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राहु ग्रह रहस्य वैदिक ज्योतिष

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राहु ग्रह रहस्य वैदिक ज्योतिष – ॐ राहवे नमः। अनिश्चितता के कारक राहु की प्रवृत्ति को समझना मुश्किल ही नहीं करीब करीब नामुनकिन है । इच्छाओं को अभियक्त करने वाले राहु चौंकाने वाले परिणाम देते देखे गए हैं । अमूमन इन्हें एक पापी क्रूर छाया ग्रह की तरह देखा जाता है लेकिन यह तथ्य पूर्णतया सत्य नहीं हैं । कुंडली में उचित प्रकार से स्थित राहु जातक को मात्र भक्त, शत्रुओं का पूर्णतया नाश करने वाला , बलिष्ठ , विवेकी, विद्वान , ईश्वर के प्रति समर्पित, समाज में प्रतिष्ठित व् धनवान बनाता है । वहीँ यदि राहु की स्थिति कुंडली में उचित नहीं है तो वात रोगों जैसे गैस, एसिडिटी, जोड़ों में दर्द और वात रोग से संबंधित बीमारियां देने वाला होता है। राहु की महादशा में जातक के जीवन में इतनी तेजी से और अचानक बदलाव आते हैं जिनका पूर्वानुमान लगाना सम्भव नहीं होता । कुछ भी सुव्यस्थित नहीं होरहा होता ।अतः जातक का मन परेशान रहता है । नींद गहरी नहीं आती है व् सुबह उठने पर तारो ताजा महसूस नहीं होता है । बुरी संगत , बुरे कर्मों के प्रति झुकाव बना रहता है, पैसे की तंगी बनी रहती है, व्यसनों के एडिक्ट होने की संभावना प्रबल रहती है! राहु महादशा से पूर्व यदि जातक की तैयारी ( साधना ) पूर्ण है तो राहु काल में जातक की आध्यात्मिक उन्नति में कुछ भी बाधा नहीं आ सकती और ऐसा जातक राहु महादशा को युटीलाइज़ करने में पूरी तरह सक्षम होता है । राहु ग्रह राशि, भाव और विशेषताएं -: राशि स्वामित्व : कोई नहीं दिशा : दक्षिण पश्चिम दिन : शनिवार तत्व: वायु उच्च राशि: मिथुन नीच राशि: धनु दृष्टि अपने भाव से: 7 , 5 , ९ लिंग: पुरुष नक्षत्र स्वामी : आद्रा , स्वाति तथा शतभिषा शुभ रत्न : गौमेध महादशा समय : 18 वर्ष मंत्र: ऊँ रां राहवे नम: राशि स्वामित्व : छाया गृह होने से राहु की अपनी कोई राशि नहीं होती है । वृश्चिक व् धनु राशि में राहु को नीच राशिस्थ व् वृष,मिथुन में उच्च का जाने । राहु ग्रह शुभ फल – प्रभाव कुंडली – यदि कुंडली में राहु शुभ स्थित हो तो जातक को कुशाग्र बुद्धि प्रदान करता है । ऐसे जातक कुशल , प्रोफेशनल स्नाइपर हो तो कहना ही क्या । ये बिना दुश्मन कीनजर में आये उसे खत्म करने की पूरी योग्यता रखते हैं । छाया गृह होने से फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी राहु का बलवान होना बहुत अच्छा माना जाता है । इसकेसाथ साथ राहु जातक को मात्र भक्त , शत्रुओं का पूर्णतया नाश करनेवाला , बलिष्ठ , विवेकी , विद्वान , ईश्वर के प्रति समर्पित , समाज में प्रतिष्ठित , धनवानबनाता है । अचानक लाभ करवाता है व् जुआ , सट्टे व् लाटरी से भी लाभान्वित करवाता है । राहु ग्रह अशुभ फल – प्रभाव कुंडली – यदि राहु की स्थिति कुंडली में उचित नहीं है तो मति भ्र्म की स्थिति बनती है , वात रोगों जैसे गैस, एसिडिटी, जोड़ों में दर्द और वात रोग से संबंधित बीमारियां होजाती हैं । प्रॉफेशन में दिक्कत परेशानियों का सामना करना पड़ता है । बुरी संगत , बुरे कर्मों के प्रति झुकाव बना रहता है , पैसे की तंगी बनी रहती है , व्यसनों केएडिक्ट होने की संभावना प्रबल रहती है । उचित – अनुचित का भान नहीं रहता है । परिस्थितियों से जूझने की क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है । राहु शान्ति के उपाय -रत्न लग्नकुंडली में राहु शुभ स्थित हो और बलाबल में कमजोर हो तो राहु रत्न गौमेध धारण करना उचित रहता है । गौमेध के उपरत्न तुरसा , साफी हैं । गौमेध केअभाव में उपरत्नो का उपयोग किया जा सकता है । किसी भी रत्न को धारण करने से पूर्व किसी योग्य ज्योतिषी से कुंडली का उचित निरिक्षण आवश्य करवाएं ।यदि राहु खराब स्थित हो तो शनिवार का व्रत रखें , शनिवार को चींटियों को काले तिल खिलाएं , ऊँ रां राहवे नम: का नित्य 108 बार जाप राहु की सम्पूर्णमहादशा में करें । किसी जरूरतमंद को चाय पत्ती , जूते दान करें। ये उपाय केतु की सम्पूर्ण महादशा में करते रहने से केतु के प्रकोप से आवश्य राहत मिलती है ।

References

rahu , ketu
