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जय भोलनाथ गुरु राहु का मिलना गुरुचंडल योग

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सरल एवम सीधी ज्योतिष :- गुरु राहु जिसे हम चांडाल योग बोलते है गुरु मतलब ज्ञान, विवेक, जीव राहु जहरीली धुंवा,अहंकार,धोकेबाज़,छलिया, राहु आकाश में उड़ने वाला धुंवा ,गुरु पाताल एवं प्राण दायनी वायु,जितना ऊपर जाओगे सांस लेने में उतनी ही तकलीफ होगी, जितना नीचे आओगे, सांस उतना गहरा और स्वच्छ होगा,जब जन्मकुंडली में दोनों मतलब(गुरू,राहु) मिल गए तो गुरु (जीव एवम ज्ञान),राहु (धुंवे एवमअहंकार,) में फंस गया,अब सोचो कौन बचाएगा ? बिल्कुल सरल है,आपकी बुद्धि बचाएगी, बुद्धि का कारक बुध है। इसका अर्थ ये निकला,जब जन्मकुंडली में गुरु,राहु इकट्ठे हो तो बुध का उपाय करना चाहिए ऐस्ट्रो ईश्वर दत्त
posted Aug 16 by Ishwer Dutt

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जय श्री बालाजी में बुध हु लोग मुझे बच्चा समझकर ध्यान नही देते। लेकिन में ही उनके दिमाग की नशे हु। उनका तंत्रिका तंत्र हु। उनको नही पता में बिगड़ गया तो भेजा खाली कर सकता हु उनका। ये सही है कि मुझ अकेले को सम्हालना मुश्किल है लेकिन में उनकी एनर्जी का 75% ग्रहण कर लेता हूं। मे सूर्य के पास रहता हूं इसलिए सूर्य का भी तेज है मेरे पास। में तो विष्णु से क्या कम हु। सामने वाले के रंग में रंग जाता हूं। में बुध हु। तेरी वाणी भी में ही हु पार्थ। तेरी त्वचा भी में ही हु। तेरी बड़ी आंत भी में ही हु। मुझे तू कम न आंक मनुष्य। में बिगड़ा तो तू कहि का न रहेगा। तंत्रिका तंत्र गया। बड़ी आंत गयी तो बचेगा क्या तेरे अंदर। में बुध हु। में तो किसी के रंग में भी रंग जाता हूं। वराह ने तो मुझे लग्न के साथ मिलाके लग्न को ओर बलि ओर शुभ बना दिया। क्योंकि में तो सांमने वाले कर रंग में रंग जाता हूं। सूर्य के रंग में रंगा तो बुधादित्य योग में रंग गया। चन्दर कर साथ मिला तो मन की गहराइयों में ऐसा लेके जाता हूं कि सूक्ष्म से सूक्ष्म बात को समझा देता हूं। मंगल के साथ दिमाग के घोड़े ऐसे दौड़ाता हु की तुझ चैन से नही बैठने देता हूं बड़े बड़े काम करवाता हु तुझसे। गुरु के साथ तो तुझे महाज्ञानी ओर महा शुभ बना देता हूं। में बुध ही तो हु। शुक्र के साथ महालक्ष्मी योग बना देता हूं। यही शुक्र मुझे अपना बल दे देता है। शनि भी तो मेरे रंग में रंग जाता है। क्या जबरदस्त निर्णय क्षमता बनाता हूँ इसी शनि के साथ मिलकर। लोग राहु का गुण गाते है। उसके रंग में रंगे है। लेकिन यही राहु मेरी राशियों में नतमस्तक हो जाता है। मिथुन मेरी ही राशि है जहाँ यह उच्च का हो जाता है। में ही तो इसको मिथुन में कन्ट्रोल करता हु। मेरी इसी मिथुन राशि मे राहु इतनी व्रद्धि करता है कि कोई सीमा न रहे। मेरी राशि कन्या में तो राहु कब्जा जमा के ढेर डाल लेता है। हिलता ही नही। हर प्रतियोगिता में अव्वल लेके आता है। सब इस रंग राहु को भयावह मानते है। लेकिन यही राहु मेरे बल के आगे एक मच्छर कर समान है। इस राहु को सिर्फ में ही नियंत्रित कर सकता हु। क्योंकि में बुध हु। ए राहु मेरी क्षत्र छाया में ही पलता