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राहु के गुण दोष

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राहु के गुण दोष प्रायः शनि के समान ही होते हैं । शनि की भांति राहु काला , धीमी गति वाला , रोगप्रद , स्नायु रोग कारक , पृथकताजनक , लंबा , विदेश गमन , अधार्मिक मनुष्य , गंदगी , भ्रम , जादू , अंधकार प्रिय , भय ,कष्ट तथा त्रुटियों का कारक होता है । राहु अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल अचानक देता है । यह अचानक फल देने के लिए प्रसिद्ध है । राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है । बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है , जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है । इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है , जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है , हार नहीं मानता है अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है। राहु धन भाव पंचम भाव या लाभ भाव में विराजमान होकर अचानक लाभ करवाता है बशर्ते इन भावों के स्वामी बलवान हो । राहु पर यदि कुंडली के राजयोग बनाए वाले ग्रह तथा शुभ ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है तो राहु अपनी भुक्ति में उन शुभ ग्रहों के राजयोग का फल करता है । परंतु यदि अष्टमेश द्वादशेश आदि से युक्त दृष्ट हो तो धन हानि एवं दरिद्रता भी देता है । गलत तरीके से धन प्राप्त करने के लिए राहु ही प्रेरित करता है । जब राहु शनि के साथ विराजमान हो तो राहु में शनि के भी गुण समाहित हो जाते हैं जिसके कारण राहु की दृष्टि जहां पड़ती है वहां पृथकता आदि अनिष्ट फल देता है । संसार में जितने भी गलत एवं खतरनाक कार्य होते हैं जितने भी खतरनाक बीमारियां होती हैं उन सब में राहु का योगदान होता है । बिना राहु के योगदान से यह संभव नही है । राहू पर यदि शुभ प्रभाव एवं शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ जाए तो अच्छा फल भी देता है वरना समाज विरोधी और गलत कार्य करवाता है । राहु कभी भी पीड़ित नहीं होता है , बल्कि यह सभी ग्रहों को पीड़ित करता है । सूर्य सभी ग्रहों का राजा है सभी को प्रकाश देता है परंतु राहु की दृष्टि सूर्य पर पड़ जाए या राहु सूर्य के साथ बैठ जाए सूर्य भी पीड़ित हो जाता है । सूर्य पर शनि राहु की दृष्टि या युति के कारण ही पितृदोष बनता है । राहु सबसे ज्यादा पीड़ित सूर्य , चंद्रमा ,मंगल एवं गुरु को करता है । इन ग्रहों के साथ संबंध बनाकर कई प्रकार के रोग एवं परेशानी देता है । राहु किसी भी राशि का स्वामी नहीं होता है परंतु मिथुन राशि में उच्च का होता है और धनु राशि में नीच का माना जाता है । इसलिए अपने जीवन में होने वाले किसी भी कमी को पूरा करने के लिए राहु केतु को प्रबल करने के बजाय सूर्य , चंद्रमा , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , शनि इनमें से जो उस कमी वाले भाव के स्वामी हैं उन्हें प्रबल करना चाहिए । यदि राहु किसी शुभ ग्रह या किसी भाव को पीड़ित ना कर रहा हो एवं राहु पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तब बहुत अच्छे तरीके से विशेषण करने के बाद ही राहु से संबंधित रत्न धारण करना चाहिए । राहु जिन जिन ग्रहों के साथ संबंध बनाता है उन ग्रहों से संबंधित होने वाली बीमारी देता है । राहु से संबंधित बीमारी - डर , सर्पदंश , जहर फैलना , दवा से संक्रमण , पागलपन , मानसिक रोग , स्मृति नाश , दुर्घटना , शोक , आंखों के नीचे काले घेरे , नशेड़ी , मोटापा , वायु रोग , भूत , प्रेत , डायन , ऊपरी बाधा , कैंसर इत्यादि ।

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राहु के गुण दोष
posted Jul 13, 2019 by Rakesh Periwal

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केतु के गुण दोष प्रायः मंगल के समान होते हैं । केतु भी मंगल की भांति अपने युति तथा दृष्टि के प्रभाव में आने वाले पदार्थों को चोट अथवा क्षति पहुंचाता है । राहु के सामान केतु भी अचानक फल देता है । मंगल की भांति यह भी बुद्धि एवं प्रभाव में तीव्र होता है । केतु शब्द का अर्थ वेद आदि ग्रंथों में झंडे के अर्थ में आया है अर्थात ऊंचाई क, उच्चता का , महानता के प्राचुर्य का , उत्कृष्टता का प्रतीक है । अतः केतु भी अपने भीतर उत्कृष्टता आदि गुण रखता है ।
