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नवग्रह और पितृ दोष की शांति करना है तो जपें ये चमत्का‍री मंत्र, खास बातें

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नवग्रह और पितृ दोष की शांति करना है तो जपें ये चमत्का‍री मंत्र, खास बातें 1. जन्म कुंडली में पितृ दोष हो तो उसकी शांति के लिए श्रीकृष्ण-मुखामृत गीता का पाठ करना चाहिए। 2. प्रेत शांति व पितृ दोष निवारण के लिए भी श्रीकृष्ण चरित्र की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ पौराणिक विद्वान ब्राह्मणों से करवाना चाहिए। 3. ग्रह शांति व सभी ग्रहों द्वारा किए जा रहे सर्वविध उपद्रव शमनार्थ 'नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र की 1008 आहुतियां देनी चाहिए। 4. 'नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र प्राय: सभी ग्रहों की शांति के लिए उपयोग में लाया जाता है। 5. शारीरिक ऊर्जा, मानसिक शांति व आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन प्रात: या सायं 16 बार निम्न मंत्र का जप करना चाहिए। 6. भगवान श्रीकृष्ण का मूलमंत्र, जिसे द्वादशाक्षर मंत्र कहते हैं- 'नमो भगवते वासुदेवाय।
posted Jul 31, 2019 by Deepak Dhiman

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वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में कबूतर का घोंसला अस्थिरता के हालात पैदा करता है और साथ ही निर्धनता को भी आमंत्रण देता है। अगर आपके घर में ऐसा कुछ है तो जल्द से जल्द इसे हटाने का प्रयास करें। घर में मकड़ी क जाल बुनना दुर्भाग्य की निशानी है। इसे जल्द से जल्द हटवाएं और आगे से ऐसा ना हो इसके लिए घर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। घर में टूटा हुआ शीशा ना सिर्फ वास्तु के नियमों के विरुद्ध है बल्कि ये पूरे प्रभाव के साथ नकारात्मक ऊर्जा को प्रवेश करने के लिए रास्ता भी देता है। चमगादड़ का दिखना बहुत अशुभ माना जाता है। अगर घर में यह प्रवेश कर जाए तो यह दुर्भाग्य, निर्धनता के साथ-साथ बुरे स्वास्थ्य का भी परिचायक है।
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जन्मपत्रिका के 12 भावों में छुपे हैं कई राज, हर भाव की है खास बात। अज्ञानता से भय, भय से भ्रांति, भ्रांति से भूल, भूल से गलत परिणाम और गलत परिणाम से असफलता और असफलता से दु:ख अर्थात अगर देखा जाए तो दु:ख का सबसे बड़ा कारण जो है, वो है अज्ञानता और इसको दूर करने तथा सही ज्ञान का मार्ग दिखने का काम एक ज्योतिष करता है। सही ज्ञान देने के लिए कई मार्ग हैं, जैसे- न्यूमरोलोजी (अंक-विज्ञान), सामुद्रिक शास्त्र (हस्त-रेखा) टैरो कार्ड, वास्तु और कुंडली। कुंडली यानी जन्मपत्रिका से भविष्यवाणी करना सबसे पुरातन और सटीक विज्ञान माना जाता है। जातक की कुंडली उसकी जन्मतिथि, समय, स्थान के आधार पर बनाई जाती है। यद्यपि कई कारणों से जन्म समय में संशोधन की आवश्यकता हो जाती है। इसीलिए हर ज्ञानी ज्योतिष को यह मालूम होता है कि संशोधन कैसे किया जाता है। भविष्यवाणी करने से पहले एक योग्य ज्योतिषी को जांच कर लेना चाहिए कि जातक की कुंडली सही है की नहीं। जांच करने से पहले जातक के जीवन और गोचर की मुख्य घटनाओं का मिलान कर लेना चाहिए। यदि मिलान सही हो तो कुंडली सही है और नहीं तो कुंडली में जन्म समय संशोधन की आवश्यकता है। ज्योतिष में मान्य बारह राशियों के आधार पर जन्मकुंडली में बारह भावों की रचना की गई है। प्रत्येक भाव में मनुष्य जीवन की विविध अव्यवस्थाओं, विविध घटनाओं को दर्शाता है। 1. प्रथम भाव : यह लग्न भी कहलाता है। इस स्थान से व्यक्ति की शरीर यष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है। 2. द्वितीय भाव : इसे धन भाव भी कहते हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, परिवार का सुख, घर की स्थिति, दाईं आंख, वाणी, जीभ, खाना-पीना, प्रारंभिक शिक्षा, संपत्ति आदि के बारे में जाना जाता है। 