top button
    Futurestudyonline Community

Daily knowledge shubhasini

0 votes
38 views
*शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा* *यस्तु क्रियावान् पुरूष: स विद्वान् ।* *सुचिन्तितं चौषधमातुराणां* *न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥* *वास्तव में विद्वान् और सफलतम् व्यक्ति बनने के लिये अच्छी पुस्तकों और शास्त्रों का केवल अध्ययन करना पर्याप्त नहीं, अपितु जीवन में उनका अनुकरण करना आवश्यक होता है, जैसे रोग दूर करने के लिए दवा की अच्छी जानकारी होना या दवा का नाम ले लेना पर्याप्त नही अपितु दवा का नियमित सेवन करना आवश्यक एवम् लाभदायक होता है।* *In order to become a scholar and a successful person, studying only good books and scriptures is not enough, but it is necessary to imitate them in life, such that it is not enough to get good knowledge of medication or to take name of medication. Regular consumption of medication is necessary and beneficial.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
posted Sep 21, 2019 by Ajay Shastri

  Promote This Article
Facebook Share Button Twitter Share Button Google+ Share Button LinkedIn Share Button Multiple Social Share Button

Related Articles
0 votes
*किं कुलेन विशालेन विद्याहीने च देहिनाम्।* *दुष्कुलं चापि विदुषी देवैरपि हि पूज्यते॥* भावार्थ : *विद्याहीन होने पर विशाल कुल का क्या करना? विद्वान नीच कुल का भी हो, तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है।* *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
0 votes
न अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा। न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥ Giving food and water is the highest charity, twelfth moon day is the most auspicious date, 'Gayatri Mantra' is the best among the 'Mantras' and mother is the highest God. अन्न और जल के समान दान नहीं है, द्वादशी से समान तिथि नहीं है, गायत्री से बड़ा मंत्र नहीं है और माता से बड़ा देवता नहीं है। *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
0 votes
पुस्तकस्या तु या विद्या, परहस्तगतं धनम् । कार्यकाले समुत्पन्ने, न सा विद्या न तद्धनम् ॥ Knowledge that is in note-books in (our) shelves, and (our) money now in the hands of others, both are useless. When time comes for their use neither that knowledge nor that wealth will be available. किताब में रखी विद्या और उधार दी हुई मुद्रा, जरुरत होने पर बिलकुल उपयोगी नहीं होती है। *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
0 votes
उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः । न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ Any work will not get accomplished just merely by desiring for it's completion. A 'prey' will not by itself come to the mouth of a sleeping lion. कार्य करने से ही सिद्ध होते हैँ सिर्फ मनोरथ या इच्छा करने से नहीँ ,ठीक उसी प्रकार जैसे सोए हुए सिँह के मुख मे हिरन स्वयं प्रवेश नहीँ करते । *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
0 votes
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥ Dharma destroys those who destroy the dharma by going against it. Dharma protects the person who protects it. Hence, dharma should not be destroyed but protected. Dharma that is destroyed, destroys. धर्म उसका नाश करता है जो उसका (धर्म का ) नाश करता है | धर्म उसका रक्षण करता है जो उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है | अतः धर्मका नाश नहीं करना चाहिए | ध्यान रहे धर्मका नाश करने वालेका नाश, अवश्यंभावी है। *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
Dear friends, futurestudyonline given book now button (unlimited call)24x7 works , that means you can talk until your satisfaction , also you will get 3000/- value horoscope free with book now www.futurestudyonline.com
...