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लग्नेश के विभिन्न भावो में फल

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लग्नेश का विभिन्न भावों में फल लग्न के स्वामी का प्रथम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी अपने ही भाव में स्थित हो तो जातक के लिए यह स्थिति बहुत ही शुभ मानी गई है इसका मुख्य कारण यह है कि ऐसी स्थिति होने पर लग्न मजबूत हो जाता है कहा भी गया है — सैया भई कोतवाल तो डर काहे का अर्थात यदि घर का मालिक घर में ही कोतवाली करता है तो उस घर से मिलने वाले सभी फल सहज रूप में मिलेगा ही इसमें कोई संदेह नहीं है. शास्त्र में कहा गया है ——- लोमेश संहिता के अनुसार — लग्नेशे लग्नगे पुंसः सुदेहे स्वभुजकर्मी मनस्वी चातिचांचल्यो द्विभार्यो परगामी वा। अर्थात यदि लग्न का अधिपति लग्न में ही हो तो वैसा जातक शरीर से मजबूत वा आकर्षक स्वावलंबी, अपने मेहनत से धनोपार्जन करने वाला, चिंतन करने वाला अति चंचल स्वभाव वाला होता है तथा ऐसे जातक की दो पत्नी होती है अथवा अन्य स्त्रियों के प्रति आसक्त रहने वाला होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का दूसरे भाव में फल दूसरा भाव धन, वाणी, नेत्र इत्यादि का होता है यदि इस स्थान में लग्न का अधिपति स्वयं बैठा है तो ऐसा जातक अपने प्रयास से धन कमाता है। वह अपने जीवन में धन की कमी नहीं महसूस करेगा और अपने सम्पूर्ण जीवन काल में खूब धन कमाएगा। यदि धन भाव का स्वामी भी अपने ही भाव में स्थित है तब तो क्या कहना ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में धन का अभाव महसूस नहीं करता है। जीवन भर धन का लाभ मिलता रहता है । इनकी वाणी मधुर अथवा दम्भ युक्त होता है। खाने और पीने का भी शौक़ीन होता है। इनकी रूचि ज्योतिष तथा मनोविज्ञान जैसे विषयो में होती है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का तृतीय भाव में फल तीसरा भाव सहोदर और परिश्रम का भाव है यदि इस भाव में लग्न का स्वामी बैठा है तो ऐसा जातक अपने परिश्रम से भविष्य का निर्माण करता है। यदि ऐसा व्यक्ति कभी भी अपने भाग्य को कोसना नहीं चाहिए। यदि लग्न का स्वामी इस भाव में है तो भाई से सम्बन्ध ख़राब हो सकता है। यदि लग्नाधिपति यहाँ शुभ स्थिति में है तो भाइयो के साथ बढ़िया सम्बन्ध होता है। ऐसा जातक लघु यात्रा का शौक़ीन होता है वह देश विदेश में भ्रमण करता है। इस व्यक्ति संगीतकार, नर्तक, अभिनेता, खिलाड़ी, लेखक आदि के रूप में प्रसिद्ध होता है। ऐसा जातक कला का पुजारी होता है कोई एक कला तो उसके पास अवश्य ही होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का चतुर्थ भाव में फल चतुर्थ भाव वाहन, बंधू-बान्धव, मकान, माता इत्यादि का भाव है यदि लग्न का स्वामी चतुर्थ स्थान में स्थित है तो ऐसे जातक को उपर्युक्त विषय-वस्तु का सुख प्राप्त होता है। ऐसा जातक अपने माता पिता से बहुत ही प्यार करता है और माता पिता के सुख का भागी बनता है। ऐसा जातक आध्यात्मिक विषयों में रुचि लेता है। इसके लिए अपना कार्य बहुत ही प्यारा होता है। लोमेश संहिता में कहा गया है….. लग्नेशे दशमे तुर्ये पितृमातृसुखान्वितः बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौदर्यसंयुतः। अर्थात यदि लग्न वा प्रथम भाव का स्वामी चतुर्थ स्थान में है तो जातक को माता- पिता का सुख मिलता है। अनेक भाइयो का प्यार मिलता है। अत्यंत कामी गुणवान और सौन्दर्य से युक्त होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का पंचम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी पंचम भाव में स्थित है तो वैसा जातक बहुत ही चालाक होता है वह छोटी छोटी बातो को लेकर परेशान भी होते रहता है। पंचम भाव संतान का भाव होता है अतः यदि लग्नाधिपति इस स्थान में स्थित है तो जातक को अपने संतान से सुख के साथ साथ दुःख भी मिलता है। संतान सुख में कमी भी देखा गया है। शास्त्रानुसार एक संतान की मृत्यु भी संभावित होती है। ऐसा जातक तुनुकमिजाजी होता है तुरत ही किसी बात पर गुस्सा जाता है। ऐसे जातक को सामाजिक कार्यो में रूचि होती है। आप प्रशासनिक अधिकारी होते है। लाभ के पद पर कार्य करते है। कई बार तो ऐसा जातक बीच में ही पढाई छोड़कर कार्य करना शुरू कर देता है। लोमेश संहिता में कहा गया है —- लग्नेशे पंचमे मानी सुतै: सौख्यम च मध्यम प्रथमापत्यनाशः स्यात क्रोधी राजप्रवेशिक: । अर्थात ऐसा व्यक्ति क्रोधी राजकार्य करने वाला होता है। जातक के प्रथम पुत्र की हानि होती है। पुत्र तथा मित्र का सुख कम मिलता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का षष्ठ भाव में फल यदि लग्न का स्वामी छठे भाव में हो तो वह व्यक्ति शरीर से कमजोर होता है। प्रायः वह कर्ज लेते हुए देखा गया है परन्तु यदि लग्नेश की दशा चल रही है तो वैसी स्थिति में जातक कर्ज वा ऋण से मुक्त भी हो जाता है वह किसी न किसी प्रकार से कर्ज से मुक्ति पाना चाहता है। ऐसा जातक सेना अथवा पुलिस डिपार्टमेंट में नौकरी करने वाला होता है और यदि वहां नौकरी नहीं भी करेगा तो उसका स्वभाव सेनानायक जैसा ही होगा। आप मेडिकल से जुड़े कार्य कर सकते है अर्थात डॉक्टर बन सकते है। ऐसा व्यक्ति दुसरो के कार्यो में हस्तक्षेप करता है। लोमेश संहिता के अनुसार — लग्नेशे सहजे षष्ठे सिंहतुल्यपराक्रमी सर्वसम्पद्युतो मानी द्विभार्यो मतिमान सुखी। अर्थात ऐसा जातक सिंह के सामान पराक्रमी