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ज्योतिष के अनुसार जाने आपको किस क्षेत्र में मिलेगी नौकरी ?

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हम सब जानते हैं की ज्योतिष शास्त्र में कई तरह की बाते बताई जाती है। लेकिन इसमें एक मुख्य विषय है कुंडली। जन्म कुंडली और ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर चलता है और भविष्य बताने की ताकत रखता है। इसे सही सही जानने वाले कम ही लोग है, मगर जो इसके रहस्यों को जनता है, वह किसी का भी भविष्य बता सकता है। किस क्षेत्र में शिक्षा या प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद आपको अच्छी नौकरी और जीवन में सफलता मिलेगी इस बारे में ज्योतिष कैसे काम करता है खुद जान लीजिये। जन्म कुंडली में चन्द्रमा जल तत्व की राशि में हो कर पाप ग्रहों शनिं, राहु, केतु, सूर्य या मंगल से दृष्ट हो तथा बलवान गुरु दशम या लग्न को प्रभावित करें तो व्यक्ति चिकित्‍सक बन सकता है। चन्द्रमा और शुक्र या चन्द्रमा और बुध यदि मिलकर लग्न को देखें तो व्यक्ति के चिेकित्सा जगत में सफल होने की प्रबल संभावना है। बलवान मंगल और राहु भी व्यक्ति को चिकित्सक बनाता है। कुंडली में शुक्र और चन्द्रमा शुभ ग्रहों की राशि में हो कर पंचम भाव में हों तो व्यक्ति कला विषयों से प्रेरित रहता है। कुंडली में तीसरे और दसवें भाव का सम्बन्ध शुभ ग्रहों से बन जाये तो संगीत, कला , मनोरंजन, एक्टिंग आदि के क्षेत्र में व्यक्ति का कैरियरबनता है! कुंडली में बलवान शनि, मंगल, सूर्य या राहु-केतु का संबंध पंचम और दशम भाव से बन जाये तो व्यक्ति इंजीनियरिंग बन सकता है। केतु, बुध और मंगल का पंचम भाव से सम्बन्ध होने पर कंप्यूटर, सूचना तकनीक, दूरसंचार, इलेक्ट्रॉनिक आदि क्षेत्रों में व्यक्ति सही काम कर पाता है। कुंडली में सूर्य और मंगल का संबंध लग्न, तीसरे, छठे या दशम भाव से है तो व्यक्ति पुलिस, अर्धसैनिक बल, सेना, खेल-कूद आदि के क्षेत्रों के लिए सही है। कुंडली में मंगल, गुरु और शनि का संबंध पांचवें, छठे, नवम और दशम भाव से बनते हों तो व्यक्ति वकील बन सकता हैं। इस योग में यदि गुरु विशेष बलवान हों तो व्यक्ति जज भी बन सकता है। यदि किसी कुंडली में बलवान गुरु और बुध का संबंध यदि पांचवें, तीसरे और दसवें भाव से है तो व्यक्तिि लेखक बन सकता है। शुक्र और चन्द्रमा विशेष बलवान होकर जन्म लग्न या कारकांश लग्न से दशम भाव को देखें तो व्यक्तिर टीवी पत्रकार या एंकर बन सकता है।

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Job and astrology
posted Jul 21, 2019 by Deepika Maheshwary

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आप को किस क्षेत्र मे मिलेगी सफलता -

जन्मांग चक्र का दशम भाव कर्म भाव कहा जाता है। इसके स्वामी को दशमेश या कर्मेश कहा गया है। दशम भाव से व्यक्ति की आजीविका का विचार किया जाता है। अर्थात् व्यक्ति सरकारी नौकरी करेगा अथवा प्राइवेट, या व्यापार करेगा तो कौन सा, उसे किस क्षेत्र में अधिक सफलता मिलेगी। आज अधिकांश लोग अपनी आजीविका से संतुष्ट नहीं हैं, उनका कार्य क्षेत्र या कर्म का प्रकार उनके मन के अनुकूल नहीं है। अब प्रश्न उठता है कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनोनुकूल कार्य कौन सा हो सकता है, उसका निर्धारण कैसे हो? मन का स्वामी चंद्र जिस राशि में हो उस राशि से स्वामी ग्रह की प्रकृति के आधार पर या चंद्र से उसके युति अथवा दृष्टि संबंध के आधार पर यदि कोई व्यक्ति अपनी आजीविका (व्यापार नौकरी) का चयन करता है अथवा कार्यरत है तो वह कैरियर उसके मन पसंद का होगा।

