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पंचम भाव संतान सुख का भाव

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जन्म कुंडली में पंचम भाव संतान सुख का भाव होता है। इस भाव में जितने ग्रह हों और जितने ग्रहों की दृष्टि हों उतनी संख्या में संतान प्राप्त होती है। पुरुष ग्रहों के योग और दृष्टि से पुत्र और स्त्री ग्रहों के योग और दृष्टि से कन्या की संख्या का अनुमान लगाया जाता है। गर्भाधान के लिए पंचम भाव एवं पंचमेश की शक्ति की परख या परीक्षण आवश्यक है। इसी शक्ति के आधार पर प्रजनन क्षमता का पता लगाया जाता है। पुरुष की कुण्डली के पंचम भाव से बीज एवं स्त्री की कुण्डली के पंचम भाव से क्षेत्र की क्षमता बताई जाती है। जब बीज और क्षेत्र दोनों का कमजोर सम्बन्ध बने तो सन्तान सुख की प्राप्ति कमजोर ही रहती है। इस स्थिति में अनुकूल ग्रह स्थितियां ही गर्भाधान कराती हैं बृहस्पति का लग्न में या भाग्य में या एकादश में बैठना और महादशा में चलना भी संतान उत्पति का प्रबल योग बनाता है। जब शुक्र पंचम को देख रहा हो या वह पंचमेश में हो तो इन परिस्थितियों में संतान पैदा होने की तमाम संभावनाएं जन्म लेती हैं। इस प्रकार यदि कोई जातक संतान को लेकर चिंतित है तो उसे स्वास्थ्य जांच के साथ-साथ अपनी कुंडली का अध्ययन विद्वान ज्योतिषाचार्यों से अवश्य करवाना चाहिये और जानना चाहिये कि कहीं ग्रहों की दशा प्रतिकूल तो नहीं। कहीं संतान उत्पति में देरी का कारण ग्रहों की यह प्रतिकूल दशा तो नहीं।
posted Jul 12, 2019 by Astro Bhushan Ratnakar

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पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है। पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है। सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है। पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की यदि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टि पूर्ण पंचम भाव पर पड़ रही हो तो पुत्र अवश्य होता है। पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो एवं सभी ग्रहों में बलवान हो तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है। पंचम स्थान पर स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होगी। जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान लड़की होगी। एक नियम यह भी है कि सप्तमांश कुंडली में चँद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो एवं उसके साथ जीतने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी। संतान सुख कैसे होगा, इसके लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा। पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा। पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें हो तो संतान संबंधित शुभ फल देता है। यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो तो संतान सुख नहीं होता। यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है या अलग हो जाती है। यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है। द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है। पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है। पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है। पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है। सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती। इस प्रकार तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ (राहु, शनि, केतु) के साथ हो तो संतान नहीं होती। पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो पुत्र संतान सुख नहीं होता। पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है। यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो तो चांडाल योग बनता है और संतान में बाधा डालता है यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो। यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती। नीच का राहु भी संतान नहीं देता। राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है। पंचम स्थान में पड़ा चँद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है। यदि योग लग्न में न हों तो चँद्र कुंडली देखना चाहिए। यदि चँद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें। पंचम स्थान पर राहु या केतु हो तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती। यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य ऑपरेशन द्वारा संतान देता है। पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो और शनि की दृष्टि पड़ रही हो तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है।