बलशाली होता है। धन धान्य से परिपूर्ण होता है तथा दो पत्नी का सुख प्राप्त होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का सप्तम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी सप्तम भाव में हो तो ऐसे जातक को दो पत्नी का सुख मिलता है। कभी-कभी एक पत्नी को मरते हुए भी देखा गया है। आप अपने मन के अनुसार अपनी पत्नी का चयन करेंगे है। ऐसा जातक हमेशा देश – विदेश भ्रमण करता है अथवा देश – विदेश में अपना निवास स्थान बनाता है। ऐसा जातक अपने पारिवारिक माहौल से ऊबकर सन्यासी भी बन जाता है। लोमेश संहिता में भी यही कहा गया है — लग्नेश सप्तमे यस्य भार्या तस्य न जीवति विरक्तो वा प्रवासी च दरिद्रो वा नृपोपि वा। परंतु यह सब सप्तम स्थान में स्थित ग्रह के ऊपर निर्भर करता है यदि इस भाव में अशुभ ग्रह बैठा है तो अशुभ फल की प्राप्ति होगी और यदि शुभ ग्रह बैठा है तो शुभ फल की प्राप्ति होगी। प्रथम वा लग्न के स्वामी का अष्टम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी अष्टम भाव में स्थित है तो ऐसा जातक बहुत ही विद्वान होता है। आप जोखिम वाला कार्य करना पसंद करते है आप चाहते है की मैं ऐसा काम करू जिससे खूब पैसा आये तथा खूब नाम और यश मिले और आप इसमें कुछ हद तक सफल भी होते है। आपको तंत्र मन्त्र में रूचि होती है। आध्यात्मिक कार्यो में आप बढ़-चढ़कर भाग लेते है। लोमेश संहिता में कहा गया है —– लग्नेश व्ययगे चाष्टे शिल्पविद्याविशारद : द्युति चौरो महाक्रोधी परभार्यातिभोगकृता। अर्थात ऐसा जातक शिल्प विद्या में रूचि रखता है। जुआ तथा चोरी जैसे काम करना पसंद करता है। आप अत्यंत ही क्रोधी स्वभाव के होते है तथा अन्य स्त्रियों का उपभोग करना पसंद करते है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का नवम भाव में फल किसी भी जातक की कुंडली में नवम भाव भाग्य तथा पिता का स्थान होता है। यदि प्रथम भाव का स्वामी नवम भाव में है तो ऐसा जातक धार्मिक विचारो से युक्त होता है। तथा धार्मिक कार्यो में आप बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते है। आप बहुत ही भाग्यवान व्यक्ति है। आप को पिता का प्यार तथा धन सुख अवश्य ही मिलेगा। आपको अपने पिता के कथनानुसार कार्य करने के लिए कृत संकल्प होते है। लोमेश संहिता में कहा गया है —- लग्नेशे नवमे पुंसां भाग्यवान जनवल्लभ विष्णुभक्तो पटुर्वाग्भी पुत्रदारधनैरयुक्त। अर्थात यदि लग्नाधिपति नवम स्थान हो तो वह जातक भाग्यवान लोगो का प्रतिनिधित्वकर्ता होता है। आप विष्णु के भक्त होंगे। आप बोलने में कुशल पुत्र पत्नी तथा धन से युक्त होंगे। प्रथम वा लग्न के स्वामी का दशम भाव में फल जन्मकुंडली में दशम भाव कर्म भाव कहलाता है। किसी भी जातक का कर्म कैसा होगा उसका निर्धारण इसी भाव के आधार पर किया जाता है। यदि लग्न का स्वामी दशम भाव में स्थित है तो वैसा जातक अपने परिश्रम के बल पर बहुत ही आगे बढ़ता है। परन्तु यह तब जब आप तन मन और धन से कार्य करे तब अन्यथा काम के लिए भटकते रह सकते है। आप जैसे व्यक्ति अपने अपने हाथ से घर का निर्माण करा कर उस घर में रहते है। यदि शुभ ग्रहो के प्रभाव से प्रभावित है तो आपके पास अचूक प्रॉपर्टी होगी। आप जिस भी क्षेत्र में काम करेंगे उसमे अपना नाम रौशन करेंगे। लोमेश संहिता में कहा गया है —— लग्नेशे दशमे तुर्ये पितृमातृसुखान्वितः बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौन्दर्यसंयुतः। अर्थात यदि लग्नाधिपति दशम स्थान में है तो जातक को माता- पिता का सुख मिलता है। अनेक भाइयो का प्यार मिलता है। अत्यंत कामी गुणवान और सौन्दर्य से युक्त होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का एकादश भाव में फल जन्मकुंडली में एकादश भाव को लाभ भाव भी कहा जाता है। यह स्थान जातक के इच्छापूर्ति का स्थान होता है अतः यदि किसी जातक के कुंडली में लग्न वा प्रथम स्थान का स्वामी इस भाव में होता है तो येन केन प्रकारेण उसकी इच्छापूर्ति होती है। ऐसा जातक अपने भाइयो या बहनो में सबसे बड़ा होता है। आप अपने व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ कमाते है और यदि लग्नेश की दशा चल रही हो तो क्या कहना। लोमेश संहिता में कहा गया है —– लग्नेशे द्वितीये लाभे स लाभी पंडितो नरः सुशीलो धर्मवित्त मानी बहुदारगुणैर्युत:। अर्थात यदि लग्नेश लाभ स्थान में हो तब ऐसा व्यक्ति सुशील, धार्मिक, अनेक पत्नियों वाला तथा विभिन्न गुणों से युक्त होता है। ऐसा जातक अनेक प्रकार से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का बारहवें भाव में फल किसी भी जन्मकुंडली में बारहवां स्थान व्यय, हॉस्पिटल जेल इत्यादि का भाव होता है। इस भाव से पूर्व में कथित विषय-वस्तु के सम्बन्ध में फल की प्राप्ति होती है। इस जातक बहुत ही खर्चीला होता है। ऐसा जातक धार्मिक यात्रा पर जाता है। प्रायः ऐसे जातक को व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती है यदि सफलता मिल भी जाती है तो अंतिम चरण में नुकसान भी हो जाता है। आप जैसे लोग सामाजिक कार्यो में अपना अहम् भूमिका निभाते है। लोमेश संहिता में कहा गया है —– लग्नेश व्ययगे चाष्टे शिल्पविद्याविशारद: द्युति चौरो महाक्रोधी परभार्यातिभोगकृता। अर्थात ऐसा जातक शिल्प विद्या में रूचि रखता है जुआ तथा चोरी जैसे काम करना पसंद करता है। आप अत्यंत ही क्रोधी स्वभाव के होते है तथा अन्य स्त्रियों का उपभोग करना पसंद करते है।

