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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

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जन्माष्टमी विशेष :--- ---------------------- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी में मनत मांगने वाले भक्तों ने शुद्ध- पूत होकर पूजाविधि से अलावा सिर्फ "जन्मराशि" के अनुसार नीचे उपलब्ध अलग अलग बैदिक विष्णुमन्त्र को "एकसौ आठ बार" जाप करने के लिए भी मुझे मेरे गुरु से दिग्दर्शन/ आज्ञा मिला था, जिसको आजतक मैंने और मेरे अनुगामी तथा प्रिय यजमानों ने श्रद्धा तथा विश्वास के साथ पालन करते हैं।। राशि मंत्र इस प्रकार है – ------ ---------- ----- ----

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
posted Aug 23, 2019 by Rakesh Periwal

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आर्थिक संकट के निवारण के लिए ,धन लाभ के ;लिए जन्माष्टमी ( Janmashtami ) के दिन प्रात: स्नान आदि करने के बाद किसी भी राधा-कृष्ण मंदिर में जाकर प्रभु श्रीकृष्ण जी को पीले फूलों की माला अर्पण करें। इससे आर्थिक संकट दूर होने लगते है धन लाभ के योग प्रबल होते है । आचार्य शालिनी मल्होत्रा
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14-8-2017 को अष्टमी तिथि ७:४५ शाम से लगेगी , जिसका फल शास्त्रोक्त नहीं है। १५ -८-२०१७ को अष्टमी सायं ५:३९ तक है जो उदय व्यपीनी होने से रात्रि में भी मान्य होगी । और रोहिणी नक्षत्र भी २:३० से प्रारम्भ होगा । ये न कुर्वन्ति जानन्त: कृष्णजन्माष्टमी व्रतं। ते भवन्ति नरा: प्राज्ञ! व्यालव्याघ्राश्च कानने।। अष्टमी कृष्णपक्षस्य, रोहणी संयुता यदि। भवेत प्रौ ष्ठ पदे मा सि जयन्ति नाम सा समुता।।( वि. र.) इन दो श्लोकों में से पहिले में केवल अष्टमी तथा दूसरे में जयंती नाम होने से पता चलता है कि जन्माष्टमी के दो भेद है- (1) अष्टमी,(2) जयन्ति। जयंती में यदि रोहिणी का योग रात दिन होतो सर्वश्रेष्ठ, रात ही में होतो मध्यम और केवल दिन में होतो सामान्य है। किंतु यदि यदि जन्माष्टमी में रोहिणी का योग हो जावे तो जन्माष्टमी का जयंती में अंतर्भाव हो जाने के कारण फिर पृथक व्रत न करना चाहिए।जैसा कि मदन रत्न, निर्णायामृत, इत्यादि ग्रंथों के देखने से पता चलता है:- यस्मिन वर्षे जेन्त्याख्यो योगी जन्माष्टमी तदा। अन्तर्भूता जयंतयां स्याद्रहक्षयोग प्रशस्तितत:।। विष्णु धर्म में भी कहा है:- रोहिन्यामधर्मरात्रे च यदा कृष्णाष्टमी भवेत। तस्यामभ्यरचन शोरे रह्न्ति पापं त्रिजन्मजम।। अर्धरात्रि में कृष्णअष्टमी, मेंरोहिणी दिखाय। तीन जन्म का पाप तब हरिपुजे कटि जाय।। त्रेतायां द्वापरे चैव राजन! कृत युगे तथा। रोहिणी सहिता चेय विद्वदिभ: समुपोषिता।। अतः परै महिपाल! संप्राप्ते तामसे कलौ। जन्मना वासुदेवस्य भविता व्रतमुत्त मम।। इन श्लोको के आधार से कलिकाल में अष्टमी ही को व्रत मानना बताया गया है जयंती को नहीं, तथापि यह बात ठीक नहीं। क्योंकि श्लोक में ' तमि से कलौ' यह शब्द देखने से पता चलता है कि यह जयंती योग कलिकाल में यह योग दुर्लभ है। उक्त विवरणों अनुसार १५-८-२०१७ मंगलवार को श्री कृष्णजन्मोत्सब मनाना उत्तम है। जन्माष्टमी 15 को मनाई जायेगी