3. तृतीय भाव : इसे पराक्रम का सहज भाव भी कहते हैं। इससे जातक के बल, छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, पराक्रम, धैर्य, कंठ-फेफड़े, श्रवण स्थान, कंधे-हाथ आदि का विचार किया जाता है। 4. चतुर्थ स्थान : इसे मातृ स्थान भी कहते हैं। इससे मातृसुख, गृह सौख्‍य, वाहन सौख्‍य, बाग-बगीचा, जमीन-जायदाद, मित्र, छाती-पेट के रोग, मानसिक स्थिति आदि का विचार किया जाता है। 5. पंचम भाव : इसे सुत भाव भी कहते हैं। इससे संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यश, नौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है। 6. छठा भाव : इसे शत्रु या रोग स्थान भी कहते हैं। इससे जातक के श‍त्रु, रोग, भय, तनाव, कलह, मुकदमे, मामा-मौसी का सुख, नौकर-चाकर, जननांगों के रोग आदि का विचार किया जाता है। 7. सातवां भाव : विवाह सौख्य, शैय्या सुख, जीवनसाथी का स्वभाव, व्यापार, पार्टनरशिप, दूर के प्रवास योग, कोर्ट कचहरी प्रकरण में यश-अपयश आदि का ज्ञान इस भाव से होता है। इसे विवाह स्थान कहते हैं। 8. आठवां भाव : इस भाव को मृत्यु स्थान कहते हैं। इससे आयु निर्धारण, दु:ख, आर्थिक स्थिति, मानसिक क्लेश, जननांगों के विकार, अचानक आने वाले संकटों का पता चलता है। 9. नवां भाव : इसे भाग्य स्थान कहते हैं। यह भाव आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताता है। 10. दसवां भाव : इसे कर्म स्थान कहते हैं। इससे पद-प्रतिष्ठा, बॉस, सामाजिक सम्मान, कार्य क्षमता, पितृ सुख, नौकरी व्यवसाय, शासन से लाभ, घुटनों का दर्द, सासु मां आदि के बारे में पता चलता है। 11. ग्यारहवां भाव : इसे लाभ भाव कहते हैं। इससे मित्र, बहू-जंवाई, भेंट-उपहार, लाभ, आय के तरीके, पिंडली के बारे में जाना जाता है। 12. बारहवां भाव : इसे व्यय स्थान भी कहते हैं। इससे कर्ज, नुकसान, परदेश गमन, संन्यास, अनैतिक आचरण, व्यसन, गुप्त शत्रु, शैय्या सुख, आत्महत्या, जेल यात्रा, मुकदमेबाजी का विचार किया जाता है। किसी घटना के फलित होने या घटित होने के लिए हमें घटना के फलित होने का एक ही संगत घर नहीं देखना चाहिए अपितु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभाव डालने वाले सभी घरों का अध्ययन भी करना चाहिए। किसी घटना की भविष्यवाणी करते समय अन्य घरों के प्रभाव भी विचारणीय हैं।
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होली का त्‍योहार बुराई पर अच्‍छाई की जीत का प्रतीक है. होली में जितना महत्‍व रंगों का है उतना ही महत्‍व होलिका दहन का भी है. रंग वाली होली से एक दिन पहले होली जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहते हैं. होलिका दहन की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं. सूखी टहनियां, लकड़ी और सूखे पत्ते इकट्ठा कर उन्‍हें एक सार्वजनिक और खुले स्‍थान पर रखा जाता है,पूर्णिमा की तिथि पर सूर्य अस्त होने के बाद प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन की अग्नि को पवित्र माना जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत की अग्नि होती है। कुछ लोग इस अग्नि में नई फसल को भूनकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और भगवान की पूजा की जाती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहे। इस शुभ दिन पर कुछ लोग भगवान के प्रति आस्था मजबूत करने के लिए व्रत भी रखते हैं और कथा पढ़ते हैं।होलिका दहन के साथ ही बुराइयों को भी अग्नि में जलाकर खत्‍म करने की कामना की जाती है.   