posted May 31, 2019 by Rakesh Periwal

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राहु के गुण दोष प्रायः शनि के समान ही होते हैं । शनि की भांति राहु काला , धीमी गति वाला , रोगप्रद , स्नायु रोग कारक , पृथकताजनक , लंबा , विदेश गमन , अधार्मिक मनुष्य , गंदगी , भ्रम , जादू , अंधकार प्रिय , भय ,कष्ट तथा त्रुटियों का कारक होता है । राहु अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल अचानक देता है । यह अचानक फल देने के लिए प्रसिद्ध है । राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है । बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है , जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है । इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है , जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है , हार नहीं मानता है अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है। राहु धन भाव पंचम भाव या लाभ भाव में विराजमान होकर अचानक लाभ करवाता है बशर्ते इन भावों के स्वामी बलवान हो । राहु पर यदि कुंडली के राजयोग बनाए वाले ग्रह तथा शुभ ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है तो राहु अपनी भुक्ति में उन शुभ ग्रहों के राजयोग का फल करता है । परंतु यदि अष्टमेश द्वादशेश आदि से युक्त दृष्ट हो तो धन हानि एवं दरिद्रता भी देता है । गलत तरीके से धन प्राप्त करने के लिए राहु ही प्रेरित करता है । जब राहु शनि के साथ विराजमान हो तो राहु में शनि के भी गुण समाहित हो जाते हैं जिसके कारण राहु की दृष्टि जहां पड़ती है वहां पृथकता आदि अनिष्ट फल देता है । संसार में जितने भी गलत एवं खतरनाक कार्य होते हैं जितने भी खतरनाक बीमारियां होती हैं उन सब में राहु का योगदान होता है । बिना राहु के योगदान से यह संभव नही है । राहू पर यदि शुभ प्रभाव एवं शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ जाए तो अच्छा फल भी देता है वरना समाज विरोधी और गलत कार्य करवाता है । राहु कभी भी पीड़ित नहीं होता है , बल्कि यह सभी ग्रहों को पीड़ित करता है । सूर्य सभी ग्रहों का राजा है सभी को प्रकाश देता है परंतु राहु की दृष्टि सूर्य पर पड़ जाए या राहु सूर्य के साथ बैठ जाए सूर्य भी पीड़ित हो जाता है । सूर्य पर शनि राहु की दृष्टि या युति के कारण ही पितृदोष बनता है । राहु सबसे ज्यादा पीड़ित सूर्य , चंद्रमा ,मंगल एवं गुरु को करता है । इन ग्रहों के साथ संबंध बनाकर कई प्रकार के रोग एवं परेशानी देता है । राहु किसी भी राशि का स्वामी नहीं होता है परंतु मिथुन राशि में उच्च का होता है और धनु राशि में नीच का माना जाता है । इसलिए अपने जीवन में होने वाले किसी भी कमी को पूरा करने के लिए राहु केतु को प्रबल करने के बजाय सूर्य , चंद्रमा , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , शनि इनमें से जो उस कमी वाले भाव के स्वामी हैं उन्हें प्रबल करना चाहिए । यदि राहु किसी शुभ ग्रह या किसी भाव को पीड़ित ना कर रहा हो एवं राहु पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तब बहुत अच्छे तरीके से विशेषण करने के बाद ही राहु से संबंधित रत्न धारण करना चाहिए । राहु जिन जिन ग्रहों के साथ संबंध बनाता है उन ग्रहों से संबंधित होने वाली बीमारी देता है । राहु से संबंधित बीमारी - डर , सर्पदंश , जहर फैलना , दवा से संक्रमण , पागलपन , मानसिक रोग , स्मृति नाश , दुर्घटना , शोक , आंखों के नीचे काले घेरे , नशेड़ी , मोटापा , वायु रोग , भूत , प्रेत , डायन , ऊपरी बाधा , कैंसर इत्यादि ।