बढ़ता है। इसकी क्या मजाल जो मेरे आगे चूँ भी कर ले। मुझे बलवान कर लो तो राहु भी चुपचाप जहा है वहा बैठा रहे। सेनापति भी भले ही कितना भी पराक्रमी हो। मेरे घरों की तोउसे रक्षा करनी ही पड़ेगी। में राजकुमार जो हु। उसका कर्तव्य है मेरी रक्षा करना। में बुध हु। सूर्य मुझे अपने पास रखता है। चन्द्रमा मेरा पिता है। सूर्य सब ग्रहों का राजा है। चन्द्रमा सब ग्रहों के बल का बिज। सूर्य सब ग्रहों के दोष हरने की क्षमता रखता है। सूर्य चन्दर का प्यार हु में। बुध हु में। सेनापति मेरी रक्षा करता है। राहु मेरे आगे नतमस्तक है। शुक्र मुझे बल दे देता है अपना। बुध्जो हु में। पंचम में स्वग्रही या उच्च का होवू तो बिना गुरु के ही तुझे ज्ञानी बना दु। में एकमात्र ऐसा ग्रह हु जिसके बल पे में तुझे गुरु की पदवी दिला सकता हु। अष्टम में में ही तो तुझे अनन्त ज्ञान की गहराइयों में लेके चला जाता हूं। में बुध हु वत्स। मेरी तेज़ी के आगे भी सब फैल है। में इंतज़ार नही करवाता तुझे । तुरन्त फैसला करता हु। जहा बैठूंगा जल्दी जल्दी तुझे वहां के फल प्रदान करूँगा। में बुध हु। में तरी ग्रहण क्षमता हु। तू जो भी ग्रहण कर रहा है सारः से वो में ही तो हु। तेरी बहन में हु। बुआ में हु। बेटी में हु। हंसी में हु। लेखन में हु। बोलने की कला में हु। हाज़िर जीबि में हु। में बुध हु। बाहत कुछ हु में। कहा राहु के चक्कर मे पड़ा है तू। मेरी गुण गाले तू। राहु की माया से दो minut में निकाल के ले अवउँगा तुझे। मेरे रंग में तू रंग जा। में तेरे रंग में रंग जाऊंगा क्योंकि बुध हूँ मैं एस्ट्रो ईश्वर दत्त
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राहु चन्द्र हमेशा चिन्ता का योग बनाते हैं राहु और चन्द्र किसी भी भाव में एक साथ जब विराजमान हो,तो हमेशा चिन्ता का योग बनाते है,राहु के साथ चन्द्र होने से दिमाग में किसी न किसी प्रकार की चिन्ता लगी रहती है,पुरुषों को बीमारी या काम काज की चिन्ता लगी रहती है,महिलाओं को अपनी सास या ससुराल खानदान के साथ बन्धन की चिन्ता लगी रहती है। राहु और चन्द्रमा का एक साथ रहना हमेशा से देखा गया है, कुन्डली में एक भाव के अन्दर दूरी चाहे २९ अंश तक क्यों न हो,वह फ़ल अपना जरूर देता है। इसलिये राहु जब भी गोचर से या जन्म कुन्डली की दशा से एक साथ होंगे तो जातक का चिन्ता का समय जरूर सामने होगा।
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जय श्री बालाजी में बुध हु लोग मुझे बच्चा समझकर ध्यान नही देते। लेकिन में ही उनके दिमाग की नशे हु। उनका तंत्रिका तंत्र हु। उनको नही पता में बिगड़ गया तो भेजा खाली कर सकता हु उनका। ये सही है कि मुझ अकेले को सम्हालना मुश्किल है लेकिन में उनकी एनर्जी का 75% ग्रहण कर लेता हूं। मे सूर्य के पास रहता हूं इसलिए सूर्य का भी तेज है मेरे पास। में तो विष्णु से क्या कम हु। सामने वाले के रंग में रंग जाता हूं। में बुध हु। तेरी वाणी भी में ही हु पार्थ। तेरी त्वचा भी में ही हु। तेरी बड़ी आंत भी में ही हु। मुझे तू कम न आंक मनुष्य। में बिगड़ा तो तू कहि का न रहेगा। तंत्रिका तंत्र गया। बड़ी आंत गयी तो बचेगा क्या तेरे अंदर। में बुध हु। में