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पंचम भाव– जन्म कुंडली में पंचम भाव मुख्य रूप से संतान और ज्ञान का भाव होता है। ऋषि पाराशर के अनुसार इसे सीखने के भाव के तौर पर भी देखा जाता है। यह भाव किसी भी बात को ग्रहण करने की मानसिक क्षमता को दर्शाता है कि, कैसे आप आसानी से किसी विषय के बारे में जान सकते हैं। पंचम भाव गुणात्मक संभावनाओं को भी प्रकट करता है। कुंडली में पंचम भाव को निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है। सम्राट की निशानी, कर, बुद्धि, बच्चे, पुत्र, पेट, वैदिक ज्ञान, पारंपरिक कानून, पूर्व में किये गये पुण्य कर्म कुंडली में पंचम भाव से क्या देखा जाता है बुद्धिमता, लगाव, आत्मन बच्चे, प्रसिद्धि, संचित कर्म पद का बोध पंचम भाव से लगाया जाता है ज्योतिष विद्या से संबंधित पुस्तकों में पंचम भाव प्रश्नज्ञान में भट्टोत्पल कहते हैं कि मंत्रों का उच्चारण या धार्मिक भजन, आध्यात्मिक गतिविधियां, बुद्धिमता और साहित्यिक रचनाएँ पंचम भाव से प्रभावित होती हैं। पंचम भाव प्रथम संतान की उत्पत्ति, खुशियां, समाज और सामाजिक झुकाव का प्रतिनिधित्व करता है। यह भाव स्वाद और प्रशंसा, कलात्मक गुण, नाट्य रुपांतरण, मनोरंजन, हॉल और पार्टी, रोमांस, प्यार, प्रेम प्रसंग, सिनेमा, मनोरंजन का स्थान, रंगमंच आदि को दर्शाता है। यह भाव सभी प्रकार की वस्तुओं और भौतिक सुखों जैसे- खेल, ओपेरा, ड्रामा, संगीत, नृत्य और मनोरंजन को दर्शाता है। उत्तर कालामृत के अनुसार पंचम भाव कुंडली में एक महत्वपूर्ण भाव होता है क्योंकि यह उच्च नैतिक मूल्य, मैकेनिकल आर्ट, विवेक, पुण्य और पाप के बीच भेदभाव, मंत्रों के द्वारा प्रार्थना, वैदिक मंत्र और गीतों का उच्चारण, धार्मिक प्रवृत्ति, गहरी सोच, गहन शिक्षा और ज्ञान, विरासत में मिला उच्च पद, साहित्यिक रचना, त्यौहार, संतुष्टि, पैतृक संपत्ति, वेश्या के साथ संबंध और चावल से निर्मित उपहार को दर्शाता है। ऋषि पाराशर के अनुसार, पंचम भाव, दशम भाव से अष्टम पर स्थित होता है इसलिए पंचम भाव उच्च पद और प्रतिष्ठा में गिरावट को दर्शाता है। इससे पूर्व जन्म में किये जाने वाले पुण्य कर्मों का पता चलता है। यह भाव प्राणायाम, आध्यात्मिक कार्य, मंत्र-यंत्र, इष्ट देवता, शिष्य और धार्मिक कार्यक्रमों के लिए आमंत्रण को दर्शाता है। यह भाव मानसिक चेतना से आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति को प्रकट करता है। काल पुरुष कुंडली में पंचम भाव पर सिंह राशि का नियंत्रण रहता है और इसका स्वामी सूर्य है। पंचम भाव की विशेषताएँ पंचम भाव विशेष विषयों में उच्च शिक्षा, फैलोशिप, पोस्ट ग्रेजुएशन, लेखन, पढ़ना, वाद-विवाद, रिसर्च, मानसिक खोज और कौशल को दर्शाता है। इस भाव से सट्टेबाजी में होने वाले लाभ, शेयर बाजार, जुआ, मैच फिक्सिंग और लॉटरी से जुड़े मामलों को भी देखा जाता है। पंचम भाव के संबंध में जातक परिजात में उल्लेख मिलता है कि यह बुद्धिमता, पुत्र, धर्म, शासक या राजा को दर्शाता है। तीर्थयात्रा को द्वितीय, पंचम, सप्तम और एकादश भाव से देखा जाता है। पंचम भाव प्रेम-प्रसंग, किस प्रेम-प्रसंग में सफलता मिलेगी, लाइसेंस, वैध और तर्कसंगत आकर्षण, बलात्कार, अपहरण आदि को दर्शाता है। यह भाव दो लोगों के बीच शारीरिक और चुंबकीय व्यक्तित्व को आकर्षित करता है। यह भाव पेट की चर्बी और ह्रदय का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अलावा यह दायें गाल, ह्रदय का दायां भाग या दायें घुटने को भी दर्शाता है। मेदिनी ज्योतिष में पंचम भाव बुद्धिमता, संवेदना की स्थिरता, सांप्रदायिक सौहार्द, लोगों में सट्टेबाजी की प्रवृत्ति, निवेश, स्टॉक एक्सचेंज, बच्चे, आबादी, विश्वविद्यालय, लोगों के नैतिक मूल्य आदि बातों को दर्शाता है। यह भाव जन्म दर और उससे संबंधित रुचि, मनोरंजन स्थल, सिनेमा, रंगमंच, कला, स्पोर्ट्स, सभी प्रकार के मनोरंजन और खुशियों को प्रदर्शित करता है। यह भाव राजदूत, सरकार के प्रतिनिधि और विदेशों में स्थित राजनयिकों पर शासन करता