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शनि मार्गी 18 सेप्टेंबर से हुआ है

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ज्योतिष मे शनिदेव रोजगार, कर्म, न्याय के कारक व आज 18 सितम्बर दोपहर 2:15 से 142 दिन बाद शनि देव धनु राशि मे वक्री से मार्गी होकर 26 जनवरी 2020 को मकर राशि मे प्रवेश करेंगे। जिसके परिणाम स्वरुप जो व्यक्ति पिछले 4 -5 माह से रोजगार व क़ानूनी कारणों से परेशान है। उन्हे राहत मिलेगी।
posted Sep 18, 2019 by anonymous

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जाने कुंडली से शनि आपका मित्र या शत्रु - शनि को लंगड़ा ग्रह भी कहते हैं क्योंकि यह बहुत ही धीमी गति से चलता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है कि इंद्रजीत के जन्म के समय में रावण ने हर ग्रह को आदेश दिया था कि वे सबके सब एकादश भाव में रहें। इससे जातक की हर इच्छा की पूर्ति होती है। शनि भी एकादश भाव में बहुत बढ़िया प्रभाव देता है; उतना ही बुरा प्रभाव द्वादश में देता है। शनि मोक्ष का कारक ग्रह, मोक्षकारक द्वादश में हो तो इससे बुरा फल और क्या हो सकता है? देवताओं के इशारे पर शनि ने इंद्रजीत के जन्म समय में अपना एक पैर द्वादश भाव में बढ़ा दिया, जिसे देख रावण का क्रोध सीमा को पार कर गया एवं शनि के एक पैर को काट कर उसको लंगड़ा ग्रह बना दिया। शनि का सूर्य एवं चंद्र के प्रति मित्रता का भाव नहीं होता है। शनि का आचरण सूर्य-चंद्र के आचरण के विरुद्ध होता है। यही वजह है कि सूर्य-चंद्र की राशियों-सिंह एवं कर्क के विपरीत इसकी राशियां मकर एवं कुंभ हैं। चंद्र किसी काम को जल्दी में अंजाम देना चाहता है, पर शनि और चंद्र का किसी तरह का संबंध हो गया, तो एक तो काम जल्दी नहीं होगा, दूसरे कई बार प्रयास करना होगा। सूर्य हृदय का कारक ग्रह कहलाता है। अगर शनि एवं सूर्य का संबंध होता है तो खून को ले जाने वाली नलिकाओं के छेद को संकीर्ण बना कर हृदय रोग पीछा करता है। शनि के ये सब अवगुण स्पष्ट नज़र आते हैं, किंतु इसमें गुणों की भी कमी नहीं है। शनि जनतंत्र का कारक ग्रह कहलाता है। राजनीति में शनि विश्वास का प्रतीक माना जाता है। अगर किसी राजनीतिज्ञ की कुंडली में शनि की स्थिति ठीक नहीं होती तो जनता को उस राजनेता की बातों का विश्वास नहीं होता है। शनि शुष्क, रिक्त, नियम पालन करने वाला, एकांतप्रिय, रहस्यों को अपने अंदर छिपाने वाला ग्रह है। यह एकांतप्रिय होता है, अतः पूजा, साधना आदि के लिए शुभ ग्रह माना जाता है। यह मन को शांत रखता है और अगर पूजा के समय मन शांत हो गया तो साधना में मन भी लगेगा एवं सिद्धि भी जल्दी होगी। पंचम भाव को पूजा से संबंधित भाव माना जाता है। अगर किसी जातक के पंचम भाव का उपस्वामी चंद्र है तो उस आदमी का मन पूजा में कभी भी नहीं लगेगा। पूजा के समय मन इधर-उधर खूब भटकेगा एवं हर बात की चिंता उस आदमी को उसी समय होगी। पर अगर शनि पंचम का उपस्वामी है, तो पूजा के समय मन एकदम शांत रहेगा। शनि के दोस्त ग्रहों में बुध एवं शुक्र के नाम आते हैं। पर