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वाणी-पर-कैसे-होता-है-ग्रहों-का-असर*:--

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*वाणी-पर-कैसे-होता-है-ग्रहों-का-असर*:-- कुंडली में द्वितीय भाव वाणी का भी होता है। आज मै आपको ये जानकारी देने जा रहा हूँ कि जब कोई ग्रह वाणी भाव में अकेला बैठा हो तो उसका वाणी पर क्या असर पडेगा। ये सिर्फ एक General Opinion है अतः यहाँ हम दृष्टि या युति का विचार नही करेगे :-- *यदि वाणी भाव( द्वितीय ) में सूर्य हो* तो जातक की वाणी तेजस्वी होगी।वाणी आदेशात्मक ज्यादा होगी।गलत बात होने पर जातक जोरदार आवाज से प्रतिक्रिया देगा। *यदि वाणी भाव में चंद्र हो* तो जातक की वाणी शालीन होगी।जातक बहुत धीरे और कम शब्दों में अपनी राय रखेगा।जातक की मधुर वाणी की दुनिया कायल होगी।जातक बात रखने से पहले आज्ञा माँगेगा। *यदि वाणी भाव में मंगल हो* तो जातक की वाणी उग्र और तेज होगी। जातक की बात पड़ोसियों के कानों तक पहुँचेगा ।गुस्सा आने पर जातक गाली-गलौच में भी संकोच नही करेगा।जातक चिल्लाने और शोर मचाने में माहिर होगा। *यदि वाणी भाव में बुध हो* तो जातक बेवजह बातूनी होगा।मुफ्त की राय देना जातक का शौक होगा।चूंकि अकेला बैठा बुध कभी शुभकर्तरी में नही होता,यदि बुध पापकर्तरी में हुआ तो जातक चुगलखोर होगा। *यदि वाणी भाव में गुरु है* तो जातक की वाणी सकारात्मक होगी जातक उपदेशक की तरह अपनी बात को विस्तारपूर्वक कहता है जैसे -“मतलब/अर्थात/Means” ये उसकी बातों में ज्यादा उपयोग होता है। जातक पुरुष से तीव्र और स्त्रियों से मधुर वाणी में बात करने वाला होता है। *यदि वाणी भाव में शुक्र हो* तो जातक की वाणी अत्यंत विनम्र होगी।जातक कवि,गायक भी हो/बन सकता है।वाणी में प्यार और आनंद की मिठास होगी।जातक की बातें रोमांटिक होती है। *यदि वाणी भाव में शनि हुआ* तो जातक की वाणी बहुत संतुलित और संयमित होगी। शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन बहुत कम या ना के बराबर करेगा ।जातक हमेशा “शासन कर रही सरकार” का वाणी से विरोध करेगा। *यदि वाणी भाव में राहू हुआ* तो जातक गप्पें मारने वाला,बेवजह बहस करने वाला होगा।जातक के मुँह से हमेशा गाली/अपशब्द निकलेगें । वाणी नकारात्मक होगी।सीटी बजाना जातक का शौक हो सकता है। *यदि वाणी भाव में केतु हो* तो जातक मुँहफट होगा।यदि केतु शुभकर्तरी में हो तो जातक जो भी कहेगा उसकी 70% बातें/भविष्यवाणी सही होगीं..और यदि केतु पापकर्तरी में हो तो जातक हमेशा “हाय देने वाला” और “कडवी जुबान” बोलेगा, साथ ही उसकी बातें 70% तक सच साबित होगीं ।

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वाणी-पर-कैसे-होता-है-ग्रहों-का-असर*:--
posted Jul 20 by Rakesh Periwal

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तत्वों के अनुसार राशियों का वर्गीकरण तत्वों के आधार पर सभी बारह राशियों को चार भागों में बाँटा गया है. 