है। यह मानव संसाधन मंत्रालय, शिक्षा, स्कूल, संभावनाओं पर आधारित देश की अर्थव्यवस्था, लोगों की खुशियां या दुःख, शिक्षा से संबंधित सुविधाएँ, कला और देश की कलात्मक रचना आदि का बोध कराता है। पंचम भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध पंचम भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध हो सकता है। जैसे कि पंचम भाव संतान, कला, मीडिया, सृजनात्मकता, रंगमंच प्रस्तुति, सिनेमा, मनोरंजन से संंबंधित अन्य साधन, रोमांस और अस्थाई आश्रय या निवास से संबंधित होता है। पंचम भाव चतुर्थ भाव से द्वितीय स्थान पर होता है। तृतीय भाव हमारे अहंकार, अपरिपक्व व्यवहार और सोचने-समझने की शक्ति व ज्ञान को दर्शाता है लेकिन असल में इनका निर्धारण कुंडली में पंचम भाव से होता है। पंचम भाव उन बिन्दुओं को दर्शाता है, जिनसे जीवन में आप कुछ सीखते हैं। चतुर्थ भाव शुरुआती शिक्षा का कारक होता है, यह प्राथमिक शिक्षा, निवास और भवन को दर्शाता है। पंचम भाव गणित, विज्ञान, कला आदि से संबंधित होता है। इससे तात्पर्य है कि आप किस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त करेंगे। शेयर बाजार, सट्टे से लाभ, सिनेमा, अचानक होने वाला धन लाभ और हानि कुंडली में पंचम भाव से देखा जाता है। पंचम भाव राजनीति, मंत्री, मातृ भूमि से लाभ की प्राप्ति, स्थाई और पारिवारिक संपत्ति को दर्शाता है। आपके पास कितना धन होगा यह कुंडली में चतुर्थ भाव से देखा जाता है। वहीं आपके परिवार के पास कितना धन होगा यह पंचम भाव से जाना जाता है। पंचम भाव बुद्धिमता, अहंकार और आपके बड़े भाई-बहनों की संवाद क्षमता को दर्शाता है। आपकी माता का धन और उन्हें होने वाले लाभ, बच्चों से जुड़े खर्च, आपके जीवनसाथी और भाई-बहनों की इच्छा व उन्हें प्राप्त होने वाले लाभ का बोध भी पंचम भाव से होता है। यह भाव अंतर्ज्ञान और जीवनसाथी के परिवार की छवि के प्रभाव को भी दर्शाता है। यह भाव धर्म, दर्शन, धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं का सबसे उच्च भाव है। यह दर्शाता है कि आपके पिता और गुरु से आप किस प्रकार ज्ञान प्राप्त करेंगे। ज्योतिष शास्त्र की पुस्तकों में पंचम भाव कर्म या नौकरी का अंत और शुरुआत को दर्शाता है। इसका मतलब है कि आप नौकरी खो देंगे और आपको नई नौकरी मिलेगी या जॉब के लिए नये अवसर मिलेंगे। पंचम भाव बॉस की गुप्त संपत्तियाँ, इच्छाओं का अंत, बड़े भाई-बहनों के जीवनसाथी, दादी की सेहत, मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति की राह में आने वाली कठिनाइयों को दर्शाता है।
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कुण्डली के लग्न भाव में बुध का प्रभाव लग्नस्थ बुध जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमान बनाता है. जातक स्वभाव से विनम्र, शांत धैर्यवान, उदार तथा सत्य प्रेमी होता है. लग्नस्थ बुध का जातक परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको ढालने की अद्भुद क्षमता होती है। वह परिस्थितियों का आंकलन कर उचित समय पर निर्णय ले लेता है। बुध जिस भी राशि में हो उसका गुण आत्मसात कर लेता है फलतः ऐसे जातक बहुत जल्दी दूसरों से घुल मिल जाते हैं तथा किसी भी बात को बहुत शीघ्रता से समझ लेते हैं. लग्न में बैठा बुध जातक को बुद्धिमान तथा जिज्ञासु बनाता है. ऐसा जातक गणित में कुशल होता है। लग्नस्थ बुध का जातक आत्म केन्द्रित होता है तथा तर्क सांगत दृष्टिकोण रखता है. व्यवहार से हास परिहास प्रेमी तथा वार्ता में कुशल होता है. ऐसे जातक अक्सर विवादों को बहुत कुशलता से सुलझा देते हैं. लग्नस्थ बुध जातक को गहन अध्यन में रूचि देता है. लग्नस्थ बुध के जातक के जीवन में यात्राओं का विशेष महत्व होता है. जीवन में अनेक बार वह यात्राएं करता है कभी मौज मस्ती के लिए तो कभी व्यापार के लिए। यदि लग्न में बुध हो तो कुंडली के अनेक दोषों का नाश होता है. लग्नस्थ बुध जातक को धनि , यशस्वी तथा एक प्रतिभासंपन्न विद्वान् बनाता है. लग्नस्थ बुध के जातक अधिकतर ललित कला प्रेमी होते हैं. शुभ ग्रहों की दृष्टि/ प्रभाव या युति के कारण जातक के गुणों में और अधिक वृद्धि होती है। सूर्य + बुध = व्यापार कुशल तथ कर्तव्यनिष्ठ चन्द्रमा + बुध = कमीशन के कार्यों या अनाज के थोक कार्यों से लाभ। मंगल + बुध = भवन निर्माण या मशीनरी कार्यों में दक्षता बुध + गुरू = स्वभाव में धार्मिकता और अध्यात्मिकता