तो किसी के रंग में भी रंग जाता हूं। वराह ने तो मुझे लग्न के साथ मिलाके लग्न को ओर बलि ओर शुभ बना दिया। क्योंकि में तो सांमने वाले कर रंग में रंग जाता हूं। सूर्य के रंग में रंगा तो बुधादित्य योग में रंग गया। चन्दर कर साथ मिला तो मन की गहराइयों में ऐसा लेके जाता हूं कि सूक्ष्म से सूक्ष्म बात को समझा देता हूं। मंगल के साथ दिमाग के घोड़े ऐसे दौड़ाता हु की तुझ चैन से नही बैठने देता हूं बड़े बड़े काम करवाता हु तुझसे। गुरु के साथ तो तुझे महाज्ञानी ओर महा शुभ बना देता हूं। में बुध ही तो हु। शुक्र के साथ महालक्ष्मी योग बना देता हूं। यही शुक्र मुझे अपना बल दे देता है। शनि भी तो मेरे रंग में रंग जाता है। क्या जबरदस्त निर्णय क्षमता बनाता हूँ इसी शनि के साथ मिलकर। लोग राहु का गुण गाते है। उसके रंग में रंगे है। लेकिन यही राहु मेरी राशियों में नतमस्तक हो जाता है। मिथुन मेरी ही राशि है जहाँ यह उच्च का हो जाता है। में ही तो इसको मिथुन में कन्ट्रोल करता हु। मेरी इसी मिथुन राशि मे राहु इतनी व्रद्धि करता है कि कोई सीमा न रहे। मेरी राशि कन्या में तो राहु कब्जा जमा के ढेर डाल लेता है। हिलता ही नही। हर प्रतियोगिता में अव्वल लेके आता है। सब इस रंग राहु को भयावह मानते है। लेकिन यही राहु मेरे बल के आगे एक मच्छर कर समान है। इस राहु को सिर्फ में ही नियंत्रित कर सकता हु। क्योंकि में बुध हु। ए राहु मेरी क्षत्र छाया में ही पलता बढ़ता है। इसकी क्या मजाल जो मेरे आगे चूँ भी कर ले। मुझे बलवान कर लो तो राहु भी चुपचाप जहा है वहा बैठा रहे। सेनापति भी भले ही कितना भी पराक्रमी हो। मेरे घरों की तोउसे रक्षा करनी ही पड़ेगी। में राजकुमार जो हु। उसका कर्तव्य है मेरी रक्षा करना। में बुध हु। सूर्य मुझे अपने पास रखता है। चन्द्रमा मेरा पिता है। सूर्य सब ग्रहों का राजा है। चन्द्रमा सब ग्रहों के बल का बिज। सूर्य सब ग्रहों के दोष हरने की क्षमता रखता है। सूर्य चन्दर का प्यार हु में। बुध हु में। सेनापति मेरी रक्षा करता है। राहु मेरे आगे नतमस्तक है। शुक्र मुझे बल दे देता है अपना। बुध्जो हु में। पंचम में स्वग्रही या उच्च का होवू तो बिना गुरु के ही तुझे ज्ञानी बना दु। में एकमात्र ऐसा ग्रह हु जिसके बल पे में तुझे गुरु की पदवी दिला सकता हु। अष्टम में में ही तो तुझे अनन्त ज्ञान की गहराइयों में लेके चला जाता हूं। में बुध हु वत्स। मेरी तेज़ी के आगे भी सब फैल है। में इंतज़ार नही करवाता तुझे । तुरन्त फैसला करता हु। जहा बैठूंगा जल्दी जल्दी तुझे वहां के फल प्रदान करूँगा। में बुध हु। में तरी ग्रहण क्षमता हु। तू जो भी ग्रहण कर रहा है सारः से वो में ही तो हु। तेरी बहन में हु। बुआ में हु। बेटी में हु। हंसी में हु। लेखन में हु। बोलने की कला में हु। हाज़िर जीबि में हु। में बुध हु। बाहत कुछ हु में। कहा राहु के चक्कर मे पड़ा है तू। मेरी गुण गाले तू। राहु की माया से दो minut में निकाल के ले अवउँगा तुझे। मेरे रंग में तू रंग जा। में तेरे रंग में रंग जाऊंगा क्योंकि बुध हूँ मैं एस्ट्रो ईश्वर दत्त
