना चाहिए I जन्म कुण्डली के पंचमेश की स्थिति इन वर्ग कुण्डलियों में देखने से शिक्षा स्तर का आंकलन किया जा सकता है I चतुर्विशांश कुण्डली को वर्ग- 24 भी कहा जाता है I  इस में किसी विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहता है, तथा कुंडली विद्या के सम्बन्धित ग्रहों के उपाय करके भी कुछ समाधान किया जा सकता है I

प० गौतम एवं गुरविन्दर सिंह चंड़ीगढ़

 

posted Feb 10, 2019 by Gurvinder Singh

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गुरू ग्रह का महत्व । गुरु (बृहस्पति) ज्योतिष के नव ग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माने जाते हैं. गुरू मुख्य रूप से आध्यात्मिकता को विकसित करने का कारक हैं. तीर्थ स्थानों तथा मंदिरों, पवित्र नदियों तथा धार्मिक क्रिया कलाप से जुडे हैं. गुरु ग्रह को अध्यापकों, ज्योतिषियों, दार्शनिकों, लेखकों जैसे कई प्रकार के क्षेत्रों में कार्य करने का कारक माना जाता है. गुरु की अन्य कारक वस्तुओं में पुत्र संतान, जीवन साथी, धन-सम्पति, शैक्षिक गुरु, बुद्धिमता, शिक्षा, ज्योतिष तर्क, शिल्पज्ञान, अच्छे गुण, श्रद्धा, त्याग, समृ्द्धि, धर्म, विश्वास, धार्मिक कार्यो, राजसिक सम्मान देखा जा सकता है. गुरु से संबन्धित कार्य क्षेत्र कौन से है । गुरू जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में सकारात्मक उर्जा प्रदान करने में सहायक हैं. अपने सकारात्मक रुख के कारण व्यक्ति कठिन से कठिन समय को आसानी से सुलझाने के प्रयास में लगा रहता है. गुरू आशावादी बनाते हैं और निराशा को जीवन में प्रवेश नहीं करने देते हैं. गुरू के अच्छे प्रभाव स्वरुप जातक परिवार को साथ में लेकर चलने की चाह रखने वाला होता है. गुरु के प्रभाव से व्यक्ति को बैंक, आयकर, खंजाची, राजस्व, मंदिर, धर्मार्थ संस्थाएं, कानूनी क्षेत्र, जज, न्यायाल्य, वकील, सम्पादक, प्राचार्य, शिक्षाविद, शेयर बाजार, पूंजीपति, दार्शनिक, ज्योतिषी, वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता होता है. गुरु के मित्र ग्रह सूर्य, चन्द्र, मंगल हैं. गुरु के शत्रु ग्रह बुध, शुक्र हैं, गुरु के साथ शनि सम संबन्ध रखता है. गुरु को मीन व धनु राशि का स्वामित्व प्राप्त है. गुरु की मूलत्रिकोण राशि धनु है. इस राशि में गुरु 0 अंश से 10 अंश के मध्य अपने मूलत्रिकोण अंशों पर होते है. गुरु कर्क राशि में 5 अंश पर होने पर अपनी उच्च राशि अंशों पर होते हैं. गुरु मकर राशि में 5 अंशों पर नीच राशिस्थ होते हैं, गुरु को पुरुष प्रधान ग्रह कहा गया है यह उत्तर-पूर्व दिशा के कारक ग्रह हैं.गुरु के सभी शुभ फल प्राप्त करने के लिए पुखराज रत्न धारण किया जाता है. गुरु का शुभ रंग पिताम्बरी पीला है. गुरु के शुभ अंक 3, 12, 21 है. गुरु के अधिदेवता इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, भगवान नारायण है. गुरु का बीज मंत्र ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम: गुरु का वैदिक मंत्र देवानां च ऋषिणा च गुर्रु कान्चन सन्निभम । बुद्यिभूतं त्रिलोकेश तं गुरुं प्रण्माम्यहम ।। गुरु की दान की वस्तुएं गुरु की शुभता प्राप्त करने के लिए निम्न वस्तुओं का दान करना चाहिए. स्वर्ण, पुखराज, रुबी, चना दान, नमक, हल्दी, पीले चावल, पीले फूल या पीले लडडू. इन वस्तुओं का दान वीरवार की शाम को करना शुभ रहता है. गुरु का जातक पर प्रभाव