बुध + शुक्र = ललित कलाओं में रूचि बुध + शनि = आंकड़ो के विश्लेषण में दक्षता विषम राशि यानी (मेष , मिथुन, सिंह, तुला , धनु , कुम्भ) का बुध शुभ माना गया है ऐसा जातक पत्रकारिता, लेखन या सम्पादन के क्षेत्र में सफलता पाते हैं वहीँ सम(even) राशि ( वृषभ, कर्क, कन्या , वृश्चिक, मकर और मीन) का बुध जातक को पुत्रों का सुख एवं लाभ देता है। अग्नि तत्व राशि (मेष, सिंह, धनु ) का बुध जातक को लाभ तो देता है परन्तु भ्रष्ट और अनैतिक मार्ग द्वारा। भू तत्व राशि (वृषभ, मकर, कन्या ) का बुध जातक को अंतर्मुखी एवं एकांत प्रिय बनाता है । वायु तत्व राशि (तुला, कुम्भ, मिथुन) का बुध जातक की कल्पना शक्ति को बहुत बढ़ावा देता है तथा लेखन, अन्वेषण या शोध कार्यों में सफलता दिलाता है। जल तत्व राशी (कर्क, वृश्चिक, मीन) का बुध जातक को प्रकाशन कार्यों में सफल बनाता है।
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भाव कारक एवं विचारणीय विषय ज्योतिष शास्त्र में 12 राशियां तथा 12 भाव, 9 ग्रह, 27 +1( अभिजीत) = 28 नक्षत्र, बताए गए हैं अर्थात इन्ही भाव, राशि, ग्रह , नक्षत्र में हमारे जीवन का सम्पूर्ण सार छुपा हुआ है केवल आवश्यकता है इस बात को जानने के लिए की कौन राशि, भाव तथा ग्रह का सम्बन्ध हमारे जीवन में आने वाली घटनाओं से है यदि हम इनके सम्बन्ध को जान लेते है तो यह बता सकते है कि हमारे जीवन में कौन सी घटनाएं कब घटने वाली है। । परन्तु इसके लिए सबसे पहले हमें भाव और ग्रह के कारकत्त्व को जानना बहुत जरुरी है क्योकि ग्रह या भाव जिस विषय का कारक होता है अपनी महादशा, अंतरदशा या प्रत्यन्तर दशा में उन्ही विषयो का शुभ या अशुभ फल देने में समर्थ होता है। Importance of Houses | भाव का महत्त्व ज्योतिष जन्मकुंडली में 12 भाव होते है और सभी भाव का अपना विशेष महत्त्व है। आप इस प्रकार समझ सकते है भाव जातक की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूर्ति करता है। व्यक्ति को जो भी आवश्यकता होती है उसको पाने के लिए कोशिश करता है अब निर्भर करता है आपके उसे पाने के लिए कब, कैसे, किस समय और किस प्रकार के साधन का उपयोग किया है। क्योकि उचित समय और स्थान पर किया गया प्रयास ही इच्छापूर्ति में सहायक होता है। भाव इस प्रकार से कार्य करता है जैसे — जब भी कोई जातक यह प्रश्न करता है की मेरे जीवन में धन योग है की नहीं और है तो कब तब इसको जानने के लिए ज्योतिषाचार्य सबसे पहले निर्धारित धन भाव अर्थात 2nd भाव को देखते है तत्पश्चात उस भाव भावेश तथा भावस्थ ग्रह का विश्लेषण कर धन के सम्बन्ध में फल कथन करते है। Bhav Karak in Astrology | भाव कारक एवं विचारणीय विषय Houses Significator Planets | भाव का कारक ग्रह प्रथम भाव- सूर्य दूसरा भाव- गुरू तृतीय भाव – मंगल चतुर्थ भाव – चंद्र पंचम भाव – गुरु षष्ठ भाव – मंगल सप्तम भाव – शुक्र अष्टम भाव – शनि नवम भाव – गुरु दशम भाव – गुरु, सूर्य, बुध और शनि एकादश भाव – गुरु द्वादश भाव – शनि सभी भाव को कोई न कोई विचारणीय विषय प्रदान किया गया है जैसे प्रथम भाव को व्यक्ति का रंग रूप तो दुसरा भाव धन भाव है वही तीसरा भाव सहोदर का है इसी प्रकार सभी भाव को निश्चित विषय प्रदान किया गया है प्रस्तुत लेख में सभी भाव तथा ग्रह के कारकत्व बताने का प्रयास किया गया है। जन्मकुंडली के प्रत्येक भाव से विचारणीय विषय 1st House | प्रथम अथवा तनु भाव जन्मकुंडली में प्रथम भाव से लग्न, उदय, शरीर,स्वास्थ्य, सुख-दुख, वर्तमान काल, व्यक्तित्व, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, जाति, विवेकशीलता, आत्मप्रकाश, आकृति( रूप रंग) मस्तिष्क, उम्र पद, प्रतिष्ठा, धैर्य, विवेकशक्ति, इत्यादि का विचार करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के सम्बन्ध में यह देखना है कि उसका स्वभाव रंगरूप कैसा है तो इस प्रश्न का जबाब प्रथम भाव ही देता है। 2nd House | द्वितीय अथवा धन भाव जन्मकुंडली में दूसरा भाव धन, बैंक एकाउण्ट, वाणी, कुटुंब-परिवार, पारिवारिक, शिक्षा, संसाधन, माता से लाभ, चिट्ठी, मुख, दाहिना नेत्र, जिह्वा, दाँत इत्यादि का उत्तरदायी भाव है।यदि यह देखना है कि जातक अपने जीवन में धन कमायेगा या नहीं तो इसका उत्तर यही भाव देता है। 