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राशियों की कुछ विशेष जानकारियां

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मेष- सातवां घर शादी का, व्‍यापारिक संबंधों का, विदेश यात्राओं का, व्‍यापार का और कानूनी समझौतों का होता है। गुरू का सातवें घर में उपस्थित होना मानसिक रूप से शांति देने का काम करेगा। सामान्‍य रूप से मेष के जातक थोड़ा गर्म मिजाज के होते हैं अगर उनका जन्‍म शुक्र ग्रह के नक्षत्र में न हुआ हो तो। इस गोचर के दौरान गुरू मंगल, राहू और स्‍वयं अपने नक्षत्रों से होकर गुजरेगा। शादीशुदा जीवन में संघर्ष होगा लेकिन धीरे-धीरे इससे बाहर आ जाएंगे। संभव है कि गुरू के इस गोचर के दौरान मेष राशि के जातको का वजन तेजी से बढ़े इसलिए बेहतर होगा कि अपनी खाने की आदतों पर ध्‍यान दें। इस गोचर के दौरान मिलने वाली मानसिक शांति ही आपकी सारी समस्‍याओं का समाधान जैसी है। जीवनसाथी हो या बिजनेस पार्टनर दोनों न तो सहयोग के मूड में रहेंगे और न ही आपके साथ आगे बढ़ने की इच्‍छा होगी। जब गुरू राहु के नक्षत्र में पहुचेगा तो स्वास्थ में थोड़ी परेशानी आएगी। गुप्‍त रोग भी हो सकते हैं। जब गुरू अपने नक्षत्र में आएगा तो खर्चों में बहुत बढ़ोत्‍तरी हो जाएगी। बेवजह की चीजों में धन व्‍यय करेंगे। दूर के लोगों से व्‍यापारिक रिश्‍ते बनेंगे। मेष राशि के कुछ जातकों का विवाह भी संभव है। वृषभ- गुरु आपके इन स्थानों का मालिक है – अष्टम और एकादश गुरु इस भाव में गोचर कर रहा है – पांचवें बृहस्पति का गोचर आपके पंचम भाव में होने जा रहा है । अगर आप गर्भवती हैं तो इस अगस्त लगते ही एक बार चेकअप जरूर करवा लें। पेट और पैर सम्बंधित बीमारी परेशान करेगी। कुछ अडचनों के बाद धन प्राप्ति का सुन्दर संयोग बनता है, गुरु आपकी राशि का अष्टमेश है इसलिए कुछ ना कुछ अड़चन देता रहेगा। जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार रहे। गोचर आपके मान सम्मान को बढाने वाला होगा! विद्यार्थी यदि कहीं एड्मिसन लेना चाह रहें हैं तो भाग दौड़ और उठा-पटक के बाद एड्मिसन मिल जायेगा। दूसरे के प्रेम प्रसंगों को सुलझाने के प्रयास से बचें अन्यथा आप पर लांछन लग सकता है। मिथुन- गुरु का तुला में गोचर, मिथुन राशि के लिए गुरू पांचवे घर में गोचर कर रहा है। इस घर के गुरू के साथ बहुत गहरा संबंध होता है। कालपुरूष की कुंडली में पांचवा घर सूर्य का घर होता है और सूर्य और गुरू एक दूसरे के बहुत अच्‍छे मित्र हैं। पांचवा घर मंत्र शास्‍त्र और बुद्धि से संबंधित है और गुरू-बुध का भी यही स्‍वाभाव है। गोचर कर रहे ग्रह कई संम्‍मीकरणों के अनुसार अपना फल देते हैं यह सिर्फ लग्‍न राशि पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि हर एक कुंडली के लिए गोचर कर रहे ग्रह का प्रभाव अलग होता है। हालांकि इस स्‍थ‍िति में लग्‍नेश बुध और गुरू एक दूसरे के शत्रु हैं,लेकिन फिर भी गुरू जितना हो सकता है लाभ ही देता है। इसलिए इस गोचर के शुरू होते ही इस राशि के जातकों के प्रेम संबंध शुरू हो जाएंगे। जीवनसाथी के साथ अगर संबंध अच्‍छे नहीं थे तो इस गोचर के दौरान उनमें सुधार आएंगे। आप चीजों को ज्‍यादा समझेंगे और स्‍वीकार