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चांडाल योग राहु-गुरु की युति या दृष्टि संबंध से बनता है, जिसे गुरु-चांडाल योग के नाम से जाना जाता है। इस योग की सबसे बड़ी बात यह है कि गुरु ज्ञान, धर्म, सात्विक, पंडित्व का कारक है, तो राहु अनैतिक संबंध, अनैतिक कार्य, जुआ, सट्टा, नशाखोरी, अवैध व्यापार का कारक है। गुरु-राहु के संयोग की वजह से इसका प्रभाव जातक की कुंडली में इन ग्रहों के स्थानानुसार पड़ता है। राहु गुरु के प्रभाव को नष्ट करता है व उस जातक को अपने प्रभाव में जकड़ लेता है। पराई स्त्रियों में मन लगवाता है, चारित्रिक पतन के बीज बो देता है। इसके अलावा ऐसा राहु हिंसक व्यवहार आदि प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा देता है। चांडाल योग के दुष्प्रभाव के कारण जातक का चरित्र भ्रष्ट हो सकता है। ऐसा जातक अनैतिक अथवा अवैध कार्यों में संलग्न हो सकता है। इस दोष के निर्माण में बृहस्पति को गुरु कहा गया है तथा राहु को चांडाल माना गया है। गुरु का इन चांडाल माने जाने वाले ग्रह से संबंध स्थापित होने से कुंडली में गुरु चांडाल योग का बनना माना जाता है। किसी कुंडली में राहु का गुरु के साथ संबंध जातक को बहुत अधिक भौतिकवादी बना देता है, जिसके चलते ऐसा जातक अपनी प्रत्येक इच्छा को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक धन कमाना चाहता है। जिसके लिए ऐसा जातक अधिकतर अनैतिक अथवा अवैध कार्यों को अपना लेता है। सामान्यतः यह योग अच्छा नहीं माना जाता। जिस भाव में होता है, उस भाव के शुभ फलों की कमी करता है। यदि मूल जन्मकुंडली में गुरु लग्न, पंचम, सप्तम, नवम या दशम भाव का स्वामी होकर चांडाल योग बनाता हो तो ऐसे व्यक्तियों को जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। जीवन में कई बार गलत निर्णयों से नुकसान उठाना पड़ता है। पद-प्रतिष्ठा को भी धक्का लगने की आशंका रहती है। वास्तव में गुरु ज्ञान का ग्रह है, बुद्धि का दाता है। जब यह नीच का हो जाता है तो ज्ञान में कमी लाता है। बुद्धि को क्षीण बना देता है। राहु छाया ग्रह है जो भ्रम, संदेह, शक, चालबाजी का कारक है। नीच का गुरु अपनी शुभता को खो देता है। उस पर राहु की युति इसे और भी निर्बल बनाती है। राहु मकर राशि में मित्र का ही माना जाता है (शनिवत राहु) अतः यह बुद्धि भ्रष्ट करता है। निरंतर भ्रम-संदेह की स्थिति बनाए रखता है तथा गलत निर्णयों की ओर प्रेरित करता है।
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राहु चन्द्र हमेशा चिन्ता का योग बनाते हैं राहु और चन्द्र किसी भी भाव में एक साथ जब विराजमान हो,तो हमेशा चिन्ता का योग बनाते है,राहु के साथ चन्द्र होने से दिमाग में किसी न किसी प्रकार की चिन्ता लगी रहती है,पुरुषों को बीमारी या काम काज की चिन्ता लगी रहती है,महिलाओं को अपनी सास या ससुराल खानदान के साथ बन्धन की चिन्ता लगी रहती है। राहु और चन्द्रमा का एक साथ रहना हमेशा से देखा गया है, कुन्डली में एक भाव के अन्दर दूरी चाहे २९ अंश तक क्यों न हो,वह फ़ल अपना जरूर देता है। इसलिये राहु जब भी गोचर से या जन्म कुन्डली की दशा से एक साथ होंगे तो जातक का चिन्ता का समय जरूर सामने होगा।
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