जन्मकुंडली में कोई ग्रह जब लग्नेश, पंचमेश या नवमेश होकर दशम भाव में स्थित हो, या दशमेश होकर किसी भी त्रिकोण (1, 5, 9 भावों) में, या अपने ही स्थान में स्थित हो तो व्यक्ति की आजीविका के पर्याप्त साधन होते हैं। वह व्यवसाय या नौकरी में अच्छी प्रगति करता है। दशमेश या दशम भावस्थ ग्रह का बल और शुभता दोनों उसके शुभफलों में द्विगुणित वृद्धि करते हैं। भाव 3, 6, 8, 11 या 12 का स्वामी अशुभ भावेश होने पर पापी हो जाता है। जिस जातक की जन्मकुंडली में अशुभ (पापी) ग्रह दशम भाव में हों, तो उसकी आजीविका का सत्यानाश कर देते हैं। दशमेश का उनसे युति या दृष्टि संबंध भी खतरनाक होता है। ऐसे जातक व्यापार में असफल होते हैं तथा उन्हें कोई सरकारी नौकरी भी नहीं मिलती है। दशमेश यदि नीच, शत्रुगृही या अस्त होकर त्रिक भाव (6, 8, 12) में हो या त्रिषडाय (भाव 3, 6, 11 का स्वामी) यदि दशम में स्थित हो तो व्यक्ति को आजीविका का कोई साधन नहीं मिलता है और अपने पिता की पद प्रतिष्ठा को धूमिल करता है। यदि लग्नेश और दशमेश एक साथ हों तो जातक नौकरी में विशेष प्रगति करता है। दशमेश केंद्र या त्रिकोण में हो तो जातक शासकीय अधिकारी होता है, किंतु इस हेतु दशमेश का उच्च राशिस्थ होना आवश्यक है और उसे अस्त नहीं होना चाहिए। गुरु दशमेश होकर यदि त्रिकोण (1, 5, 9) में हो तो जातक निश्चय ही उच्चपद प्रतिष्ठित होकर सांसारिक सुखों का भोक्ता और यशस्वी होता है। लग्न से दशम भाव में सूर्य हो तो पिता से धन मिलता है। चंद्र हो तो माता से, मंगल हो तो शत्रु से, बुध हो तो मित्र से, गुरु हो तो भाई से, शुक्र हो तो स्त्री से और यदि राहु या केतु हो तो जातक छल प्रपंच केद्वारा धन प्राप्त करता है। दशम भावस्थ राशि विवेक - दशम भाव में जो राशि हो या दशमेश जिस राशि का हो। उस राशि के स्वामी के अनुसार भी दैवज्ञ को मोटे तौर पर आजीविका का विवेचन करना चाहिए।

#मेषः यदि दशम भाव में मेष राशि हो तो जातक को जीवन निर्वाह हेतु एक से अधिक कार्य करने पड़ते हैं। इसमें कृषि संबंधित कार्य से लेकर एजेंसी आदि कार्य शामिल हैं। मेष राशि का चंद्र ऑटोमोबाइल उद्योग में प्रवेश करता है। मेष राशि में मंगल या बुध मेकैनिकल इन्जीनियर बनाता है।

#वृषः वाहन, पशु-पक्षी या वनों और कृषि से संबंधित कार्य करने वाला ऐसा जातक एकाउंटिंग का कार्य करने वाला होता है। मिथुन: दशमेश हो तो व्यक्ति प्रोफेसर या लेक्चरर बनकर धन अर्जित करता है। बुध बैंकर भी बनाता है। विज्ञापन से संबंधित व्यवसाय करता है।