यह चार तत्व अग्नि,पृथ्वी, वायु तथा जल है. जो राशि जिस तत्व में आती है उसका स्वभाव भी उस तत्व के गुण धर्म के अनुसार हो जाता है. उदाहरण के लिए किसी जातक की राशि जलतत्व है तब उसके स्वभाव में जल के गुण पाएं जाएंगे जैसे कि वह स्वभाव से लचीला हो सकता है और परिस्थिति अनुसार अपने को ढालने में सक्षम भी हो सकता है. जल की तरह नरम होगा तथा भावनाएँ भी कूट-कूटकर भरी होगी इसलिए शीघ्र भावनाओं में बहने वाला होगा.    इसी तरह से अन्य राशियों के गुण भी उनके तत्वानुसार होगें. आइए जानने का प्रयास करते हैं।   

अग्नि तत्व  मेष, सिंह व धनु राशियां इस वर्ग में आती हैं. अग्नि तत्व वाले जातक दृढ़ इच्छा शक्ति वाले, कर्मशील और गतिशील रहते हैं. अग्नि के समान ज्वाला भी इनमें देखी जा सकती है और हर कार्य में अत्यधिक जल्दबाज भी होते हैं. 

पृथ्वी तत्व  वृष, कन्या व मकर राशियां इस वर्ग में आती हैं.व्यक्ति पृथ्वी के समान ही सहनशील होता है,मेहनती होता है, जमीन से जुड़ा होता है,धैर्य भी बहुत रहता है, संतोषी होता है तथा व्यवहारिक भी होता है. सांसारिक सुख चाहता है लेकिन समस्याओं के प्रति उदासीन रहता है. 

वायु तत्व  मिथुन, तुला तथा कुंभ राशियाँ इस वर्ग में आती हैं. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस राशि का व्यक्ति वायु की तरह हवा में बहुत बहता है अर्थात अत्यधिक विचारशील होता है, सोचना अधिक लेकिन करना कम. कल्पनाशील बहुत होता है लेकिन इन्हें बुद्धिमान भी कहा जाएगा. अनुशानप्रिय होने के साथ विचारों को हवा बहुत देते है. मन के घोड़े दौड़ाते ही रहते हैं. 

जलतत्व  कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियाँ इस वर्ग में आती हैं. यह अत्यधिक भावुक तथा संवेदनाओं से भरे हुए रहते हैं. शीघ्र ही बातों में आने वाले होते हैं और खुद भी बातूनी होते हैं. स्वभाव से लचीले होते हैं और जिसने जो कहा वही ठीक है, अपने विचार इसी कारण ठोस आधार नहीं रखते हैं. मित्र प्रेमी होते हैं और स्वाभिमान भी इनमें देखा जा सकता है. 

स्वभाव के अनुसार राशियों का वर्गीकरण राशियों के स्वभावानुसार इन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा गया है. 

चर, स्थिर तथा द्विस्वभाव राशि. हर श्रेणी में चार-चार राशियाँ आती है और इन श्रेणियों के अनुसार ही इनका स्वभाव भी होता है. आइए इसे भी समझने का प्रयास करते हैं. चर राशि 

 मेष, कर्क, तुला व मकर राशियाँ इस श्रेणी में आती है. जैसा नाम है वैसा ही इन राशियों का काम भी है. चर मतलब चलायमान तो इस राशि के जातक कभी टिककर नहीं बैठ सकते हैं. हर समय कुछ ना कुछ करते रहना इनकी फितरत में देखा गया है. व्यक्ति में आलस नहीं होता है, क्रियाशील रहता है.गतिशील व क्रियाशील इनका मुख्य गुण होता है. ये परिवर्तन पसंद करते हैं और एक स्थान पर टिककर नहीं रह पाते हैं. ये तपाक से निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं. 