गुरु लग्न भाव में बली होकर स्थित हों, या फिर गुरु की धनु या मीन राशि लग्न भाव में हो, अथवा गुरु की राशियों में से कोई राशि व्यक्ति की जन्म राशि हो, तो व्यक्ति के रुप-रंग पर गुरु का प्रभाव रहता है. गुरु बुद्धि को बुद्धिमान, ज्ञान, खुशियां और सभी चीजों की पूर्णता देता है. गुरू का प्रबल प्रभाव जातक को मीठा खाने वाला तथा विभिन्न प्रकार के पकवानों तथा व्यंजनों का शौकीन बनाता है. गुरू चर्बी का प्रभाव उत्पन्न करता है इस कारण गुरू से प्रभावित व्यक्ति मोटा हो सकता है इसके साथ ही व्यक्ति साफ रंग-रुप, कफ प्रकृति, सुगठित शरीर का होता है. गुरु के खराब होने पर गुरु कुण्डली में कमजोर हो, या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो नीच का हो षडबल हीन हो तो व्यक्ति को गाल-ब्लेडर, खून की कमी, शरीर में दर्द, दिमागी रुप से विचलित, पेट में गडबड, बवासीर, वायु विकार, कान, फेफडों या नाभी संबन्धित रोग, दिमाग घूमना, बुखार, बदहजमी, हर्निया, मस्तिष्क, मोतियाबिन्द, बिषाक्त, अण्डाश्य का बढना, बेहोशी जैसे दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. बृहस्पति के बलहीन होने पर जातक को अनेक बिमारियां जैसे मधुमेह, पित्ताशय से संबधित बिमारियों प्रभावित कर सकती हैं. कुंडली में गुरू के नीच वक्री या बलहीन होने पर व्यक्ति के शरीर की चर्बी भी बढने लगती है जिसके कारण वह बहुत मोटा भी हो सकता है. बृहस्पति पर अशुभ राहु का प्रबल व्यक्ति को आध्यात्मिकता तथा धार्मिक कार्यों दूर ले जाता है व्यक्ति धर्म तथा आध्यात्मिकता के नाम पर लोगों को धोखा देने वाला हो सकता है. गुरु ग्रह के 12 भावो मे फल - 1. लग्न में - जिस जातक के लग्न में बृहस्पति स्थित होता है, वह जातक दिव्य देह से युक्त, आभूषणधारी, बुद्धिमान, लंबे शरीर वाला होता है। ऐसा व्यक्ति धनवान, प्रतिष्ठावान तथा राजदरबार में मान-सम्मान पाने वाला होता है। शरीर कांति के समान, गुणवान, गौर वर्ण, सुंदर वाणी से युक्त, सतोगुणी एवं कफ प्रकृति वाला होता है। दीर्घायु, सत्कर्मी, पुत्रवान एवं सुखी बनाता है लग्न का बृहस्पति। 2. द्वितीय भाव में - जिस जातक के द्वितीय भाव में बृहस्पति होता है, उसकी बुद्धि, उसकी स्वाभाविक रुचि काव्य-शास्त्र की ओर होती है। द्वितीय भाव वाणी का भी होता है। इस कारण जातक वाचाल होता है। उसमें अहम की मात्रा बढ़ जाती है। क्योंकि द्वितीय भाव कुटुंब, वाणी एवं धन का होता है और बृहस्पति इस भाव का कारक भी है, इस कारण द्वितीय भाव स्थित बृहस्पति, कारक: भावों नाश्यति के सूत्र के अनुसार, इस भाव के शुभ फलों में कमी ही करता देखा गया है। धनार्जन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना, वाणी की प्रगल्भता, अथवा बहुत कम बोलना और परिवार में संतुलन बनाये रखने हेतु उसे प्रयास करने पड़ते हैं। राजदरबार में वह दंड देने का अधिकारी होता है। अन्य लोग इसका मान-सम्मान करते हैं। ऐसा जातक शत्रुरहित होता है। आयुर्भाव पर पूर्ण दृष्टि होने के कारण वह दीर्घायु और विद्यावान होता है। पाप ग्रह से युक्त होने पर शिक्षा में रुकावटें आती हैं तथा वह मिथ्याभाषी हो जाता है। दूषित गुरु से शुभ फलों में कमी आती है और घर के बड़ों से विरोध कराता है। 