#कर्कः चांदी के आभूषणों का व्यवसायी होता है और रसायन शास्त्र, जीवविज्ञान व धार्मिक कार्यों में उसकी रुचि होती है।

#सिंहः दशम भाव में सिंह राशि वाले जातक को जीविका हेतु कठोर परिश्रम करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति रत्न, सोने, पीतल, कांसे या कृषि उत्पाद का व्यवसाय करता है।

#कन्याः दशम भावस्थ कन्या राशि वाला जातक वास्तुशिल्पी, ट्रांसपोर्टर लेखक या चित्रकार होता है। किंतु अपने कत्र्तव्य के प्रति उदासीन रहता है, नौकरी गंभीरता से नहीं करता।

#तुलाः व्यापार में तीव्रता से उन्नति की ओर अग्रसर होता है। वित्तीय सलाहकार, दुकानदारी आदि में भी सफल रहता है। तुला राशि का दशमस्थ बुध और राहु जातक को वैज्ञानिक बनाता है। वहीं शनि कानूनी पेशे से जोड़ता है।

#वृश्चिकः नौकरी में जातक कठोर परिश्रम के उपरांत प्रगति करता है। ऐसा जातक जलसेवा, जलविद्युत, खेतीबाड़ी से जीवन यापन करता है।

#धनुः दशम स्थान में धनु राशि होने से जातक सचिव, क्लर्क या कोटपाल के पद पर कार्य कर सकता है। उसे नौकरी में परेशानी एवं विरोधी वातावरण का सामना करना पड़ता है।

#मकरः जिस जातक के जन्मांग के दशम भाव में मकर राशि होती है, वह समय के अनुकूल सेवा कार्य करने में समर्थ होता है।

#कुंभः ट्रांसपोर्टर, पल्लेदार आदि कार्यों से धनार्जान करता है। राजनीति में प्रवीण, विरोधियों को अपने वश में रखने वाला और उनसे इच्छानुसार कार्य कराने वाला होता है।

#मीनः दशम भावस्थ मीन राशि का जातक अपने नीतियुक्त कार्यों से नौकरी में विशेष प्रगति करता है। पेट्रोल, पानी आदि के कार्यों में सफल और रसायन, जीवविज्ञान आदि विषयों में उसकी विशेष रुचि होती है।

#सारावली के अनुसार लग्न या चंद्र में जो बलवान हो उससे दशम राशि, दशम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टियोग के अनुसार मनुष्य की आजीविका का विचार किया जाता है। दशमेश के बली होने से जीविका की वृद्धि और निर्बल होने पर हानि होती है। लग्न से द्वितीय और एकादश भाव में बली एवं शुभ ग्रह हो तो जातक व्यापार से अधिक धन कमाता है। धनेश और लाभेश का परस्पर संबंध धनयोग का निर्माण करता है। दशम भाव का कारक यदि उसी भाव में स्थित हो अथवा दशम भाव को देख रहा हो तो जातक को आजीविका का कोई न कोई साधन अवश्य मिल जाता है। सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं। दशम भाव में केवल शुभ ग्रह हों तो अमल कीर्ति नामक योग होता है, किंतु उसके अशुभ भावेश न होने तथा अपनी नीच राशि में न होने की स्थिति में ही इस योग का फल मिलेगा। बलवान चंद्र से दशम भाव में गुरु हो तो गजकेसरी नामक योग होता है, किंतु गुरु कर्क या धनु राशि का होना चाहिए। ऐसा जातक यशस्वी, परोपकारी धर्मात्मा, मेधावी, गुणवान और राजपूज्य होता है।