होलिका दहन कब है? हिन्‍दू पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात्रि ही होलिका दहन किया जाता है. यानी कि रंग वाली होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है. इस बार होलिका दहन 9 मार्च को किया जाएगा, जबकि रंगों वाली होली 10 मार्च को है. होलिका दहन के बाद से ही मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं. मान्‍यता है कि होली से आठ दिन पहले तक भक्त प्रह्लाद को अनेक यातनाएं दी गई थीं. इस काल को होलाष्टक कहा जाता है. होलाष्टक में मांगलिक कार्य नहीं होते हैं. कहते हैं कि होलिका दहन के साथ ही सारी नकारात्‍मक ऊर्जा समाप्‍त हो जाती है. होलिका दहन का शुभ मुहूर्त  जानते हैं कि होलिका दहन का शुभ मुहूर्त क्या है और इस मौके शुभ मुहूर्त देखने के लिए दो बातों को ध्यान रखा जाता है.  पहला, उस दिन “भद्रा” न हो। दूसरा, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए। इस बार 9 मार्च 2020 सोमवार को होलिका दहन के समय भद्राकाल की बाधा नहीं रहेगी। फाल्गुन माह की पूर्णिमा यानी होलिका दहन के दिन भद्राकाल सुबह सूर्योदय से शुरू होकर दोपहर करीब डेढ़ बजे ही खत्म हो जाएगा।  इसलिए शाम को प्रदोषकाल में होलिका दहन के समय भद्राकाल नहीं होने से होलिका दहन शुभ फल देने वाला रहेगा। जिससे रोग, शोक और दोष दूर होंगे।9 मार्च 2020 को सुबह 3 बजकर 3 मिनट से पूर्णिमा तिथि शुरू हो जाएगी 9 मार्च को सोमवार है और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र है वहीं पूर्णिमा तिथि सोमवार को होने से चंद्रमा का प्रभाव ज्यादा रहेगा। क्योंकि ज्योतिष के अनुसार सोमवार को चंद्रमा का दिन माना जाता है। इसके साथ ही स्वराशि धनु में स्थित देवगुरु बृहस्पति की दृष्टि चंद्रमा पर रहेगी। जिससे गजकेसरी योग का प्रभाव रहेगा।इस बार होली भद्रा रहित, ध्वज एवं गजकेसरी योग भी बन रहा है। इसके बाद 10 मार्च को रंग वाली होली में त्रिपुष्कर योग बनेगा। इस साल होली पर गुरु और शनि का विशेष योग बन रहा है। ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी राशि में रहेंगे।  तो इस बार होली का यह पावन पर्व ग्रहों के शुभ संयोग के कारण शुभ फलदाई मानी गई है होलिका दहन का शुभ मुहूर्त  होलिका दहन की तिथि: 9 मार्च 2020 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 9 मार्च 2020 को सुबह 3 बजकर 3 मिनट से  पूर्णिमा तिथि समाप्‍त: 9 मार्च 2020 को रात 11 बजकर 17 मिनट तक  होलिका दहन मुहूर्त: शाम 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 52 मिनट तक होली का दहन की महिमा रंग वाली होली से भी ज्यादा मानी गई है .भारतीय परंपरा में पुराने साल को विदाई देते हुए नए साल के आगमन की खुशियां मनाई जाती है पुराना साल जिसे संवत कहते हैं को विदाई देने के लिए होली का पावन पर्व मनाया जाता है इसलिए होलिका दहन को संवत जलाना भी कहते चैत्र शुक्ल पक्ष के पहले दिन से जब नवरात्रि शुरू होते हैं तो भारतीय नव संवत की शुरुआत हो जाती है होलिका की अग्नि में पुराने साल और संवत की यादों को समस्याओं को परेशानियों को जलाते हुए जीवन की सारी पुरानी साल की मुश्किलों से निजात पाया जाता है माना जाता है कि इस राख को घर पर लाकर उससे अपने सभी परिवार के लोग अपने माथे पर तिलक करें तो निश्चित ही पिछले साल की सारी नकारात्मकता खत्म हो जाती है पुराने साल की विदाई और नए साल की खुशियां बनाने के साथ-साथ होलिका दहन के पर्व पर किसी भी तरह की आर्थिक समस्या व मानसिक परेशानी हो धन संबंधी समस्याओं से लेकर स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या का समाधान किया जा सकता है.. ज्योतिष के हिसाब से कुछ ऐसे उपाय होते हैं जिन्हें अगर आप होलिका दहन के अवसर पर करें और होलिका के जलने के साथ उन चीजों को अग्नि में डाले तीन बार परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें तो आपकी प्रार्थना जरूर पूरी होती है तो चलिए उन्हीं सभी छोटे-छोटे उपायों की बात करते हैं 1. बीमारी से मुक्ति के लिए और सेहत में लाभ के लिए अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए इस दिन एक मुट्ठी काले तिल होलिका की अग्नि में डाले ,कोई बीमारी से मुक्ति पाना चाहता है तो हरी इलायची और कपूर