शनि वृष एवं तुला लग्न वालों के लिए हमेशा ही लाभदायक होगा। पर यह बात मिथुन एवं कन्या लग्न वालों पर लागू नहीं होगी। उत्तर कालामृत के अनुसार शनि अगर अपनी राशि में स्थित हो या गुरु की राशि पर स्थित हो या उच्च का हो, तो शुभ होता है। पर शनि के बारे में एक विशेष बात यह कही गयी है कि शनि अगर अपनी भाव स्थिति के अनुसार शुभ है, तो उसे स्वयं की राशि पर, उच्च राशि में, या वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो योगकारक शनि की दशा के समय राजा भी भिखारी बन जाएगा। शनि अगर अशुभ हो, तो काम में देरी हो सकती है, निराशा मिल सकती है, झगड़ा हो सकता है, शांति बाधित हो सकती है, जातक का निरादर हो सकता है, उसे अवहलेना का शिकार होना पड़ सकता है। पर अगर शनि शुभ हो, तो शांति से काम करने, धन की बचत का उपाय करने, मेहनत करने, जीवन में सफलता प्राप्त करने एवं अपने अंदर बहुत सारे रहस्यों को दबा रखने की क्षमता मिलती है। शनि आयुष्कारक ग्रह कहलाता है एवं अगर यह आयु स्थान, यानी अष्टम भाव में हो, तो उम्र को बढ़ाता है। गुरु में जहां वृद्धि की बात होती है, वहीं शनि में कटौती की। गुरु जहां संतान वृद्धि में कारक ग्रह होता है, वहीं शनि को, परिवार नियोजन के द्वारा, संतान वृद्धि को रोकने की क्षमता प्राप्त है। गुरु एवं शनि में एक और खास भेद है। गुरु जहां पुरोहित का काम, धर्म के प्रचारक का काम करता है, वहां शनि मौन रह कर साधना करता है। उसे भोज खाने के स्थान पर उपवास करना ही भाता है। शनि का रंग बैंगनी है। इसका रत्न नीलम होता है। अंकों में संख्या 8 होती है। शनि के प्रभाव की वजह से ही 8 अंक को छिपे रहस्यों का अंक कहा जाता है। शनि से संबंधित विषय इतिहास, भूगर्भ शास्त्र, चिकित्सा की पुरानी पद्धतियां आदि हैं। शनि एवं मंगल दोनों को ही जमीन से वास्ता होता है, पर मंगल जमीन की ऊपरी सतह से संबंधित होता है, जबकि शनि भीतरी सतह से। शनि अगर शुभ स्थिति में न हो, तो तरह-तरह की बीमारियां दे सकता है। शरीर से उस गंदगी को बाहर आने से रोक देता है, जिसे बाहर निकलना चाहिए था। पायरिया हो जाता है, झिल्ली कड़ी हो जाती है, शरीर में खून आदि का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। यह सब उस स्थिति में होता है जब शनि चंद्र को प्रदूषित करता है। अगर इस प्रदूषण में मंगल भी आता है तो चेचक की संभावना बनती है एवं शरीर में मवाद जम जाता है। शनि अगर सिर्फ मंगल को दूषित कर रहा हो, तो रीढ़ की हड्डी का टेढ़ा होना, गिर कर चोट लगना, पित्त की थैली में पथरी का होना इत्यादि बीमारियां होती हैं। इसी तरह से शनि अगर सूर्य एवं गुरु को प्रदूषित करता है तो, शरीर में कोलेस्ट्रोल की वृद्धि के कारण रक्त वाहक नलिकाओं में अवरोध पैदा होता है एवं हृदयाघात की संभावना पैदा होती है। इस तरह से अलग-अलग ग्रहों के साथ अलग-अलग रोग हो सकते हंै। शनि के द्वारा दी गयी बीमारी ज्यादा समय के लिए होती है
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दरिद्रता और बदहाली लाता है शनि-चंद्र से बना विषयोग

 

 

 