3. तृतीय भाव में - जिस जातक के तृतीय भाव में बृहस्पति होता है, वह मित्रों के प्रति कृतघ्न और सहोदरों का कल्याण करने वाला होता है। वराह मिहिर के अनुसार वह कृपण होता है। इसी कारण धनवान हो कर भी वह निर्धन के समान परिलक्षित होता है। परंतु शुभ ग्रहों से युक्त होने पर उसे शुभ फल प्राप्त होते हैं। पुरुष राशि में होने पर शिक्षा अपूर्ण रहती है, परंतु विद्यावान प्रतीत होता है। इस स्थान में स्थित गुरु के जातक के लिए सर्वोत्तम व्यवसाय अध्यापक का होता है। शिक्षक प्रत्येक स्थिति में गंभीर एवं शांत बने रहते हैं तथा परिस्थितियों का कुशलतापूर्वक सामना करते हैं। 4. चतुर्थ स्थान में - जिस जातक के चतुर्थ स्थान में बलवान बृहस्पति होता है, वह देवताओं और ब्राह्मणों से प्रीति रखता है, राजा से सुख प्राप्त करता है, सुखी, यशस्वी, बली, धन-वाहनादि से युक्त होता है और पिता को सुखी बनाता है। वह सुहृदय एवं मेधावी होता है। इस भाव में अकेला गुरू पूर्वजों से संपत्ति प्राप्त कराता है। जिस 5. पंचम स्थान में - जातक के पंचम स्थान में बृहस्पति होता है, वह बुद्धिमान, गुणवान, तर्कशील, श्रेष्ठ एवं विद्वानों द्वारा पूजित होता है। धनु एवं मीन राशि में होने से उसकी कम संतति होती है। कर्क में वह संततिरहित भी देखा गया है। सभा में तर्कानुकूल उचित बोलने वाला, शुद्धचित तथा विनम्र होता है। पंचमस्थ गुरु के कारण संतान सुख कम होता है। संतान कम होती है और उससे सुख भी कम ही मिलता है। 6. छठे स्थान में - रिपु स्थान, अर्थात जन्म लग्न से छठे स्थान में बृहस्पति होने पर जातक शत्रुनाशक, युद्धजया होता है एवं मामा से विरोध करता है। स्वयं, माता एवं मामा के स्वास्थ्य में कमी रहती है। संगीत विद्या में अभिरुचि होती है। पाप ग्रहों की राशि में होने से शत्रुओं से पीड़ित भी रहता है। गुरु- चंद्र का योग इस स्थान पर दोष उत्पन्न करता है। यदि गुरु शनि के घर राहु के साथ स्थित हो, तो रोगों का प्रकोप बना रहता है।इस भाव का गुरु वैद्य, डाक्टर और अधिवक्ताओं हेतु अशुभ है। इस भाव के गुरु के जातक के बारे में लोग संदिग्ध और संशयात्मा रहते हैं। पुरुष राशि में गुरु होने पर जुआ, शराब और वेश्या से प्रेम होता है। इन्हें मधुमेह, बहुमूत्रता, हर्निया आदि रोग हो सकते हैं। धनेश होने पर पैतृक संपत्ति से वंचित रहना पड़ सकता है। 7. सप्तम भाव में - जिस जातक के जन्म लग्न से सप्तम भाव में बृहस्पति हो, तो ऐसा जातक, बुद्धिमान, सर्वगुणसंपन्न, अधिक स्त्रियों में आसक्त रहने वाला, धनी, सभा में भाषण देने में कुशल, संतोषी, धैर्यवान, विनम्र और अपने पिता से अधिक और उच्च पद को प्राप्त करने वाला होता है। इसकी पत्नी पतिव्रता होती है। मेष, सिंह, मिथुन एवं धनु में गुरु हो, तो शिक्षा के लिए श्रेष्ठ है, जिस कारण ऐसा व्यक्ति विद्वान, बुद्धिमान, शिक्षक, प्राध्यापक और न्यायाधीश हो सकता है। 8. अष्टम भाव में - जिस व्यक्ति के अष्टम भाव में बृहस्पति होता है, वह पिता के घर में अधिक समय तक नहीं रहता। वह कृशकाय और दीर्घायु होता है। द्वितीय भाव पर पूर्ण दृष्टि होने के कारण धनी होता है। वह कुटुंब से स्नेह रखता है। उसकी वाणी संयमित होती है। यदि शत्रु राशि में गुरु हो, तो जातक शत्रु से घिरा हुआ, विवेकहीन, सेवक, निम्न कार्यों में लिप्त रहने वाला और आलसी होता है।स्वग्रही एवं शुभ राशि में होने पर जातक ज्ञानपूर्वक किसी उत्तम स्थान पर मृत्यु को प्राप्त करता है। वह सुखी होता है। बाह्य संबंधों से लाभान्वित होता है। स्त्री राशि में होने के कारण अशुभ फल और पुरुष राशि में होने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। 