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तुलसी पौधे का नाम सुनते ही हमारे मन में पवित्र भाव आने लगते हैं। यह इस बात का संकेत है कि तुलसी का हमारे जीवन में कितना बड़ा महत्व है। तुलसी कोई आम पौधा नहीं है बल्कि यह अपने चमत्कारिक गुणों के कारण एक विशिष्ट पौधा हो जाता है। शास्त्रों में इसे माँ लक्ष्मी का रूप माना गया है। इसलिए जिस घर में तुलसी का पौधा होता है उस घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। धार्मिक महत्व के साथ-साथ तुलसी पौधे का आयुर्वेदिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व भी है। ज्योतिष शास्त्र में तुलसी के पौधे के अचूक उपाय बताए गए हैं। वहीं आयुर्वेद की दृष्टि से भी यह पौधा कई रोगों के उपचार के लिए रामबाण है और वैज्ञानिक रूप से भी इसके महत्व को कम नहीं आंका जा सकता है। तुलसी के प्रकार राम तुलसी श्याम तुलसी श्वेत/विष्णु तुलसी वन तुलसी नींबू तुलसी तुलसी का धार्मिक महत्व यह तुलसी पौधे की महानता है कि भारत वर्ष में तुलसी विवाह को धार्मिक त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह विवाहोत्सव कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) तिथि को मनाया जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु का विवाह तुलसी जी के साथ किया जाता है। यह प्रक्रिया वैवाहिक मंत्रोच्चारण के साथ होती है और भगवान विष्णु और तुलसी के ऊपर सिंदूरी रंग में रगे हुए चावल डालकर शादी को विधिपूर्वक संपन्न किया जाता है। इसके अलावा घर-घर में इस पौधे की पूजा होती है। तुलसी की आराधना मंत्र सहित करनी चाहिए। तुलसी मंत्र तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी। धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।। लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्। तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।। तुलसी पूजा के नियम सबसे पहले तुलसी को नमन करें उसके बाद तुलसी पर शुद्ध जल चढ़ाएँ अब सिंदूर और हल्दी चढ़ाएँ पूजा हेतु घी का दीया जलाएँ माँ लक्ष्मी का स्मरण कर तुलसी जी की आरती करें अंत में सुख-शांति और भाग्य की कामना करें तुलसी का ज्योतिषीय महत्व ज्योतिषीय दृष्टिकोण से तुलसी का पौधा बेहद अहम है। यह पौधा चंद्र और शुक्र ग्रह के दोषों को दूर करने में सहायक होता है। इसलिए जिस जातक की कुंडली में सूर्य और चंद्रमा की स्थिति कमज़ोर हो तो उस जातक को तुलसी की पूजा और तुलसी की माला धारण करनी चाहिए। तुलसी की आराधना करने से कुंडली में अष्टम और षष्ट भाव से संबंधित दोष दूर होते हैं और सप्तम भाव भी मजबूत होता है। यदि विवाहित जातक तुलसी की नित्य आराधना करते हैं तो उसके वैवाहिक जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और पति-पत्नी के बीच रिश्ता अटूट होता है। तुलसी का पौधा वास्तु दोषों को दूर करता है। तुलसी का आयुर्वेदिक महत्व आयुर्वेदिक औषिधि के लिए तुलसी बहुत काम आती है। यह विष और दुर्गंध नाषक औषिधि है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी तुलसी मदद करती है। यदि रोजाना तुलसी की एक पत्ती को चबाकर खाया जाए तो व्यक्ति को कफ विकार की समस्या नहीं होगी। तुलसी के पत्ते को काली मिर्च के साथ खाने से सर्दी-जुकाम तथा खांसी जैसी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। इससे स्वाइन फ्लू जैसी गंभीर बीमारी का इलाज संभव है। तुलसी का पौधा घर में नकारात्मक प्रभावों और प्रदूषण को दूर करता है। तुलसी का वैज्ञानिक महत्व विज्ञान की दृष्टि से तुलसी एक महत्वपूर्ण पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम ऑसीमम सैंक्टम है। तुलसी का पौधा वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड गैस को सोख कर ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है। इसलिए इसके आसपास का लगभग 50 मीटर का क्षेत्र पूर्ण रूप से शुद्ध रहता है। इसके साथ ही तुलसी के प्रभाव से घर में पिस्सू और मलेरिया के जीव आदि नहीं पनपते हैं। तुलसी का मुख्य गुण डी-टॉक्सिफिकेशन करना है जो शरीर में रक्त को शुद्ध करता है। सावधानियाँ वास्तु के अनुसार घर में तुलसी का पौधा ईशान कोण में लगाना चाहिए रविवार को छोड़कर स्नान के बाद प्रातः तुलसी को जल चढ़ाएँ गणेशजी, शिवजी और भैरव जी के ऊपर तुलसी के पत्ते न चढ़ाएं तुलसी के पत्ते 11 दिनों तक शुद्ध रहते हैं अतः इन पर गंगा जल छिड़कर पूजा के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है रविवार, एकादशी, द्वादशी, संक्रांति और संध्याकाल के समय तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए!