डालें तीन परिक्रमा करते हुए बीमारी से मुक्ति की प्रार्थना करें 2. धन प्राप्ति के लिए और किसी भी तरह की आर्थिक समस्या से जूझ रहे हैं. तू होली के दिन एक छोटी सी चंदन की लकड़ी होली की अग्नि में डाल देतीन बार परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें 3. अगर किसी को रोजगार की समस्या है यह व्यापार या व्यवसाय में परेशानी आ रही है तो इसके लिए एक मुट्ठी पीली सरसों के दाने होलिका की अग्नि में डालें निश्चित ही व्यापार संबंधी रोजगार संबंधी सारी समस्याएं दूर होंगी 4. अगर किसी को विवाह की समस्या आ रही है विवाह नहीं हो पा रहा, वैवाहिक जीवन में परेशानी और दिक्कतें आ रही हैं खुशहाली नहीं है तो उसके लिए हवन सामग्री लेकर जरा सा देसी घी मिलाकर उसे होलिका की अग्नि में डालें तो निश्चित ही जीवन में सभी तरह की समस्याएं दूर होती हैं 5. किसी भी तरह के तंत्र मंत्र नजर दोष और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए एक मुट्ठी काली सरसों को अपने सिर पर से एंटी क्लॉक वाइज 7 बार घुमाकर होली की जलती हुई अग्नि में डाल दिया जाए तो जीवन की सारी नकारात्मकता खत्म हो जाती हैहोलिकादहन करने या फिर उसके दर्शन मात्र से भी व्यक्ति को शनि-राहु-केतु के साथ नजर दोष से मुक्ति मिलती है। होली की भस्म का टीका लगाने से नजर दोष तथा प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है। 6. जिन लोगों को अपनी नाम राशि लग्न राशि नहीं पता यह जिनको अपनी जन्म कुंडली के बारे में ज्ञान नहीं है वह लोग होलिका दहन के दिन गोबर के उपले गेहूं की बालियां और काले तिल लेकर होलिका की जलती अग्नि में डालकर तीन बार परिक्रमा करके प्रार्थना करें तो उनके जीवन में से सभी तरह की समस्याएं विघ्न बाधाएं अपने आप खत्म हो जाते हैं ..और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है 7. किसी को मन संबंधी समस्याएं मानसिक परेशानी है या किसी की कुंडली में चंद्रमा पीड़ित है तो वह होलिका दहन के बाद घर आकर अपने हाथ पैर धोकर अगर चंद्रमा के दर्शन करते हुए चंद्रमा की रोशनी में बैठे और श्री कृष्ण के किसी भी मंत्र ओम नमो भगवते वासुदेवाय ,ओम क्लीम कृष्णाय नमः, या गीता का पाठ करें तो निश्चित रूप से उनके सभी तरह की मानसिक परेशानियां दूर होने के साथ-साथ जीवन के सभी दिक्कत और परेशानियां खत्म हो जाती है मन मजबूत होता है
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देश के इन 42 स्थानों पर श्राद्ध कर्म से पितरों को मिलती है शांति बरेली। पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म और पिंडदान का विशेष महत्व है। भारतवर्ष में पितृ दोष शांति के लिए 42 तीर्थों को मुख्य माना गया है। शास्त्रों के अनुसार किया गया पिंडदान और श्राद्ध कर्म सबसे ज्यादा मान्य है। इन 42 प्रमुख स्थानों पर श्राद्ध करने पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। 1. देव प्रयाग, उत्तराखंड- यह भागीरथी एवं अलखनन्दा का संगम है। यहां पितृों के निमित्त श्राद्ध तर्पण आदि किया जाता है। 2. त्रियूगीनारायण या सरस्वती कुंड, उत्तराखंड - रूद्र प्रयाग के समीप इस तीर्थ पर भगवान नारायण, भू-देवी एवं लक्ष्मी देवी विराजमान हैं। यहां सरस्वती नदी पर स्थित रूद्र कुण्ड स्नान, विष्णु कुण्ड मार्जन, ब्रह्मकुण्ड आश्वन और सरस्वती कुण्ड तर्पण के लिए हैं। 3. मदमहेश्वर या मध्यमेश्वर, उत्तराखंड- केदारधाम पर स्थित इस तीर्थ पर भगवान शंकर की नाभि प्रतिष्ठित है। यह तीर्थ पंच केदार में शामिल द्वितीय केदार है। 4. रूद्रनाथ - यह तीर्थ पंच केदार में से एक तुंगनाथ के समीप स्थित है। 5. बद्रीनाथ (ब्रह्म कपाल शिला) - अलखनन्दा नदी के किनारे ब्रह्म कपाल (कपाल मोचन) तीर्थ है। यहां पिण्डदान किया जाता है। 6. हरिद्वार (हरि की पैड़ी) - यहां सप्त गंगा, त्रि-गंगा और शक्रावर्त में विधिपूर्वक देव ऋषि एवं पितृ तर्पण करने वाला पुण्यलोक में प्रतिष्ठित होता है। तदन्तर कनखल में पवित्र स्नान किया जाता है। 