की भावना बढ़ेगी। गुरु का तुला में गोचर के दौरान शेयर बाजार से धनलाभ भी संभव है। पढ़ाई में बच्‍चे अच्‍छा प्रदर्शन करेंगे जिससें आप फूले नहीं समाएंगे। आपको इस गोचर के दौरान अपनी वाणी में नियंत्रण करना होगा और हो सकता है दांत या मसूड़ों के दर्द से भी परेशान होना पड़े। चेहरे में पिंपल भी हो सकते हैं। किसी अपने की सलाह मानकर कुछ पैसा फंसा सकते हैं। नौकरी बदलेगी या छूट जाएंगी लेकिन भाग्‍य आपके साथ ही रहेगा कर्क- गुरु आपके इन स्थानों का मालिक है – छठवें और नवमें गुरु इस भाव में गोचर कर रहा है – तीसरे बृहस्पति का गोचर आपके तीसरे भाव में हो रहा है। यह आपके छठे व नवम भाव का स्वामी है। अत: आपके भीतर एक नए आत्मविश्वास का संचार होगा, लेकिन अत्यधिक आत्मविश्वास में आकर लोगों से लड़ाई करने से बचें। देवगुरु की दृष्टि से विवाह योग्य लोगों के विवाह के योग बनेंगे, विवाहित लोगों को वैवाहिक सुख बढ़ेगा। पैत्रक संपत्ति को लेकर भाई-भतीजों में विवाद संभव है, विवाद से बचें। बीच का रास्ता निकालने का सोचें किसी माफिया के चक्कर में भूल से ना पड़ें। किसी बड़े धार्मिक उत्सव को आयोजित करने का योग बन रहा है। सिंह- गुरू आपकी शादी शुदा जिंदगी में प्‍यार के पल बढ़ाने की तैयारी कर चुका है। यह गोचर विवाहित लोगों के लिए अच्‍छे समय का तोहफा लेकर आ रहा है। इस राशि के जातक अपने व्‍यापार में भी अच्‍छी सफलता प्राप्‍त करेंगे और नए रिश्‍ते भी बनेंगे जो आगे चलकर उनके बहुत काम आएंगे। अच्‍छे करियर की ओर आगे बढ़ने में आपकी आंतरिक ताकत आपको उत्‍साहित करती रहेगी। यह सब तब होगा जब गुरू अपने ही नक्षत्रों से होकर गुजरेगा। लेकिन जब यह शनि के नक्षत्र से होकर गुजरेगा तो आपको आवास बदलना पड़ सकता है। ऐसा संभव है आप किसी का पहले से बना घर खरीदें। इस दशा में आपको काम के क्षेत्र में भी कुछ परेशानियां होंगी। इस दौरान जब शनि धनु राशि में गोचर करेगा तब से आपके वैवाहिक जीवन में भी कुछ परेशानियां आएंगी। कुंडली में तीसरा घर भाई-बहनों, पड़ोसियों, संचार, मीडिया और इंटरनेट से संबंधित होता है इसलिए अगर आप मीडिया या कम्‍यूनिकेशन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं तो गुरू के नक्षत्र में गुरू होगा तो आपको व्‍यस्‍त रखेगा लेकिन जब यह बुध के नक्षत्र में पहुंचेगा तो आप विख्‍यात हो जाएंगे। अगर अपने भाई-बहनों और रिश्‍तेदारों से संबंधों में अनबन चल रही होगी तो इस गोचर में गुरू के बुध के नक्षत्र में आते ही सब सही हो जाएगा। आपके सिर्फ तब धैर्य और समझदारी से काम लेना है जब गुरू अपने इस गोचर के दौरान शनि के नक्षत्र से होकर गुजरेगा। बाकी गुरू का यह 2017 का गोचर आपके लिए शुभ फल देने वाला है। कन्या- गुरु आपके इन स्थानों का मालिक है – चौथे और सातवें गुरु इस भाव में गोचर कर रहा है – आपकी ही राशि में बृहस्पति आपके पहले भाव में आ रहे हैं और ये आपके चतुर्थ और सप्तम भाव के स्वामी भी हैं, अत: आप प्रसन्न रहेंगे। विवाह योग्य लोगों का विवाह तय हो जायेगा। आय में वृद्धि होगी, मित्रों और भाई बंधुओं का भरपूर सहयोग मिलेगा। घर में मांगलिक कार्य होने की प्रबल सम्भावना है। गोचर हर मामले में अच्छा है परन्तु