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राहु ग्रह रहस्य वैदिक ज्योतिष – ॐ राहवे नमः। अनिश्चितता के कारक राहु की प्रवृत्ति को समझना मुश्किल ही नहीं करीब करीब नामुनकिन है । इच्छाओं को अभियक्त करने वाले राहु चौंकाने वाले परिणाम देते देखे गए हैं । अमूमन इन्हें एक पापी क्रूर छाया ग्रह की तरह देखा जाता है लेकिन यह तथ्य पूर्णतया सत्य नहीं हैं । कुंडली में उचित प्रकार से स्थित राहु जातक को मात्र भक्त, शत्रुओं का पूर्णतया नाश करने वाला , बलिष्ठ , विवेकी, विद्वान , ईश्वर के प्रति समर्पित, समाज में प्रतिष्ठित व् धनवान बनाता है । वहीँ यदि राहु की स्थिति कुंडली में उचित नहीं है तो वात रोगों जैसे गैस, एसिडिटी, जोड़ों में दर्द और वात रोग से संबंधित बीमारियां देने वाला होता है। राहु की महादशा में जातक के जीवन में इतनी तेजी से और अचानक बदलाव आते हैं जिनका पूर्वानुमान लगाना सम्भव नहीं होता । कुछ भी सुव्यस्थित नहीं होरहा होता ।अतः जातक का मन परेशान रहता है । नींद गहरी नहीं आती है व् सुबह उठने पर तारो ताजा महसूस नहीं होता है । बुरी संगत , बुरे कर्मों के प्रति झुकाव बना रहता है, पैसे की तंगी बनी रहती है, व्यसनों के एडिक्ट होने की संभावना प्रबल रहती है! राहु महादशा से पूर्व यदि जातक की तैयारी ( साधना ) पूर्ण है तो राहु काल में जातक की आध्यात्मिक उन्नति में कुछ भी बाधा नहीं आ सकती और ऐसा जातक राहु महादशा को युटीलाइज़ करने में पूरी तरह सक्षम होता है । राहु ग्रह राशि, भाव और विशेषताएं -: राशि स्वामित्व : कोई नहीं दिशा : दक्षिण पश्चिम दिन : शनिवार तत्व: वायु उच्च राशि: मिथुन नीच राशि: धनु दृष्टि अपने भाव से: 7 , 5 , ९ लिंग: पुरुष नक्षत्र स्वामी : आद्रा , स्वाति तथा शतभिषा शुभ रत्न : गौमेध महादशा समय : 18 वर्ष मंत्र: ऊँ रां राहवे नम: राशि स्वामित्व : छाया गृह होने से राहु की अपनी कोई राशि नहीं होती है । वृश्चिक व् धनु राशि में राहु को नीच राशिस्थ व् वृष,मिथुन में उच्च का जाने । राहु ग्रह शुभ फल – प्रभाव कुंडली – यदि कुंडली में राहु शुभ स्थित हो तो जातक को कुशाग्र बुद्धि प्रदान करता है । ऐसे जातक कुशल , प्रोफेशनल स्नाइपर हो तो कहना ही क्या । ये बिना दुश्मन कीनजर में आये उसे खत्म करने की पूरी योग्यता रखते हैं । छाया गृह होने से फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी राहु का बलवान होना बहुत अच्छा माना जाता है । इसकेसाथ साथ राहु जातक को मात्र भक्त , शत्रुओं का पूर्णतया नाश करनेवाला , बलिष्ठ , विवेकी , विद्वान , ईश्वर के प्रति समर्पित , समाज में प्रतिष्ठित , धनवानबनाता है । अचानक लाभ करवाता है व् जुआ , सट्टे व् लाटरी से भी लाभान्वित करवाता है । राहु ग्रह अशुभ फल – प्रभाव कुंडली – यदि राहु की स्थिति कुंडली में उचित नहीं है तो मति भ्र्म की स्थिति बनती है , वात रोगों जैसे गैस, एसिडिटी, जोड़ों में दर्द और वात रोग से संबंधित बीमारियां होजाती हैं । प्रॉफेशन में दिक्कत परेशानियों का सामना करना पड़ता है । बुरी संगत , बुरे कर्मों