यदि जन्म लग्न, सूर्य और दशम भाव बलवान हो तथा पाप प्रभाव में न हो तो जातक शाही कार्यों से धन कमाता है और यशस्वी होता है। दशम भावस्थ नवग्रह फल - सूर्यः दसवें भाव में स्थित वृश्चिक राशि का सूर्य चिकित्सा अधिकारी बनाता है। मेष, कर्क, सिंह या धनु राशि का सूर्य सेना, पुलिस या आवकारी अधिकारी बनाता है। चंद्रः शुभ प्रभाव में बली चंद्र यदि दशमस्थ हो तो धनी कुल की स्त्रियों से लाभ होता है। यदि ऐसा व्यक्ति दैनिक उपयोग में आनेवाली वस्तुओं का व्यापार करे तो लाभप्रद होता है। चंद्र से मंगल या शनि की युति विफलता का सूचक है। मंगलः मेष, सिंह, वृश्चिक या धनु राशि का मंगल जातक/जातका को प्राइवेट चिकित्सक और सर्जन बनाता है। ऐसे डाक्टरों को मान-सम्मान और धन की प्राप्ति होती है। मंगल का सूर्य से संबंध हो तो व्यक्ति सुनार या लोहार का काम करता है। बुधः लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश या दशमेश होकर कन्या या सिंह राशि का बुध गुरु से दृष्ट या युत हो तो व्यक्ति प्रोफेसर या लेक्चरर बनकर धन अर्जित करता है। बुध बैंकर भी बनाता है। बुध शुक्र के साथ या शुक्र की राशि में हो तो जातक फिल्म या विज्ञापन से संबंधित व्यवसाय करता है। गुरुः गुरु का संबंध जब नवमेश से हो तो व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धन अर्जित करता है। गुरु मंगल के प्रभाव में हो तो जातक फौजदारी वकील बनता है। बलवान और राजयोगकारक हो तो जातक न्यायाधीश बना देता है। शुक्रः जातक सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, फैंसी वस्तुओं आदि का निर्माता/विक्रेता होता है। शुक्र का संबंध द्वितीयेश, पंचमेश या बुध से हो तो गायन-वादन के क्षेत्र में सफलता मिलती है। शनिः शनि का संबंध यदि भाव या चतुर्थेश से हो तो जातक लोहे, कोयले मिट्टी के तेल आदि के व्यापार से धन कमाता है। बलवान शनि का मंगल से संबंध हो तो जातक इलेक्ट्रीक/ इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर होता है। यदि बुध से संबंध हो तो मेकैनिकल इंजीनियर होता है। शनि का राहु से संबंध हो तो व्यक्ति चप्पल, जूते, रेक्सिन बैग, टायर-ट्यूब आदि के व्यापार में सफल होता है। राहुः दशम भाव में मिथुन राशि का राहु राजनीति के क्षेत्र में सफलता दिलाता है। ऐसा जातक सेना, पुलिस, रेलवे में या राजनेता के घर नौकरी करता है। केतुः धनु या मीन राशि का दशमस्थ केतु व्यापार में सफलता, वैभव, धन और यश का सूचक है। ऊपर वर्णित बिंदुओं के आधार पर अपने अनुकूल आजीविका का निर्णय करें। शुभ/ योगकारक ग्रहों की महादशा में उनसे या जिन ग्रहों से उनका संबंध हो उनसे संबंधित व्यवसाय करने पर अच्छा लाभ होता है। आजीविका हेतु अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंत्र, यंत्र, रत्न, दान और पूजा अर्चना आदि समय-समय पर करते रहना चाहिए।