3rd House | तृतीय अथवा सहज भाव यह भाव जातक के लिए पराक्रम, छोटा भाई-बहन, धैर्य, लेखन कार्य, बौद्धिक विकास, दाहिना कान, हिम्मत, वीरता, भाषण एवं संप्रेषण, खेल, गला कन्धा दाहिना हाँथ, का उत्तरदायी भाव है। यदि यह देखना है कि जातक अपने भाई बहन के साथ कैसा सम्बन्ध है तो इस प्रश्न का जबाब यही भाव देता है। 4rth House | चतुर्थ अथवा कुटुंब भाव यह भाव जातक के जीवन में आने वाली सुख, भूमि, घर, संपत्ति, वाहन, जेवर, गाय-भैस, जल, शिक्षा, माता, माता का स्वास्थ्य, ह्रदय, पारिवारिक प्रेम छल, उदारता, दया, नदी, घर की सुख शांति जैसे विषयों का उत्तरदायी भाव है। यदि किसी जातक की कुंडली में यह देखना है कि जातक का घर कब बनेगा तथा घर में कितनी शांति है तो इस प्रश्न का उत्तर चतुर्थ भाव से मिलता है। 5th House | पंचम अथवा संतान भाव जन्मकुंडली में पंचम भाव से संतान सुख, बुद्धि, शिक्षा, विद्या, शेयर संगीत मंत्री, टैक्स, भविष्य ज्ञान, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्द,प्रेम, सत्कर्म, पेट,शास्त्र ज्ञान यथा वेद उपनिषद पुराण गीता, कोई नया कार्य, प्रोडक्शन, प्राण आदि का विचार करना चाहिए। यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक की पढाई या संतान सुख कैसा है तो इस प्रश्न का जबाब पंचम अर्थात संतान भाव ही देगा अन्य भाव नहीं । Bhav Karak in Astrology | भाव कारक एवं विचारणीय विषय 6th House | षष्ठ अथवा रोग भाव जन्मकुंडली में षष्ठ भाव से रोग,दुख-दर्द, घाव, रक्तस्राव, दाह, अस्त्र, सर्जरी, डिप्रेशन,शत्रु, चोर, चिंता, लड़ाई झगड़ा, केश मुक़दमा, युद्ध, दुष्ट, कर्म, पाप, भय, अपमान, नौकरी आदि का विचार करना चाहिए। यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक का स्वास्थ्य कैसा रहेगा या केश में मेरी जीत होगी या नहीं तो इस प्रश्न का जबाब षष्ठ भाव ही देगा अन्य भाव नहीं । 7th House | सप्तम अथवा विवाह भाव जन्मकुंडली में सप्तम भाव से पति-पत्नी, ह्रदय की इच्छाए ( काम वासना), मार्ग,लोक, व्यवसाय, साझेदारी में कार्य, विवाह ( Marriage) , कामेच्छा, लम्बी यात्रा आदि पर विचार किया जाता है। इस भाव को पत्नी वा पति अथवा विवाह भाव भी कहा जाता है । यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक की पत्नी वा पति कैसा होगा या साझेदारी में किया गया कार्य सफल होगा या नही का विचार करना हो तो इस प्रश्न का जबाब सप्तम भाव ही देगा अन्य भाव नहीं । 8th House | अष्टम अथवा मृत्यु भाव जन्मकुंडली में अष्टम भाव से मृत्यु, आयु, मांगल्य ( स्त्री का सौभाग्य – पति का जीवित रहना), परेशानी, मानसिक बीमारी ( Mental disease) , संकट, क्लेश, बदनामी, दास ( गुलाम), बवासीर रोग, गुप्त स्थान में रोग, गुप्त विद्या, पैतृक सम्पत्ति, धर्म में आस्था और विश्वास, गुप्त क्रियाओं, तंत्र-मन्त्र अनसुलझे विचार, चिंता आदि का विचार करना चाहिए। इस भाव को मृत्यू भकव भी कहा जाता है यदि किसी की मृत्यु का विचार करना है तो यह भाव बताने में सक्षम है। 9th House | नवम अथवा भाग्य भाव जन्मकुंडली में निर्धारित नवम भाव से हमें भाग्य, धर्म,अध्यात्म, भक्ति, आचार्य- गुरु, देवता, पूजा, विद्या, प्रवास, तीर्थयात्रा, बौद्धिक विकास, और दान इत्यादि का विचार करना चाहिए। इस स्थान को भाग्य स्थान तथा त्रिकोण भाव भी कहा जाता है। यह भाव पिता( उत्तर भारतीय ज्योतिष) का भी भाव है इसी भाव को पिता के लिए लग्न मानकर उनके जीवन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी की जाती है। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा में भाग्य का क्या रोल है क्या जितना मेहनत कर रहा हूँ उसके अनुरूप भाग्यफल भी मिलेगा । क्या मेरे तरक्की में भाग्य साथ देगा इत्यादि प्रश्नों का उत्तर इसी भाव से मिलता है। 10th House | दशम अथवा कर्म भाव जन्मकुंडली में निर्धारित दशम भाव से राज्य, मान-सम्मान, प्रसिद्धि, नेतृत्व, पिता( दक्षिण भारतीय ज्योतिष), नौकरी, संगठन, प्रशासन, जय, यश, यज्ञ, हुकूमत, गुण, आकाश, स्किल, व्यवसाय, नौकरी तथा व्यवसाय का प्रकार, इत्यादि का विचार इसी भाव से करना चाहिए। कुंडली में दशम भाव को कर्म भाव भी कहा जाता है । यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक कौन सा काम करेगा, व्यवसाय में सफलता मिलेगी या नहीं , जातक को नौकरी कब मिलेगी और मिलेगी तो स्थायी होगी या नहीं इत्यादि का विचार इसी भाव से किया जाता है। 