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लग्न कुंडली
posted May 28, 2019 by Rakesh Periwal

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जन्मपत्रिका में विभिन्न राजयोग विचार राजयोग किसी भी कुंडली में लगन से केन्द्र विभाव ष्णु स्थान कहलाते है एवं लग्र से त्रिकोण स्थान लक्ष्मी स्थान कहलाते है । जब भी इन विष्णु एवं लक्ष्मी स्थानों का संबंध अर्थात परस्पर इन भावों के स्वामी आपस में संबंध बनाते है तो राजयोग का निर्माण होता है। विष्णु स्थान १,४,७ और १० भाव लक्ष्मी स्थान १,५,९ भाव अत: बनने वाले राजयोग १+५, १+९, ४+५, ४+९, ७+५, ७+९, १०+५ और १०+९ भाव उपरोक्त भावों में युति, परस्पर दृष्टि और परिवर्तन सम्बन्ध बनने पर राजयोग बनता है। 

विपरीत राज योग – ६,८,१२ भावों में ही इन भावों के स्वामी स्थित हो, किन्तु इनके साथ कोई ग्रह नहीं हों या किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो, तो यह विपरीत राजयोग उत्तम फल कारक होता है। षष्ठेश ८,१२ भाव में अष्टमेश ६,१२ भाव में व्ययेश ६,८ भाव में स्थित होने पर किसी ग्रह से युक्त या दृश्य नहीं हो तब यह योग बनता है। ६,८,१२ भाव के स्वामी एकत्र स्थित हो या अलग-अलग होकर ६,८,१२ भावों में स्थित होने पर अन्य ग्रह से युक्त दृष्ट नहीं हो तब भी विपरीत राजयोग बनता है। जो शुभफल प्रद होता है। 

१. हर्ष विपरीत राजयोग जब षष्टेश अष्टम या द्वादश स्थान जाय।

 २. सरल विपरीत राजयोग जब अष्टमेश षष्टम या द्वादश भाव में चला जाए। 

३. विमल विपरीत राजयोग जब द्वादशेश षष्टम या अष्टम स्थान में चला जाएं।

 नीच भंग राजयोग- जो ग्रह नीच का हो उसकी उच्च राशि का स्वामी लगन से या चन्द्र से केन्द्र में स्थित होने पर नीच भंग योग बनता है। अथवा जो ग्रह यदि दिन में जन्म हो तो विषम राशि का सूर्य पिता, सम राशि का चन्द्रमा मामी, सम राशि का शुक्र माता, विषम राशि का शनि चाचा का स्वामी होता है। यदि रात्रि का जन्म हो विषयम राशि का सूर्य चाचा का सम राशि चन्द्र माता का सम राशि शुक्र मामी का विषम राशि का शनि पिता का स्वामी होता है। प्रत्येक भाव शुभ ग्रह युत दृष्टि हो भावेश उच्च राशि में मित्र राशि में मित्र राशि में भावकारक ग्रह भी बलवान् हो तथा भाव से भाव तक गणना करने पर अर्थात् चतुर्थ भाव के विचार के समय चतुर्थ से चतुर्थ भव का स्वामी भी बलवान् हो तो उस भाव का शुभ फल होता है। इसी प्रकार भाव पापयुत द्रष्ट हो षष्टेश अष्टमेश द्वादशेश से भाव और भावाधिपति युतद्रष्ट हो अस्त नीच पापा-क्रान्त शत्रुगृही हो तथा भावकारक ग्रह उपर्युक्त दोषयुक्त हो उस भाव की हानि होती है फलित का विचार करते समय इस सूत्र को अवश्य ध्यान में रखना चाहिये। भावाधिपति केन्द्र या त्रिकोण में रहने पर भाव की पुष्टि करता है। 

१. जन्म कुण्डली में जो ग्रह नीच राशि का स्वामी नीच राशि को देखत हो अथवा वह नीच राशि लग्र या चन्द्र से केन्द्र में हो तो राजाधिराज योग बनता है। 

२. यदि नीच राशिस्थ ग्रह की उच्च राशि का स्वामी केन्द्र में तब भी राजा बनताहै। ३. नीच राशि का स्वामी लग्र या चन्द्र से केन्द्र में हो तब भी नीच भंग योग होता है। गुरु मकर राशि का चन्द्र लग्र से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग बन जाता है। इसका कारण यह है कि गुरु की उच्च राशि का स्वामी केन्द्रस्थ है। यदि नीच राशि का स्वामी नीच का होकर केन्द्र में स्थित हो तो नीचभंग राजयोग नहीं बनता। 

उच्चपदासीन राजयोग- १. यदि लग्रेश केन्द्र में हो और अपने मित्रग्रहों से दृष्ट हो तथा लग्र में शुभग्रह हों तो जातक न्यायाधीश अथवा विधिमंत्री आदि पद प्राप्त करता है। २. यदि पूर्ण चन्द्र जलचर राशि के नवमांश में चतुर्थ भावस्थ हो, स्वराशिस्थ शुभग्रह लग्र में हो तथा केन्द्र में पापग्रह न हो तो ऐसा जातक राजदूत अथवा गुप्तचर विभाग में किसी उच्च पद को प्राप्त करता है। ३. किसी ग्रह की उच्च राशि लग्र में हो, वह ग्रह यिद अपने नवांश अथवा मित्र अथवा उच्च के नवांश में केन्द्रगत शुभाग्रह से दृष्ट हो तो ऐसा जातक शासनधिकारी का पद प्राप्त करता है। उच्चपद कारक योग जब दो या दो से अधिक ग्रह उच्चस्थ या स्वराशिस्थ होकर परस्पर केन्द्रों में और लग्र से भी केन्द्र में हो तो कारक योग होता है जो धनी व उच्च पद का अधिकारी बनाता है। जब जन्म लग्रप ही नवमांश लग्र हो। सूर्य से द्वितीय भाव में शुभग्रह हो। कुण्डली में चारों केन्द्रों में ग्रह हो, कारक योग हो इनमें से कोई भी योग होने पर व्यक्ति धनी व उच्च पदाधिकारीयोग बन जाता है। 