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राधाष्टमी का पर्व राधा रानी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन की जाने वाली पूजा सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करती है. ऐसा कहा जाता है कि राधाजी को वृंदावन की अधीश्वरी हैं। यह भी कहा जाता है कि जिसने राधा जी को प्रसन् कर लिया उसे भगवान कृष्ण भी मिल जाते हैं। इसलिए इस दिन राधा-कृष्ण दोनों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में राधा जी को लक्ष्मी जी का अवतार माना गया है। इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन भी किया जाता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को रखने से व्यक्ति अपने समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। राधाष्टमी का पर्व पंचांग के अनुसार 26 अगस्त को बुधवार के दिन मनाया जाएगा. राधारानी को भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति के तौर पर पूजा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार राधाजी जगत में परम आनंद की वाहक हैं. वहीं राधाजी को मोक्ष, सौम्यता की प्रतीक माना जाता है. इस दिन राधा और कृष्ण का ध्यान लगाकर स्तुति की जाती है. राधाष्टमी का पर्व प्रेम के अध्यात्मिक महत्व को बताता है. जन्माष्टमी के 15 दिन बात मनाई जाती है राधाष्टमी पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन मनाया जाता है. इसके ठीक 15 दिन बाद भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी के रूप में मनाने की परंपरा है. राधाष्टमी का शुभ मुहूर्त अष्टमी तिथि प्रारम्भ: 25 अगस्त, 12:21 Pmसे अष्टमी तिथि समाप्त: 26 अगस्त, 10:39 Am तक राधाष्टमी की पूजा विधि स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान पर आसान लगाकर पूजा प्रारंभ करें. पूजा स्थान पर राधा कृष्ण की संयुक्त प्रतिमा या चित्र रखें और जल से शुद्ध करते हुए पूजा आरंभ करें. पूजा के दौरान पुष्प अर्पित करें और मिष्ठान का भोग लगाएं. पूजा में चंदन का प्रयोग करें. राधा चालीसा और राधा स्तुति राधा रानी की आरती जरूर करें !
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सभी देवों में प्रथम पूज्य रिद्धि-सिद्धि को देने वाले श्री गणेशजी का जन्मदिन 22 अगस्त, शनिवार को मनाया जाएगा।इस दिन विधिवत इनकी स्थापना करके आपको गणेशजी की कृपा तो प्राप्त होगी ही साथ में आपके घर के वास्तुदोष भी समाप्त हो जाएंगे। वास्तुशास्त्र कहता है कि गणेशजी की आराधना के बिना वास्तु देवता की संतुष्टि नहीं होती है। इसलिए गणपति की आराधना से व्यक्ति हर वास्तु दोष को दूर कर सकता है। वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने मानव कल्याण के लिए वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर गृहकलेश की स्थिति बनती है और घर के सदस्यों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। इसलिए वास्तु दोष निवारण के लिए भगवान गणेश की पूजा का विधान है। भवन निर्माण में वास्तु का ध्यान रखा जाता है, लेकिन फिर भी अगर कोई दोष रह जाता है तो आप गणेशजी की प्रतिमा या चित्र लगाकर घर में बिना तोड़-फोड़ के गणेश जी की कृपा से वास्तु दोष का निवारण कर सकते हैं। दूर होगा वास्तुदोष यदि आपके घर के ड्राइंगरूम में किसी भी प्रकार का वास्तुदोष है तो यहां गणेश जी की ऐसी प्रतिमा लगाएं जिसमें गणपति तकिये पर एक हाथ का सहारा लेकर लेटे हुए नजर आते हैं। कलाकृति के तौर पर इसे यहीं रखें ,पूजाघर में नहीं रखें। लेकिन गणेश जी की प्रतिमा लगाते वक्त एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि कभी भी इनका मुख दक्षिण या नैऋत्य में न हो अन्यथा परिणाम विपरीत हो सकते है संगीत या शिक्षा में सफलता के लिए नृत्य करते हुए गणेशजी की प्रतिमा देखने में बहुत मनमोहक लगती है। बड़े उदर और भारी भरकम शरीर में नृत्य करते हुए भी वे बड़े आकर्षक लगते हैं। यदि कला, संगीत या इससे संबंधित कोई अन्य शिक्षा के प्रयोजन से पूजन करना हो तब डांसिंग गणेश की प्रतिमा या तस्वीर का पूजन करना लाभकारी है। आत्मविश्वास में वृद्धि के लिए मूषक या चूहे पर खड़े गजानन की प्रतिमा साहस, शक्ति और आत्मविश्वास का प्रतीक है।