किसी पर अन्धविश्वास ना करें विशेष तौर पर किसी क़ानूनी कागजात पर हस्ताक्षर करने से पहले सोच समझ लें। किसी की कोई जमानत लेने से बचें। तुला राशि- गुरू इस राशि के राशि स्‍वामी शुक्र का शत्रु है इसके बाद भी गुरू बहुत हद तक अच्‍छा ही करता है क्‍योंकि गुरू और शुक्र दोनों ही अच्‍छे फल देने वाले ग्रह हैं। शादी शुदा जीवन बेहतर होगा लेकिन जन्‍म कुंडली के सितारे इस लग्‍न के कुछ जातकों को कानूनी रूप से अलग भी करवा सकते हैं। कुछ भी हो लेकिन गुरू का यह गोचर आपको मानसिक शांति अवश्‍य देगा। आपका उतावला और भटकने वाला मन गुरु का तुला में गोचर के दौरान शांत रहेगा। आप जीवन को स्थिर करने और अपने विकास के बारे में ज्‍यादा विचार करेंगे। अगर आपकी जन्‍म कुडली में सितारे आपका साथ दे रहे होंगे तो कुछ लोग इसी गोचर के दौरान व्‍यवस्‍थ‍ित हो जाएंगे। गोचर के दौरान गुरू अपने नक्षत्रों के साथ साथ शनि और बुध के नक्षत्रों से भी होकर गुजरेगा। लेकिन इस गोचर का अधिकतम लाभ आपको गुरू अपने नक्षत्र में होने के दौरान ही मिल जाएगा। नौकरी के क्षेत्र में अच्‍छे अवसर और प्रमोशन दोनों के आसार हैं। अगर किराए के मकान में रह रहे हैं तो मकान मालिक से झगड़ा हो सकता है। कुछ लोग धन प्राप्‍ति के लिए अपनी जमीन जायदाद बेच सकते हैं। आस- पास के क्षेत्र में यात्रा करने जा सकते हैं। अपने अंतिम चरण में 2017 में हो रहा गुरू का यह गोचर विदेश यात्रा भी करवा सकता है। वृश्‍चिक- गुरू के दूसरे और 12वें भाव का स्‍वामी होने के कारण खर्चे बढ़ेंगे। गुरू का आपके पांचवें भाव पर भ्‍ी अधिकार है इसलिए प्‍यार और सट्टे दोनों ही मामलों में आपको धक्‍का लग सकता है। इस गोचर के दौरान आप उतने सटीक और प्रभावी निर्णय लेने में असफल रहेंगे और आपका अंतरमन ही आपको गलत राह की ओर ले जाएगा। घर में छोटे-मोटे झगड़े हो सकते हैं और आप बच्‍चों की पढाई से भी परेशान रहेंगे। इस कारण से जीवनसाथी के साथ भी थोड़ी तू-तू, मैं-मैं हो सकती है। इसके बाद जब गुरू अपने नक्षत्र से निकल कर शनि के नक्षत्र में जाएगा तो छोटी-छोटी यात्राएं करनी पड़ेगी। अपने छोटे भाई बहनों के सा‍थ रिश्‍ते में कुछ खटास आएगी। इस गोचर के दौरान आपको अपने प्रयासों के पर्याप्‍त फल नहीं मिलेंगे हो सकता है जिस काम में आप हाथ डालें वो हो ही न या बहुत देर से हो। जगह परिवर्तन के योग भी हैं। इस गोचर के दौरान जब गुरू बुध के नक्षत्र में आएगा तो आपको अच्‍छे परिणाम मिलेंगे। स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति‍ सावधान रहेंगे तो इस समय आय के स्रोत खुलेंगे और नए संबंध भी बनेंगे। धनु- गुरू का यह गोचर धनु राशि के जातकों के लिए बहुत अच्‍छा समय लेकर आ रहा है। इस राशि के लिए लग्‍न स्‍वामी 11वें भाव में पहुंच रहा है जो कि लाभ का स्‍थान है। वर्ष 2017 में हो रहा यह गोचर तब धनु राशि के जातकों के लिए बहुत लाभप्रद रहेगा जब गुरू अपने ही नक्षत्रों से होकर गुजरेगा। इस दौरान आपके अपने दोस्‍तों के साथ अच्‍छे संबंध रहेंगे। कुछ लोगों के विवाहेत्‍तर संबंध भी होंगे और वो बिना परेशानी अपने इन संबंधों का सुख लेते रहेंगे। लोगों के साथ संबंधों में विकास होगा और समाज में आपकी लोगों से