धनी यशस्वी राज्याधिकारी योग – १. लग्र से केन्द्रों में शुभग्रह षष्ठ अष्टम भाव रिक्त हों या इनमें शुभग्रह स्थित हो। २. लग्र और व्यय के स्वामी परस्पर केन्द्रगत मित्रग्रहों से दृष्ट हों। ३. लग्रेश जिस राशि में स्थित हो उस राशि का स्वामी स्वक्षेत्रीय या उच्चस्थ होकर केन्द्र में स्थित हो। ४. मेष लग्र में मंगल दशमस्थ शनि के साथ स्थित हो, गुरु से भी दृष्ट हो। ५. कर्कलग्र में चन्द्र कर्क में बुध सप्तम में होने पर शुभग्रह केन्द्रस्थ हो और षष्ठ व अष्टम में शुक्र गुरु उदित हों और उनके साथ धनेश सूर्य अष्टम में हों। ६. चन्द्र लग्रेश व लग्रेश दोनों एकत्र केन्द्रस्थ होकर अधिमित्र ग्रह से दृष्ट हो तथा लग्र को बली ग्रह देखता हों। ७. सूर्य से बुध द्वितीय से हो बुध, से चन्द्र एकादश में हो चन्द्र से गुरु नवम भावस्थ हो, तुला लग्र में सूर्य व्यय में बुध लगन में चन्द्र एकादश में और गुरु सप्तम भाव स्थित हों। ८. गुरु से केन्द्र में शुक्र हो और दशमेश बलवान हों। ९. १,२,६,१२ भावों में ग्रह स्थित हों दशमेश बलवान हों। १०. किसी पुरुष का दिन में जन्म हो और लग्र चन्द्र लग्र, सूर्य लग्र तीनों विषम राशि में हों। ११. किसी स्त्री का जन्म रात्रि में हो और तीनों लग्र में चन्द्र लग्र, सूर्य लग्र समराशि हों। १२. किसी स्त्री का जन्म रात्रि में हो और तीनों लग्र सम राशि में हो। १३. उच्चस्थ ग्रह जिस नवमांश में हो उसका स्वामी उच्च राशि का केन्द्रस्थ हो और लग्रेश बली हो। १४. लग्र में ३ शुभग्रह हो। १५. लग्र में ३ पापग्रह से दरिद्री, अपमानित रोगी चिन्तित योग बनता है। १६. नवमेश तथा शुक्र उच्च राशि अथवा स्वराशि में स्थित होकर केन्द्र त्रिकोण में हो। १७. उच्चराशिगत नवमेश, स्वराशि या मूल त्रिकोण में नवमेश लग्र से केन्द्र में हो। १८. जब कोई ग्रह अधिकतर लग्रों का मित्र होता हुआ पंचमस्थ या अन्य धनप्रद भावस्थ राहु केतु जिस राशि में हों उसका स्वामी हो और बलवान् हो तो लाटरी धन लाभ होता है। १९. जन्म लग्र या चन्द्र लग्र ६,७,८ भाव में शुभग्रह हों अथवा दोनों लग्र में से किसी से ३,६,१०,११ भाव में शुभग्रह हों। २०. सूर्य से द्वितीय भाव में चन्द्र को छोडक़र कोई ग्रह हों अथवा सूर्य से व्यय भाव में चन्द्र को छोडक़र कोई ग्रह हो अथवा सूर्य से द्वितीय और द्वादश भाव चन्द्र को छोडक़र अन्य ग्रह हों अथवा चन्द्र से द्वितीय और द्वादश में सूर्य को छोडक़र अन्य ग्रह हों। २१. चन्द्र से द्वितीय में सूर्य छोडक़र सूर्य ग्रह हो या सूर्य से व्यय में सूर्य को छोडक़र अन्य ग्रह हो अथवा चन्द्र से द्वितीय और द्वादश में सूर्य को छोडक़र अन्य ग्रह हो। २२. यदि सप्तमेश दशम भाव में उच्च राशिगत हो। अथवा दशमेश भागयेश का योग हो उपर्युक्त सभी योग धनी यशस्वी, राज्याधिकाीर आदि शुभ योग कारक है। २२. द्वितीय व पंचम भाव में बुध, गुरु, शुक्र स्थित हो अथवा गुरु बुध या शुक्र की राशि में स्थित हो तो श्रेष्ठ संगीतज्ञ योग बनता है। दशमेश पंचम में बुध केन्द्र में हो, सूर्य सिंह राशि में हो तो शारदा योग बनता है अथवा चन्द्र से नवम पंचम गुरु हो और गुरु बुध से लाभ में हो। शुक्र, गुरु तथा बुध केन्द्र में या त्रिकोण में हो अथवा यही तीन शुभग्रह धन भाव में अपने उच्च या मित्र ग्रह की राशि में हो और गुरु बलवान हो तो सरस्वती योग बनाकर व्यकित को कवि, शास्त्रज्ञ, ग्रन्थकर्ता, धनी, स्त्री, पुत्र से युक्त व राज्य सम्मानित करता है।

 पंच महापुरुष योग – मंगल बुध, गुरु, शुक्र शनि क्रमश : पअनी उच्च राशिस्थ व स्वक्षेत्री होकर केन्द्रस्थ हों तो क्रमश: रुचक, भद्र, हंस मालव्य और शश योग बनाते हैं, इन योगों में सम्पन्न व्यक्ति उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति में ग्रह के गुण धर्मों का समावेश रहता है। चन्द्र और गुरु षडाष्टक स्थिति में हों और गुरु लग्र से केन्द्र में न हो तो शकट योग बनता है जो व्यक्ति निर्धन तो होता है, सदा जीवन कष्टमय व्यतीत करता है। 

गज केसरी योग – १. चन्द्र से गुरु केन्द्र में हो तो गज केसरी योग बनता है। इसमें चन्द्र से सप्तम में गुुरु स्थित हो तो उसे उत्तम गज केसरी योग माना है। २. पूर्णचन्द्र शुभ नवमांश में हो स्वगृही या उच्च का हो वह पापग्रहों से युत द्रष्ट नहीं होतो लग्र के अतिरिक्त अन्य केन्द्रों में स्थित होने पर भी गज केसरी योग बनता है। ३. चन्द्र पर बु.बृ.शु. तीनों की दृष्टि होने पर भी गज केसरी योग बनता है। इस योग का फल अत्युत्तम लिखा है। ४. नीच ग्रह का नवमांशेश अर्थात् नीच ग्रह के नवमांश का अधिपति लग्र से केन्द्र त्रिकोण में हो और लग्र १,४,७,१० राशि का हो तो नीच भंग राजयोग बनकर शुभ फल प्रद होता है। धन योग किसी भी कुंडली में द्वितीय भाव एवं एकादश भाव धन भाव कहलाते है एवं लग्र से त्रिकोण स्थान लक्ष्मी स्थान कहलाते है जब भी लक्ष्मी स्थानों का संबंध धन भाव से बनता है तो धन योग का निर्माण होता है। धन भाव २,११ लक्ष्मी स्थान १,५,९ धन योग २+१, २+५, २+९, २+११, १+११, ५+११ और ९+११ भाव राहु-केतु से बनने वाले राज योग जब किसी कुंडली में राहु-केतु विशेष राज योग बनाते है तब वे अपनी महादशा या अन्तरदशा में अपना शुभ फल देने में सक्षम होते है। इन राजयोगों के बनने की तीन अवस्थाएं है। १. जब कभी राहु या केतु त्रिकोण भाव में विद्यमान हो और कुंडली के केन्द्रेश से संबंध बनाये। २. जब कभी राहु या केतु केन्द्रभाव में विद्यमान हो और कुंडली से त्रिकोणेश में संबंध बनाये। ३. जब कभी राहु या केतु केन्द्र या त्रिकोण से अन्य किसी स्थान में विद्यमान हो और कुंडली के केन्द्रेश एवं त्रिकोणेश दोनो के संबंध हो तो राजयोग बनाते है। 