11th House | एकादश अथवा लाभ भाव जन्मकुंडली में निर्धारित एकादश भाव से लाभ, आय, संपत्ति, सिद्धि, वैभव, ऐश्वर्य, कल्याण, बड़ा भाई-बहन,बायां कान, वाहन, इच्छा, उपलब्धि, शुभकामनाएं, धैर्य, विकास और सफलता इत्यादि पर विचार किया जाता है। यही वह भाव है जो जातक को उसकी इच्छा की पूर्ति करता है । इससे लाभ का विचार किया जाता है किसी कार्य के होने या न होने से क्या लाभ या नुकसान होगा उसका फैसला यही भाव करता है। वस्तुतः यह भाव कर्म का संचय भाव है अर्थात आप जो काम कर रहे है उसका फल कितना मिलेगा इसकी जानकारी इसी भाव से प्राप्त की जा सकती है। 12th House | द्वादश वा व्यय भाव जन्मकुंडली में निर्धारित द्वादश भाव से व्यय, हानि, रोग, दण्ड, जेल, अस्पताल, विदेश यात्रा, धैर्य, दुःख, पैर, बाया नेत्र, दरिद्रता, चुगलखोर,शय्या सुख, ध्यान और मोक्ष इत्यादि का विचार करना चाहिए । इस भाव को रिफ भाव भी कहा जाता है। जीवन पथ में आने वाली सभी प्रकार क़े नफा नुकसान का लेखा जोखा इसी भाव से जाना जाता है। यदि कोई यह जानना चाहता है कि जातक विदेश यात्रा (abroad Travel) करेगा या नहीं यदि करेगा तो कब करेगा, शय्या सुख मिलेगा या नहीं इत्यादि का विचार इसी भाव से किया जाता है।
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पत्रिका से जानें सन्तान सुख ज्योतिष शास्त्र में सन्तान सम्बन्धी विचार विशेष रूप से विचारणीय विषय है| फलित ज्योतिष की सभी विधाओं में इसका पृथक् से विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है| फलित शास्त्र की सबसे महत्त्वपूर्ण विधा जन्मपत्रिका द्वारा फलकथन में पञ्चम भाव से सन्तान विचार किया जाता है| इस भाव की सुत भाव के रूप में संज्ञा दी गई है| आज के सन्दर्भ में जब सन्तानोत्पत्ति तथा उनकी संख्याओं का विचार करते हैं, तो पूर्व शास्त्रों में कथित योग पूर्ण रूप से फलीभूत नहीं हो पाते हैं, क्योंकि इन शास्त्रों में सन्तान सम्बन्धी सभी फल उस समय के देशकाल तथा परिस्थिति के अनुसार कहे गए हैं| उस समय एक से अधिक विवाह सामान्य बात थी तथा अधिक सन्तानोत्पत्ति पर भी कोई कानून नहीं था| चूँकि सन्तान विचार मानव जीवन से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण विषय है, अत: आज के परिप्रेक्ष्य में यह विचार कैसे किया जाए? इस विषय पर मन्थन आवश्यक है| आज के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिष से सन्तान विचार में मूलभूत तथ्य तो वही रहेंगे, जो कि ज्योतिष के पुरातन ग्रन्थों में थे, लेकिन उन्हें आज के अनुसार विचार करने का माध्यम पृथक् होगा| प्राय: ज्योतिष ग्रन्थों में सन्तान विचार से सम्बन्धित योगों का निर्णय पति-पत्नी में से किसी एक की जन्मपत्रिका के आधार पर किया जाता है, लेकिन यह निर्णय कभी भी तर्कसंगत नहीं हो सकता| सन्तान विचार करते समय सर्वदा पत्नी एवं पति दोनों की ही जन्मपत्रिकाओं का अध्ययन करना चाहिए| दोनों के ही जन्मचक्रों में निम्नलिखित तथ्यों का विचार करने के पश्‍चात् ही सन्तान सम्बन्धी फल का निर्णय करना चाहिए| 1. विवाह पूर्व जन्मपत्रिका मिलान| 2. स्वयं की जन्मपत्रिका में सन्तान योग| 3. सन्तान प्राप्ति का समय| 4. गर्भाधान संस्कार का महत्त्व| विवाह पूर्व जन्मपत्रिका मिलान प्राय: विवाह से पूर्व जब वर-वधू की जन्मपत्रिका का मिलान किया जाता है, तो अष्टकूट तथा मङ्गली सम्बन्धी विचार तक ही यह अध्ययन सीमित रह जाता है| कई बार यह भी देखने में आता है कि श्रेष्ठ मेलापक विचार तथा मङ्गली विचार करने के पश्‍चात् भी विवाह के पश्‍चात् कई दम्पतियों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है, अत: उपर्युक्त विचार के साथ ही जन्मपत्रिका में वैवाहिक सुख, आयु तथा सन्तान सम्बन्धी फल का भी विचार अवश्य करना चाहिए| सन्तान सम्बन्धी विचार करते समय निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए : 1. वर एवं वधू दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चम तथा पञ्चमेश की स्थिति पर विचार करना चाहिए| 2. पञ्चम भाव में यदि बुध अथवा शनि में से कोई भी ग्रह बली होकर वर एवं वधू दोनों की जन्मपत्रिका में स्थित हो, तो सन्तान का अभाव रहता है| 3. वर एवं वधू दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चमेश पाप ग्रहों से पीड़ित हो तथा पञ्चम भाव को भी पाप ग्रह देखते हों, तो सन्तानोत्पत्ति का अभाव रह सकता है| 4. दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चम भाव में बली मङ्गल राहु अथवा केतु से युति करते हुए स्थित हो, तो भी सन्तान सम्बन्धी