स्थिर राशि  वृष, सिंह, वृश्चिक व कुंभ राशियाँ इस श्रेणी में आती हैं. इनमें आलस का भाव देखा गया है इसलिए अपने स्थान से ये आसानी से हटते नहीं हैं. इन्हें बार-बार परिवर्तन पसंद नहीं होता है. धैर्यवान होते हैं और यथास्थिति में ही रहना चाहते हैं. इनमें जिद्दीपन भी देखा गया है. कोई भी काम जल्दबाजी में नहीं करते और बहुत ही विचारने के बाद महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं.   

द्विस्वभाव राशि  मिथुन, कन्या, धनु व मीन राशियाँ इस श्रेणी में आती है. इन राशियों में चर तथा स्थिर दोनों ही राशियों के गुण देखे जा सकते हैं. इनमें अस्थिरता रहती है और शीघ्र निर्णय लेने का अभाव रहता है. इनमें अकसर नकारात्मकता अधिक देखी जाती है.

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ग्रहो के कमजोर होने पर जीवन पर होने वाले प्रभाव*** : सूर्य सबसे पहले बात करते हैं सूर्य ग्रह की। सामाजिक अपयश, पिता के साथ कलह या वैचारिक मतभेद, आंख, हृदय या पेट का कोई रोग होना इस बात को दर्शाता है कि जातक की कुंडली में सूर्य अशुभ स्थिति में है। जीवन में असंतुष्ट रहना और मुंह में कमजोर चंद्रमा घर में पानी के नल्कों या कुंओं का सूख जाना, पालतू दुधारू पशु की मृत्यु हो जाना, माता को कष्ट होना, मन में बार-बार आत्महत्या करने के विचारों का जन्म लेना भी कमजोर चंद्रमा की ओर इशारा करता है। मंगल आए दिन कोई ना कोई दुर्घटना होना, घर के बिजली के समान जल्दी खराब हो जाना, विशेषकर जिस कमरे में व्यक्ति रहता है वहां मौजूद बिजली के उपकरणों का कम समय में ही खराब हो जाना, मंगल दोष की वजह से होता है। मंगल के दोषी होने पर रक्त समस्या, भाई से विवाद और अत्याधिक क्रोध जैसी स्थिति जन्म लेती है। बुध ज्योतिष विद्या में बुध को व्यापार और स्वास्थ्य का कारक बताया गया है। जिस व्यक्ति की कुंडली में बुध अशुभ या कमजोर स्थिति में होता है उस व्यक्ति के दांत कमजोर रहते हैं। उसकी सूंघने की शक्ति कम हो जाती है और एक समय के बाद उसे गुप्त रोग होने की संभावना भी प्रबल हो जाती है। बृहस्पति अगर किसी विद्यार्थी को पढ़ाई में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, किसी के असमय बाल झड़ने शुरू हो गए हैं, अपमान का शिकार होना पड़ रहा है, व्यापार की स्थिति बदतर होती जा रही है, घर में कलह का माहौल बन गया है तो निश्चित तौर पर यह कमजोर बृहस्पति की ओर इशारा करता है। शुक्र ज्योतिष के अनुसार शुक्र ग्रह मौज-मस्ती, भोग-विलास और आलीशान जीवन व्यतीत करवाता है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र सही नहीं है तो उस व्यक्ति के मन में भटकाव अवश्य रहेगा। वह अपने हाथ से धन का नाश करता है, उसे चर्म रोग और स्वप्न दोष होने की संभावना रहती है। शनि शनि धीमी गति का ग्रह है, अगर किसी की कुंडली में शनि पीड़ित या कमजोर होता है तो उस व्यक्ति का हर कार्य बहुत आराम से होता है। अगर आपके मकान का कोई हिस्सा गिर गया है या टूट गया है तो यह कमजोर शनि की ओर इशारा करता है। वाहन से दुर्घटना या धड़ के निचले हिस्से, विषेकर जांघों के हिस्से में परेशानी कमजोर शनि की वजह से होती है। राहु शक, संदेह, मानसिक परेशानियां, आपसी तालमेल में रुकावट, बात-बात पर क्रोधित हो जाना, गुस्से एमं अपशब्द या गाली-गलौज करना, ये सब राहु के परिणाम हैं। कुंडली में राहु के अशुभ होने से हाथ के नाखून टूटने लगते हैं और पेट से संबंधित परेशानियां लग जाती हैं वाहन से दुर्घटना, मस्तिष्क की पीड़ा, दिमागी संतुलन बिगड़ जाना, भोजन या किसी खाद्य पदार्थ में अकसर बाल दिखना, सामाजिक मानहानि होना, ये सभी राहु ग्रह के दुष्प्रभाव हैं। केतु जब किसी व्यक्ति की कुंडली में केतु अशुभ फलदायी होता है तो उसे आर्थिक नुकसान के साथ-साथ चर्म रोग भी हो सकता है। वह व्यक्ति खुद अपने लिए ही गलत धारण बना लेता है जो उसे नुकसान पहुंचाती है।