जान-पहचान कई गुना बढ़ जाएगी। यह समय उन लोगों के लिए तो बहुत बेहतर है जो किसी भी तरह से संचार आदि से जुड़े हैं। गुरु का तुला में गोचर के समय मीडिया में काम कर रहे लोगों और लेखन आदि के क्षेत्र से जुड़े लोग कार्यक्षेत्र में बहुत अच्‍छा कर सकेंगे। गुरू जब शनि के नक्षत्र में प्रवेश करेगा तो कुछ आर्थिक नुकसान होने के आसार भी है। परिवार के सदस्‍यों के बीच में मनमुटाव रहेगा। लेकिन जब ये बुध के नक्षत्र में पहुंचेगा तो धनु राशि के लिए व्‍यक्तिगत और आर्थिक दोनों मामलों में लाभदायक रहेगा क्‍योंकि यह 7वें और 10वें भाव से संबंधित है। साथ ही इसका संबंध 11वें घर से भी है। आर्थिक लाभ होंगे और व्‍यापार में वृद्ध‍ि होगी। कुल मिलाकर ये गोचर आपके लिए बहुत अच्‍छा जाने वाला है। कुंभ राशि- पिछला साल जब गुरू का कन्‍या राशि में गोचर हुआ था तो वह दौर कुंभ राशि‍ के जातकों के लिए बहुत संघर्ष से भरा था लेकिन यह गोचर जो कि तुला में है तो कुंभ राशि के जातक थोड़ा आनंद का अनुभव कर सकते हैं। काल पुरूष की कुंडली में गुरू 9वें भाव का स्‍वामी होता है और इस भाव में बैठा गुरू हमेशा अच्‍छे फल ही देता है। साथ ही यह 2वें और 11वें भाव का स्‍वामी है जो कि दो सबसे ज्‍यादा अच्‍छा फल देने वाले भाव है। अत: कुंभ राशि के जो जातक गुरू की महादशा या अंतर दशा से गुजर रहे होंगे उनके लिए यह समय बहुत अच्‍छा है। समय अच्‍छा है स्‍वास्‍थ्‍य में मामलों में सुधार होगा और अपने से बड़ों के साथ जो संबंध बिगड़ चुके हैं एक बार फिर उनमें नई जान आएगी। मकर- गुरु आपके इन स्थानों का मालिक है – बारहवें और तीसरे गुरु इस भाव में गोचर कर रहा है – नवम बृहस्पति का गोचर आपके नवम भाव में हो रहा है। यह गोचर आपके लिए एक बदलाव का गोचर होगा इस गोचर के बाद आपके सोचने और समझने का नजरिया अभी के मुकाबले एकदम बदल जायेगा। विद्यार्थी शिक्षा के लिए यात्रा करेंगे, नौकरी पेशा नौकरी के लिए और व्यापारी व्यापार अथवा तीर्थ यात्रा करेंगे, कुल मिला के कहा जाए तो यह समय यात्राओं की अधिकता होगी और इन यात्राओं से आपको लाभ होगा। धार्मिक पूजन पाठ या अनुष्ठान करवाने का योग भी बन रहा है। धार्मिक क्षेत्र में कुछ बेहतर करने का मौका मिलेगा, आप कुछ पुराने दोस्‍तों से मिलेंगे और कुछ नए दोस्‍त भी बनाएंगे। ऐसे लोग जो किसी भी तरह से धर्म से संबंधित व्‍यापार में हैं निश्‍चित ही धन और नाम दोनों की प्राप्‍त करेंगे। गुरू जब अपने नक्षत्राों से गोचर करेगा तो वह समय आपके जीवन का सबसे अच्‍छा समय होगा। आप संबंधि‍त क्षेत्र में कुछ बेहतर करेंगे। शिक्षा, धर्म और ज्ञान से जुड़े लोग जाने मानी हस्‍ती बन सकते हैं। धार्मिक रूप से यह समय बहुत कुछ प्राप्‍त करने और सीखने का है। शनि के नक्षत्रों में पहुंचने के बाद भी परिस्‍थ‍ितियों में बहुत ज्‍यादा बदलाव नहीं आएगा। अपने सामाजिक ताने-बाने के अनुसार आपको आर्थिक लाभ भी होगा। इस दौरान मंत्र स‍िद्धि में रूचि लेंगे। ऐसे जातक जिनका जन्‍म सतभिषा नक्षत्र में हुआ होगा उन्‍हें इस दौरान साधना से अनोखा अनुभव मिल सकता है। इस दौरान प्रेम संबंधों के स्‍थापित होने के संकेत भी मिल रहे हैं लेकिन यह क्षणिक ही होगा। बुध के