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लग्न कुण्डली से जानिये अपने ईष्ट देव

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हम सब प्रतिदिन विभिन्न देवी -देवताओं का पूजन करते हैं। लगभग सभी सकाम पूजा ही करते हैं। कहने का मतलब यह है कि हम हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए ही ईश्वर को मानते है। बहुत कम लोग होते हैं निष्काम पूजा करते हैं। बहुत सारे लोगों कि यह शिकायत होती है कि वो पूजा -व्रत आदि बहुत करते हैं फिर भी फल नहीं मिलता। मैं यहाँ कहना चाहूंगी कि हमें काम तो बिजली विभाग में होता है और चले जाते हैं जल-विभाग में ! जब हम गलत कार्यालय में जायेंगे तो काम कैसे होगा। इसी प्रकार हर कुंडली के अनुसार उसके अपने अनुकूल देवता होते हैं। किसी भी कुंडली के लग्न /प्रथम भाव , पंचम भाव और नवम भाव में स्थित राशि के अनुसार इष्ट देव निर्धारित होते है और इनके अनुसार ही रत्न धारण किये जा सकते हैं। मेष लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर प्रथम राशि मेष होती है तो वह मेष लग्न की कुंडली कही जायेगी। मेष लग्न में पांचवे भाव में सिंह राशि और नवम भाव में धनु राशि होती है। मेष राशि का स्वामी मंगल , सिंह राशि का स्वामी है सूर्य और धनु राशि का स्वामी वृहस्पति है। इस कुंडली के लिए अनुकूल देव हनुमान जी , सूर्य देव और विष्णु भगवान है । मेष लग्न के लिए हनुमान जी की आराधना , मंगल के व्रत , सूर्य चालीसा , आदित्य - हृदय स्त्रोत , राम रक्षा स्त्रोत , रविवार का व्रत , वृहस्पति वार का व्रत , विष्णु पूजन करना चाहिए। मूंगा , माणिक्य और पुखराज रत्न अनुकूल रहेंगे। वृषभ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वितीय राशि वृषभ होती है तो वह वृषभ लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृषभ लग्न में पांचवे भाव में कन्या राशि और नवम भाव में मकर राशि होती है। वृषभ राशि का स्वामी शुक्र , कन्या राशि का बुध और मकर राशि के स्वामी शनि देव है। वृषभ लग्न वालों के लिए लक्ष्मी देवी , गणेश जी और दुर्गा देवी की आराधना उचित रहेगी। लक्ष्मी चालीसा , दुर्गा चालीसा और गणेश चालीसा का पाठ करना चाहिए। इस लग्न के लिए हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है । मिथुन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर तृतीय राशि मिथुन होती है तो वह मिथुन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मिथुन लग्न में पांचवे भाव में तुला राशि और नवम भाव में कुम्भ राशि होती है। मिथुन राशि का स्वामी बुध , तुला राशि का शुक्र और कुंभ राशि का स्वामी शनि देव हैं। इस लग्न के लिए गणेश जी , लक्ष्मी देवी और काली माता अराध्य होगी। कुम्भ राशि के स्वामी शनि होने के कारण शनि देव को प्रसन्न और शांत रखने के उपाय किये जा सकते हैं। इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा और नीलम अनुकूल रत्न हैं। कर्क लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर चतुर्थ राशि कर्क होती है तो वह कर्क लग्न की कुंडली कही जायेगी। कर्क लग्न के पांचवे भाव में वृश्चिक राशि और नवम भाव में मीन राशि होती है। कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा,वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल और मीन राशि के स्वामी वृहस्पति होते है। इस लग्न के लिए शिव जी , हनुमान जी और विष्णु जी अराध्य देव होंगे। इस लग्न के लिए मोती , मूंगा और पुखराज अनुकूल रत्न हैं। सिंह लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर पंचम राशि सिंह होती है तो वह सिंह लग्न की कुंडली कही जायेगी। सिंह लग्न के पांचवे भाव में धनु राशि और नवम भाव में मेष राशि होती है। सिंह राशि का स्वामी सूर्य देव , धनु राशि के स्वामी वृहस्पति और मेष राशि के स्वामी मंगल होता है। इस लग्न के लिए सूर्य देव , विष्णु जी और हनुमान जी आराध्य देव होंगे। इस लग्न के लिए माणिक्य , मूंगा और पुखराज रत्न अनुकूल होते हैं। कन्या लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर षष्ठ राशि कन्या होती है तो वह कन्या लग्न की कुंडली कही जायेगी। इस