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महत्वपूर्ण_अशुभ_योगों_के_शुभ_फल

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कुंडली जातक के सम्पूर्ण जीवन का नक्शा है।कुंडली मे बनने वाले शुभ-अशुभ योग जातक के जीवन पर बहुत गहरा डालते है।कुंडली मे अशुभ योग कब और कैसी स्थिति में कुछ फल देते इसी विषय पर बात करते है इन महत्वपूर्ण अशुभ योगों में अशुभ योग है जैसे ; सूर्य ग्रहण योग, चन्द्र ग्रहण योग, अंगारक योग, गुरु चांडाल योग, प्रेतयोग अमूमन यह सब योग ज्यादातर राहु केतु से बनने वाले योगों पर ही लागू होगा अन्य ग्रहों से बनने वाले अशुभ योग अशुभ प्रभाव ही दिखाएंगे।अब कुंडली के कुछ उदाहरणों के अनुसार बात करते है।। सूर्य_या_चन्द्र_ग्रहण_योग:- सूर्य ग्रहण योग और चन्द्र ग्रहण योग दोनो योग कहने को अशुभ है लेकिन यह दोनों योग अशुभ होकर भी यदि शुभ स्थिति में बने हो तब राजयोग तक दे देते है।माना जाय सूर्य दशम भाव का स्वामी हो(जो कि वृश्चिक लग्न में ही होगा)और सूर्य के साथ ग्यारहवे भाव मे बैठ जाए तब यह सूर्य ग्रहण योग लाभ ही देगा ऐसे ही चन्द्र ग्रहण योग भी।। मतलब सूर्य चन्द्र कुंडली के लिए कारक हो या किसी शुभ भाव के स्वामी हो और सूर्य चन्द्र जिस भी शुभ भाव के स्वामी हो उस शुभ भाव पर राहु या केतु का प्रभाव किसी भी तरह न हो तब निश्चित ही यह ग्रहण योग भी शुभ फल देगा।। गुरुचंडाल_उदाहरण_अनुसार:- जैसे मीन लग्न की कुंडली मे गुरु लग्नेश और दशमेश होता है अब यदि राहु केतु गुरु के साथ होगा तो गुरु चंडाल योग बनेगा लेकिन गुरु के साथ राहु या केतु हो लेकिन राहु या केतु का प्रभाव गुरु के भाव पर न हो मान लिया जाय इसी मीन लग्न में गुरु पाचवे भाव मे उच्च राशि मे होंगे तो यह गुरु चांडाल योग दशवे भाव संबंधी शुभ फल देगा।। कहने का मतलब यह है गुरुचंडाल योग ऐसी स्थिति में बनने पर शुभ फल देगा रोजगार और कार्य छेत्र में सफलता देगा। लेकिन इसके विपरीत गुरु और राहु दोनो इसी मीन लग्न में दसवे भाव मे धनु ही राशि मे हो तब यह योग अशुभ फल देगा क्योंकि यहाँ राहु गुरु और गुरु के घर दोनो पर अपना प्रभाव डालकर इन्हें पीड़ित कर रहा है।इसी स्थिति में बनने वाला राहु से कोई भी अशुभ योग अशुभ फल देता है वरना नही।। राहु या केतु जिस भी शुभ भाव पति के साथ हो तो उस भाव को पीड़ित न करे केवल भाव के स्वामी से ही संबंध करे तब इनके द्वारा बनने वाले उपरोक्त अशुभ योग शुभ फल ही देते है।

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posted Sep 17, 2019 by Deepika Maheshwary

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ईश्वर का नाम रोज स्मरण करने और नियमित रूप से पूजा पाठ करने से मन में आत्मिक शांति का एहसास होता है। ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव से नकारात्मक समय में भी लोग उम्मीद की एक छोटी सी किरण पर भी विश्वास कर पाते हैं। आस्था आपके मन को भीतर से मजबूत बनाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईश्वर की आराधना करते वक्त कुछ नियमों का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी होता है। कई लोग घर में पूजाघर बनाते वक्त छोटा सा मंदिर बनवाना पसंद करते हैं क्योंकि हमेशा तो मंदिर नहीं जाया जा सकता है। लेकिन इस बात का ख्याल रखें कि पूजाघर में कोई भी मूर्ति स्थापित करने से पहले मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा जरूर करें। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जिस घर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा होती है वहां प्रभु साक्षात निवास करते हैं। आपकी कुलदेवी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती हैं। ऐसी भी मान्यता है कि अगर लोग अपनी राशियों के अनुसार देवियों का पूजा पाठ करेंगे तो उनका भाग्य अच्छा रहेगा और उनके ऊपर ईश्वर की कृपा भी बरसती रहेगी। कई लोग नियमित तौर से पूजा करते वक्त तुलसी पूजन करना भूल जाते हैं जबकि हिंदू धर्म में तुलसी को भी माना गया है और तुलसी पूजन के लाभ भी बताये गए हैं। मान्यता है कि जिस घर में मां तुलसी की पूजा अर्चना होती है वहां सुख समृद्धि का वास होता है और घर की स्त्रियां और गृहस्वामी प्रसन्न रहते हैं।
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*नवग्रहों से संबंधित उपाये आधार व्याख्या*: * प्रथम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को गले में धारण करना चाहिए * द्वितीय भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को देवी - देवता को अर्पित करना चाहिए * तृतीय भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को बाजू / हाथ में धारण करना चाहिए * चतुर्थ भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को जल प्रवाह करें या पर्स में रखें * पंचम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को शिक्षा संस्थान में पहुंचाए या विद्यार्थी को दान करें * छ्ठे भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को गड्ढे / कुएं / बरसाती नाले में गिराएं * सप्तम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को मिट्टी में दबाएं * अष्टम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को श्मशान / खाली जमीन में दबाएं * नवम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को संगत में बांटे * दसम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु का सरकारी जमीन पर उपाये करें या सरकारी कर्मचारी को दान * एकादश भाव में विराजमान ग्रह के लिए ग्रह से संबंधित रंग का रुमाल उपयोग में लाएं । * द्वादश भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को छत पर रखें #कारक_ग्रह_को_धारण_करने_का_उपाये : किसी भी कारण वश किसी भाव से संबंधित फल प्राप्ति में बाधा का अनुभव हो तो उस भाव के कारक ग्रह के उपाये के तौर पर जातक को ग्रह से संबंधित जड़ी / ओषधि जल में मिला कर स्नान ज़रूर करना चाहिए, जैसे कि गुरु ग्रह 2, 5, 9, 12वे भाव का कारक ग्रह है तो जब भी इन में से किसी भाव से फल प्राप्ति में बाधा का अनुभव हो तो बाकी उपायों के साथ जातक को जल में हल्दी मिला कर स्नान करना चाहिए , प्रथम भाव के लिए बेल के पत्ते जल में मिला कर स्नान करें, तृतीय भाव के लिए नीम के पत्ते , चतुर्थ भाव के लिए जल में दूध मिला कर , छ्ठे भाव के लिए दूर्वा जल में मिला कर, सप्तम भाव के लिए हरी इलायची पानी में उबाल कर उस पानी को स्नान करने वाले जल में मिला दें , अष्टम और दसम भाव के लिए स्नान से पहले सरसो का तेल से मालिश करें , एकादश भाव के लिए जल में काले तिल मिला कर स्नान करें , यह उपाये लगातार 43 दिन करना चाहिए । #काल_पुरूष_कुण्डली_अनुसार_नीच_ग्रह_के_दान_का_उपाये : जैसे कि किसी की जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव में पापी ग्रह होकर सुख स्थान को खराब कर रहे हो तो , कालपुरुष कुण्डली अनुसार चतुर्थ भाव में मंगल नीच का होता है, इस लिए ऐसे जातक को सुख स्थान की शूभता के लिए मंगल से संबंधित दान करने चाहिए , इसी तरह लग्न भाव में शनि नीच का होता है तो लग्न भाव की शूभता के लिए शनि के दान किये जा सकते हैं । #एक_ही_भाव_में_दो_शत्रु_ग्रह_हो : जैसे कि जन्म कुण्डली के किसी भी भाव में सूर्य शनि की युति हो तो इस स्थिति में उस भाव की शूभता के लिए बुध ग्रह को उस भाव में स्थापित करना चाहिए क्योंकि बुध ग्रह दोनो का मित्र ग्रह है इस तरह बुध के उपाये से सूर्य शनि का झगड़ा खत्म हो जाएगा और भाव से शुभ फल आने लगेंगे ।