नक्षत्र में पहुंचने के बाद बाकी चीजें तो सामन्‍य रहेंगी लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर आपको सावधान होने की जरूरत होगी। कुल मिला कर गुरू का यह गोचर आपके लिए बहुत अच्‍छे परिणाम लेकर आने वाला है। मीन- गुरु आपके इन स्थानों का मालिक है – लग्न और नवम गुरु इस भाव में गोचर कर रहा है – सप्तम बृहस्पति आपके सप्तम भाव में गोचर कर रहा है। यह आपका राशि स्वामी होने के साथ-साथ कर्मेश में भी है जोकि कर्म क्षेत्र में सफलता इंगित करता है। जीवनसाथी का सुन्दर सहयोग प्राप्त होगा। यदि आप जीवनसाथी से दूर रह रहे थे या किसी कारण से विवाद या और कोई भी कारण हो आपका जीवनसाथी से मिलन होगा विवाह योग्य लोगों का विवाह भी संपन्न होगा। आपकी ख्याति बढ़ेगी। जो लोग नौकरी की तलाश में हैं उनको नौकरी की प्राप्ति होगी और जो नौकरी कर रहे है उनको पदोन्नति मिलेगी। अधिकारीयों का सहयोग रहेगा।

References

ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय
वाराणसी
9450537461
posted Sep 10, 2017 by anonymous

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ज्योतिष के कुछ अचूक सूत्र 1)जब गोचर में शनि ग्रह धनु, मकर, मीन व कन्या राशियों में गुजरता है तो भयंकर अकाल रक्त सम्बन्धी विचित्र रोग होते हैं। 2)"स्त्री की कुंडली में यदि चन्द्र वृष कन्या या सिहं राशी में स्थित हो तो स्त्री के कम पुत्र होते हैं "। 3)"जन्म लग्न में चन्द्र व शुक्र हो तो स्त्री क्रोधिनी परन्तु सुखी होती है "। 4)"किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष सोमवार ,बुध या गुरूवार को शपथ ले तो उसे प्रजा एवं राष्ट्राध्यक्ष के लिए शुभ माना जाता है"।। 5)"सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ ,अष्टम,या द्वादश भाव में हो और नीच या अस्त हो तो जातक के विवाह में बाधा आती है" 6)"चन्द्र से सम्बंधित चार विभिन्न योग बनते हैं जब कोई ग्रह चन्द्र से 10वें 7वें, 4थे, ओर पहले हो तो क्रमश:उत्तम,मध्यम, अधम ओर अधमाधम योग बनता है। यदि इनमें अंतिम योग बनता हो तो कुंडली के अन्य योग कमजोर और निष्फल हो जाते हैं"!! 7)जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है. जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है. जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए. 8)))जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है. जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है। 9)जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है. चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है. यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है. 10)कोई भी ग्रह पहले नवाँशा में होने से जातक को एक प्रगतिशील और साहसिक नेता बनाता है ऐसे ग्रह की दशा /अन्तर्दशा के समय में जातक सक्रिय होता है।। और अपने सम्वन्धित क्षेत्र में सफलता पाता है।। 11)"सूर्य चन्द्र मंगल और लगन से गर्भाधान का विचार किया जाता है वीर्य की अधिकता से पुरुष तथा रक्त की अधिकता से कन्या होती है। रक्त और रज का बरावर होने से नपुंसक का जन्म होता है"। 