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कुंडली में उच्च के ग्रह वैदिक ज्योतिष के अनुसार मकर राशि में स्थित होने पर मंगल को उच्च का मंगल कहा जाता है जिसका साधारण शब्दों में अर्थ यह होता है कि मकर राशि में स्थित होने पर मंगल अन्य सभी राशियों की तुलना में सबसे बलवान हो जाते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में उच्च का मंगल सदा शुभ फलदायी होता है जो सत्य नहीं है क्योंकि कुंडली में मंगल का उच्च होना केवल उसके बल को दर्शाता है तथा उसके शुभ या अशुभ स्वभाव को नहीं जिसके चलते किसी कुंडली में उच्च का मंगल शुभ अथवा अशुभ दोनों प्रकार के फल ही प्रदान कर सकता है जिसका निर्णय उस कुंडली में मंगल के शुभ अशुभ स्वभाव को देखकर ही लिया जा सकता है। आज के इस लेख में हम कुंडली के विभिन्न 12 घरों में स्थित होने पर उच्च के मंगल द्वारा प्रदान किये जाने वाले कुछ संभावित शुभ तथा अशुभ फलों के बारे में विचार करेंगे। 1 कुंडली के पहले घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के पहले घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन से संबंधित शुभ फल दे सकता है विशेषतया तब जब ऐसा शुभ मंगल कुंडली के पहले घर में स्थित होकर कुंडली में शुभ फलदायी मांगलिक योग बनाता हो। इस प्रकार का शुभ उच्च मंगल जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में भी शुभ फल प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक अपने व्यवसाय के माध्यम से बहुत धन कमा सकते हैं। कुंडली के पहले घर में स्थित शुभ मंगल जातक की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने में सहायता कर सकता है जिसके कारण इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातक आर्थिक रूप से समृद्ध अथवा बहुत समृद्ध हो सकते हैं तथा इस प्रकार का शुभ प्रभाव जातक को सुख, सुविधा तथा ऐश्वर्य से युक्त जीवन भी प्रदान कर सकता है। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के पहले घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकतीं हैं तथा ये समस्याएं उस स्थिति में और भी दुखदायी हो सकतीं हैं जब कुंडली के पहले घर में स्थित ऐसा अशुभ उच्च मंगल कुंडली में मांगलिक दोष का निर्माण कर दे। कुंडली के किसी भी घर में अशुभ उच्च के मंगल द्वारा बनाया गया मांगलिक दोष जातक के वैवाहिक जीवन को बहुत कष्टमय बना सकता है क्योंकि ऐसा अशुभ मंगल उच्च होने के कारण बहुत अधिक बलवान हो जाता है जिसके कारण ऐसे बलवान मंगल द्वारा बनाया गया मांगलिक दोष भी साधारण मांगलिक दोष की तुलना में अधिक बलवान होता है जिसके कारण इस प्रकार के मांगलिक दोष से पीड़ित जातक का एक विवाह तो आसानी से टूट सकता है तथा जातक की शेष कुंडली अनुकूल न होने की स्थिति में जातक के एक से अधिक विवाह भी टूट सकते हैं। कुंडली के पहले घर में स्थित अशुभ उच्च का मंगल जातक के व्यवसायिक क्षेत्र में भी बाधाएं पैदा कर सकता है जिसके कारण इस प्रकार के अशुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातकों को लंबे समय तक व्यवसायहीन रहना पड़ सकता है। 2 कुंडली के दूसरे घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के दूसरे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन को बहुत सुखमय बना सकता है, विशेषतया तब जब इस प्रकार का शुभ उच्च मंगल कुंडली में शुभ फलदायी मांगलिक योग बना रहा हो जिसके चलते ऐसे जातक को अपने विवाह से बहुत सुख प्राप्त हो सकता है। कुंडली में इस प्रकार के उच्च मंगल का शुभ प्रभाव जातक को बहुत मात्रा में धन भी प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपने व्यवसाय से बहुत मात्रा में धन कमाने के अतिरिक्त नाम तथा यश भी कमाते हैं। कुंडली के दूसरे घर में स्थित शुभ उच्च का मंगल जातक को बहुत अच्छी अथवा उत्तम संतान भी प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के प्रभाव में आने वाले जातक की संतान जातक की सेवा करने वाली और जातक को सहायता प्रदान करने वाली होती है। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के दूसरे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन में गंभीर अथवा अति गंभीर समस्याएं पैदा हो सकतीं हैं तथा यह समस्याएं उस स्थिति में और भी गंभीर बन सकती हैं जब इस प्रकार का अशुभ उच्च मंगल कुंडली में मांगलिक दोष का निर्माण कर दे। इस प्रकार के मांगलिक दोष से पीड़ित कुछ जातकों का विवाह देरी से अथवा बहुत ही देरी से हो सकता है जबकि इस प्रकार के मांगलिक दोष के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ अन्य जातकों के 2 या इससे भी अधिक विवाह बहुत बुरी स्थितियों में टूट सकते हैं। कुंडली के दूसरे घर में स्थित अशुभ उच्च का मंगल जातक की आर्थिक स्थिति पर भी अशुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते इस प्रकार के अशुभ प्रभाव में आने वाले जातकों को समय समय पर अनचाहे खर्चों से पीड़ित रहना पड़ सकता है जिससे इन जातकों की आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। कुंडली के दूसरे घर में स्थित अशुभ उच्च का मंगल जातक को अनेक प्रकार के रोगों से पीड़ित भी कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के अशुभ प्रभाव में आने वाले विभिन्न जातक भिन्न भिन्न प्रकार के रोगों के कारण लंबे समय तक कष्ट उठा सकते हैं। 