नकारात्मक फल प्राप्त होते हैं| 5. पञ्चम भाव में बली गुरु भाव मध्य में स्थित हो तथा किसी भी ग्रह से युति नहीं करे, तो सन्तान सम्बन्धी नकारात्मक फल प्राप्त होते हैं| 6. पञ्चम भाव में सूर्य विषम राशि में स्थित होकर बली हो तथा किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि पञ्चम भाव पर नहीं पड़ती हो, तो भी नकारात्मक फल ही प्राप्त होंगे| 7. पञ्चमेश बली हो अथवा शुभ ग्रहों के साथ त्रिकोणादि शुभ भावों में स्थित हो, तो सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी शुभ फलों की प्राप्ति होती है| 8. शुभ ग्रहों के साथ बुध पञ्चम भाव में स्थित हो, तो सरलता से सन्तान प्राप्ति होती है| 9. पञ्चम भाव में कोई ग्रह नहीं हो तथा पञ्चमेश अथवा शुभ ग्रह इस भाव को देखते हों, तो भी सन्तानोत्पत्ति में किसी प्रकार की समस्या नहीं होती है| उपर्युक्त योगों से सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी फलों को ज्ञात किया जा सकता है| यदि नकारात्मक योग वर एवं वधू दोनों की जन्मपत्रिका में उपस्थित हों, तो ऐसा विवाह सन्तानोत्पत्ति के दृष्टिकोण से अच्छा नहीं होता है| वहीं दोनों में से किसी एक की जन्मपत्रिका में सन्तान सम्बन्धी शुभ योग होने पर थोड़े प्रयास से अथवा विलम्ब से सन्तान रत्न की प्राप्ति हो जाती है| यदि दोनों की ही जन्मपत्रिका में शुभ योग उपस्थित हों, तो नाड़ी आदि दोष होने पर भी उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है| स्वयं की जन्मपत्रिका में सन्तान योग किसी भी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में पञ्चम भाव अथवा पञ्चमेश ग्रह पीड़ित होने पर सन्तानोत्पत्ति में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है| यदि अत्यधिक अशुभ योग इस भाव में बनते हों साथ ही सप्तम भाव भी बुरे योगों से पीड़ित हो, तो सन्तान का ऐसे व्यक्ति के जीवन में अभाव होता है| पञ्चम भाव से सन्तान का विचार करते समय निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए: 1. पञ्चम भाव में कौनसे ग्रह स्थित हैं? 2. यदि पञ्चमेश पञ्चम भाव में स्थित हो साथ ही वह बली भी हो तथा सप्तम भाव की स्थिति भी दृढ़ हो, तो सन्तानोत्पत्ति में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती| 3. पञ्चम भाव में पाप ग्रह स्थित होने पर भी अथवा पञ्चमेश पीड़ित होने पर भी यदि शुभ ग्रह पञ्चम भाव को देखते हों तथा सप्तम एवं सप्तमेश की स्थिति भी श्रेष्ठ हो, तो कुछ विलम्ब से सन्तान सुख की प्राप्ति हो जाती है| 4. पञ्चम भाव मध्य में बिना किसी ग्रह की युति के बली गुरु, सूर्य अथवा बुध ग्रह स्थित हों, तो वह सन्तान सुख प्राप्ति में समस्या उत्पन्न करते हैं| 5. पञ्चम भाव में स्थित किसी भी प्रकार की स्थिति वाला मङ्गल यदि राहु अथवा केतु से सम्बन्ध बनाए, तो यह सन्तान सुख में कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न करता है| ऐसे व्यक्ति को बहुत प्रयासों के पश्‍चात् ही सन्तान प्राप्त होती है| 6. किसी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में सप्तम-सप्तमेश तथा द्वितीय-द्वितीयेश की स्थिति अच्छी नहीं हो, तो पञ्चम-पञ्चमेश बली होने पर भी सन्तान प्राप्ति में कई प्रकार की समस्याएँ होती हैं| 7. पञ्चम, द्वितीय तथा सप्तम भाव पाप ग्रहों अथवा त्रिकेश ग्रहों से पीड़ित हों तथा इनके भावेशों की स्थिति भी श्रेष्ठ नहीं हो, तो कितने ही प्रयासों के बावजूद सन्तान सुख की प्राप्ति नहीं होती है| उपर्युक्त तथ्यों का विचार करने के पश्‍चात् ही सन्तान सम्बन्धी फल का विचार करना चाहिए| यदि हम बिना द्वितीय एवं सप्तम भाव की स्थिति के ही पञ्चम भाव से सन्तान का विचार करते हैं अथवा पति या पत्नी में से किसी एक की जन्मपत्रिका से सन्तान सम्बन्धी फलों का विचार करेंगे, तो ऐसे फल में कभी सटीकता नहीं होगी| सन्तान प्राप्ति का समय सन्तान सम्बन्धी योगों को जानने के पश्‍चात् सन्तान प्राप्ति का समय जानना भी महत्त्वपूर्ण है| प्राय: विवाह होने के पश्‍चात् जब सन्तान प्राप्ति के योगों को देखा जाता है, तो विंशोत्तरी दशा एवं गोचर का विचार भी पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका से करना चाहिए| पञ्चम अथवा पञ्चमेश कितने ही बली क्यों नहीं हों? यदि अशुभ गोचर अथवा दशा में सन्तानोत्पत्ति होती हो, तो उसमें कई प्रकार की समस्याएँ हो सकती हैं| वहीं जन्मपत्रिका