12)जन्म से चार वर्ष के भीतर बालक की मृत्यु का कारण माता के कुकर्मों, चार से आठ वर्ष के बीच मृत्यु पिता के पाप कर्मों और आठ से बारह वर्ष की आयु के मध्य मृत्यु स्वयं के पूर्वजन्म के पापों के कारण मानी गई है. 13)शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म देने की जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है। 14)राशिचक्र के २७ नक्षत्रों के नौ भाग करके तीन-तीन नक्षत्रों का एक-एक भाग माना गया है। इनमें प्रथम 'जन्म नक्षत्र', दसवाँ 'कर्म नक्षत्र' तथा उन्नीसवाँ 'आधान नक्षत्र' माना गया है। शेष को क्रम से संपत्, विपत्, क्षेम्य, प्रत्वर, साधक, नैधन, मैत्र और परम मैत्र माना गया है। 15)किसी भी प्रकार का रिसाव राहु के अंतर्गत आता है.रिसाव किसी भी चीज का हो सकता है द्रव , शक्ति , धन , मान सम्मान या ओज का.। 16)बुध के निर्बल होने पर कुंडली में अच्छा शुक्र भी अपना प्रभाव खो देता है क्योंकि शुक्र को लक्ष्मी माना जाता है और विष्णु की निष्क्रियता से लक्ष्मी भी अपना फल देने में असमर्थ हो जाती हैं. 17)शनि वचनबद्धता , कार्यबद्धता और समयबद्धता का कारक ग्रह है. जिस भी व्यक्ति के जीवन में इन तीनो चीजों का अभाव होगा तो समझना चाहिए की उसकी पत्रिका में शनि की स्थिति अच्छी नहीं है। 18)नीलम को शनि रत्न माना जाता रहा है. लेकिन इस रत्न की तुरंत प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति मन में संदेह उत्पन्न करती है की क्या यह वास्तव में शनि रत्न है. क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया शनि का स्वभाव नहीं है. शनि एक मंदगामी ग्रह है. इसीलिये इसे शनैश्चर भी कहा गया है. जबकि तुरंत और अचानक प्रतिक्रिया राहु का स्वाभाव है. राहु नीलवर्णी माना गया है. सभी प्रकार के विषों का अधिपत्य राहु कोप्राप्त है.। इधर ज्योतिष की अपेक्षाकृत ‘लाल किताब’ भी नीलम को राहु की कारक वस्तु मानती है.। यह बात नीलम के स्वभाव से मेल खाती है. फिर नीलम रत्न का अधिपति कौन है. शनि या राहु.?????? 19)ज्योतिष में व्यवस्था है की पीड़ित ग्रहों की वस्तुएं दान की जाएं. यह ग्रहपीड़ा शांति के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण उपाय है. इस उपाय में ग्रह की कारक वस्तु को मंदिर , डाकोत , अपाहिजों और गरीबों में दान किया जाता है. इससे अनिष्टकारक ग्रह के प्रकोप में कमी आ जाती है. इस उपाय में कुंडली विवेचना उपरांत ही तय किया जाता है की अमुक वस्तु कितनी बार दान करनी है. कई बार यह उपाय केवल एक बार करना होता है तो कभी कई बार दोहराना होता है. 20)"लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है."। 21)"व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा"".।।।।। Kp 1)चोरी हुई या नहीं ? - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - ; - - - ; - ;- - दूसरे घर के उप नक्षत्र को देखें यदि उसका सम्बन्ध 7 तथा 8 से बनता हैचोरी हुई है यदि चन्द्र का सम्बन्ध किसी भी तरह केतू से हो गया तो प्रश्न कर्ता उलझन में तथा चिंता में है। क्या चोरी हुई वस्तु मिलेगी या नहीं यदि सूचक RP 2,6और 11 से सम्बन्ध बना लेते हैं तो चोरी किया गया समान मिल जाएगा।। यदि 5,8 तथा 12 से बनता है तो नहीं ।। 