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Shubhasini daily knowledge

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शान्तितुल्यं तपो नास्ति न संतोषात्परं सुखम्। न तृष्णया: परो व्याधिर्न च धर्मो दया परा:।। शान्ति के समान कोई तप नही है, संतोष से श्रेष्ठ कोई सुख नही, तृष्णा से बढकर कोई रोग नही और दया से बढकर कोई धर्म नहीं। There is no bliss other than peace, there is no happiness beyond satisfaction, no disease bigger than from craving and no religion rising from compassion. ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम
posted Aug 9 by Ajay Shastri

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तं विद्याद् दु::खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोsनिर्विण्णचेतसा ।। जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये । वह योग उत्साहयुक्त चित्र से निश्चय पूर्वक करना कर्तव्य है। Srimad Bhagwad Gita, Chapter-6/23 Let this state of disassociation with pain be understood by the name Yoga. The yoga should be practised with determination and without desperation. *ॐ हरि ॐ,प्रणाम,जय सीता राम*
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*यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।* *स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।* *श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।* *Whatever the superior man conducts, other men also behave in the same manner. Whatever he proves, the whole human community starts to act accordingly.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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धॄति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ There are ten characteristics of 'Dharma' - patience, forgiveness, self-control, non- stealing, purity, control of senses, intelligence, knowledge, truth, non-anger. धर्म के दस लक्षण हैं - धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना॥ *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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*परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।* *धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥* *साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की यथार्थ स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥* *In order to save the saintly men, to destroy those who commit sinful acts, and to establish the truth religion, I have appeared in every age.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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*प्रत्येक का विश्वास स्वयं की प्रकृति के अनुसार है।* *भगवत गीता* *प्रत्येकाचा विश्वास स्वतःच्या स्वभावानुसार असतो.* *The faith of each is in accordance with own nature.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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