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शनि का बारह भाव मे फल ओर उसके उपाय .......शनि का पहले भाव में फल पहला घर सूर्य और मंगल ग्रह से प्रभावित होता है। पहले घर में शनि तभी अच्छे परिणाम देगा जब तीसरे, सातवें या दसवें घर में शनि के शत्रु ग्रह न हों। यदि, बुध या शुक्र, राहू या केतू, सातवें भाव में हों तो शनि हमेशा अच्छे परिणाम देगा। यदि शनि नीच का हो और जातक के शरीर में बाल अधिक हों तो जातक गरीब होगा। यदि जातक अपना जन्मदिन मनाता है तो बहुत बुरे परिणाम मिलेंगे हालांकि जातक दीर्घायु होगा। उपाय: (1) शराब और मांसाहारी भोजन से स्वयं को बचाएं। (2) नौकरी और व्यवसाय में लाभ के लिए जमीन में सुरमा दफनायें। (3) सुख और समृद्धि के लिए बंदरों की सेवा करें। (4) बरगद के पेड़ की जड़ों पर मीठा दूध चढानें से शिक्षा और स्वास्थ्य में सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। शनि का दूसरे भाव में फल जातक बुद्धिमान, दयालु और न्यायकर्ता होगा। वह धन का आनंद लेगा और धार्मिक स्वभाव का होगा। भले ही शनि उच्च का हो या नीच का, यह नतीजा आठवें भाव में बैठे ग्रह पर निर्भर करेगा। जातक की वित्तीय स्थिति सातवें भाव में स्थित ग्रह पर निर्भर करेगी। परिवार में पुरुष सदस्यों की संख्या छठवें भाव और आयु आठवें भाव पर निर्भर करेगी। जब शनि इस भाव में नीच का हो तो शादी के बाद उसके ससुराल वाले परेशान होंगे। उपाय: (1) लगातार 43 दिनों तक नंगे पांव मंदिर जाएं। (2) माथे पर दही या दूध का तिलक लगाएं। (3) साँप को दूध पिलाए। शनि का तीसरे भाव में फल इस घर में शनि अच्छा परिणाम देता है। यह घर मंगल ग्रह का पक्का घर है। जब केतु अपने इस घर को देखता है तो यहां बैठा शनि बहुत अच्छे परिणाम देता है। जातक स्वस्थ, बुद्धिमान और बहुत सरल स्वभाव का होता है। यदि जातक धनवान होगा तो उसके घर में पुरुष सदस्यों की संख्या कम होगी। गरीब होने की दशा में परिणाम उल्टा होगा। यदि जातक शराब और मांशाहार से दूर रहता है तो वह लम्बे और स्वस्थ जीवन का आनंद उठाएगा। उपाय: (1) तीन कुत्तों की सेवा करें। (2) आँखों की दवाएं मुफ्त बांटें। (3) घर में एक कमरे में हमेशा अंधेरा रखना बहुत फायदेमंद साबित होगा। शनि का चौथे भाव में फल यह भाव चंद्रमा का घर होता है। इसलिए शनि इस भाव में मिलेजुले परिणाम देता है। जातक अपने माता पिता के प्रति समर्पित होगा और प्रेम मुहब्बत से रहने वाला होगा। जब कभी जातक बीमार होगा तो चंद्रमा से संबंधित चीजें फायदेमंद होंगी। जातक के परिवार से कोई व्यक्ति चिकित्सा विभाग से संबंधित होगा। जब शनि इस भाव में नीच का होकर स्थित हो तो शराब पीना, सांप मारना और रात के समय घर की नीव रखना जैसे काम बहुत बुरे परिणाम देते हैं। रात में दूध पीना भी अहितकर है। उपाय: (1) साँप को दूध पिलाएं अथवा दूध चावल किसी गाय या भैंस को खिलाएं। (2) किसी कुएं में दूध डालें और रात में दूध न पियें। (3) चलते पानी में रम डालें। शनि का पांचवें भाव में फल यह भाव सूर्य का घर होता है। जो शनि का शत्रु ग्रह है। जातक घमंडी होगा। जातक को 48 साल तक घर का निर्माण नहीं करना चाहिए, अन्यथा उसके बेटे को तकलीफ होगी। उसे अपने बेटे के बनवाए या खरीदे हुए घर में रहना चाहिए। जातक को अपने पैतृक घर में