3 कुंडली के तीसरे घर में उच्च का मंगल : कुंडली के तीसरे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक को स्वस्थ तथा बलवान शरीर प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया जीवन भर स्वस्थ तथा सक्रिय रहते हैं। इस प्रकार का शुभ प्रभाव जातक को बहुत साहस, पराक्रम तथा शौर्य प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के उच्च मंगल के शुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातक युद्ध कला में बहुत प्रवीण हो सकते हैं तथा पुलिस बल, सेना बल अथवा ऐसी किसी अन्य संस्था में कार्यरत हो सकते हैं जहां इन्हें अपने शौर्य प्रदर्शन का भरपूर अवसर प्राप्त हो सके। कुंडली के तीसरे घर में स्थित शुभ उच्च के मंगल के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी साहस, आशा तथा प्रयत्न का साथ नहीं छोड़ते तथा अपनी निरंतर संघर्ष करते रहने की क्षमता के कारण विकट से विकट परिस्थितियों में से भी निकल कर अनुकूल परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार के जातक सामान्यतया बहुत अच्छे मित्र भी सिद्ध होते हैं तथा विपत्ति में फंसे अपने किसी मित्र की सहायता करने के लिए ऐसे जातक अपने प्राणों को संकट में भी डाल सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के तीसरे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक को अपने विरोधियों तथा शत्रुओं के कारण बहुत विकट परिस्थितियों तथा संकटों का सामना करना पड़ सकता है तथा ऐसे जातक के विरोधी अथवा शत्रु जातक को हानि पहुंचाने के लिए समय समय पर जातक के विरुद्ध षड़यंत्र रचते रहते हैं। कुंडली के तीसरे घर में स्थित अशुभ उच्च मंगल के प्रभाव में आने वाले जातकों को अपने मित्रों, सहयोगियों अथवा भाईयों के कारण भी संकट अथवा हानि का सामना करना पड़ सकता है तथा कुछ स्थितियों में इस प्रकार के अशुभ प्रभाव के कुंडली में बहुत प्रबल होने पर जातक का कोई करीबी मित्र या जातक का सगा भाई भी जातक के साथ विश्वासघात करके उसे गंभीर आर्थिक हानि पहुंचा सकता है अथवा उसे किसी अन्य प्रकार के गंभीर संकट में डाल सकता है। 4 कुंडली के चौथे घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के चौथे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन पर शुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते जातक का वैवाहिक जीवन बहुत सुखमय तथा आनंदमय बन सकता है तथा यह संभावनाएं उस स्थिति में और भी बलवान हो जातीं हैं जब कुंडली में स्थित ऐसा शुभ उच्च का मंगल कुंडली में शुभ फलदायी मांगलिक योग बनाता हो। इस प्रकार का शुभ उच्च मंगल जातक को सुंदर तथा धनी पत्नी प्रदान कर सकता है तथा ऐसे शुभ प्रभाव में आने वाले जातकों को अपने जीवन में अनेक प्रकार के सुखों, सुविधाओं तथा साधनों आदि की प्राप्ति होती है जिसके चलते इन जातकों का जीवन सुविधापूर्वक तथा आनंदमय होता है। कुंडली के चौथे घर में स्थित शुभ उच्च का मंगल जातक को विभिन्न प्रकार के सुविधापूर्वक वाहन, आलीशान घर, सुख सुविधा के अन्य साधन तथा बहुत से अन्य लाभ प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक अपने व्यवसायिक जीवन में भी सफल अथवा बहुत सफल रहते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के चौथे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर सकता है तथा जातक के वैवाहिक जीवन में आने वाली मुसीबतें उस स्थिति में और भी बढ़ सकतीं हैं जब इस प्रकार का अशुभ उच्च मंगल कुंडली में मांगलिक दोष बनाता हो। इस प्रकार के मांगलिक दोष के दुष्प्रभाव में आने वाले जातक का विवाह किसी कठोर अथवा बहुत कठोर स्वभाव वाली अथवा बुरे आचरण वाली स्त्री के साथ हो सकता है जो अपने स्वभाव और आचरण के चलते जातक के वैवाहिक जीवन को बहुत कष्टमय अथवा नर्क समान बना सकती है। कुंडली के चौथे घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का दुष्प्रभाव जातक की मानसिक शांति पर अशुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते ऐसे जातक किसी न किसी प्रकार की चिंता के कारण मानसिक रूप से पीड़ित तथा अशांत ही रहते हैं। 