शुभ योग १. लग्र का स्वामी जिस राशि में हो उसका स्वामी उच्चराशि में हो अथवा लग्र का स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी चन्द्र से केन्द्र में हो तो आजीवन सुखी योग बनता है। 

२. लग्र कुण्डली, चन्द्र कुण्डली, नवमांश कुण्डली में से किसी में भी उपर्युक्त योग का विचार करना चाहिये। लग्र में मेष, सिंह, धनु राशि का मंगल स्थित होकर मित्र ग्रह से दृष्ट हो तो स्व भुजोपर्जित धन से धनी होता है। 

३. तृतीय में सूर्य नवम में चन्द्र पंचम में गुरु हो तो महाधनी योग बनता है। 

४. चन्द्र से अथवा लग्र से ६,७,८वें भावों में बु.वृ.शु. क्रमश: स्थित हों अथवा एकत्र स्थित हों या दो स्थानों में ही स्थित हों तो नृप तुल्य योग अथवा बहुत बड़ा जमींदार होता है। यदि चन्द्र धनुराशि का हो तो षष्ठ में शुक्र सप्तम में बुध अष्टम में गुरु स्थित होने से बहुत उत्तम योग बन जाने से सर्वोत्तम अधियोग बन जाता है। जन्म लग्र कन्या हो और चन्द्र धनुराशि में हो तो चन्द्र से ६,७,८ भाव में क्रमश: शु.बु.गु. के स्थित होने पर यह अधियोग अत्युत्तम बन जाता है। जन्म लग्र से अधियोग का विचार करने धनु लग्र में ६,७,८ वें भाग स्थित ग्रह क्रमश: शुक्र, बुध, व गुरु होने से यह अधियोग अधम अधियोग बनता है। क्योंकि जन्म लग्र से शुक्र षष्ठ में और गुरु अष्टम में हो जाता है। ६,८,१२ भाव के स्वामी परस्पर अन्योन्य राशि में हो अथवा स्वराशि में स्थित हो इन पर शुभ ग्रहों की युति दृष्टि नहीं हो तो विपरीत राजयोग बनता है। यह योग धन, यश, पदवी, राज्याधिकार आदि उपलब्ध करवाता है।