7. कुरू क्षेत्र (पेहेवा) - पंजाब के अम्बाला जिले में सरस्वती के दाहिने तट पर स्थित इस तीर्थ को अधिक पुण्यमय माना जाता है। 8. पिण्डास्क (हरियाणा) - इसे पिण्ड तारक तीर्थ भी कहते हैं। यहां स्नान करके पितृ तर्पण किया जाता है। 9. मथुरा (ध्रुवघाट) - मथुरा में यमुना किनारे 24 प्रमुख घाटों में से एक ध्रुव घाट है। इसके पास धु्रव टीले पर छोटे मंदिर में ध्रुव जी का विग्रह है। इसे पितृ तर्पण के लिए प्रधान माना जाता है। 10. नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश) - बालामऊ जंक्शन के पास नैमिषारण्य में तपस्या, श्राद्ध, यज्ञ, दान इत्यादि की पूजा एंव क्रिया सात जन्मों के पापों को दूर करती है। 11. धौतपाप (हत्याहरण तीर्थ) - निमिषारण्य से लगभग 13 किमी दूर गोमती नदी के किनारे स्थित इस तीर्थ पर स्नान एवं श्राद्ध तर्पण करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। 12. बिठूर (ब्रह्मावर्त) - कानपुर के निकट बिठूर नामक स्थान है, यहां गंगा जी के कई घाटों में प्रमुख ब्रह्मा घाट है। 13. प्रयागराज, इलाहाबाद- यहां श्राद्ध एवं पितृ तर्पण करने से बहुत अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। 14. काशी (मणिकर्णिका घाट) - यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी हुई है और प्रलय में भी इसका नाश नहीं होता है। यहां श्राद्ध एवं पितृ तर्पण करने से पितृ तृप्त होकर सभी सुख प्रदान करते हैं। 15. अयोध्या - सप्त पुरियों में अयोध्या को प्रथम पुरी माना गया है। यहां सरयू नदी पर पितृ तर्पण एवं श्राद्ध करने से पितृ तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं। 16. गया, बिहार - यह भारत का प्रमुख पितृ तीर्थ है। पुराणों के अनुसार पितृ कामना करते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र हो जो गया जाकर उनका श्राद्ध करे। गया में पिण्डदान से पितृों को अक्षय तृप्ति प्रदान होती है। 17. बोधगया, बिहार - यहां भगवान बुद्ध का विशाल मंदिर है। यहां पितृ तर्पण एवं श्राद्धकर्म का विशेष महत्व है। 18. राजगृह, बिहार - यह हिन्दू, बौद्ध एवं जैन तीनों धर्मों का तीर्थ स्थल है। यहां पुरूषोत्तम मास में श्राद्ध करने से पितृ तृप्त होते हैं। 19. परशुराम कुण्ड, असम - पूर्वकाल में इसे श्राद्धकर्म के लिए बहुत पवित्र माना जाता था। 20. याजपुर, ओडिशा - यहां श्राद्ध एवं तर्पण आदि का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि यहां ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था। 21. भुवनेश्वर, ओडिशा - यहां काशी के समान अत्यधिक शिव मंदिर हैं। इसे उत्कल-वाराणसी और गुप्त काशी भी कहा जाता है। श्राद्ध एवं पितृ तर्पण के लिए यह पवित्र स्थान है। 22. जगन्नाथपुरी, ओडिशा - भारत के पावन चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी है। यह क्षेत्र श्राद्ध एवं पितृकर्म के लिए अत्यन्त पावन माना जाता है। 23. उज्जैन, मध्यप्रदेश - यहां बहती शिप्रा नदी भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न मानी जाती है, जिस पर कई घाट पर मंदिर बने हैं, महाकाल के इस स्थान पर श्राद्ध करने से पितृ पूर्ण तृप्त होते हैं। 24. अमर कण्टक, मध्यप्रदेश - ऐसा माना जाता है कि सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का एक सप्ताह में तथा गंगा का जल छूते ही पवित्र कर देता है। 25. नासिक, महाराष्ट्र - यहां बहने वाली गोदावरी नदी भारत की प्रसिद्ध सात नदियों में से एक है। यहां पितृों की संतुष्टि हेतु स्नान तर्पण आदि कर्म किये जाते हैं। 26. त्र्यम्बकेश्वर, महाराष्ट्र - यहां महर्षि गौतम ने तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया था। पितृ दोष शान्ति का यह प्रमुख स्थान है। 