जिन व्यक्तियों में साहस और आत्मविश्वास की कमी हो या किसी विशिष्ट व्यक्ति से बात करने में झिझक लगती हो तो उन्हें अपने घर या कार्यस्थल पर इस तरह की प्रतिमा लगाने से लाभ होगा।गणेश जी का यह रूप ऐसा आशीर्वाद देता है कि मूषक जैसा प्राणी भी हर तरह के भार को सहन कर सकता है। कृषक वर्ग के लोगों को, जिनके खेत में चूहे फसलों को नुकसान पहुँचाते है उनके लिए इस मुद्रा के गणेश का पूजन उत्तम है। परिवार में सुख-शांति के लिए सिंहासन पर बैठे हुए गणेश की प्रतिमा जिनकी सूंड बांयी ओर मुड़ी होती है, पूजाघर में रखी जानी चाहिए। इनकी पूजा से घर में सुख-शांति व समृद्धि आती है। भवन के ब्रह्मस्थान, ईशान कोण या पूर्व दिशा में बैठे हुए सुखकर्ता की मूर्ति या चित्र लगाना चाहिए। इसे बहुत शुभ माना जाता है इससे परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। दांयी ओर सूंड वाले एकदंत दांयी ओर घूमी हुई सूंड वाले गणेशजी हठी होते हैं।आमतौर पर ऎसी प्रतिमा घर और ऑफिस में नहीं रखी जाती। इनको स्थापित करने पर कई धार्मिक रीतियों का पालन करना ज़रूरी होता है। ऐसी प्रतिमा को देवालयों में स्थापित करके वहीँ उनकी पूजा की जाती है। उत्साह पूर्वक काम करने के लिए कार्यस्थल पर गणेश जी की मूर्ति विराजित कर रहे हों तो खड़े हुए गणेश जी की मूर्ति लगाएं जिनके दोनों पैर ज़मीन को स्पर्श करते हों, इससे कार्यस्थल पर स्फूर्ति और काम करने में उमंग हमेशा बनी रहती है। कार्य में स्थिरता आने की संभावना रहती है।
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हनुमान जी 11वें रुद्रवतार हैं, दसों दिशाओं में इनकी कीर्ति है, इसके साथ ही बाबा हनुमान जी को मां सीता जी ने अष्ट सिद्धि,और नवनिधि का वरदान दिया हुआ है, जिसके चलते इनके लिये इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। साथ ही ये चिरंजीवी भी है। इसके अलावा किसी भी प्रकार के ग्रह परिवर्तन हो या ग्रहों का प्रभाव हो, श्री बजरंगबली हर किसी पर असर डालने में सक्षम है। दरअसल नौ ग्रहों में जहां हनुमान जी देवताओं के सेनापति मंगल के कारक देव है। : मंगल ग्रह : हनुमान जी एक ऐसे शक्तिशाली देवता है जिनके प्रताप से कोई भी अंजान नहीं है। माना जाता है कि हनुमान जी का जन्म मंगलवार को हुआ था, वहीं ये स्वयं देवताओं के सेनापति मंगल के कारक देव हैं इसलिए इनकी पूजा करने से मंगल की पीड़ा से मुक्ति मिलने के साथ ही मंगल देव की कृपा बरसने लगती है । - वहीं शनि पर भी इनका प्रभाव चलता है। : शनिदेव : सूर्य पुत्र शनिदेव न्याय के जाने जाते है, जब शनिदेव की दशा चलती है तब ये व्यक्ति को उसके कर्मों के हिसाब से दंड जरूर देते हैं । लेकिन अगर कोई हनुमान जी की शरण में चला जाता है तो शनिदेव का कोप काफी हद तक शांत हो जाता है। ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी को शनिदेव ने वचन दिया हुआ है कि वो उनके भक्तों का कुछ भी नहीं बिगाड़ेंगे । इसलिए हनुमान जी की शरण में जाने से शनिदेव के कोप भाजन से राहत मिलती है। - इसके अलावा सोमवार जिसके कारक देव भगवान शंकर है, हनुमान जी को उनका ही अवतार माना जाता है। - बृस्पतिवार के कारक देव श्री हरी विष्णु हैं, तो वहीं उनके अवतार श्रीराम के हनुमान जी स्वयं परम भक्त है : सूर्य देव : आप सभी ने सुना होगा कि बालक पन में हनुमान जी ने सूर्य देव को फल समझ कर निगल लिया था । जिसके बाद इंद्र के बज्र चलाने के बाद सूर्य देव को मुक्ति मिली थी। लेकिन कम लोगों को ही ये मालूम होगा कि सूर्य देव हनुमान जी के गुरु हैं, हनुमान जी ने सूर्य देव से ही शिक्षा ग्रहण की थी। हनुमान जी के जन्म के समय सूर्य उच्च राशि में थे। इसलिए हनुमान जी की उपासना करने से सूर्य देव भी प्रसन्न हो जाते हैं । वहीं ये मान्यता है कि सूर्य देव की आराधना से चंद्र, बुध, गुरु, ग्रह भी शांत होते हैं और इनकी पीड़ा से मुक्ति मिलती है क्यों कि वो सूर्य देव के मित्र ग्रह हैं । - शुक्र की कारक देवी मां लक्ष्मी हैं और वे ही रामायण काल में सीता का रूप लेकर आईं थी, तब उन्होंने ही हनुमान जी को कई वरदान दिए थे। : शुक्र : हनुमान जी संगीत के महान ज्ञाता, शृंगार प्रिय हैं । इस लिये भक्ति भाव से उनका स्मरण करने और उनका शृंगार करने से वे जल्द खुश हो जाते हैं । इस प्रकार हमें शुक्र ग्रह की पीड़ा से राहत मिलती है । राहु-केतु ग्रहों के कष्टों से मुक्ति ... इसके अलावा राहु और केतु दोनों क्रूर छाया ग्रह हैं, कहा जाता है कि हनुमानजी के भय से राहु भागकर इंद्रदेव की शरण में भाग गया था। हनुमानजी की पूजा और भक्ति करने से इन क्रूर ग्रहों की हिम्मत भी नहीं पड़ती कि वो हनुमान भक्त को कष्ट दें । हनुमानजी इस कलियुग में सबसे ज्यादा शक्तिशाली, जाग्रत और साक्षात देवता हैं। इस युग में हनुमानजी की भक्ति करने मात्र से ही दुखों और संकट रक्षा हो जाती है। हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ भावना होनी बेहद जरूरी है, जितनी आपकी भावना प्रबल होगी, उतनी ही जल्दी आपको हनुमान जी की कृपा प्राप्त होगी। ऐसे करें हनुमान जी की आराधना ? हनुमान जी की आराधना करते समय एक सामान्य भक्त की तरह भावना को प्रबल करते हुए हनुमान जी की पूजा करें। इस समय मन में ये विश्वास जरूर रखें कि आपको उनकी कृपा जरूर मिलेगी। इसके अलावा हनुमान जी की पूजा करते समये कुछ सामान्य बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। इसके तहत सबसे पहले अपने घर में पूजा स्थान पर साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते हुऐ हनुमान जी के किसी एक रूप की तस्वीर रखें, उनके सामने आसन बिछा लें। इसके बाद दीप जला लें। प्रभु का ध्यान करते हुए धूप, दीप, फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाएं । बता दें की यहां हनुमान जी की आराधना करने के लिये आपकी भावना बेहद अहम है। जितनी आपके अंदर भक्ति प्रबल होगी उतनी जल्द ही आपको हनुमान जी की कृपा भी मिलेगी। अगर ब्रह्म मुहूर्त में या फिर शाम को गो-धूलि की बेला में आप हनुमान जी की पूजा करेंगे तो आप पर जरूर कृपा बरसेगी । इस बात का रखें विशेष ध्यान.. चूकिं हनुमान जी भगवान श्री राम जी के अनन्य भक्त हैं, ऐसे में आपको सबसे पहले प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। कम से कम 11 बार 'ओम गं गणपतये नम :' का जाप कर लें । इसके बाद हनुमान जी का ध्यान करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ कम से कम पांच बार ,या फिर सात बार, या फिर 11 बार करें। हनुमान चालीसा का पाठ करने के बाद भगवान श्रीरामचन्द्र जी का ध्यान करते हुए कुछ देर उनका नाम या फिर भजन करें। हनुमान जी भगवान श्रीराम चन्द्र जी का भजन सुन कर बेहद प्रसन्न हो जाते हैं ।
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