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वैदिक ज्योतिष में भावानुसार उच्च के चंद्र का फल 〰️〰️
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कुंडली के नवम भाव में लग्नेश का प्रभाव कुंडली के नवम भाव में लग्नेश का प्रभाव 1)कुंडली के नवम भाव में लग्नेश का प्रभाव जानने के लिए सर्वप्रथम हम प्रथम भाव और नवम भाव के नैसर्गिक कारक के संदर्भ में जानकारी प्राप्त करेंगे। 2) नवम भाव भाग्य का कारक भाव है। यदि लग्नेश नवम भाव में स्थित हो तब जातक जन्म से ही भाग्यशाली होता है। जातक धनी और समृद्ध व्यक्ति होता है। जातक के जीवन के प्रति प्रैक्टिकल एप्रोच होता है। जातक सांसारिक सुख सुविधाओं की ओर झुकाव रखने वाला व्यक्ति होता है। जातक दयालु और दूसरों की रक्षा करने वाला व्यक्ति होता है। जातक की संवाद का तरीका उत्तम होता है। 3) नवम भाव धर्म त्रिकोना होता है। यदि लग्नेश नवम भाव में हो तो जातक धार्मिक प्रवृत्ति का होता है। जातक धार्मिक क्रियाकलापों के प्रति एक्टिव होता है। जातक मंदिर निर्माण, धर्मशाला का निर्माण, मंदिर के रखरखाव या किसी दूसरे धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाता है। जातक धार्मिक व्यक्तियों से संबंध रखने वाला व्यक्ति होता है। जातक एक अच्छा रिलीजियस स्पीकर या वक्ता हो सकता है। 4) नवम भाव मंत्र शक्ति और यंत्र शक्ति से भी संबंधित होता है। अतः नवम भाव में स्थित लग्नेश जातक को मंत्रों या यंत्रों को सिद्ध करने की क्षमता देता है। जातक की क्षमता जातक की कुंडली पर निर्भर करेगी। 5) नवम भाव प्रसिद्धि का कारक भाव है। नवम भाव में स्थित लग्नेश जातक को अच्छी प्रसिद्धि दिलाती है। यह जातक की कुंडली के बल पर निर्भर करेगा कि जातक कितना ज्यादा नेम और फेम प्राप्त करेगा। यदि नवम भाव में स्थित लग्नेश शुभ ग्रहों के साथ संबंध बनाता है तब जातक निश्चित ही एक प्रसिद्ध व्यक्ति होगा। 6)नवम भाव पिता से संबंधित भाव है। नवम भाव में स्थित लग्नेश के कारण जातक अपने पिता का आदर और सम्मान करेगा। जातक के अपने पिता से उत्तम संबंध होंगे। यदि लग्नेश नवम भाव में सुस्थित हो तब जातक के पिता प्रसिद्ध और उत्तम व्यक्तित्व वाले व्यक्ति होंगे। जातक के पिता की ईश्वर पर अच्छी आस्था होगी। जातक के पिता की सामाजिक प्रतिष्ठा भी अच्छी होगी। जातक अपने पिता की संपत्ति को प्राप्त करेगा। 7) नवम भाव यात्रा का कारक भाव है। अतः लग्नेश नवम भाव में स्थित हो तब जातक की लंबी दूरी की यात्रा संभव होती है। जातक देश में या विदेश में बहुत सारी यात्राएं करेगा। 8)ज्योतिष के शास्त्रों के अनुसार यदि लग्नेश नवम भाव में स्थित हो तब जातक विष्णु का उपासक होता है। अगर हम इसके दूसरे पहलू के बारे में बात करें तो हम कह सकते हैं कि जातक पालनकर्ता की भूमिका में होगा। अर्थात जातक अपने समाज की, परिवार की, नगर की या देश की पालन करने में या भरण पोषण करने में उत्तम जिम्मेदारी निभाएगा। यह एक प्रकार से जातक की कर्तव्य परायण होने की सूचना देता है। 9)नवम भाव में स्थित लग्नेश यदि नवमेश के साथ स्थित हो तब यह एक उत्तम राजयोग बनाता है। जातक धनी और समृद्ध व्यक्ति होगा। जातक भाग्यशाली व्यक्ति होगा। जातक धार्मिक व्यक्ति होगा और धर्म के लिए बहुत सारे उत्तम कार्य करेगा। जातक धार्मिक यात्राएं करेगा। जातक अपने पिता और अपने गुरु की सेवा करेगा। जातक अपने पिता का सुख प्राप्त करेगा। जातक को अपने पैतृक संपत्ति का सुख प्राप्त होगा। Use app for consultation अपना जन्म दिनांक और समय भेजे अपने कुण्डली का वीशलेषण कराये
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मेष लग्न-जन्म के समय यदि मेष लग्न हो तो जातक का औसत कद, सुघड़ शरीर, तीव्र स्वभाव, लालिमापूर्ण आंखें, महत्वाकांक्षी, साहसी, कमजोर टांगे, स्त्रीप्रिय, अभिमानी तथा अस्थिर धनवाला होता है। इस लग्न पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति आवेशात्मक व झगड़ालू हो जाता है। ये लोग प्राय: स्थिर स्वभाव के नहीं होते, अत: जीवन में ये बार-बार काम बदलते हैं। फिर भी इनमें वला की कार्य कुशलता तथा कभी निराश न होने का गुण होता है। इनका स्वभाव प्राय: गरम होता है तथा ये अपने ऊपर पड़ी जिम्मेदारी को जल्दी ही निबटाना पसन्द करते हैं अर्थात् काम में विलम्ब करना इनका स्वभाव नहीं होता है। ये भोजन के शौकीन होते हैं, लेकिन फिर भी कम भोजन कर पाते हैं तथा जल्दी भोजन करना इनका स्वभाव होता है। कभी कभी इनके नाखूनों में विकार देखा जाता हैं ये लोग साहसिक कामों में अपनी प्रतिभा का विस्तार कर सकते हैं। वृष लग्न-इस लग्न में जातक मध्यम शरीर, चर्बी रहित तथा शौकीन स्वभाव के होते हैं। ये प्राय: सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं। प्राय: रंग खुलता गेहुआं तथा बाल चमकदार होते हैं। इनकी जांघें मजबूत तथा इनकी चाल मस्तानी होती है। इनमें धैर्य खूब होता है, इसीलिए बहुत जल्दी ये लोग उत्तेजित नहीं होते हैं। यथासम्भव क्रोधित होने पर ये लोग खूंखार हो जाते हैं। ये लोग प्राय: प्रबल इच्छा शक्ति रखते हैं तथा जीवन में बहुत सफलता प्राप्त करते हैं। ये जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाते। ये धन कमाते हैं तथा संसार के सारे सुखों को भोगना चाहते हैं। इनके जीवन का मध्य भाग काफी सुखपूर्वक व्यतीत होता है। इनके यहां कन्या सन्तान की अधिकता होती है। मिथुन लग्न-मिथुन लग्न में उत्पन्न बालक लम्बे कद व चमकीले नेत्रों वाला होता है। इनकी भुजाएं प्राय: लम्बी देखी गयी हैं। ये लोग प्राय: खुश मिजाज व चिन्तारहित होते हैं। ये लोग प्राय: प्राचीन शास्त्रों में रुचि रखते हैं। तथा कुशल वक्ता होते हैं। अपनी बात को प्रभावी ढंग से पेश करना इनकी विशेषता होती है। इनकी नाम लम्बी व ऊंची होती है। ये लोग स्त्रियों या अपने से कम उम्र के लोगों से दोस्ती रखते हैं। इनकी एकतरफा निर्णय करने की शक्ति कुछ कम होती है। ये लोग कई व्यवसाय कर सकते हैं। स्वभावत: भावुक होते