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कौन सा ग्रह सबसे बलशाली है कुंडली मे मुख्य ग्रह की बहुत ही विशेषता है। अगर कुंडली मे मुख्य ग्रह मजबूत है तो आपको दूसरें ग्रहों के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है। मुख्य ग्रह के मजबुत होने पर आपकी सारी समस्याओं का हल हो जाता है। प्रत्येक कुण्डली में एक विशेष ग्रह होता है, जो कुण्डली का प्राण होता है। इस ग्रह के कमजोर होने पर व्यक्ति कों सफलता नहीं मिलती है, अगर मिलती भी है तो बड़ी मुशकीलों का सामना करना पड़ता है। ये आपको लग्न के अनुसार बताया जा रहा है :- (1) मेष लग्न :- इस लग्न का मुख्य ग्रह सूर्य है। इस लग्न में सूर्य चमत्कारी परिणाम देता है। अगर कुण्डली में सूर्य मजबुत हो तो हर तरह की सफलता पाई जा स्कती है। सूर्य मजबुत होने पर स्वास्थ हमेशा अच्छा बना रहता है। (2) वृष लग्न :– इस ग्रह का मुख्य ग्रह शनि है। इस लग्न में शनि सबकुछ होता है। अगर शनि मजबुत हो तो सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है। इस लग्न में शनि धन , सेहत , वैभव , और रिशतों का वरदान् देता है। अगर शनि मजबुत हो तो कोई भी बीमारी बड़ा रुप धारण नहीं कर सकती है। (3) मिथुन लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह बुध होता है। इस लग्न का स्वामी भी बुध होता है। बुध आर्थिक– मजबुती देता है और व्यक्ति की सोच कों बेहतर रखता है। अगर बुध कमजोर हो तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ! व्यक्ति ठीक समय पर निर्णय नहीं लें पाता है और ज़िन्दगी ढह जाती है और कोई भी सफलता नहीं मिलती है। (4) कर्क लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह मंगल है। कर्क लग्न सबसे बड़ा राजसी लग्न होता है। इस लग्न में सबसे बड़ी शक्ती मंगल के पास होती है। अगर मंगल मजबुत हो तो सफलता मिलती रहती है।दुर्घटना और सेहत की समस्या से बचाव होता है ! व्यक्ति कों कम प्रयास में ही सफलता मिलती है ! इस लग्न में अगर मंगल– अच्छा ना हो तो व्यक्ति का विकास नहीं होता है। (5) सिहृं लग्न :– इस लग्न में दो मुख्य ग्रह होतें है मंगल और गुरू। इस लग्न की ताकत दोनों ग्रहों में विभाजित हो जाती है ! अगर दोनों ग्रह अच्छें हो तो जीवन में आने वालें उतार – चढ़ावं से बचें रहेंगे। मंगल और गुरू के मजबुत होने पर जीवन में संघर्ष कम हो जाता है ! मजबुत होने पर व्यक्ति की ताकत और प्रभाव कों बड़ाता है। (6) कन्या लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह शुक्र है। शुक्र इस लग्न में सबसे ज्यादा बेहतर परिणांम देता है। शुक्र के मजबुत होने पर वैभव एवं रिश्तों का वरदान मिलता है ,अगर शुक्र अच्छा हो तो ग्लैमर मिलता है और सुख सफलतां मिलती है। (7) तुला लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह शनि होता है। अगर शनि मजबुत हो तो व्यक्ति अपुर्व सफलता प्राप्तं करता है। जीवंन में किसी भी चीज का अभाव नहीं रहता है। शनि के मजबुत होने पर व्यक्ति समाज में विशिष्ठ स्थान पाता है। (8) वृशिचक लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह गुरू है। गुरु के मजबुत होने पर धन ,मान ,स्वास्थ ,संतान और ज्ञान का वरदान मिलता है ! गुरू के कमजोर होने पर सफलता नहीं मिलती है। (9) धनु लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह मंगल है। इस लग्न में सारी शक्ति मंगल के पास होती है। मंगल मजबुत होने पर जीवंन् में संघर्ष कम हो जाता है। मुकदमों और विवादों से छुटकारा मिलता है। धनु लग्न .