9. नवम स्थान में - जिस जातक के नवम स्थान में बृहस्पति हो, उसका घर चार मंजिल का होता है। धर्म में उसकी आस्था सदैव बनी रहती है। उसपर राजकृपा बनी रहती है, अर्थात जहां भी नौकरी करेगा, स्वामी की कृपा दृष्टि उसपर बनी रहेगी। वह उसका स्नेह पात्र होगा। बृहस्पति उसका धर्म पिता होगा। सहोदरों के प्रति वह समर्पित रहेगा और ऐश्वर्यशाली होगा। उसका भाग्यवान होना अवश्यंभावी है और वह विद्वान, पुत्रवान, सर्वशास्त्रज्ञ, राजमंत्री एवं विद्वानों का आदर करने वाला होगा। 10. दसवें भाव में - जिस जातक के दसवें भाव में बृहस्पति हो, उसके घर पर देव ध्वजा फहराती रहती है। उसका प्रताप अपने पिता-दादा से कहीं अधिक होता है। उसको संतान सुख अल्प होता है। वह धनी और यशस्वी, उत्तम आचरण वाला और राजा का प्रिय होता है। इसे मित्रों का, स्त्री का, कुटुंब का धन और वाहन का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। दशम में रवि हो, तो पिता से,चंद्र हो, तो माता से, बुध हो, तो मित्र से, मंगल हो, तो शत्रु से, गुरु हो, तो भाई से, शुक्र हो, तो स्त्री से एवं शनि हो, तो सेवकों से उसे धन प्राप्त होता है। 11. एकादश भाव में - जिस जातक के एकादश भाव में बृहस्पति हो, उसकी धनवान एवं विद्वान भी सभा में स्तृति करते हैं। वह सोना- चांदी आदि अमूल्य पदार्थों का स्वामी होता है। वह विद्यावान, निरोगी, चंचल, सुंदर एवं निज स्त्री प्रेमी होता है। परंतु कारक: भावों नाश्यति, के कारण इस भाव के गुरु के फल सामान्य ही दृष्टिगोचर होते हैं, अर्थात इनके शुभत्व में कमी आती है। 12. द्वादश भाव में - जिस जातक के द्वादश भाव में बृहस्पति हो, तो उसका द्रव्य अच्छे कार्यों में व्यय होने के पश्चात भी, अभिमानी होने के कारण, उसे यश प्राप्त नहीं होता है। निर्धन , भाग्यहीन, अल्प संतति वाला और दूसरों को किस प्रकार से ठगा जाए, सदैव ऐसी चिंताओं में वह लिप्त रहता है। वह रोगी होता है और अपने कर्मों के द्वारा शत्रु अधिक पैदा कर लेता है। उसके अनुसार यज्ञ आदि कर्म व्यर्थ और निरर्थक हैं। आयु का मध्य तथा उत्तरार्द्ध अच्छे होते हंै। इस प्रकार यह अनुभव में आता है कि गुरु कितना ही शुभ ग्रह हो, लेकिन यदि अशुभ स्थिति में है, तो उसके फलों में शुभत्व की कमी हो जाती है और अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं और शुभ स्थिति में होने पर गुरु कल्याणकारी होता है।
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शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते है. नवरात्रि में देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है. इन नौ दिनों में भक्तों नियमों के साथ मां की पूजा करते हैं. इसबार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ेगी, जिसके कारण नवरात्र में देवी आराधना के लिए पूरे 9 दिन मिलेंगे. प्रतिपदा तिथि को माता के प्रथम स्वरूप शैल पुत्री के साथ ही कलश स्थापना के लिए भी अति महत्त्वपूर्ण दिन होता है. कलश स्थापना या कोई भी शुभ कार्य शुभ समय एवं तिथि में किया जाना शुभ माना जाता है, इसलिए इस दिन कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. नवरात्र के 9 दिनों में मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और हर स्वरूप सौभाग्य का प्रतीक होता है. इन शुभ दिनों में मां की हर रोज पूजा की जाती है और ज्यादातर लोग 9 दिन का व्रत भी रखते हैं. वैसे तो मां को श्रद्धा भाव से लगाए गए हर भोग को ग्रहण करती हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में मां के हर स्वरूप का अलग भोग लगता है. कलश स्था‍पना की तिथि और शुभ मुहूर्त कलश स्था‍पना की तिथि: 17 अक्टूबर 2020 कलश स्था‍पना का शुभ मुहूर्त: 17 अक्टूबर 2020 को सुबह 06 बजकर 23 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक। कुल अवधि: 03 घंटे 49 मिनट अभिजीत मुहूर्त सभी शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम होता है। जो मध्यान्ह 11:43 से 12:29 तक होगा। शुभ का चौघड़िया सुबह 07:49 से 09:14 तक होगा जिसने कलश स्थापना की जा सकती है स्थिर लग्न कुम्भ दोपहर 2:30 से 3:55 तक होगा, साथ ही शुभ चौघड़िया भी इस समय प्राप्त होगी, अतः यह अवधि कलश स्थापना हेतु अतिउत्तम है। जानिए कैसे करें नवरात्रि पर कलश पूजन सभी प्राचीन ग्रंथों में पूजन के समय कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. सभी मांगलिक कार्यों में कलश अनिवार्य पात्र है. दुर्गा पूजन में कलश की स्थापना करने के लिए कलश पर रोली से स्वास्तिक और त्रिशूल अंकित करना चाहिए और फिर कलश के गले पर मौली लपेट दें. जिस स्थान पर कलश स्थापित किया जाता है पहले उस स्थान पर रोली और कुमकुम से अष्टदल कमल बनाकर पृथ्वी का स्पर्श करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- ओम भूरसि रस्यादितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धात्रीं। पृथिवीं यच्छ पृथिवी दृह पृथ्वीं माहिसीः।। ओम आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्तिवन्दवः। पुनरूर्जानि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।
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पूरा जरूर पड़े अतिमहत्वपूर्ण जानकारी हिन्दू धर्म में कुछ संख्याओं का विशेष महत्व एक ओम्कार्
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6 जुलाई से सावन का महिना शुरू गया है भोलेनाथ को ये महिना अति प्रिय है इस दिन देवो के देव महादेव यानी भगवान् शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना की जाती है और इनकी पूजा अत्यन्य फलदायी होती है इस वार सावन के महीने में 5 सोमवार होंगे यानि सावन 6 जुलाई से शुरू होकर 3 अगस्त को ख़त्म होगा ! ऐसा माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान् शिव की पूजा करने से जीवन के कष्टों से निवारण मिलता है ! सच्चे मन से भगवान् शिव की आराधना करने से मन वांछित फल मिलता है ! सावन का व्रत शुरू करने की विधि सोमवार का व्रत सूर्य उदय से शुरू होकर तीसरे प्रहार तक होता है, दिन में एक समय हो भोजन करना चाहिए, नमक नहीं खाना चाहिए ! ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर, घर की सफाई करें, फिर स्नान आदि करके घर में गंगाजल का छिडकाव करें ! उसके बाद व्रत का संकल्प ले और भगवान् शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चहिये ! शिव चालीसा का पाठ करें ! निम्न में से किसी भी मंत्र का 7, 11, 21 माला का उच्चारण करे, शिवलिंग में जल चढ़ाये, बेल पत्र, भांग चन्दन आधी चढ़ाये ! ॐ नमः शिवाय ॐ जूं स : ॐ ह्रीं नमः शिवाय शाम को सूर्य उदय पश्चात् भगवान् शिव की धुप द्वीप और चन्दन से पूजा करें ! पूजा के