के प्रति झुकाव बना रहता है , पैसे की तंगी बनी रहती है , व्यसनों केएडिक्ट होने की संभावना प्रबल रहती है । उचित – अनुचित का भान नहीं रहता है । परिस्थितियों से जूझने की क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है । राहु शान्ति के उपाय -रत्न लग्नकुंडली में राहु शुभ स्थित हो और बलाबल में कमजोर हो तो राहु रत्न गौमेध धारण करना उचित रहता है । गौमेध के उपरत्न तुरसा , साफी हैं । गौमेध केअभाव में उपरत्नो का उपयोग किया जा सकता है । किसी भी रत्न को धारण करने से पूर्व किसी योग्य ज्योतिषी से कुंडली का उचित निरिक्षण आवश्य करवाएं ।यदि राहु खराब स्थित हो तो शनिवार का व्रत रखें , शनिवार को चींटियों को काले तिल खिलाएं , ऊँ रां राहवे नम: का नित्य 108 बार जाप राहु की सम्पूर्णमहादशा में करें । किसी जरूरतमंद को चाय पत्ती , जूते दान करें। ये उपाय केतु की सम्पूर्ण महादशा में करते रहने से केतु के प्रकोप से आवश्य राहत मिलती है ।
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मेष लग्न-जन्म के समय यदि मेष लग्न हो तो जातक का औसत कद, सुघड़ शरीर, तीव्र स्वभाव, लालिमापूर्ण आंखें, महत्वाकांक्षी, साहसी, कमजोर टांगे, स्त्रीप्रिय, अभिमानी तथा अस्थिर धनवाला होता है। इस लग्न पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति आवेशात्मक व झगड़ालू हो जाता है। ये लोग प्राय: स्थिर स्वभाव के नहीं होते, अत: जीवन में ये बार-बार काम बदलते हैं। फिर भी इनमें वला की कार्य कुशलता तथा कभी निराश न होने का गुण होता है। इनका स्वभाव प्राय: गरम होता है तथा ये अपने ऊपर पड़ी जिम्मेदारी को जल्दी ही निबटाना पसन्द करते हैं अर्थात् काम में विलम्ब करना इनका स्वभाव नहीं होता है। ये भोजन के शौकीन होते हैं, लेकिन फिर भी कम भोजन कर पाते हैं तथा जल्दी भोजन करना इनका स्वभाव होता है। कभी कभी इनके नाखूनों में विकार देखा जाता हैं ये लोग साहसिक कामों में अपनी प्रतिभा का विस्तार कर सकते हैं। वृष लग्न-इस लग्न में जातक मध्यम शरीर, चर्बी रहित तथा शौकीन स्वभाव के होते हैं। ये प्राय: सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं। प्राय: रंग खुलता गेहुआं तथा बाल चमकदार होते हैं। इनकी जांघें मजबूत तथा इनकी चाल मस्तानी होती है। इनमें धैर्य खूब होता है, इसीलिए बहुत जल्दी ये लोग उत्तेजित नहीं होते हैं। यथासम्भव क्रोधित होने पर ये लोग खूंखार हो जाते हैं। ये लोग प्राय: प्रबल इच्छा शक्ति रखते हैं तथा जीवन में बहुत सफलता प्राप्त करते हैं। ये जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाते। ये धन कमाते हैं तथा संसार के सारे सुखों को भोगना चाहते हैं। इनके जीवन का मध्य भाग काफी सुखपूर्वक व्यतीत होता है। इनके यहां कन्या सन्तान की अधिकता होती है। मिथुन लग्न-मिथुन लग्न में उत्पन्न बालक लम्बे कद व चमकीले नेत्रों वाला होता है। इनकी भुजाएं प्राय: लम्बी देखी गयी हैं। ये लोग प्राय: खुश मिजाज व चिन्तारहित होते हैं। ये लोग प्राय: प्राचीन शास्त्रों में रुचि रखते हैं। तथा कुशल वक्ता होते हैं। अपनी बात को प्रभावी ढंग से पेश करना इनकी विशेषता होती है। इनकी नाम लम्बी व ऊंची होती है। ये लोग स्त्रियों या अपने से कम उम्र के लोगों से दोस्ती रखते हैं। इनकी एकतरफा निर्णय करने की शक्ति कुछ कम होती है। ये लोग कई व्यवसाय कर सकते हैं। स्वभावत: भावुक होते हैं तथा भावावेश में कभी अपना नुकसान सहकर भी परोपकार करते हैं। ये लोग उच्च बौद्धिक स्तर के होते हैं। तथा शीघ्र धनी बनने के चक्कर में कभी कभी सट्टा या लॉटरी का शौक पाल लेते हैं। इनकी मध्य अवस्था प्राय: संघर्षपूर्ण होती है। ये लोग कवित्व शक्ति से भी पूर्ण होते हैं। कर्क लग्न-इन लग्न के लोग छोटे कद वाले होते हैं। इनका शरीर प्राय: मोटापा लिए होता है तथा जलतत्व राशि होने के कारण जल्दी सर्दी की पकड़ में आ जाते हैं। इनके फेफड़े कमजोर होते है। इन्हें नशीले पदार्थों का शौक होता है। इनका जीवन प्राय: परिवर्तनशील होता है। पूर्वावस्था में इन्हें संघर्ष करना पड़ता है। इनकी कल्पना शक्ति अच्छी होती है तथा लेखन का इन्हें शौक होता है। आवेश इनकी कमजोरी होती है तथा जीवन में ये तेज रफ्तार से दौड़ना चाहते हैं। ये लोग प्राय: मध्यावस्था में धन व सम्मान अर्जित करते हैं तथा स्वयं को कुछ श्रेष्ठ मानते हैं। इनकी स्मरण-शक्ति भी अद्भुत देखी गई है। ये लोग प्राय: बातूनी होते हैं। यदि सप्तम स्थान पर शुभ ग्रहों का प्रभाव न हो तो इनका वैवाहिक जीवन सुखी नहीं होता। गृहस्थ जीवन से ये बहुत लगाव रखते हैं। धन जमा करना इनका स्वप्न होता है। इन्हें अच्छी चीजों का शौक होता है। इनकी विचारधारा कभी बहुत शूरतापूर्ण तथा कभी बहुत भीरू होती है। जीवन के तीसरे पहर में इन्हें विरासत में धन-सम्पत्ति भी प्राप्त होती है। सिंह लग्न-इस लग्न के जातक तीक्ष्ण स्वभाव वाले तथा क्रोधी होते हैं। इनका कद मध्यम व व्यक्तित्व रौबीला होता है, इन्हें पेट व दांत के रोग होने की सम्भावना रहती है। महत्वाकांक्षा बहुत होती है। ये लोग अपनी बात से बहुत हठी होते हैं तथा उच्चाधिकार प्राप्त होने पर ये खूब रौब जमाते हैं। इनका वैवाहिक जीवन प्राय: सुखी नहीं होता। ये लोग राजनीति में भी पड़ते हैं। ये लोग दूसरों पर अधिक विश्वास रखते हैं। प्राय: कृपालु व उदार-हृदय वाले ये लोग बहुत न्यायप्रिय होते हैं। माता के ये अधिक दुलारे होते हैं। इन्हें अभक्ष्य भक्षण का भी शौक होता है। पुत्र कम होते हैं। तथा सन्तान भी कम होती हैं। कन्या लग्न- इस लग्न के व्यक्ति प्राय: मोटे नहीं होते तथा इनकी तोंद कम निकलती है। ये लोग समय-चतुर तथा बुद्घिमान होते हैं। औपचारिक शिक्षा में इनकी6 अभिरुचि कम होती है। ये लोग दुनियादारी में काफी तेज होते हैं। ये लोग शास्त्र के अर्थ को समझने वाले, गणित प्रेमी,  चिकित्सा या ज्योतिष का शौक रखने वाले तथा गुणी होते हैं। ये लोग विवाह देर से करते हैं तथा विवाह के बाद गृहस्थी में रम जाते हैं। इनकी भौंहे आपस में मिली होती हैं। ये श्रृंगार प्रिय होते हैं। इनका झुकाव धन इकट्ठा करने की तरफ अधिक होता है। ये परिवर्तनशील स्वभाव के होते हैं। अत: ये हरफनमौला बनने का प्रयास करते हैं। यदि कमजोर लग्न हो तो भाग्यहीन होते हैं तथा बली लग्न में संघर्ष के बाद अच्छी सफलता पाते हैं। इन्हें यात्राओं का बहुत शौक होता है। इनकी अभिरुचियों में स्त्रीत्व का प्रभाव पाया जाता है। तुला लग्न-इन लग्न के लोगों का व्यक्तित्व शानदार तथा आकर्षक होता है। इनकी नाक लम्बी व रंग गोरा होता है। ये मूल रूप से बड़े धार्मिक, सत्यवादी, इन्द्रियों को वश में करने वाले तथा तीव्र बुद्घि वाले होते हैं। ये धीर गम्भीर स्वभाव रखते हैं। यदि अष्टम स्थान तथा वृहस्पति पर शुभ प्रभाव हो तो ये सांसारिक होते हुए भी मानवीय मूल्यों की मिसाल होते हैं। क्रूर प्रभाव पड़ने से प्राय: तेज, चालक व शारीरिक श्रम करने वाले हो जाते हैं। इन लोगों में वैरागय की भावना भी जाग सकती है। ये लोग प्राय: सांसारिक सम्बन्धों को अधिक विस्तार नहीं देते है तथा प्राय: अपने परिवार के विरोध का सामना करते हैं। इनकी कल्पना शक्ति व विचारों का स्तर सामान्यत: उन्नत होता है। ये लोकप्रियता प्राप्त करते हैं। कई बड़े सत्पुरुषों का जन्म तुला लग्न में हुआ है। महात्मा गांधी व विवेकानन्द तुला लग्न के व्यक्ति थे। तुला लग्न के व्यक्ति बहुत प्रेममय होते हैं। ये लोग प्राय: लेखक, उपदेशक, व्यापारी आदि भी पाए जाते हैं। वृश्चिक लग्न-इन लग्न के लोग संतुलित शरीर के होते हैं तथा इनके घुटने व पिंडलियां गोलाई लिए होती हैं। ये लोग अपनी बात पर अड़ जाते हैं, प्राय: ये बिना सोचे समझे भी बात को पकड़ कर अड़ते हैं। यद्यपि इनकी कल्पना शक्ति तीव्र होती है तथा ये बुद्धिमान भी होते हैं लेकिन अपने निकटवर्ती धोखेबाज को भी नहीं पहचान पाते। अक्सर ठगे जाने पर अक्लमंदी दिखाते हैं। इन्हें असानी से किसी तरफ भी मोड़ा जा सकता है। ये कामुक स्वभाव के होते हैं तथा अपनी स्त्री के अतिरिक्त भी अन्य स्त्रियों से शारीरिक सम्बन्ध रखते हैं। दिखने में सरल होते हैं लेकिन अनेक फलितवेत्ता इस बात से सहमत हैं। कि इनमें छिपे तौर पर पाप  vकरने की प्रवृत्ति होती है। स्वभावत: ये खर्चीले स्वभाव के होते हैं, लेकिन अधिकांश खर्च अपने आराम व शौक पर करते हैं। इनका घरेलू जीवन अक्सर अस्त व्यस्त होता है, यदि शुभ प्रभाव से युक्त लग्न हो तो इनकी रुचि गुप्त विद्याओं की तरफ हो जाती है। शुभ प्रभाव वाले लग्न में उत्पन्न होने पर ये कुशल प्रशासक भी होते हैं। धनु लग्न-ये लोग अच्छे शारीरिक गठन वाले होते हैं। शुभ प्रभाव होने पर ये लोग काफी सुन्दर होते हैं। लग्न पर बुरा प्रभाव होने पर इनके दॉत व नाक मोटे हो जाते हैं। ये परिश्रमी तथा धैर्यवान होते हैं। ये लोग जल्दी निर्णय नहीं ले पाते तथा काफी सोच विचार के उपरान्त ही कोई काम करते हैं। ये जोशीले व आलस्य रहित होते हैं अत: जीवन में ये काफी आगे बढ़ते हैं। ये लोग अक्सर सत्यवादी तथा ईमानदार होते हैं लेकिन शनि, राहु, मंगल का प्रभाव लग्न पर हो तो ये प्राय: स्वार्थी व धोखेबाज भी बन जाते हैं। तब इनकी कथनी व करनी में बहुत अन्तर होता है। प्राय: ये लोग धनी तथा भाग्यशाली होते हैं। मकर लग्न-इस