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कालसर्प योग और फल और उपाय

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क्या आपकी कुंडली में भी कालसर्प दोष है क्या कहती है आपकी जन्मकुंडली करे चमत्कारिक उपाय .... अगर काफी मेहनत के बाद भी आपको अपने कामों का उचित परिणाम नहीं मिलता, दूसरों की भलाई करने के बाद भी बदले में केवल बुराई ही मिलती है, आपके अपने भी वक्त आने पर आपसे कन्नी काट लेते हैं तो सब आपकी गलती नहीं बल्कि आपकी कुंडली में मौजूद कालसर्प दोष का परिणाम भी हो सकता है। आइए जानते हैं कि जब कुंडली में कालसर्प दोष होता है तो किस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और इस दोष के निवारण के उपाय क्या हैं… मेहनत का पूरा फल नहीं मिलता ... आप जीतोड़ मेहनत करते हैं लेकिन आपकी मेहनत का पूरा फल आपको नहीं प्राप्त होता। आप पूरी तरह सोच-समझकर कार्य करते हैं, निवेश से पहले सभी पहलुओं पर ध्यान देते हैं, बावजूद इसकेआपको नुकसान उठाना पड़ता है। अपने साथ छोड़ देते हैं ... वो लोग जिन्हें आप अपना समझते हैं और उनके साथ बुरे वक्त में खड़े रहते हैं और हर संभव मदद करते हैं, आपकी जरूरत के वक्त पर वही लोग आपको अकेला छोड़ देते हैं। बिना गलती के सजा मिलना ... बिना किसी गलती के दोषी ठहराया जाना या किसी और की गलती की सजा आपको मिलना और ऐसा बार-बार होना। आपकी मेहनत और अच्छे कार्यों का यश किसी दूसरे को मिलना। सफलता मिलते-मिलते रह जाना। शादी और परिवार की दिक्कतें ... शादी नहीं होना, शादी में दिक्कतें आना या शादी होने के बाद भी दांपत्य जीवन में बिखराव और दिक्कतें होना। बच्चे नहीं होना या बच्चों का लगातार स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूझना। तथा आपकी सेहत भी लगातार या बार-बार खराब होना। डरावने सपने और मृत परिजन की मांग ... डरावने सपने आना और सपने में नाग-नागिन,खुद का पानी में डूबना, बारात दिखना,खुद को रोते हुए देखना, किसी विधवा महिला को रोते हुए देखना, खुद को अपाहिज देखना या मरे हुए परिजन द्वारा कुछ मांगा जाना। शांति के लिए करें यह उपाय ... चांदी के नाग-नागिन का जोड़ा बनवाकर, विधि पूर्वक पूजा के बाद जल में प्रवाहित कर दें। या फिर किसी सपेरे को पैसे देकर उसके द्वारा पकड़ा गया नाग-नागिन का जोड़ा जंगल में स्वतंत्र करा दें। गोमूत्र का यह उपयोग भी ... हर रोज गोमूत्र से दांत साफ करें। या फिर अपने वजन के बराबर कोयला पानी में प्रवाहित कर दें। शिवलिंग पर धातु का नाग ... किसी मंदिर के शिवलिंग पर जहां नाग न हो वहां पूजा-प्रतिष्ठा कराकर शिवलिंग पर नाग लगवाएं। शिव को अर्पित करें इत्र ... भगवान शिव को चंदन का इत्र अर्पित करें। तथा खुद भी चंदन का इत्र रोज लगाएं। नारियल और नाग-नागिन ... नारियल पर नाग-नागिन का जोड़ा बनवाएं, इस नारियल पर मौली लपेटें और फिर इसे जल में प्रवाहित कर दें। और ज्यादा जानकारी समाधान और उपाय या कुंडली विश्लेषण रत्न विश्लेषण का भविष्यफल या आपके जीवन में होने वाले हर समस्याओं के समाधान और उपाय विधि प्राप्ति के लिए संपर्क करे।

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संकलित
posted Aug 25 by anonymous

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*आप ग्रस्त है काल सर्प दोष से या राहु की कुंडली मे स्तिथि से* कालसर्प एक ऐसा योग है जो जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है। व्यावहारिक रूप से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है, मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह के रोग भी उसे परेशान किये रहते हैं। जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह राहु और केतु के बीच अवस्थित रहते हैं तो उससे ज्योतिष विद्या मर्मज्ञ व्यक्ति यह फलादेश आसानी से निकाल लेते हैं कि संबंधित जातक पर आने वाली उक्त प्रकार की परेशानियां कालसर्प योग की वजह से हो रही हैं। परंतु याद रहे, कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। किस भाव में कौन सी राशि अवस्थित है और उसमें कौन-कौन ग्रह कहां बैठे हैं और उनका बलाबल कितना है - इन सब बातों का भी संबंधित जातक पर भरपूर असर पड़ता है। इसलिए मात्रा कालसर्प योग सुनकर भयभीत हो जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुद्धिमत्ता कही जायेगी। जब असली कारण ज्योतिषीय विश्लेषण से स्पष्ट