में शनि का दुष्प्रभाव जल्दी हो जाता है ! मंगल मजबुत होनें पर ये शनि के दुष्प्रभाव से बचाता है। (10) मकर लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह शुक्र है। शुक्र मजबुत होने पर विद्या ,बुद्धि ,धन का लाभ देता है। ये करियर का लाभ देता है। मजबुत होने पर स्वास्थ और संतान की समस्या से बचाव करता है। इस लग्न वालों कों शराब और नशें से परहेज करना चाहिऐं ! (11) कुम्भ लग्न :– इस लग्न में मुख्य दो ग्रह होतें है बुध और शुक्र। शुक्र ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ! अगर शुक्र माइंड रीडर अच्छा हो तो नाम ,यश , ग्लैमर मिलता है ! व्यक्ति करियर की उचाईयों कों छुता है ! शुक्र हर तरह की मानसिक समस्याओं से छुटकारा दिलता है। (12) मीन लग्न :– इस लग्न का मुख्य ग्रह चन्द्र होता माइंड रीडर है। इस लग्न की सारी ताकत चन्द्र के पास होती है ! चन्द्र मजबुत होने पर व्यक्ति ज्ञानी ,शानदार और सफल होता है ! चन्द्र अच्छा करियर देता है ! चन्द्र मजबुत होने पर अच्छी संपति का वरदान भी मिलता है |
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पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है। पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है। सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है। पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की यदि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टि पूर्ण पंचम भाव पर पड़ रही हो तो पुत्र अवश्य होता है। पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो एवं सभी ग्रहों में बलवान हो तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है। पंचम स्थान पर स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होगी। जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान लड़की होगी। एक नियम यह भी है कि सप्तमांश कुंडली में चँद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो एवं उसके साथ जीतने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी। संतान सुख कैसे होगा, इसके लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा। पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा। पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें हो तो संतान संबंधित शुभ फल देता है। यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो तो संतान सुख नहीं होता। यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है या अलग हो जाती है। यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है। द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है। पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है। पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है। पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है। सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती। इस प्रकार तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ (राहु, शनि, केतु) के साथ हो तो संतान नहीं होती। पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो पुत्र संतान सुख नहीं होता। पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है। यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो तो चांडाल योग बनता है और संतान में बाधा डालता है यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो। यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती। नीच का राहु भी संतान नहीं देता। राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है। पंचम स्थान में पड़ा चँद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है। यदि योग लग्न में न हों तो चँद्र कुंडली देखना चाहिए। यदि चँद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें। पंचम स्थान पर राहु या केतु हो तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती। यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य ऑपरेशन द्वारा संतान देता है। पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो और शनि की दृष्टि पड़ रही हो तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है।
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