हैं तथा भावावेश में कभी अपना नुकसान सहकर भी परोपकार करते हैं। ये लोग उच्च बौद्धिक स्तर के होते हैं। तथा शीघ्र धनी बनने के चक्कर में कभी कभी सट्टा या लॉटरी का शौक पाल लेते हैं। इनकी मध्य अवस्था प्राय: संघर्षपूर्ण होती है। ये लोग कवित्व शक्ति से भी पूर्ण होते हैं। कर्क लग्न-इन लग्न के लोग छोटे कद वाले होते हैं। इनका शरीर प्राय: मोटापा लिए होता है तथा जलतत्व राशि होने के कारण जल्दी सर्दी की पकड़ में आ जाते हैं। इनके फेफड़े कमजोर होते है। इन्हें नशीले पदार्थों का शौक होता है। इनका जीवन प्राय: परिवर्तनशील होता है। पूर्वावस्था में इन्हें संघर्ष करना पड़ता है। इनकी कल्पना शक्ति अच्छी होती है तथा लेखन का इन्हें शौक होता है। आवेश इनकी कमजोरी होती है तथा जीवन में ये तेज रफ्तार से दौड़ना चाहते हैं। ये लोग प्राय: मध्यावस्था में धन व सम्मान अर्जित करते हैं तथा स्वयं को कुछ श्रेष्ठ मानते हैं। इनकी स्मरण-शक्ति भी अद्भुत देखी गई है। ये लोग प्राय: बातूनी होते हैं। यदि सप्तम स्थान पर शुभ ग्रहों का प्रभाव न हो तो इनका वैवाहिक जीवन सुखी नहीं होता। गृहस्थ जीवन से ये बहुत लगाव रखते हैं। धन जमा करना इनका स्वप्न होता है। इन्हें अच्छी चीजों का शौक होता है। इनकी विचारधारा कभी बहुत शूरतापूर्ण तथा कभी बहुत भीरू होती है। जीवन के तीसरे पहर में इन्हें विरासत में धन-सम्पत्ति भी प्राप्त होती है। सिंह लग्न-इस लग्न के जातक तीक्ष्ण स्वभाव वाले तथा क्रोधी होते हैं। इनका कद मध्यम व व्यक्तित्व रौबीला होता है, इन्हें पेट व दांत के रोग होने की सम्भावना रहती है। महत्वाकांक्षा बहुत होती है। ये लोग अपनी बात से बहुत हठी होते हैं तथा उच्चाधिकार प्राप्त होने पर ये खूब रौब जमाते हैं। इनका वैवाहिक जीवन प्राय: सुखी नहीं होता। ये लोग राजनीति में भी पड़ते हैं। ये लोग दूसरों पर अधिक विश्वास रखते हैं। प्राय: कृपालु व उदार-हृदय वाले ये लोग बहुत न्यायप्रिय होते हैं। माता के ये अधिक दुलारे होते हैं। इन्हें अभक्ष्य भक्षण का भी शौक होता है। पुत्र कम होते हैं। तथा सन्तान भी कम होती हैं। कन्या लग्न- इस लग्न के व्यक्ति प्राय: मोटे नहीं होते तथा इनकी तोंद कम निकलती है। ये लोग समय-चतुर तथा बुद्घिमान होते हैं। औपचारिक शिक्षा में इनकी6 अभिरुचि कम होती है। ये लोग दुनियादारी में काफी तेज होते हैं। ये लोग शास्त्र के अर्थ को समझने वाले, गणित प्रेमी,  चिकित्सा या ज्योतिष का शौक रखने वाले तथा गुणी होते हैं। ये लोग विवाह देर से करते हैं तथा विवाह के बाद गृहस्थी में रम जाते हैं। इनकी भौंहे आपस में मिली होती हैं। ये श्रृंगार प्रिय होते हैं। इनका झुकाव धन इकट्ठा करने की तरफ अधिक होता है। ये परिवर्तनशील स्वभाव के होते हैं। अत: ये हरफनमौला बनने का प्रयास करते हैं। यदि कमजोर लग्न हो तो भाग्यहीन होते हैं तथा बली लग्न में संघर्ष के बाद अच्छी सफलता पाते हैं। इन्हें यात्राओं का बहुत शौक होता है। इनकी अभिरुचियों में स्त्रीत्व का प्रभाव पाया जाता है। तुला लग्न-इन लग्न के लोगों का व्यक्तित्व शानदार तथा आकर्षक होता है। इनकी नाक लम्बी व रंग गोरा होता है। ये मूल रूप से बड़े धार्मिक, सत्यवादी, इन्द्रियों को वश में करने वाले तथा तीव्र बुद्घि वाले होते हैं। ये धीर गम्भीर स्वभाव रखते हैं। यदि अष्टम स्थान तथा वृहस्पति पर शुभ प्रभाव हो तो ये सांसारिक होते हुए भी मानवीय मूल्यों की मिसाल होते हैं। क्रूर प्रभाव पड़ने से प्राय: तेज, चालक व शारीरिक श्रम करने वाले हो जाते हैं। इन लोगों में वैरागय की भावना भी जाग सकती है। ये लोग प्राय: सांसारिक सम्बन्धों को अधिक विस्तार नहीं देते है तथा प्राय: अपने परिवार के विरोध का सामना करते हैं। इनकी कल्पना शक्ति व विचारों का स्तर सामान्यत: उन्नत होता है। ये लोकप्रियता प्राप्त करते हैं। कई बड़े सत्पुरुषों का जन्म तुला लग्न में हुआ है। महात्मा गांधी व विवेकानन्द तुला लग्न के व्यक्ति थे। तुला लग्न के व्यक्ति बहुत प्रेममय होते हैं। ये लोग प्राय: लेखक, उपदेशक, व्यापारी आदि भी पाए जाते हैं। वृश्चिक लग्न-इन लग्न के लोग संतुलित शरीर के होते हैं तथा इनके घुटने व पिंडलियां गोलाई लिए होती हैं। ये लोग अपनी बात पर अड़ जाते हैं, प्राय: ये बिना सोचे समझे भी बात को पकड़ कर अड़ते हैं। यद्यपि इनकी कल्पना शक्ति तीव्र होती है तथा ये बुद्धिमान भी होते हैं लेकिन अपने निकटवर्ती धोखेबाज को भी नहीं पहचान पाते। अक्सर ठगे जाने पर अक्लमंदी दिखाते हैं। इन्हें असानी से किसी तरफ भी मोड़ा जा सकता है। ये कामुक स्वभाव के होते हैं तथा अपनी स्त्री के अतिरिक्त भी अन्य स्त्रियों से शारीरिक सम्बन्ध रखते हैं। दिखने में सरल होते हैं लेकिन अनेक फलितवेत्ता इस बात से सहमत हैं। कि इनमें छिपे तौर पर पाप  vकरने की प्रवृत्ति होती है। स्वभावत: ये खर्चीले स्वभाव के होते हैं, लेकिन अधिकांश खर्च अपने आराम व शौक पर करते हैं। इनका घरेलू जीवन अक्सर अस्त व्यस्त होता है, यदि शुभ प्रभाव से युक्त लग्न हो तो इनकी रुचि गुप्त विद्याओं की तरफ हो जाती है। शुभ प्रभाव वाले लग्न में उत्पन्न होने पर ये कुशल प्रशासक भी होते हैं। धनु लग्न-ये लोग अच्छे शारीरिक गठन वाले होते हैं। शुभ प्रभाव होने पर ये लोग काफी सुन्दर होते हैं। लग्न पर बुरा प्रभाव होने पर इनके दॉत व नाक मोटे हो जाते हैं। ये परिश्रमी तथा धैर्यवान होते हैं। ये लोग जल्दी निर्णय नहीं ले पाते तथा काफी सोच विचार के उपरान्त ही कोई काम करते हैं। ये जोशीले व आलस्य रहित होते हैं अत: जीवन में ये काफी आगे बढ़ते हैं। ये लोग अक्सर सत्यवादी तथा ईमानदार होते हैं लेकिन शनि, राहु, मंगल का प्रभाव लग्न पर हो तो ये प्राय: स्वार्थी व धोखेबाज भी बन जाते हैं। तब इनकी कथनी व करनी में बहुत अन्तर होता है। प्राय: ये लोग धनी तथा भाग्यशाली होते हैं। मकर लग्न-इस लग्न के लोग लम्बे कद के निकलते हैं। इनका शारीरिक विकास धीरे-धीरे होता है। ये दिखने में कठोर व्यक्तित्व वाले होते हैं। ये लोग दूसरों