बृहस्पति और मंगल ग्रह से संबंधित वस्तुएं रखनी चाहिए, इससे उसके बच्चों का भला होता है। यदि जातक के शरीर में बाल अधिक होंगे तो जातक बेईमान हो जाएगा। उपाय: (1) बेटे के जन्मदिन पर नमकीन चीजें बाटें। (2) बादाम का एक हिस्सा मंदिर में बाटें और दूसरा हिस्सा लाकर घर में रख दें। सम्पूर्ण जन्म कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क करें शनि का छठें भाव में फल यदि शनि ग्रह से संबंधित काम रात में किया जाय तो हमेशा लाभदायक परिणाम मिलेंगे। यदि शादी के 28 साल के बाद होगी तो अच्छे परिणाम मिलेंगे। यदि केतु अच्छी स्थित में हो जातक धन, लाभदायक यात्रओं और बच्चों के सुख का आनंद पाता है। यदि शनि नीच का हो तो शनि से सम्बंधित चीजें जैसे चमडा, लोहा आदि को लाना हानिकारक होता है, खासकर तब, जब शनि वर्षफल में छठवें भाव में हो। उपाय: (1) एक काला कुत्ता पालें और उसे भोजन करायें। (2) नदी या बहते पानी में नारियल और बादाम बहाएं। (3) सांप की सेवा बच्चों के कल्याण के लिए फायदेमंद साबित होगी। शनि का सातवें भाव में फल यह घर बुध और शुक्र से प्रभावित होता है, दोनो ही शनि के मित्र ग्रह हैं। इसलिए शनि इस घर में बहुत अच्छा परिणाम देता है। शनि से जुड़े व्यवसाय जैसे मशीनरी और लोहे का काम बहुत लाभदायक होगा। यदि जातक अपनी पत्नी से अच्छे संबंध रखता है तो वह अमीर और समृद्ध होगा और लंबी आयु के साथ अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लेगा। यदि बृहस्पति पहले घर में हो तो सरकार से लाभ होगा। यदि जातक व्यभिचारी हो जाता है या शराब पीने लगता है तो शनि नीच और हानिकर हो जाता है। यदि जातक 22 साल के बाद शादी करता है तो उसकी दृष्टि पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। उपाय: (1) किसी बांसुरी में चीनी भरें और किसी सुनसान जगह जैसे कि जंगल आदि में दफना दें। (2) काली गाय की सेवा करें। शनि का आठवें भाव में फल आठवें घर में कोई भी ग्रह शुभ नहीं माना जाता है। जातक दीर्घायु होगा लेकिन उसके पिता की उम्र कम होती है और जातक के भाई एक-एक करके शत्रु बनते जाते हैं। यह घर शनि का मुख्यालय माना जाता है, लेकिन यदि बुध, राहू और केतु जातक की कुंडली में नीच के हैं तो शनि बुरा परिणाम देगा। उपाय: (1) अपने साथ चांदी का एक चौकोर टुकड़ा रखें। (2) नहाते समय पानी में दूध डालें और किसी पत्थर या लकड़ी के आसन पर बैठ कर स्नान करें। शनि का नौवें भाव में फल जातक के तीन घर होंगे। जातक एक सफल यात्रा संचालक (टूर ऑपरेटर) या सिविल इंजीनियर होगा। वह एक लंबे और सुखी जीवन का आनंद लेगा साथ ही जातक के माता - पिता भी सुखी जीवन का आनंद लेंगे। यहां स्थित शनि जातक की तीन पीढ़ियों शनि के दुष्प्रभाव से बचाएगा। अगर जातक दूसरों की मदद करता है तो शनि ग्रह हमेशा अच्छे परिणाम देगा। जातक के एक बेटा होगा, हालांकि वह देर से पैदा होगा। उपाय: (1) बहते पानी में चावल या बादाम बहाएं। (2) बृहस्पति से संबंधित (सोना, केसर) और चंद्रमा से संबंधित (चांदी, कपड़ा) का काम अच्छे परिणाम देंगे। शनि का दसवें भाव में फल यह शनि का अपना घर है, जहां शनि अच्छा परिणाम देगा। जातक तब तक धन और संपत्ति का आनंद लेता रहेगा, जब तक कि वह घर नहीं बनवाता। जातक महत्वाकांक्षी होगा और सरकार से लाभ का आनंद लेगा। जातक को चतुराई से काम लेना चाहिए और एक जगह बैठ कर काम करना चाहिए। तभी उसे शनि से लाभ और आनंद मिल पाएगा। उपाय: (1) प्रतिदिन मंदिर जाएं। (2) शराब, मांस और अंडे से परहेज करें। (3) दस अंधे लोगों को भोजन कराएं। शनि का ग्यारहवें भाव में फल जातक के भाग्य का निर्धारण उसकी