27. पंढरपुर महाराष्ट्र- यहां भीमा नदी है, जिसे चन्द्रभागा भी कहा जाता है। यहां भगवान श्री बिट्ठल का प्रसिद्ध मंदिर भी है, जोकि पितृकर्म के लिए अत्यन्त श्रेष्ठ माना गया है। 28. लोहार्गल, सीकर राजस्थान - यहां देशभर के लोग अस्थि विसर्जन के लिए आते हैं। यहां मुख्य तीन पर्वत से निकलने वाली सात धारायें हैं। 29. पुष्कर, अजमेर राजस्थान - यहां अधिकतर लोग हरिद्वार आदि तीर्थ में अस्थि विसर्जन के बाद पुष्कर में आकर पिण्डदान करते हैं। 30. तिरूपति, तमिलनाडू - यह श्राद्ध के लिए अत्यन्त पवित्र माना जाता है। यहां कपिल तीर्थ में स्नान, बैंकटाचल पर बालाजी दर्शन के बाद ऊपर के अन्य तीर्थ दर्शन के बाद तिरूपति में गोविन्दराज आदि के दर्शन किये जाते हैं। 31. शिवकांची, सर्वतीर्थ सरोवर तमिलनाडू - मोक्षदायिनी सप्त पुरियों में शामिल कांची हरिहरात्मकपुरी है। इसके शिवकांची और विष्णुकांची दो भाग हैं। भगवान शिव और विष्णु का क्षेत्र एंव शक्ति सति स्थान होने के कारण इसे अत्यन्त पावन पितृ तीर्थ माना गया है। 32. कुम्भ कोणम, केरल - कावेरी नदी के तट पर स्थित यहां मुख्य तीर्थ महामघम सरोवर है। 33. रामेश्वरम, लक्ष्मणतीर्थ - यहां पर पिण्डदान करने से पितृगण पूर्ण रूप से संतुष्ट होते हैं। 34. दर्भशयनम् - यहां भगवान राम ने दर्भशय्या पर शयन किया था। इसे भी श्राद्ध आदि के लिए मुख्य तीर्थ माना जाता है। 35. सिद्धपुर, गुजरात- यहां श्राद्ध करने से पितृों को पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है। 36. द्वारकापुरी, गुजरात - श्रीकृष्ण का धाम होने के कारण यहां श्राद्ध करने से पितृों को पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है। 37. नारायणसर, गुजरात - यहां आदि नारायण, लक्ष्मी नारायण, गोबर्धनन्नाथ आदि के मंदिर हैं। अतः नारायण सरोवर के पास पितृों की तृप्ति का तीर्थ स्थान है। 38. प्रभास-पाटण, वेरावल - यहां अग्निकुण्ड, ज्योर्तिलिंगसोमनाथ, अहिल्याबाई इत्यादि कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। इस क्षेत्र से प्राची त्रिवेणी संगम पर भालक तीर्थ भी है। जहां श्री कृष्ण को पैर में बाण लगा था। 39. शूलपाणी, गुजरात - नरवदा तट के मुख्य तीर्थों में शामिल शूलपाणी तीर्थ पर शूलपाणी महादेव का मंदिर है। इसके अलावा पिंडदान के लिए चाणोद, श्रीरंगम, और रीवा भी प्रमुख स्थान हैं।

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पितृ दोष लक्षण,कारण एवं निवारण बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति। पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है। आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है। वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं। पितृ दोष क्या होता है? हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे "पितृ- दोष" कहा जाता है। पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है। इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार फल न मिलना ,वैवाहिक जीवन में समस्याएं.,कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते,कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल नहीं मिल पाता। पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है १.अधोगति .वाले पितरों के कारण २. .उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण,की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं ,परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं। उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं। इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ? जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य ,चन्द्रमा ,गुरु ,शनि ,और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है। इनमें से भी गुरु ,शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है। अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है। पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है। विभिन्न