शनि और चंद्रमा का संयोग जातक के लिए बेहद कष्टकारी माना जाता है। शनि अपनी धीमी प्रकृति के लिए बदनाम है और चंद्रमा अपनी द्रुत गति के लिए विख्यात। किंतु शनि क्षमताशील होने की वजह अक्सर चंद्रमा को प्रताड़ित करता है। यदि चंद्र और शनि की युति कुंडली के किसी भी भाव में हो, तो ऐसे में उनकी आपस में दशा-अंतर्दशा के दौरान विकट फल मिलने की संभावना बलवती होती है। शनि धीमी गति, लंगड़ापन, शूद्रत्व, सेवक, चाकरी, पुराने घर, खपरैल, बंधन, कारावास, आयु, जीर्ण-शीर्ण अवस्था आदि का कारक ग्रह है जबकि चंद्रमा माता, स्त्री, तरल पदार्थ, सुख, सुख के साथ, कोमलता, मोती, सम्मान, यश आदि का कारकत्व रखता है।

 

शनि और चंद्र की युति से विष योग नामक दुर्लभ अशुभ योग की सृष्टि होती है। ये विष योग जातक के जीवन में यथा नाम विषाक्तता घोलने में पूर्ण सक्षम है।



जिस भी जातक की कुण्डली में विष योग का निर्माण होता है, उसे जीवन भर अशक्तता, मानसिक बीमारी, भ्रम, रोग, बिगड़े दाम्पत्य आदि का सामना करना पड़ता है। हां, जिस भी भाव में ऐसा विष योग निर्मित हो रहा हो, उस भाव अनुसार भी अशुभ फल की प्राप्ति होती है।   

 

 

जैसे यदि किसी जातक के लग्न चक्र में शनि-चंद्र के संयोग से विष योग बन रहा हो तो ऐसा जातक शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम महसूस करता है। उसे ताउम्र कंगाली और दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। लग्न में शनि-चंद्र के बैठ जाने से उसका प्रभाव सप्तम भाव पर बेहद नकारात्मक होता है, जिससे जातक का घरेलू दाम्पत्य जीवन बेहद बुरा बीतता है। लग्न शरीर का प्रतिनिधि है इसलिए इस पर चंद्र और शनि की युति बेहद नकारात्मक असर छोड़ती है। जातक जीवन भर रोग-व्याधि से पीड़ित रहता है।

 

इसी प्रकार यदि द्वितीय भाव में शनि-चंद्र का संयोग बने तो जातक जीवन भर धनाभाव से ग्रसित होता है। तृतीय भाव में यह युति जातक के पराक्रम को कम कर देती है। चतुर्थ भाव में सुख और मातृ सुख की न्यूनता तथा पंचम भाव में संतान व विवेक का नाश होता है। छठे भाव में ऐसी युति शत्रु-रोग-ऋण में बढ़ोत्तरी व सप्तम भाव में शनि-चंद्र का संयोग पति-पत्नी के बीच सामंजस्य को खत्म करता है। अष्टम भाव में आयु नाश व नवम भाव में भाग्य हीन बनाता है। दशम भाव में ऐसी युति पिता से वैमनस्य व पद-प्रतिष्ठा में कमी एवं ग्यारहवें भाव में एक्सिडेंट करवाने की संभावना बढ़ाने के साथ लाभ में न्यूनता लाती है। जबकि बारहवें भाव में शनि-चंद्र की युति व्यय को आय से बहुत अधिक बढ़ाकर जातक का जीवन कष्टमय बना देने में सक्षम है।    

 

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5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच मे तीन ग्रहण है l एक महीने में तीन ग्रहण , दो चंद्र ग्रहण , एक सूर्य ग्रहण l जब कभी एक महीने में तीन से ज्यादा ग्रहण आ जाये तो एक चिंता का विषय बनता है l 5 जून 2020 चंद्रग्रहण प्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, जिसके कारण जिसके प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा। शेयर बाजार से जुड़े हुए लोग सावधान रहें। यह ग्रहण वृश्चिक राशि पर बहोत बुरा प्रभाव डालेगा। 21 जून 2020 सूर्य ग्रहण, एक साथ छ ग्रह वक्री रहेंगे बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु यह छह ग्रह 21 जून 2020 को वक्री रहेंगे। 5 जुलाई 2020 चंद्रग्रहण एक बहुत बड़ा परिवर्तन l मंगल का राशि परिवर्तन, सूर्य का राशि परिवर्तन, गुरु धनु राशि मे वापस, लेकिन वक्री रहेंगे। शुक्र मार्गी l
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