5 कुंडली के पांचवें घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के पांचवें घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक की आर्थिक समृद्धि पर शुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक आर्थिक रूप से समृद्ध अथवा बहुत समृद्ध हो सकते हैं। इस प्रकार का शुभ प्रभाव जातक को रचनात्मक विशेषताएं भी प्रदान कर सकता है जिसके चलते ऐसे जातक रचनात्मकता से जुड़े व्यवसायिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। कुंडली के पांचवें घर में स्थित शुभ उच्च का मंगल जातक को आध्यात्म तथा परा विज्ञान जैसे क्षेत्रों के प्रति रूचि तथा इन क्षेत्रों में विकास करने की क्षमता भी प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के कुछ जातक ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, हस्त रेखा शास्त्र आदि जैसे क्षेत्रों में भी कार्यरत पाये जा सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के पांचवें घर में स्थित उच्च का मंगल अशुभ होने की स्थिति में जातक की शिक्षा पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है जिसके कारण इस प्रकार के कुछ जातक उच्च शिक्षा प्राप्त ही नहीं कर पाते जबकि इस प्रकार के कुछ अन्य जातकों की शिक्षा बहुत रुकावटों के पश्चात ही पूर्ण हो पाती है। कुंडली के पांचवें घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का प्रभाव जातक को किसी असामान्य प्रेम संबंध में पड़ने के कारण बहुत समस्याएं दे सकता है। उदाहरण के लिए इस प्रकार के कुछ जातक किसी विवाहित स्त्री के साथ प्रेम संबंध स्थापित कर सकते हैं जिसका भेद खुल जाने के कारण इन जातकों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कुंडली के पांचवें घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का प्रभाव जातक को स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से भी पीड़ित कर सकता है तथा इस प्रकार के अशुभ मंगल के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ जातकों को अपने जीवन में एक से अधिक बार शल्य चिकित्सा अर्थात सर्जरी का सामना करना पड़ सकता है। 6 कुंडली के छठे घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के छठे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक को स्वस्थ शरीर तथा लंबी आयु प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ मंगल के प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया स्वस्थ ही रहते हैं। कुंडली में उच्च मंगल का इस प्रकार का प्रभाव जातक के व्यवसायिक क्षेत्र में भी शुभ फल प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक विभिन्न व्यवसायिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। कुंडली के छठे घर में स्थित शुभ उच्च के मंगल का विशिष्ट प्रबल प्रभाव जातक को सरकार में कोई उच्च आधिकारिक पद प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के कुछ जातक राजनीति के माध्यम से भी सरकार में लाभ तथा प्रभुत्व वाला कोई पद प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के शुभ मंगल के प्रभाव में आने वाले राजनेता सामान्यता जनता के मध्य बहुत लोकप्रिय होते हैं तथा जन समुदाय के समर्थन के कारण ही ऐसे नेता सरकार में प्रभुत्व का कोई पद प्राप्त करते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के छठे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक को अपनी संपत्ति आदि से संबंधित विवादों के चलते लंबे समय तक कोर्ट केसों का सामना करना पड़ सकता है तथा इस प्रकार के अशुभ प्रभाव के कुंडली में बहुत प्रबल होने की स्थिति में जातक को