2)हम जिस भाव का विचार कर रहे है उस भावसे 1 3 5 7 9 11 भाव शुभ है 4 8 12 भाव बुरे है 2 6 10 वा भाव तट स्त है। 3) पितृ ऋण जब कुण्डली में बृहस्पति 2,5,9,12 भावो से बाहर हो जोकि बृहस्पति के पक्के घर है. तथा बृहस्पति स्वंय 3,6,7,8,10 भाव में और बृहस्पति के पक्के घरों (2,5,9,12) में बुध या शुक्र या शनि याराहु या केतु बैठा हो तो व्यक्ति पितृ ऋण से पीडित होता है। 24)मातृ ऋण जब कुण्डली में चन्द्रमा द्वितीय एंव चतुर्थ भाव से बाहर कहीं भी स्थित हो तथाचतुर्थ भाव में केतु हो तो व्यक्ति मातृ-ऋण से पीडित होता है. अर्थात चन्द्रमाविशेषतः3,6,8,10,11,12 भावों में स्थित हो.। 25)नमक (पिसा हुआ) ==: सूर्य!!!!!. लाल मिर्च (पिसी हुई) : =मंगल!! हल्दी (पिसी हुई ) : = वृहस्पति!!!!!जीरा (साबुत या पिसा हुआ) :=राहु-केतु !!!!!धनिया (पिसा हुआ) =बुध!!!!! काली मिर्च (साबुत या पाउडर) : = काली मिर्च (साबुत या पाउडर) : =शनि!!!!!!!अमचूर (पिसा हुआ) : =केतु!!!!!!!गर्म मसाला (पिसा हुआ) : =राहु!!!!!!!! मेथी : =मंगल 26)राहू ससुराल है जेल में बंद निर्दोष कैदी भी राहू है |राहू सफाई है |रास्ते का पत्थर राहू है |हस्पताल का पोस्ट मार्टम विभाग राहू है। 27)बृहस्पति और राहू जुड़ी कुछ बातें बृहस्पति के साथ राहू सदैव जुड़ा है। आकाश तत्त्व को ईथर भी कहा गया है। यह ईथर भी आत्मतत्व की तरह ही अभौतिक है। जो भी चीज भौतिक है उसके प्रमाणिक कण में जो इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रोन न्यूट्रोन की व्यवस्था के पीछे जो अदृश्य शक्ति है वो राहू है।जाहीर है जो अभौतिक है उसमें राहू प्रभाव नहीं है। लेकिन राहू में वो प्रवीनता है जिससे उस अभौतिक के समानान्तर रूप में संलग्न हो कर उसे भौतिक होने का बोध करा देता है। गुरु का आकाश राहू नीला रंग बना देता है प्रतीति के स्तर पर । गुरु को इस प्रकार आच्छादित कर देने की राहू की चंडालिक प्रवृति इस अभौतिक स्तर की तर्ज पर व्यावहारिक रूप में भी बुरी कही गयी है। हालांकि व्यावहारिक स्तर पर इस युति के कई अच्छे मायने भी है।बृहस्पति का आकाश तत्ब व्यापक है - इसकी व्यापकता इहलोक से परलोक तक है । इन दोनों के बीच जो दरवाजा या अंतर है वो राहू है।. 28)शुक्र जो होये कुंडली में सूर्य से आगे, जातक जाये समृद्धि में पिता से आगे। .29)शुक्र तथा शनि आमने-सामने हो दोनों में से कोई एक अथवा दोनों लग्न के या सप्तम के स्वामी हो या चंद्रेश हो तो व्यक्ति समलैंगिक होता है । अगर ये दोनों लग्न और सप्तम में आमने-सामने तो अवश्य ही ऐसा होता है । 30)ज्योतिष में सभी 27 नक्षत्रों को त्रिगुण स्वभावानुसार वर्गीकृत किया गया है. यह गुण हैं सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण. सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति को सतोगुणी, बुध एवं शुक्र को रजोगुणी और मंगल, शनि, राहु, केतू को तमोगुणी माना गया है. एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य- संक्रान्ति, शनिवार, मंगलवार, गुरुवार, व्रत तथा श्राद्ध के दिन बाल एवं नाखून नहीं काटने चाहिए, ना ही दाढ़ी बनवानी चाहिए।
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