लग्न के लोग लम्बे कद के निकलते हैं। इनका शारीरिक विकास धीरे-धीरे होता है। ये दिखने में कठोर व्यक्तित्व वाले होते हैं। ये लोग दूसरों की बात को बड़े ध्यान से सुनते हैं तथा सुन-सुनकर ही बहुत कुछ सीखते हैं। इनकी सहन शक्ति बहुत होती है। ये लोग हर एक बात को बड़े व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखते हैं। ये लोग धीरे-धीरे सन्तोष से अपना काम करते है। यदि लग्न पर अशुभ प्रभाव हो तो ये लोग धोखेबाज, जेब कतरे, चोर तथा दादागिरी दिखाने वाले हो जाते हैं। इसके विपरीत शुभ प्रभाव होने पर ये ईमानदार तथा कर्तव्यनिष्ठ होते हैं। ये लोग अन्धभक्ति करने वाले, स्रेह से सब कुछ न्यौछावर करने वाले तथा शक्ति से वश में न होने वाले होते हैं। ये लोग बहुत परिश्रमी होते हैं। तथा सबके प्रति बड़ा सेवा भाव रखते हैं। यदि इनके स्वाभिमान की रक्षा होती रहे तो बड़े-बड़े दान-पुण्य के महान कार्य कर देते हैं। ये अड़ियल होते हैं। तथा मुसीबत का सीना तान कर सामना करते हैं। प्राय: ये पुरानी विचार धाराओं को मानने वाले होते हैं। कुम्भ लग्न-इस लग्न के व्यक्ति पूरे लम्बे कद तथा लम्बी गरदन वाले होते हैं। ये लोग बहुत सन्तुलित स्वभाव वाले तथा एकान्त प्रिय देखे गए हैं। संघर्ष करने की इनमें क्षमता होती है। ये लोग अपने सिद्घान्त के लिए सब कुछ दांव पर लगा सकते हैं। इनका कभी कभी थोड़े समय के लिए बहुत भाग्योदय हो जाता है।  ये लोग बीस वर्ष के उपरान्त ही सफलता पाना शुरू करते हैं। इनके काम रातों रात सम्पन्न नहीं होते, अपितु मेहनत से करने पड़ते हैं। इन्हें अपनी बात समझाकर अपने ढंग से चलाना बड़ा मुश्किल कार्य होता है। लेकिन बात समझ में आने पर ये पूरी ईमानदारी व तत्परता से उसे मान लेंगे। इन्हें जीवन में प्राय: हर सिरे से असन्तोष होता है। ये लोग अपने असन्तोष को कभी कभी संघर्ष की शक्ल में या विद्रोह के रूप में प्रकट करते हैं। शारीरिक कष्ट सहने की इनमें अद्भुत क्षमता पाई जाती है। इनका विवाह थोड़ी देर से तथा अक्सर बेमेल होता है। ये लोग सबको अपने ढंग से चलाने का प्रयास करते हैं। प्राय: इनका भाग्योदय स्थायी नहीं होता है। फिर भी ये अपने क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध होते हैं। मीन लग्न-इन लग्न के व्यक्ति प्राय: नाटे देखे जाते हैं। इनका माथा औसत शरीर के अनुपात में थोड़ा बड़ा दिखता है। ये लोग जीवन में बेचैनी अनुभव करते हैं तथा कभी कभी दार्शनिकता की तरफ झुक जाते हैं। ये लोग अस्थिर स्वभाव के होते हैं। इनमें अभिनेता, कवि, चिकित्सक, अध्यापक, या संगीतकार बनने योग्य गुण होते हैं। इन्हें प्राय: पैतृक सम्पत्ति प्राप्त होती है तथा ये लोग उसे बढ़ाने की पूरी कोशिश करते हैं। भीतरी तौर पर ये लोग दब्बू तथा डरपोक होते हैं। इन्हें सन्तान अधिक होती है। तथा ये स्वभाव से उद्यमी नहीं होते हैं। इन्हें जीवन में अचानक हानि उठानी पड़ती है। यदि वृहस्पति अशुभ स्थानों में अशुभ प्रभाव में हो तो प्रारम्भिक अवस्था में इनके जीवन की सम्भावना क्षीण होती हैं। इस तरह हमने जाना कि जन्म लग्न मानव स्वभाव व उसके व्यक्तित्व की संरचना में बड़ा योगदान करता है। लग्न पर प्रभाव से उपर्युक्त गुणों में न्यूनता या अधिकता देखी जाती है। यदि लग्नेश बलवान होकर शुभ स्थानों में शुभ ग्रहों से दृष्ट या युत हो तो बहुत से दोषों को दूर कर देता है।