न्यायालय के प्रतिकूल निर्णय के कारण संपत्ति अथवा धन की हानि भी उठानी पड़ सकती है। कुंडली के छठे घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल के प्रभाव के कारण जातक को अपने पिता के माध्यम से आने वाली अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है जिसके चलते इस प्रकार के कुछ जातकों को अपने पिता द्वारा लिया गया कर्ज चुकाना पड़ सकता है जबकि कुछ अन्य जातकों को बहुत लंबे समय तक अपने पिता के किसी रोग के उपचार के लिए बहुत धन व्यय करना पड़ सकता है जिससे इन जातकों को धन की कमी का सामना भी करना पड़ सकता है। कुंडली के छठे घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का दुष्प्रभाव जातक को किसी गंभीर रोग से पीड़ित भी कर सकता है।।
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ग्रह-दशा फल नियम (1) ग्रह कब ? कैसे ? कितना ? फल देते हैं इस बात का निर्णय दशा अन्तर्दशा से किया जाता है। (2) दशा कई प्रकार की हैं, परन्तु सब में शिरोमणि विंशोत्तरी ही है। (3) सबसे पहले कुंडली में देखिये की तीनो लग्नों ( चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, और लग्न ) में कौन- सी दो लग्नों के स्वामी अथवा तीनो ही लग्नों के स्वामी परस्पर मित्र हैं। कुंडली के शुभ अशुभ ग्रहों का निर्णय बहुमत से निश्चित लग्नों के आधार पर करना चाहिए । उदाहरण के लिए यदि लग्न कुंभ है; सूर्य धनु में चंद्र वृश्चिक में है तो ग्रहों के शुभ-अशुभ होने का निर्णय वृश्चिक अथवा धनु लग्न से किया जायेगा अर्थात गुरु, सूर्य, चंद्र और मंगल ग्रह शुभ अथवा योगकारक होंगे और शुक्र , बुध तथा शनि अनिष्ट फलदायक होंगे। (4) यदि उपर्युक्त नियमानुसार महादशा का ग्रह शुभ अथवा योगकारक बनता है तो वह शुभ फल करेगा । इसी प्रकार यदि अन्तर्दशा का ग्रह भी शुभ अथवा योगकारक बनता है तो फल और भी शुभ होगा। (5) स्मरण रहे की अन्तर्दशा के स्वामी का फल दशानाथ की अपेक्षा मुख्य है- अर्थात यदि दशानाथ शुभ ग्रह न भी हो परंतु भुक्तिनाथ शुभ है तो फल शुभ होगा। (6) यदि भुक्तिनाथ दशानाथ का मित्र हो और दशानाथ से शुभ भावों ( दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवें, दशवें और ग्यारहवें ) में स्थित हो तो और भी शुभ ही फल देगा। (7) यदि दशानाथ निज शुभ स्थान से भी अच्छे स्थान ( दूसरे, चौथे आदि ) में स्थित है तो और भी शुभ फल करेगा। (8) परंतु सबसे आवश्यक यह है की शुभ भुक्तिनाथ में अच्छा बल होना चाहिए। यदि शुभ भुक्तिनाथ केंद्र स्थान में स्थित है, उच्च राशि अथवा स्वक्षेत्र में स्थित है अथवा मित्र राशि में स्थित है और भाव मध्य में है, किसी पापी ग्रह से युक्त या दृष्ट नहीं, बल्कि शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट है, वक्री है तथा राशि के बिलकुल आदि में अथवा बिल्कुल अंत में स्थित नहीं है, नवांश में निर्बल नहीं है , तो भुक्तिनाथ जिस शुभ भाव का स्वामी है उसका उत्तम फल करेगा अन्यथा यदि ग्रह शुभ भाव का स्वामी है परंतु छठे, आठवे, बारहवें आदि नेष्ट (अशुभ) स्थानों में स्थित है, नीच अथवा शत्रु राशि का है, पापयुक्त अथवा पापदृष्ट है, राशि के आदि अथवा अंत में है, नवांश में निर्बल है, भाव संधि में है, अस्त है, अतिचारी है तो शुभ भाव का स्वामी होता हुआ भी बुरा फल करेगा। (9) जब तिन ग्रह एकत्र हों और उनमे से एक नैसर्गिक पापी तथा अन्य दो नैसर्गिक शुभ हों और यदि दशा तथा भुक्ति नैसर्गिक शुभ ग्रहों की हो तो फल पापी ग्रह का होगा। उदाहरण के लिए यदि लग्न कर्क हो , मंगल, शुक्र तथा गुरु एक स्थान में कहीं हों, दशा गुरु की भुक्ति शुक्र की हो तो फल मंगल का होगा। यह फल अच्छा होगा क्यों की मंगल कर्क लग्न वालों के लिए योगकारक होता है। (10) जब दशानाथ तथा भुक्तिनाथ एक भाव में स्थित हों तो उस भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं (11) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ एक ही भाव को देखते हों तो दृष्ट भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं। (12) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ परस्पर शत्रु हों, एक दूसरे से छठे, आठवें स्थित हों और भुक्तिनाथ लग्न से