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ज्योतिष अनुसार द्वादश भावो से संबंधित जानकारी : #पहला_भाव : दुनिया में सब से पहली घटना व्यक्ति का जन्म है, इस लिए जन्म के समय से जो चीज़े व्यक्ति के पास होती है जन्म कुण्डली का पहला भाव उन से संबंधित होता है जैसे कि आत्मा, जाति, आचरण, कर्म, शरीर का सुख, बुद्धि, अहंकार #द्वितीय_भाव : जन्म के बाद शिशु को वस्त्र में लपेटा जाता है, उसको भोजन दिया जाता है, उस के बाकी रिश्ते जुड़ने शुरू होते हैं , उसकी इच्छायें शुरू होती हैं, बोलचाल शुरू होती है । इस लिए द्वितीय भाव से इनका सुख देखा जाता है जैसे कि परिवार, वाणी, वस्त्र, धन, घर परिवार से मिलने वाला धन संपदा और संस्कार । #तृतीय_भाव : परिवार, वस्त्र और आय की प्राप्ति के बाद इनका दिखावा शुरू होता है यानी दुनिया में खुद को एक दूसरे से बड़ा दिखाने की दौड़ शुरू होती है इसी को पराकर्म स्थान कहा जाता है , और फिर वैसे ही मित्रो की प्राप्ति होती है । इस लिए तृतीय भाव से इनके सुख देखे जाते हैं जैसे कि साहस और पराकर्म, रोज़ के मिलने वाले मित्र , आस पड़ोस, रोजाना की भाग दौड़ जैसे कि यात्राएं, छोटे भाई बहन, बाजुयो की ताकत और कला । #चतुर्थ_भाव : जातक का जितना पराकर्म होता है जैसी उसकी संगत होती है वैसी ही उसकी बुद्धि होती है फिर वही शुरुआती रुझान आदतें बन जाती हैं और वैसी ही चीज़े वह धारण करता है, वैसा ही रहन सहन, वैसा ही घर और वैसे ही खान पान की आदतें , और फिर वही आदतें कैरियर का निर्धारण करती हैं । इस लिए चतुर्थ भाव से यही सब सुख देखे जाते हैं जैसे कि ज़मीन, वाहन, शिक्षा, माता के सुख, मानसिक रूप से मजबूती । #पंचम_भाव : जातक जैसा खुद के घर परिवार के रिवाज़ों को आगे बढ़ाता है, जितनी उच्च और अच्छे स्तर की शिक्षा प्राप्त करता है , उतनी ही उस में कला और गुणों का विकास होता है जो उसको सामाजिक प्रतिष्ठा देती है । इसी लिए पंचम भाव से इन सब विषयो का विचार किया जाता है जैसे कि खुद से कुछ भी बनाना, संतान को अच्छी शिक्षा देना, खुद से प्राप्त की गई शिक्षा को समाज में बांटना जिस से दूसरों को भी सुख मिले, दूसरों से प्रेम करना । #छठा_भाव : जब जातक खुद की कला और गुण समाज को दिखाता है सम्मान की प्राप्ति करता है तो उस से जलने वाले लोगो की संख्या भी बढ़ने लगती है , फिर वही लोग शत्रु बन जाते हैं और कार्यो में बाधा देते हैं इस तरह जातक के लिए संघर्ष की शुरुआत होती है । इस लिए छठे भाव से इन विषयों का विचार किया जाता है जैसे कि शरीर का वह हिस्सा जो आपकी कमज़ोरी है इस लिए शारीरिक रोग का विचार इस भाव में आने वाली राशि से किया जाता है, रोज़ के दैनिक संघर्ष जैसे कि जिम, योगा का विचार इस भाव से किया जाता है, आमने सामने की शत्रुता जैसे कि कोर्ट कचहरी की लड़ाई झगड़े इन में होने वाली हानि और लाभ का विचार भी इसी भाव से किया जाता है । #सप्तम_भाव : तो जब आप संघर्ष में होते हैं शत्रु से लड़ रहे होते हैं भाग दौड़ कर रहे होते हैं तो आपके अपने आपके साथ होते हैं एक तरह का यह public support यही सप्तम भाव से संबंधित है । विपरीत लिंगी का विचार ( पुरूष के लिए स्त्री और स्त्री के लिए पुरूष ) इसका विचार इसी भाव से किया जाता है । इसी लिए सप्तम भाव से इन विषयों का विचार किया जाता है जैसे कि प्रेमी / प्रेमिका, जीवनसाथी, व्यवसायक साँझीदार , किसी भी तरह का public support । #अष्टम_भाव : जब प्रेम संबंध बनते हैं , रिश्ते जुड़ते हैं , support मिलता है लोग करीब आते हैं तो धोखा देने वाले लोग भी इन्ही में शामिल होते हैं , रिश्तो में झगड़े होते हैं, अपने रूठते हैं , तकरार होती है जिस से अवसाद होता है, मरने का मन करता है । इसी लिए इन सब विषयो का विचार अष्टम भाव से किया जाता है, जैसे कि दुसरों से मिलने वाले धोखे, सदमें , शरीर के वह हिस्से जो जीवन भर परेशानी देते हैं , खास कर हार्मोन्स से संबंधित परेशानी , चोट और दुर्घटना , चरित्र पर लांछन के चलते नोकरी से या किसी विशेष अहुदे से बर्खास्त हो जाना । #नवम_भाव : तो जब हमारी गलतियों के चलते लोग हम से रिश्ते तोड़ देते हैं फिर हम उसका पश्चाताप करते हैं , धर्मस्थल जाते हैं प्रार्थना करते हैं दुआएं करते हैं , दुनियादारी और समाज के कानून को समझ कर फिर से कुछ नया सीख कर जीवन की नई शुरुआत करते हैं । तो इन सब विषयो का विचार नवम भाव से किया जाता है जैसे कि कानून और देश का संविधान, घर के बड़े, धर्मस्थल, लंबी दूरी की यात्राएं और लंबे समय के लिए किए गए वायदे , खुद के गुणों का प्रदर्शन । #दसम_भाव : तो जब हम नया सीख कर खुद में सुधार करके आते हैं तो फिर से हमें दुनियादारी में अपनी जगह बनाने के अवसर मिलने लगते हैं, लोग हमारी गलतियों को भूल कर हमारी नई पहचान से हमे जानने लगते हैं, हर कोई अपने अपने कर्म और आजीविका के अनुसार काम के लगते हैं जैसे कि कोई अस्पताल में काम करता है कोई स्कूल / कालेज में , कोई भोजन पदार्थो से जुड़े कार्य करने लगता है तो कोई वस्त्रो से जुड़े कार्य । #एकादश_भाव : तो जब हम धन और आजीविका की दौड़ में किसी ना किसी कार्य से जुड़ते हैं , भाग्य और मेहनत दोनो के दम पर उच्च पदों से भी कुछ को नवाजा जाता है, जैसे कि कोई तरक्की करते हुए लीडर बनते हैं, संस्थाओं के प्रमुख कार्यकर्ता और प्रधान बनते हैं, छोटे से होटलों से वह 3 और 5 स्टार होटल बनते हैं, कुछ ऑटो सेक्टर में होते हुए यूनियन प्रधान बनते हैं , कुछ प्रेजिडेंट बनते हैं , कुछ सीइओ बनते हैं । इस लिए एकादश भाव का संबंध इन्ही सब विषयो से होता है, मेहनत और भाग्य के दम पर जातक अपने अपने उच्च मुकामो को प्राप्त करते हैं , बड़े भाई बहनों , बड़े अधिकारी लोगो का सानिध्य , बड़े बड़े होटल और बड़ी बड़ी संस्थाओं में आना जाना इसी भाव से देखा जाता है । #द्वादश_भाव : तो जब जातक ने वह उच्च मुकाम हासिल कर लिया, ग्रहस्थ को भोग लिया तब उस के मन में धन दौलत आगे बच्चों को देते हुए खुद मोक्ष प्राप्ति की इच्छा करता है , जो कि जन्म कुण्डली का आखरी भाव यानी द्वादश भाव है । इस तरह जन्म कुण्डली के द्वादश भाव का संबंध इन विषयों से संबंधित होता है जैसे कि बाहरी स्थान , बाहरी लोक जिस में आत्मा शरीर का त्याग कर पृथ्वी लोक से गमन करती है कर्मो के अनुसार आगे की यात्रा के लिए , इसी तरह इस भाव से विदेश यात्रा का विचार भी किया जाता है, बाहरी शक्तियों से बातचीत जैसे कि एलियन से संपर्क , या किसी शक्ति की साधना उनके दर्शन और आशीर्वाद , निद्रा का सुख विचार इस भाव से किये जाते हैं Astrology can Help you as navigation for future path of life. 