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कुण्डली के लग्न भाव में बुध का प्रभाव लग्नस्थ बुध जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमान बनाता है. जातक स्वभाव से विनम्र, शांत धैर्यवान, उदार तथा सत्य प्रेमी होता है. लग्नस्थ बुध का जातक परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको ढालने की अद्भुद क्षमता होती है। वह परिस्थितियों का आंकलन कर उचित समय पर निर्णय ले लेता है। बुध जिस भी राशि में हो उसका गुण आत्मसात कर लेता है फलतः ऐसे जातक बहुत जल्दी दूसरों से घुल मिल जाते हैं तथा किसी भी बात को बहुत शीघ्रता से समझ लेते हैं. लग्न में बैठा बुध जातक को बुद्धिमान तथा जिज्ञासु बनाता है. ऐसा जातक गणित में कुशल होता है। लग्नस्थ बुध का जातक आत्म केन्द्रित होता है तथा तर्क सांगत दृष्टिकोण रखता है. व्यवहार से हास परिहास प्रेमी तथा वार्ता में कुशल होता है. ऐसे जातक अक्सर विवादों को बहुत कुशलता से सुलझा देते हैं. लग्नस्थ बुध जातक को गहन अध्यन में रूचि देता है. लग्नस्थ बुध के जातक के जीवन में यात्राओं का विशेष महत्व होता है. जीवन में अनेक बार वह यात्राएं करता है कभी मौज मस्ती के लिए तो कभी व्यापार के लिए। यदि लग्न में बुध हो तो कुंडली के अनेक दोषों का नाश होता है. लग्नस्थ बुध जातक को धनि , यशस्वी तथा एक प्रतिभासंपन्न विद्वान् बनाता है. लग्नस्थ बुध के जातक अधिकतर ललित कला प्रेमी होते हैं. शुभ ग्रहों की दृष्टि/ प्रभाव या युति के कारण जातक के गुणों में और अधिक वृद्धि होती है। सूर्य + बुध = व्यापार कुशल तथ कर्तव्यनिष्ठ चन्द्रमा + बुध = कमीशन के कार्यों या अनाज के थोक कार्यों से लाभ। मंगल + बुध = भवन निर्माण या मशीनरी कार्यों में दक्षता बुध + गुरू = स्वभाव में धार्मिकता और अध्यात्मिकता बुध + शुक्र = ललित कलाओं में रूचि बुध + शनि = आंकड़ो के विश्लेषण में दक्षता विषम राशि यानी (मेष , मिथुन, सिंह, तुला , धनु , कुम्भ) का बुध शुभ माना गया है ऐसा जातक पत्रकारिता, लेखन या सम्पादन के क्षेत्र में सफलता पाते हैं वहीँ सम(even) राशि ( वृषभ, कर्क, कन्या , वृश्चिक, मकर और मीन) का बुध जातक को पुत्रों का सुख एवं लाभ देता है। अग्नि तत्व राशि (मेष, सिंह, धनु ) का बुध जातक को लाभ तो देता है परन्तु भ्रष्ट और अनैतिक मार्ग द्वारा। भू तत्व राशि (वृषभ, मकर, कन्या ) का बुध जातक को अंतर्मुखी एवं एकांत प्रिय बनाता है । वायु तत्व राशि (तुला, कुम्भ, मिथुन) का बुध जातक की कल्पना शक्ति को बहुत बढ़ावा देता है तथा लेखन, अन्वेषण या शोध कार्यों में सफलता दिलाता है। जल तत्व राशी (कर्क, वृश्चिक, मीन) का बुध जातक को प्रकाशन कार्यों में सफल बनाता है।
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