भी छठे , आठवें, बारहवें स्थित हो तो जीवन में संघर्ष, बाधायें, विरोध, शत्रुता, स्थान च्युति आदि अप्रिय घटनाएं घटती हैं। (13) लग्न से दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, ग्यारहवें तथा बारहवें भावों के स्वामी अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देते हैं यदि महादशा नाथ स्वामी इनमे से किसी भाव का स्वामी होकर इन्ही में से किसी अन्य के भाव में स्थित हो अपनी महादशा में रोग देने को उद्धत होगा ऐसा ही भुक्ति नाथ के बारे में समझना चाहिए। ऐसी दशा-अन्तर्दशा आयु के मृत्यु खंड में आये तो मृत्यु हो जाती है। (14) गुरु जब चतुर्थ तथा सप्तम अथवा सप्तम तथा दशम का स्वामी हो तो इसको केंद्राधिपत्य दोष लगता है। ऐसा गुरु यदि उपर्युक्त द्वितीय, षष्ठ आदि नेष्ट भावों में निर्बल होकर स्थित हो अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देता है। (15) राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। इनका स्वतंत्र फल नहीं है। ये ग्रह यदि द्वितीय, चतुर्थ, पंचम आदि शुभ भावों में स्थित हों और उन भावों के स्वामी भी केंद्रादि स्थिति तथा शुभ प्रभाव के कारण बलवान हों तो ये छाया ग्रह अपनी दशा भुक्ति में शुभ फल देते हैं। (16) राहु तथा केतु यदि शुभ अथवा योगकारक ग्रहों के प्रभाव में हों और वह प्रभाव उनपर चाहे युति अथवा दृष्टि द्वारा पड़ रहा हो तो छाया ग्रह अपनी दशा- अन्तर्दशा में उन शुभ अथवा योगकारक ग्रहों का फल करेंगे
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रंगों का अपना एक विशेष महत्व है। रंग व्यक्तित्व को निखारते हैं। खुशी का अहसास कराते हैं। मन की भावनाएँ भी दर्शाते हैं। कई रोग भी रंगों द्वारा ठीक किए जाते हैं जिन्हें हम कलर थैरेपी के नाम से जानते हैं। तो क्या रंग हमारे भाग्य को तय करने में भी कोई भूमिका निभाते हैं? जो लोग इस पर विश्वास करते हैं, उनका तो जवाब यही है कि हाँ! दिनों के हिसाब से रंगों का चुनाव फायदेमंद है। जानते हैं सप्ताह के दिनों के हिसाब से कौन सा रंग कौन से दिन पहना जा सकता है सोमवार- सोमवार यानी शीतल चंद्रमा का दिन। इसलिए इस दिन का रंग है सफेद । मंगलवार - यह हनुमानजी का दिन है। उनकी मूर्तियों में भगवा रंग में देखा है। इसलिए इस दिन का विशेष रंग है भगवा, जिसे अंग्रेजी में ऑरेंज कलर कहते हैं। बुधवार- तीसरा दिन होता है देवों के देव गणपति का, जिन्हें सबसे ज्यादा प्रिय है दूर्वा। इसलिए इस दिन हरे रंग का महत्व है। गुरुवार- यानी हफ्ते का चौथा दिन, जो बृहस्पति देव और साईं बाबा का है। बृहस्पति देव स्वयं पीले हैं, तो इस दिन का रंग है पीला। शुक्रवार- यह देवी माँ का दिन होता है, जो सर्वव्यापी जगतजननी हैं। इसलिए यह दिन सभी रंगों का मिक्स या प्रिंटेड कपड़ों का होता है। वैसे शुक्र ग्रह से संबंधित सफेद रंग या गुलाबी रंग का प्रयोग किस दिन किया जा सकता है शनिवार- शनि देवता को समर्पित इस दिन नीला कलर पहना जाता है। रविवार- सूर्य की उपासना के इस दिन लाल रंग ,मरून लालिमा युक्त रंग का विशेष महत्व है। कुछ रंगों से हमारा अच्छा तालमेल होता है, जो हमें 'पॉजीटिव एनर्जी' देते हैं। इसलिए कुछ खास रंग हमें ज्यादा आकर्षित करते हैं। इसे ही 'कलर साइंस' या रंग विज्ञान कहा जाता है। लेकिन ज्योतिष पर यकीन करने वाले भी दिन के लिहाज से रंगों का चयन करने लगे हैं।
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ज्योतिष की दृष्टि में राहु ********************* राहु :यह एक छाया ग्रह । गले के ऊपरी भाग पर राहु का बाकी नीचे का केतु का स्वामित्व या अधिकार है कन्या राशि :स्वराशि। मिथुन राशि में उच्च व धनु में नीच का होता है। मित्र ग्रह :शनि, बुध व शुक्र । शत्रु ग्रह :सूर्य, चंद्र, मंगल व गुरु । तामसिक ग्रह। कारक तत्वों : मतिभ्रम, छल-कपट, झूठ बोलना, चोरी, तामसिक भोजन, षड्यंत्र, छिपे शत्रु, अनैतिक कर्म, आकस्मिकता, नकारात्मक सोच, शुभ फलकारक:शनि, शुक्र ,बुध के लग्नेश होने पर मित्रता के कारण राहु शुभफल कारक शत्रु फलकारक: सूर्य, चंद्र, मंगल व चंद्रमा के लग्नेश होने के कारण कुछ अशुभ राहु की भावफलदायक : जन्मकुंडली में तृतीय, षष्ठ व एकादश भाव में राहु