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हिन्दू धर्म में शुभ-अशुभ का बड़ा महत्व होता हैं। हिन्दू धर्म में किसी भी कार्य को करने से पहले उसका शुभ मूर्हत देखा जाता हैं, ताकि उस काम में सफलता प्राप्त हो। हिन्दू धर्म में सप्ताह के हर वार का अपना महत्व होते हैं। सप्ताह के हर दिन से सम्बंधित कई कार्य हैं जिनमें से कुछ उस दिन के लिए निषेध हैं तो कुछ उस वार के लिए शुभ। आज हम आपको बताने जा रहे हैं वार के अनुसार किये जाने वाले काम जो उस दिन किये जाने चाहिए। तो आइये जानते हैं कौनसे दिन क्या काम करना शुभ। * रविवार : यह सूर्य देव का वार माना गया है। इस दिन नवीन गृह प्रवेश और सरकारी कार्य करना चाहिए। विज्ञान, इंजीनियरिंग, सेना, उद्योग बिजली, मैडिकल एवं प्रशासनिक शिक्षा उत्तम, नवीन वस्त्र धारण, सोने और तांबे की वस्तुओं के नवीन आभूषण धारण करने शुभ होते हैं। * सोमवार : सोमवार के दिन आप कृषि संबंधी कोई भी नया कार्य प्रारंभ करें, फलित ही होगा। कृषि संबंधी कार्य जैसे कि खेती यंत्र खरीदी, बीज बोना, बगीचा, फल के वृक्ष लगाना, आदि इस दिन करें। इसके अलावा वस्त्र तथा रत्न धारण करना, औसत क्रय-विक्रय, भ्रमण-यात्रा, कला कार्य, स्त्री प्रसंग, नवीन कार्य, अलंकार धारण करना, पशुपालन, वस्त्र आभूषण का क्रय-विक्रय हेतु इस दिन शुभ होता है। * मंगलवार : मंगल देव के इस दिन विवाद एवं मुकद्दमे से संबंधित कार्य करने चाहिए। बिजली से संबंधित कार्य, सर्जरी की शिक्षा, शस्त्र विद्या सीखना, अग्नि स्पोर्टस, भूगर्भ विज्ञान, दंत चिकित्सा, मुकदमा दायर करना शुभ है। लेकिन इस दिन भूल कर भी किसी से उधार न लें। * बुधवार : यदि आप किसी को ऋण दे रहे हैं, तो बुधवार को दें। इस दिन दिया हुआ ऋण आपके पास जल्दी वापस आ जाता है। इसके अलावा शिक्षा-दीक्षा विषयक कार्य, विद्यारंभ अध्ययन, सेवावृत्ति, बहीखाता, हिसाब विचार, शिल्पकार्य, निर्माण कार्य, नोटिस देना, गृहप्रवेश, राजनीति विचार शुभ है। * गुरुवार : यूं तो यह दिन सबसे अधिक शुभ माना जाता है, लेकिन इस दिन आप ऐसे कौन से कार्य करें कि वह सफल हों यह जान लीजिए। इस दिन ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा, धर्म संबंधी कार्य, अनुष्ठान, विज्ञान, कानूनी कार्य, नई शिक्षा आरंभ करना, गृह शांति, मांगलिक कार्य, आदि शुभ कार्य साथ ही सफल होते हैं। * शुक्रवार : शुक्र ग्रह से प्रभावित होता है यह दिन। इस दिन सांसारिक कार्य, गुप्त विचार गोष्ठी, प्रेम व्यवहार, मित्रता, वस्त्र, मणिरत्न धारण तथा निर्माण, अर्क, इत्र, नाटक, छायाचित्र फिल्म, संगीत आदि कार्य शुभ भण्डार भरना, खेती करना, हल प्रवाह, धान्या रोपण, आयु ज्ञान शिक्षा शुभ है। * शनिवार : मकान बनाना, गृह प्रवेश, ऑपरेशन, तकनीकी शिल्प कला, मशीनरी संबंधित ज्ञान, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी का ज्ञान सीखना, तेल लगाना विशेष शुभ, मुकदमा दायर करना शुभ है।
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