ऋण और पितृ दोष हमारे ऊपर मुख्य रूप से ५ ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने(ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण। मातृ ऋण माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमेंमा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं |इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है | पितृ ऋण पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है। पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता ,संतान को विबिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि। देव ऋण माता-पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं। ऋषि ऋण जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है। मनुष्य ऋण माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की गाय आदि पशुओं का दूध पिया जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया। लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा गौरवान्वित महसूस करते हैं|इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है रामायण में श्रवण कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है। पितृ-दोष कि शांति के उपाय १ सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए। २ वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए। वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है। ३ भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं : मंत्र : "ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात। ४ अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है। ५ अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं। ६ पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए "हरिवंश पुराण " का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें। ७ प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है। ८ सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार "ॐ घृणि सूर्याय नमः " मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है। ९ अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए। १० पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा। विशिष्ट उपाय : १ किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं। २ यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें। ३ पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए। एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त करें उसे थोड़े जल में मिलाकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें ऐसा करने पर पितृ दोष शांत हो जायेगा। ४ घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना जाता है इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ दोष शांत होता है। ५ अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और अपने द्वारा जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर अथवा शिवालय में पितृ गायत्री मंत्र का सवा लाख विधि से जाप कराएं जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प ले की इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है। ६ पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं.| ७ अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग कर उसकी सदगति के लिए "गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र " का पाठ करना चाहिए। ८ पितृ दोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (N -W )में नित्य सरसों का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है ,दीपक कम से कम १० मिनट नित्य जलना आवश्यक है।
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