में पञ्चम-पञ्चमेश की अशुभ स्थिति होने पर भी यदि विवाह के पश्‍चात् शुभ गोचर और दशाएँ चल रही हों, तो सन्तान प्राप्ति में समस्याएँ आने पर भी उसकी प्राप्ति अवश्य हो जाती है| पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका में यदि विवाह के पश्‍चात् केन्द्र तथा त्रिकोण भावेशों की दशा चल रही हो साथ ही गोचर में पञ्चम भाव के अन्तर्गत शुभ ग्रहों का गोचर हो रहा हो, तो सन्तान प्राप्ति में समस्याएँ नहीं होती हैं| विवाह के पश्‍चात् त्रिकेश अथवा पाप ग्रहों की दशा हो साथ ही गोचर में पञ्चम, सप्तम तथा द्वितीय भाव में अशुभ ग्रहों का गोचर हो, विशेष रूप से पञ्चम भाव में मङ्गल, शनि, सूर्य अथवा राहु-केतु में से किन्हीं दो अथवा तीन ग्रहों का गोचर हो, अथवा ये ग्रह पञ्चम भाव को देखते हों, तो कितने ही शुभ योग होने के पश्‍चात् भी सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है| उपर्युक्त सन्तान प्राप्ति के समय का विचार गर्भाधान के समय विशेष रूप से करना चाहिए| इन विचारों के साथ ही गर्भाधान संस्कार का भी विशेष महत्त्व होता है| गर्भाधान संस्कार का महत्त्व ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार का षोडश संस्कारों के अन्तर्गत उल्लेख प्राप्त होता है| इन ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार के लिए विशेष मुहूर्त का प्रावधान है तथा उसके लिए त्याज्य समय का भी उल्लेख है, जो इस प्रकार है| गर्भाधान संस्कार में गण्डान्त नक्षत्र (ज्येष्ठा, रेवती, आश्‍लेषा इन नक्षत्रों की अन्तिम दो घटी तथा मूल, अश्‍विनी एवं मघा नक्षत्र की प्रारम्भिक दो घटी), जन्म नक्षत्र भरणी, ग्रहण के दिवस, व्यतिपात-वैधृति योग, माता-पिता के श्राद्ध का दिन, जन्म राशि से अष्टम लग्न, पाप ग्रह युक्त लग्न, भद्रा, रिक्ता तिथि (4, 9, 14), सन्ध्या का समय, मङ्गल-शनिवार तथा रजोदर्शन से चार रात्रियॉं त्याज्य होती हैं, वहीं उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद तथा उत्तराफाल्गुनी, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा नक्षत्र तथा शुभ ग्रह की केन्द्र त्रिकोण में स्थिति एवं पापग्रहों की 3, 6, 11 भावों में स्थिति, सूर्य, मङ्गल तथा गुरु की लग्न पर दृष्टि तथा 6, 8, 10 आदि सम रात्रियों में गर्भाधान श्रेष्ठ होता है| उपर्युक्त सभी तथ्यों को मिलाकर गर्भाधान का मुहूर्त निकालना बहुत ही कठिन है, अत: शुभ नक्षत्र एवं लग्न का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, खासकर जन्मकालीन चन्द्र राशि से अष्टम भाव की राशि का लग्न एवं जिस लग्न से पञ्चम भाव में मङ्गल, सूर्य, शनि आदि पाप ग्रह स्थित हों, ऐसे लग्न वाले समय को त्याग देना चाहिए, शेष त्याज्य समय उतना अधिक विचारणीय नहीं है| यदि जन्मपत्रिका में अशुभ योग हों, लेकिन दम्पती सन्तान प्राप्ति के लिए गर्भाधान का ऐसे समय प्रयोग करे, जब उनके गोचर से पञ्चम भाव में शुभ ग्रह गमन कर रहे हों एवं विंशोत्तरी दशा भी श्रेष्ठ ग्रहों की हो, तो सन्तान प्राप्ति के योग निश्‍चित रूप से बन जाते हैं| ऐसी स्थिति में सिर्फ नक्षत्र एवं लग्न की शुद्धि करके भी गर्भाधान किया जाए, तो स्वस्थ एवं सुन्दर सन्तान की प्राप्ति होती है| वहीं विंशोत्तरी दशा एवं गोचर से समय अनुकूल नहीं हो, तो श्रेष्ठ गर्भाधान संस्कार का मुहूर्त भी इतना कारगर नहीं हो पाएगा| उपर्युक्त सभी तथ्यों का विचार कर सन्तान सम्बन्धी फल कथन कहा जाए, तो निश्‍चित रूप से फलादेश में सटीकता होगी| पुत्र होगा अथवा पुत्री? इसके विचार के लिए पुरुष एवं स्त्री ग्रहों की विशेष भूमिका होती है| गर्भाधान के समय यदि विंशोत्तरी दशाओं में एवं गोचर में स्त्री ग्रह बली हों साथ ही वे लग्न और पञ्चम भाव को देखते हों, तो कन्या सन्तति की प्राप्ति होती है| वहीं इस समय में पुरुष ग्रहों की दशा हो, गोचर में वे पञ्चम और लग्न भाव से सम्बन्ध बनाते हों, तो पुत्र सन्तति के योग बनते हैं| यह स्थिति भी पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका में विचारी जानी चाहिए| यदि किसी दम्पती की जन्मपत्रिका में सन्तान प्राप्ति सम्बन्धी योग बिल्कुल नहीं बनते हों, तो उन्हें तत्सम्बन्धी अशुभ ग्रह का उपाय करने के साथ ही शुभ दशाओं में, शुभ गोचर में एवं शुद्ध गर्भाधान मुहूर्त के समय गर्भाधान करने से सन्तान प्राप्ति अवश्य होती है|
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