उम्र के अडतालीसवें वर्ष में होगा। जातक कभी भी निःसंतान नहीं रहेगा। जातक चतुराई और छल से पैसे कमाएगा। शनि ग्रह राहु और केतु की स्थिति के अनुसार अच्छा या बुरा परिणाम देगा। उपाय: (1) किसी महत्वपूर्ण काम को शुरू करने से पहले 43 दिनों तक तेल या शराब की बूंदें जमीन पर गिराएं। (2) शराब न पियें और अपना नैतिक चरित्र ठीक रखें। शनि का बारहवें भाव में फल शनि इस घर में अच्छा परिणाम देता है। जातक के दुश्मन नहीं होंगे। उसके कई घर होंगे। उसके परिवार और व्यापार में वृद्धि होगी। वह बहुत अमीर हो जाएगा। हालांकि, यदि जातक शराब पिए, मांशाहार करे या अपने घर के अंधेरे कमरे में रोशनी करे तो शनि नीच का हो जाएगा। उपाय: (1) किसी काले कपड़े में बारह बादाम बांधकर उसे किसी लोहे के बर्तन में भरकर किसी अंधेरे कमरे में रखने से अच्छे परिणाम मिलेंगे।
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पौराणिक कथाओं के अनुसाक एक समय सूर्यदेव जब गर्भाधान के लिए अपनी पत्नी छाया के समीप गए तो छाया ने सूर्य के प्रचंड तेज से भयभीत होकर अपनी आंखें बंद कर ली थीं। कालांतर में छाया के गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ। शनि के श्याम वर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर यह आरोप लगाया कि शनि मेरा पुत्र नहीं है तभी से शनि अपने पिता सूर्य से शत्रुता रखते हैं। शनिदेव ने अनेक वर्षों तक भूखे-प्यासे रहकर शिव आराधना की तथा घोर तपस्या से अपनी देह को दग्ध कर लिया था, तब शनिदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने शनिदेव से वरदान मांगने को कहा। शनिदेव ने प्रार्थना की- युगों-युगों से मेरी मां छाया की पराजय होती रही है, उसे मेरे पिता सूर्य द्वारा बहुत अपमानित व प्रताड़ित किया गया है इसलिए मेरी माता की इच्छा है कि मैं (शनिदेव) अपने पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली व पूज्य बनूं। तब भगवान शिवजी ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा स्थान सर्वश्रेष्ठ रहेगा। तुम पृथ्वीलोक के न्यायाधीश व दंडाधिकारी रहोगे। साधारण मानव तो क्या- देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर और नाग भी तुम्हारे नाम से भयभीत रहेंगे। ग्रंथों के अनुसार शनिदेव कश्यप गोत्रीय हैं तथा सौराष्ट्र उनका जन्मस्थल माना जाता है। • ज्योतिष के अनुसार सूर्य पुत्र शनिदेव को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं कि वह गुस्सेल, भावहीन और निर्दयी हैं। • शनिदेव न्याय के देवता हैं। आपको जानकर हैरानी भी होगी कि जिस शनि के प्रकोप से दुनिया डरती है वह भी इन देवी-देवताओं से डरते हैं। • शनि महाराज को जिनसे डर लगता है उनमें एक नाम तो हनुमान जी का है। कहते हैं हनुमानजी के दर्शन और उनकी भक्ति करने से शनि के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं और हनुमान जी के भक्तों को शनिदेव परेशान नहीं करते। • श्रीकृष्ण, शनि महाराज के ईष्ट देव माने जाते हैं। इनके दर्शन के लिए शनि महाराज ने कोकिला वन में तपस्या की थी। यहीं कोयल रूप में श्रीकृष्ण ने शनि महाराज को दर्शन दिए थे और शनि महाराज ने कहा था कि वह कृष्ण भक्तों को परेशान नहीं करेंगे।