हो जाये तो तत्काल उसका उपाय करना चाहिए। नीचे हम कुछ ज्योतिषीय स्थितियां दे रहे हैं जिनमें कालसर्प योग बड़ी तीव्रता से संबंधित जातक को परेशान किया करता है। जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भूत-प्रेतों की बाधा सताती रहती हो, या किसी के टोने-टोटके से पीड़ित होने की बीमारी आम रूप से परेशान करने लगती है। जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है। चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है। जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है। जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है। जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियां बढ़ती हैं। जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियां बढ़ती हैं। जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियां बढ़ती हैं। जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, देर होती है, अथवा उसे वैधव्य या विाुरत्व की प्राप्ति होती है। यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्ति में भी फंसना पड़ जाता है। जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है। जब दशम भाव का नवांशेश मंगलराहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक भयंकर अग्निकांड का शिकार होता है। जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक की दम घुटने से मौत या मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है। जब अष्टम भाव में पाप ग्रह युक्त राहु अवस्थित हो तब संबंधित जातक की मृत्यु सांप काटने से होती है। जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंाित जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो। जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1वे3वे4वे5वे 6ए 7वे 8वे 11 या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्राी, पुत्रा, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है। जब राहु छठे भाव में स्तिथ हो तथा बृहस्पति केंद्र में हो तब जातक का जीवन खुशहाल व्यतीत होता है। जब राहु व चंद्रमा की युति केंद्र (1वे 4वे7वे 10वेंभाव) या त्रिाकोण में हो तब जातक के जीवन में सुख-समृद्धि की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं। जब शुक्र दूसरे य12वें भाव में स्तिथ हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं। जब बुधादित्य योग हो और बुध अस्त न हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं। जब लग्न व लग्नेश सूर्य व चंद्र कुंडली में बलवान हों साथ ही किसी शुभ भाव में स्तिथ हों और शुभ ग्रहों द्वारा देखे जा रहे हों। तब कालसर्प योग की प्रतिकूलता कम हो जाती है। जब दशम भाव में मंगल बली हो तथा किसी अशुभ भाव से युक्त या दृष्ट न हों। तब संबंधित जातक पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। जब मंगल की युति चंद्रमा से केंद्र में अपनी राशि या उच्च राशि में हो, अथवा अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों। तब कालसर्प योग की सारी परेशानियां कम हो जाती है। जब राहु अदृश्य भावों में स्थित हो तथा दूसरे ग्रह दृश्य भावों में स्थित हों तब संबंधित जातक का कालसर्प योग समृद्धिदायक होता है। जब राहु छठे भाव में तथा बृहस्पति केंद्र या दशम भाव मेंस्तिथ हो तब जातक के जीवन में धन-धान्य की जरा भी कमी महसूस नहीं होती। उक्त लक्षणों का उल्लेख इस दृष्टि से किया गया है ताकि सामान्य पाठकों को कालसर्प योग के बुरे प्रभावों की पर्याप्त जानकारी हासिल हो सके। किंतु ऐसा नहीं है कि कालसर्प योग सभी जातकों के लिए बुरा ही होता है। विविध लग्नों व राशियों में अवस्थित ग्रह जन्म-कुंडली के किस भाव में हैं, इसके आधार पर ही कोई अंतिम निर्णय किया जा सकता है। कालसर्प योग वाले बहुत से ऐसे व्यक्ति हो चुके हैं, जो अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए भी ऊंचे पदों पर पहुंचे। जिनमें भारत के प्रथम प्राानमंत्राी स्व पं ज़वाहर लाल नेहरू का नाम लिया जा सकता है। स्व मोरारजी भाई देसाई व श्री चंद्रशेखर सिंह,फ़िल्म एक्टर रजनी कांत,सन्त मोरारी बापू,धीरू भाई अम्बानी, विजया राजे सिंधिया, की कुंडलियो में भी कालसर्प आदि योग से ग्रसित थे व है,किंतु इन्होंने बेसुमार सफलता प्राप्त की अच्छे व उच्चस्थ पद पर रहे। अत: किसी भी स्थिति में व्यक्ति को मायूस नहीं होना चाहिए और उसे अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हमेशा अपने चहुंमुखी प्रगति के लिए सतत सचेष्ट रहना चाहिए। यदि कालसर्प योग का प्रभाव किसी जातक के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे दूर करने के उपाय भी किये जा सकते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में ऐसे कई उपायों का उल्लेख है, जिनके माध्यम से हर प्रकार की ग्रह-बाधाएं व पूर्वकृत अशुभ कर्मों का प्रायश्चित किया जा सकता है।