उत्तम फलदायक रहता है। अच्छा फलदायक : 1,लग्न, 5,पंचम,9, नवम, 10,दशम भाव में। मध्यम फलदायक :2,द्वितीय व 7, सप्तम में 4, चतुर्थ । अनिष्टकारक :8,अष्टम व12, द्वादश भाव । फलादेश के लिये : राहु मित्र ग्रह की राशि में है या शत्रु की राशि में। राहु किसी भी भाव में शत्रु राशि में हो उस भाव की हानि करेगा और यदि मित्र राशि में है तो सहायक होगा। ग्रहों से युति का फल: राहु सूर्य युति : पिता का सुख नहीं मिलेगा, या कमज़ोर होगा पुत्र सुख में भी कमी होगी, प्रसिद्धि व प्रतिष्ठा मे कमी , आत्मविश्वास मे कमी , यश मे कमी । राहु चंद्रमा युति : माता के सुख मे कमी मानसिक रूप से अशांत। एकाग्रता की कमी।. अवसाद में आना । चिंता करना । व्याकुलता व घबराहट से परेशान। राहु मंगल युति : अनिष्टकारी ,क्रोधी व अहंकारी होती है। दुर्घटना, शत्रु बाधा ,लड़ाई झगड़े । वैवाहिक जीवन में समस्याएं । राहु बुध युति : निर्णय क्षमता में कमी। शिक्षा में उतार-चढ़ाव। अगर 2 हाउस में हो तब वाणी दोष भी बनता है परिवार से दूरी बनेंगी राहु गुरु युति : गुरु चांडाल दोष बनता है । विवेक में कमी, शिक्षा में बाधा । संतान सुख में बाधायें। प्रतिभा कम होती है। उन्नति में भी बाधायें। राहु शुक्र युति : तामसिक विलासिता शराब औऱ अन्य नशे की आदत। प्रेम-विवाह, अन्तर्जातीय विवाह भी हो सकता है। राहु शनि युति : आकस्मिक लाभ भी हो सकता है। चतुराई से लाभ। पर आजीविका में कुछ संघर्ष । राहु की महादशा का फल: अनिष्टकारक होगी या शुभ कारक। ******************************* राहु अशुभ स्थिति में है तो निश्चित ही अनिष्टकारी होगा। शुभ स्थिति में होने पर उतना ही आकस्मिक लाभ करायेगा।जीवन में सभी सुख सुविधाएँ होंगी कुंडली में राहु 4,चतुर्थ, 8,अष्टम या 12,यानी द्वादश भाव में स्थित है तो राहु की दशा अशुभ फल कारक होगी। कुंडली के अकारक ग्रहों 6, षष्ठेश, 8,अष्टमेश व 12,द्वादशेश भाव के मालिकों से द्रस्तिगत या युत राहु भी अशुभ फलकारक होगा। जैसे ग्रहों के प्रभाव में होगा वैसा ही फल करेगा। कुंडली में राहु 3,तृतीय, 6षष्ठ व 11, एकादश भाव में है तो अपनी दशा में शुभकारक होगा। अगर 1,5,9,11 यानी लग्न, पंचम, नवम, दशम भाव में भी शुभ है। कुंडली के शुभकारक ग्रह1,5,9 यानी लग्नेश, पंचमेश व नवमेश से दृष्ट या युत राहु दशा में शुभ फलकारक होगा। कुंडली में राहु अशुभ स्थिति में है तो उसकी दशा में , मन में अशांति , मन चलायमान , व्यक्ति मतिभ्रम , गलत निर्णय ,कर्म तथा लक्ष्य से भटकना , बुरी आदतों का शिकार,बड़ों का कहना न मानना , लापरवाही के कारण असफलता आदि होगा । राहु शुभ स्थिति में है तो ऐसे राहु की दशा में व्यक्ति को आकस्मिक लाभ अवश्य होते हैं तथा व्यक्ति थोड़े समय में ही अप्रत्याशित उन्नति कर लेता है और सभी रूके कार्य इस समय में स्वतः ही पूरे हो जाते हैं। राहु के अनिष्ट फल से बचने के उपाय: ऊँ रां राहवे नमः का प्रतिदिन एक माला जाप करें। दुर्गा चालीसा का पाठ करें। पक्षियों को बाजरा खिलायें । धान्य का दान करते रहें। शिवलिंग को जलाभिषेक करें। र्नैत्य कोण S/ W दिशा में पीले रंग के फूल लगाना ठीक रहता है । तामसिक आहार व नशा नही करना चाहिए । पहली मुफ्त सलाह के लिए गिफ्ट कोड FS16 से मोबाइल ऐप में रजिस्टर करे , वीडियो देखे https://youtu.be/3rBsGaSvEdI योगा, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सक, ज्योतिष विद्वान, मनोवैज्ञानिक ,कानूनी सलाहकार , कैरियर सलाहकार, चार्टर्ड अकाउंटेंट, बिजनेस कंसलटेंट या अन्य कोई मानवता के काम आने वाली विशेष योग्यता रखते हैं ऐसे विद्वानों से फ्यूचर स्टडी ऑनलाइन द्वारा प्रस्तुत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विश्व के किसी भी कोने से व्यक्ति सलाह लेकर जीवन को लाभान्वित कर सकते हैं । सशुलक सलाह के लिए ऐप लिंक से डाऊनलोड करें https://play.google.com/store/apps/details?id=futurestudyonline.vedicjyotishvidyapeeth&hl=en या वेबसाइट में रजिस्टर करे। फोन द्वारा कोई भी व्यक्ति विद्वान सलाहकार से अपने लिए मार्गदर्शन ले सकता है । http://www.futurestudyonline.com जय श्री राम
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