की बात को बड़े ध्यान से सुनते हैं तथा सुन-सुनकर ही बहुत कुछ सीखते हैं। इनकी सहन शक्ति बहुत होती है। ये लोग हर एक बात को बड़े व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखते हैं। ये लोग धीरे-धीरे सन्तोष से अपना काम करते है। यदि लग्न पर अशुभ प्रभाव हो तो ये लोग धोखेबाज, जेब कतरे, चोर तथा दादागिरी दिखाने वाले हो जाते हैं। इसके विपरीत शुभ प्रभाव होने पर ये ईमानदार तथा कर्तव्यनिष्ठ होते हैं। ये लोग अन्धभक्ति करने वाले, स्रेह से सब कुछ न्यौछावर करने वाले तथा शक्ति से वश में न होने वाले होते हैं। ये लोग बहुत परिश्रमी होते हैं। तथा सबके प्रति बड़ा सेवा भाव रखते हैं। यदि इनके स्वाभिमान की रक्षा होती रहे तो बड़े-बड़े दान-पुण्य के महान कार्य कर देते हैं। ये अड़ियल होते हैं। तथा मुसीबत का सीना तान कर सामना करते हैं। प्राय: ये पुरानी विचार धाराओं को मानने वाले होते हैं। कुम्भ लग्न-इस लग्न के व्यक्ति पूरे लम्बे कद तथा लम्बी गरदन वाले होते हैं। ये लोग बहुत सन्तुलित स्वभाव वाले तथा एकान्त प्रिय देखे गए हैं। संघर्ष करने की इनमें क्षमता होती है। ये लोग अपने सिद्घान्त के लिए सब कुछ दांव पर लगा सकते हैं। इनका कभी कभी थोड़े समय के लिए बहुत भाग्योदय हो जाता है।  ये लोग बीस वर्ष के उपरान्त ही सफलता पाना शुरू करते हैं। इनके काम रातों रात सम्पन्न नहीं होते, अपितु मेहनत से करने पड़ते हैं। इन्हें अपनी बात समझाकर अपने ढंग से चलाना बड़ा मुश्किल कार्य होता है। लेकिन बात समझ में आने पर ये पूरी ईमानदारी व तत्परता से उसे मान लेंगे। इन्हें जीवन में प्राय: हर सिरे से असन्तोष होता है। ये लोग अपने असन्तोष को कभी कभी संघर्ष की शक्ल में या विद्रोह के रूप में प्रकट करते हैं। शारीरिक कष्ट सहने की इनमें अद्भुत क्षमता पाई जाती है। इनका विवाह थोड़ी देर से तथा अक्सर बेमेल होता है। ये लोग सबको अपने ढंग से चलाने का प्रयास करते हैं। प्राय: इनका भाग्योदय स्थायी नहीं होता है। फिर भी ये अपने क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध होते हैं। मीन लग्न-इन लग्न के व्यक्ति प्राय: नाटे देखे जाते हैं। इनका माथा औसत शरीर के अनुपात में थोड़ा बड़ा दिखता है। ये लोग जीवन में बेचैनी अनुभव करते हैं तथा कभी कभी दार्शनिकता की तरफ झुक जाते हैं। ये लोग अस्थिर स्वभाव के होते हैं। इनमें अभिनेता, कवि, चिकित्सक, अध्यापक, या संगीतकार बनने योग्य गुण होते हैं। इन्हें प्राय: पैतृक सम्पत्ति प्राप्त होती है तथा ये लोग उसे बढ़ाने की पूरी कोशिश करते हैं। भीतरी तौर पर ये लोग दब्बू तथा डरपोक होते हैं। इन्हें सन्तान अधिक होती है। तथा ये स्वभाव से उद्यमी नहीं होते हैं। इन्हें जीवन में अचानक हानि उठानी पड़ती है। यदि वृहस्पति अशुभ स्थानों में अशुभ प्रभाव में हो तो प्रारम्भिक अवस्था में इनके जीवन की सम्भावना क्षीण होती हैं। इस तरह हमने जाना कि जन्म लग्न मानव स्वभाव व उसके व्यक्तित्व की संरचना में बड़ा योगदान करता है। लग्न पर प्रभाव से उपर्युक्त गुणों में न्यूनता या अधिकता देखी जाती है। यदि लग्नेश बलवान होकर शुभ स्थानों में शुभ ग्रहों से दृष्ट या युत हो तो बहुत से दोषों को दूर कर देता है।
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कुण्डली के लग्न भाव में बुध का प्रभाव लग्नस्थ बुध जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमान बनाता है. जातक स्वभाव से विनम्र, शांत धैर्यवान, उदार तथा सत्य प्रेमी होता है. लग्नस्थ बुध का जातक परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको ढालने की अद्भुद क्षमता होती है। वह परिस्थितियों का आंकलन कर उचित समय पर निर्णय ले लेता है। बुध जिस भी राशि में हो उसका गुण आत्मसात कर लेता है फलतः ऐसे जातक बहुत जल्दी दूसरों से घुल मिल जाते हैं तथा किसी भी बात को बहुत शीघ्रता से समझ लेते हैं. लग्न में बैठा बुध जातक को बुद्धिमान तथा जिज्ञासु बनाता है. ऐसा जातक गणित में कुशल होता है। लग्नस्थ बुध का जातक आत्म केन्द्रित होता है तथा तर्क सांगत दृष्टिकोण रखता है. व्यवहार से हास परिहास प्रेमी तथा वार्ता में कुशल होता है. ऐसे जातक अक्सर विवादों को बहुत कुशलता से सुलझा देते हैं. लग्नस्थ बुध जातक को गहन अध्यन में रूचि देता है. लग्नस्थ बुध के जातक के जीवन में यात्राओं का विशेष महत्व होता है. जीवन में अनेक बार वह यात्राएं करता है कभी मौज मस्ती के लिए तो कभी व्यापार के लिए। यदि लग्न में बुध हो तो कुंडली के अनेक दोषों का नाश होता है. लग्नस्थ बुध जातक को धनि , यशस्वी तथा एक प्रतिभासंपन्न विद्वान् बनाता है. लग्नस्थ बुध के जातक अधिकतर ललित कला प्रेमी होते हैं. शुभ ग्रहों की दृष्टि/ प्रभाव या युति के कारण जातक के गुणों में और अधिक वृद्धि होती है। सूर्य + बुध = व्यापार कुशल तथ कर्तव्यनिष्ठ चन्द्रमा + बुध = कमीशन के कार्यों या अनाज के थोक कार्यों से लाभ। मंगल + बुध = भवन निर्माण या मशीनरी कार्यों में दक्षता बुध + गुरू = स्वभाव में धार्मिकता और अध्यात्मिकता बुध + शुक्र = ललित कलाओं में रूचि बुध + शनि = आंकड़ो के विश्लेषण में दक्षता विषम राशि यानी (मेष , मिथुन, सिंह, तुला , धनु , कुम्भ) का बुध शुभ माना गया है ऐसा जातक पत्रकारिता, लेखन या सम्पादन के क्षेत्र में सफलता पाते हैं वहीँ सम(even) राशि ( वृषभ, कर्क, कन्या , वृश्चिक, मकर और मीन) का बुध जातक को पुत्रों का सुख एवं लाभ देता है। अग्नि तत्व राशि (मेष, सिंह, धनु ) का बुध जातक को लाभ तो देता है परन्तु भ्रष्ट और अनैतिक मार्ग द्वारा। भू तत्व राशि (वृषभ, मकर, कन्या ) का बुध जातक को अंतर्मुखी एवं एकांत प्रिय बनाता है । वायु तत्व राशि (तुला, कुम्भ, मिथुन) का बुध जातक की कल्पना शक्ति को बहुत बढ़ावा देता है तथा लेखन, अन्वेषण या शोध कार्यों में सफलता दिलाता है। जल तत्व राशी (कर्क, वृश्चिक, मीन) का बुध जातक को प्रकाशन कार्यों में सफल बनाता है।
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