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मिथुन लग्न की कुंडली में मंगल – Mithun Lagn Kundali me Mangal (Mars)  मिथुन लग्न की कुंडली में 12 भावों में मंगल कैसे फल प्रदान करते हैं । यहां मंगल षष्ठेश, एकादशेश होने से एक मारक गृह हैं । मंगल की 4, 7, 8वीं दृष्टि होती है और कर्क राशि मंगल की नीच राशि व् मकर उच्च मानी जाती है। मिथुन लग्न कुंडली में अगर मंगल बलवान ( डिग्री से भी ताकतवर ) होकर स्थित हो तो समस्त कुंडली में अधिकतर फल अशुभ ही प्राप्त होते हैं । यहां बताते चलें की कुंडली के 6, 8, 12 भावों में जाने से योगकारक गृह भी अपना शुभत्व खो देते हैं और खराब परिणाम देने के लिए बाध्य हो जाते हैं । अपवाद केवल विपरीत राज योग की कंडीशन में हो 6, 8, 12 भावों में पड़े गृह शुभ फल प्रदान करने की स्थिति में आते हैं । यदि लग्नेश बुध बलवान होकर शुभ स्थित हों तो मंगल 6, 8, 12 भाव में कहीं स्थित होने पर शुभ परिणाम कारक हैं ।  कारक ग्रह को बलाबल में सुदृढ़ होना और शुभ स्थित होना उत्तम समझना चाहिए और मारक गृह का बलाबल में कमजोर होना उत्तम जानें । कुंडली के उचित विश्लेषण के बाद ही उपाय संबंधी निर्णय लिया जाता है उक्त ग्रह को रत्न से बलवान करना है , दान से ग्रह का प्रभाव कम करना है, कुछ तत्वों के जल प्रवाह से ग्रह को शांत करना है या मंत्र साधना से उक्त ग्रह का आशीर्वाद प्राप्त करके रक्षा प्राप्त करनी है । मंत्र साधना सभी के लिए लाभदायक होती है । आइये मिथुन लग्न कुंडली के 12 भावों में मंगल देव के शुभाशुभ प्रभाव को जानने का प्रयासकरते हैं : मिथुन लग्न – प्रथम भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mangal pratham bhav me लग्नेश बुद्ध के अति शत्रु मंगल यदि लग्न में ही विराजमान हो जाएँ तो जातक हर काम में जल्दबाजी करने वाला होता है , बड़े भाई बहनो के सुख में कमी आती है , माता से मन मुटाव रहता है , पत्नी से नहीं बनती है और हर शुभ काम में देरी होती है । मंगल की महादशा में टेंशन बानी ही रहती है । जातक के विदेश सैटलमेंट के योग बनते हैं मिथुन लग्न – द्वितीय भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mangal dweetiya bhav me : यहां कर्क राशि में आने से मंगल नीच के हो जाते हैं । धन , कुटुंब , परिवार या कह लीजिये सराउंडिंग्स लिए बहुत अच्छा नहीं होता , वाणी बहुत खराब होती है। यदि मंगल अच्छी डिग्री में हो तो ऐसे जातक के परिवार में आने के बाद से घर की समस्याओं में बढ़ौतरी होती है । पुत्र प्राप्ति का योग बनता है , पेट खराब , संकल्पशक्ति क्षीण , मन अशांत रहता है । हर काम में रुकावट आती है । जातक धर्म को नहीं मानता , पिता से संबंध में खटास आती है , विदेश यात्रा का योग बनता है । मिथुन लग्न – तृतीय भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mars treetiya bhav me : यद्यपि तीसरा घर मंगल का कारक भाव होता है परन्तु और अधिकतर अशुभ परिणाम ही देते हैं । मेहनत के उचित परिणाम नहीं मिलते हैं । जातक धर्म को नहीं मानता , पिता से संबंध में खटास आती है , विदेश यात्रा का योग बनता है , प्रोफेशनल लाइफ में बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है । छठा भाव मंगल का कारक भाव होने से प्रतियोगिता में विजयी बनाते हैं । मिथुन लग्न – चतुर्थ भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mangal chaturth bhav me : यहाँ सीने में कोई रोग उत्पन्न हो सकता है । प्रॉपर्टी लेने में, सुख सुविधाओं के साधन जुटाने में प्रॉब्लम आती है, माता से मन मुटाव रहता है । पत्नी का साथ मिलता है, पार्टनरशिप से लाभ की संभावना रहती है, काम काज में समस्याएं, बड़े भाई बहन का साथ ना मिलना व् इनसे परेशानी मिलती है । मंगल की महादशा / अंतर्दशा में आठवीं दृष्टि ( स्वयं स्वामी ) ग्यारहवें भाव पर पड़ने से लाभ अर्जित होता रहता है । मिथुन लग्न – पंचम भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mars pancham