पश्चात् कथा सुने, आरती करने के वाद भगवान् शिव और देवी पारवती को भोग लगाये, आरती का प्रसाद वितरण करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें ! इस तरह से पहले सोमवार से सावन के आखरी सोमवार तक व्रत का पालन करना चाहिए ! माना जाता है कि सावन के महीने में आने वाले सोमवार के व्रत करने से इसका फल 16 सोमवार के फल के बराबर मिलता है ! जो भी भक्त सच्चे मन से सावन का व्रत रखता है और विधि अनुसार पूजा करता है उसे मन वांछित फल प्राप्त होता है ! सावन के व्रत में न करे ये काम सावन के व्रत के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए, गुस्सा नही करना चाहिए, बुरे विचार मन में नहीं लाने चाहिए और किसी के लिए मुख से अपशव्द नहीं कहने चाहिए ! ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए, अनैतिक कार्य से दूर रहे ! शाश्त्रो के अनुसार बैंगन को अशुद्ध मन जाता है इसलिए इस महीने बैंगन खाने से परहेज़ करें ! मांस मदिरा का सेवन आदि न करें इससे आपको जीव हत्या का पाप लगता है साथ ही मन में अशांति बनती है ! पेड़ पौधों को तोड़ने से पाप लगता है !
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आमतौर पर हमारे देश में हर विशेष दिन कुछ न कुछ दान करने की परंपरा रही है। महाभारत के एक दृष्टांत में कहा गया है कि माघ मास के दिनों में अनेक तीर्थों का समागम होता है, वहीं पद्मपुराण में कहा गया है कि अन्य मास में जप, तप और दान से भगवान विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वे माघ मास में स्नान करने से होते हैं। यही वजह है कि प्राचीन ग्रंथों में नारायण को पाने का सुगम मार्ग माघ मास के पुण्य स्नान को बताया गया है, विशेषकर आज के दिन गंगा स्नान का खास महत्व माना गया है। * माघ मास में पवित्र नदियों में स्नान करने से एक विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है। * अमावस्या के दिन जप-तप, ध्यान-पूजन करने से विशेष धर्मलाभ प्राप्त होता है। * मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर आचरण तथा स्नान-दान करने का विशेष महत्व है। * शास्त्रों के अनुसार माघ मास में पूजन-अर्चन व नदी स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है तथा इन दिनों नदी में स्नान करने से स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग मिल जाता है। * जो लोग घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करना चाहिए। * इस दिन सूर्यनारायण को अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होती है। * जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, व गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी। * आज के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें। * इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है। * इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। क्या करें दान :- मौनी अमावस्या के दिन तेल, तिल, सूखी लकड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, काले कपड़े, जूते दान करने का विशेष महत्व है। वहीं जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा नीच ग्रह का है तो उन्हें दूध, चावल, खीर, मिश्री, बताशा दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी।
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