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सूर्य ग्रह से संबंधित जानकारी समस्या और उपाय 〰️〰️
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ग्रह कब नहीं देते शुभ फल और क्यों? सूर्य सूर्य का संबंध आत्मा से होता है। यदि आपकी आत्मा, आपका मन पवित्र है और आप किसी का दिल दुखाने वाला कार्य नहीं करते हैं तो सूर्यदेव आपसे प्रसन्न रहेंगे। लेकिन किसी का दिल दुखाने (कष्ट देने), किसी भी प्रकार का टैक्स चोरी करने एवं किसी भी जीव की आत्मा को ठेस पहुंचाने पर सूर्य अशुभ फल देता है। कुंडली में सूर्य चाहे जितनी मजबूत स्थिति में हो लेकिन यदि ऐसा कोई कार्य किया है, तो वह अपना शुभ प्रभाव नहीं दे पाता। सूर्य की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा में कमी आती है और उसे पिता की संपत्ति से बेदखल होना पड़ता है। चंद्र परिवार की स्त्रियों जैसे, मां, नानी, दादी, सास एवं इनके समान पद वाली स्त्रियों को कष्ट देने से चंद्र का बुरा प्रभाव प्राप्त होता है। किसी से द्वेषपूर्वक ली गई वस्तु के कारण चंद्रमा अशुभ फल देता है। चंद्रमा अशुभ हो तो व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान रहता है। उसके कार्यों में रुकावट आने लगती है और तरक्की रूक जाती है। जल घात की आशंका बढ़ जाती है। यहां तक कि व्यक्ति मानसिक रोगी भी हो सकता है। मंगल मंगल का संबंध भाई-बंधुओं और राजकाज से होता है। भाई से झगड़ा करने, भाई के साथ धोखा करने से मंगल अशुभ फल देता है। अपनी पत्नी के भाई का अपमान करने पर भी मंगल अशुभ फल देता है। मंगल की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति जीवन में कभी स्वयं की भूमि, भवन, संपत्ति नहीं बना पाता। जो संपत्ति संचय की होती है वह भी धीरे-धीरे हाथ से छूटने लगती है। बुध बहन, बेटी और बुआ को कष्ट देने, साली एवं मौसी को दुखी करने से बुध अशुभ फल देता है। किसी किन्नर को सताने से भी बुध नाराज हो जाता है और अशुभ फल देने लगता है। बुध की अशुभता के कारण व्यक्ति का बौद्धिक विकास रूक जाता है। शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अशुभ बुध विकट स्थितियां पैदा कर सकता है। गुरु अपने पिता, दादा, नाना को कष्ट देने अथवा इनके समान सम्मानित व्यक्ति को कष्ट देने एवं साधु संतों को सताने से गुरु अशुभ फल देने लगता है। जीवन में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा के कारक ग्रह बृहस्पति के रूठ जाने से जीवन अंधकारमय होने लगता है। व्यक्ति को गंभीर बीमारियां घेरने लगती है और उसका जीवन पल-प्रतिपल कष्टकारी होने लगता है। धन हानि होने लगती है और उसका अधिकांश पैसा रोग में लगने लगता है। शुक्र अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, किसी भी प्रकार के गंदे वस्त्र पहनने, घर में गंदे एवं फटे पुराने वस्त्र रखने से शुक्र अशुभ फल देता है। चूंकि शुक्र भोग-विलास का कारक ग्रह है अतः शुक्र के अशुभ फलों के परिणामस्वरूप व्यक्ति गरीबी का सामना करता है। जीवन के समस्त भोग-विलास के साधन उससे दूर होने लगते हैं। लक्ष्मी रूठ जाती है। वैवाहिक जीवन में स्थिति विवाह विच्छेद तक पहुंच जाती है। शुक्र की अशुभता के कारण व्यक्ति अपने से निम्न कुल की स्त्रियों के साथ संबंध बनाता है। शनि ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतकश व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने एवं इसी के साथ शराब, मांस खाने से शनि देव अशुभ फल देते हैं। कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा मांगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है। शनि के अशुभ फल के कारण व्यक्ति रोगों से घिर जाता है। उसकी संपत्ति छिन जाती है और वह वाहनों के कारण लगातार दुर्घटनाग्रस्त होने लगता है।
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