bhav me : पुत्र प्राप्ति का योग बनता है परन्तु पुत्र प्राप्ति में देरी होती है । पेट खराब , मन खिन्न रहता है , आकस्मिक धन हानि होती है , हर काम में रुकावट आती है , टेंशन – डिप्रेशन बना रहता है, बड़े भाई बहन से प्रॉब्लम रहती है , फिजूल खर्च होता है । मिथुन लग्न – शष्टम भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mangal shashtam bhav me : स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याएं बनी रहती हैं, लड़ाई झगडे लगे रहते हैं , कोर्ट कैसे से संबधित समस्याएं लगी रहती हैं । पिता से मन मुटाव लगा रहता है और धन हानि की संभावना बनी रहती है । विदेश यात्रा का योग बनता है । बड़े भाई बहनो को प्रॉब्लम , संतान को प्रॉब्लम आती है । यदि बुद्ध बलि हों तो विपरीत राजयोग बनता है और छठे भाव में स्थित मंगल शुभ परिणामकारी होते हैं । मिथुन लग्न – सप्तम भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mangal saptm bhav me : जातक पत्नी व् अन्य साझेदारों से अशुभ फल प्राप्त करने वाला होता है । प्रोफेशनल लाइफ पर बुरा असर पड़ता है , मन अशांत रहता है , वाणी खराब हो जाती है , परिवार का साथ नहीं मिलता है । मिथुन लग्न – अष्टम भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mangal ashtm bhav me : परेशानियां लगातार बनी रहती हैं , परिश्रम के उचित परिणाम नहीं मिलते हैं , लाभ में कमी आती है , वाणी खराब हो जाती है , पत्नी बीमार रहती है , परिवार से नहीं बनती ऐसे जातक को परिश्रम के अनुकूल परिणाम नहीं प्राप्त होते हैं । यदि बुद्ध बलि हों तो विपरीत राजयोग बनता है और आठवें भाव में स्थित मंगल शुभ परिणामकारी होते हैं । मिथुन लग्न – नवम भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mangal navam bhav me : जातक धार्मिक, पिता का आदर करने वाला नहीं होता , पत्नी का सुख मिलता है, साझेदारी से लाभ की संभावना रहती है, विदेशों यात्रा / सेटलमेंट का योगबनता है , परिश्रमी का फल अल्प मात्रा में मिलता हैं, सुख सुविधाओं में कमी आती है । माता को परेशानी बनी रहती है । सीने में विकार आने की संभावना रहती है। मंगल की महादशा में पिता बीमार रहते हैं । मिथुन लग्न – दशम भाव में मंगल – Mithun Lagan – Mars dasham bhav me : प्रोफ्रेशनल लाइफ में परेशानियां आती है, सुख सुविधाओं में कमी आती है , पुत्र प्राप्ति का योग बनता है । पेट खराब, मन खिन्न रहता है, आकस्मिक धन हानि होती है । माता, बड़े भाई बहन और संतान को परेशानी बनी रहती है । सीने में विकार आने की संभावना रहती है । मिथुन लग्न – एकादश भाव में मंगल – यहां मंगल देवता के आने से लाभ की संभावनाएं बनती हैं । बड़े भाई बहनो से लाभ मिलता है । स्वस्थ्य संबंधी समस्याएं बनी रहती हैं, धन, परिवार, कुटुंब का साथ नहीं मिलता है , मन खिन्न रहता है । पुत्र प्राप्ति का योग बनता है । कोर्ट केस कॉम्पिटिशन में जीत होती है। मिथुन लग्न – द्वादश भाव में मंगल यदि बुद्ध बलि हों तो विपरीत राजयोग बनता है और 12वें भाव में स्थित मंगल शुभ परिणामकारी होते हैं अन्यथा द्वादश भाव में आने से व्यय बढ़ते हैं, मेहनत में इजाफा होता है, ऋण, रोग, शत्रु, बढ़ जाते हैं , पत्नी – पार्टनर से समस्या व् व्यवसाय में भी परेशानियां उठानी पड़ती हैं । केवल विपरीत राजयोग की स्थिति में परिणाम शुभ जानने चाहियें । कुंडली का उचित विश्लेषण आवश्य करवाएं तदुपरांत ही किसी उपाय को अपनाएँ । मंगल के फलों में बलाबल के अनुसार कमी या वृद्धि जाननी चाहिए । धन्यवाद
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