लग्न के पांचवे भाव में मकर राशि और नवम भान में वृषभ राशि होती है। कन्या राशि का स्वामी बुध , मकर राशि का स्वामी शनि और वृषभ राशि का स्वामी शुक्र होता है। इस लग्न के लिए गणेश जी , दुर्गा देवी ,लक्ष्मी देवी आराध्य देव होते हैं और पन्ना, नीलम और हीरा अनुकूल रत्न होते हैं। तुला लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर सप्तम राशि तुला हो तो वह तुला लग्न की कुंडली कही जायेगी। तुला लग्न में पांचवे भाव में कुम्भ राशि और नवम भाव में मिथुन राशि होती है। तुला राशि का स्वामी शुक्र , कुम्भ राशि का स्वामी शनि और मिथुन राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए लक्ष्मी देवी , काली देवी , दुर्गा देवी और गणेश जी आराध्य देव हैं और हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है। वृश्चिक लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर अष्ठम राशि वृश्चिक हो तो वह वृश्चिक लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृश्चिक लग्न में पांचवे भाव में मीन राशि और नवम भाव में कर्क राशि होती है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल , मीन राशि का स्वामी वृहस्पति और कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा होता है। इस लग्न के लिए हनुमान जी , विष्णु जी और शिव जी अराध्य देव होते है और मूंगा , पुखराज और मोती अनुकूल रत्न है। धनु लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर नवम राशि धनु हो तो वह धनुलग्न की कुंडली कही जायेगी। धनु लग्न में पांचवे भाव में मेष राशि और नवम भाव में सिंह राशि होती है। धनु राशि का स्वामी वृहस्पति , मेष राशि का स्वामी मंगल और सिंह राशि का स्वामी सूर्य होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी ,हनुमान जी और सूर्य देव आराध्य देव हैं और पुखराज , मूंगा और माणिक्य अनुकूल रत्न है। मकर लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर दशम राशि मकर हो तो वह मकर लग्न की कुंडली कही जायेगी। मकर लग्न में पांचवे भाव में वृषभ राशि और नवम भाव में कन्या राशि होती है। मकर राशि का स्वामी शनि , वृषभ राशि का स्वामी शुक्र और कन्या राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए शनि देव , हनुमान जी , दुर्गा देवी , लक्ष्मी देवी और गणेश जी आराध्य देव है और नीलम , हीरा और पन्ना अनुकूल रत्न है। कुम्भ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर एकादश राशि कुम्भ हो तो वह कुम्भ लग्न की कुंडली कही जायेगी। कुम्भ लग्न में पांचवे भाव में मिथुन राशि और नवम भाव में तुला राशि होती है।कुम्भ राशि का स्वामी शनि , मिथुन राशि का स्वामी बुध और तुला राशि का स्वामी शुक्र होता है। इस लगन के लिए शनि देव , काली देवी , गणेश जी , दुर्गा देवी और लक्ष्मी देवी आराध्य देव है और नीलम , पन्ना और हीरा अनुकूल रत्न है। मीन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वादश राशि मीन हो तो वह मीन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मीन लग्न में पांचवे भाव में कर्क राशि और नवम भाव में वृश्चिक राशि होती है। मीन राशि का स्वामी वृहस्पति , कर्क राशि का स्वामी चन्द्र और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी , शिव जी और हनुमान जी आराध्य देव है और पुखराज , मोती और मूंगा अनुकूल रत्न है। लेकिन यहाँ यह भी देखा जायेगा कि उपरोक्त राशि स्वामी किस भाव में और कितने अंशो पर स्थित है। क्या वो उच्च या नीच के तो नहीं है। अक्सर विद्वान् जन ग्रह के उच्च या नीच के होने पर रत्न पहना देते हैं जो कि उचित नहीं है। उच्च का ग्रह तो स्वतः ही अच्छा फल देता है। नीच ग्रह का रत्न पहनने से उस ग्रह के नीचत्व में ही वृद्धि होती है। ऐसे में उस ग्रह को शांत करने के लिए पूजा और व्रत आदि उचित रहेगी। खराब ग्रह को अनुकूल बनाने के लिए उस देव का चालीसा का पाठ करना चाहिए। यहाँ पर यह ध्यान रखने वाली बात है कि जो ग्रह अधिक कमजोर हो उसे बलवान करने के लिए पूजा - व्रत आदि करें। रत्न भी धारण किया जा सकता है लेकिन कुंडली को अच्छी तरह विश्लेषण करवा कर ही। क्यूंकि कई बार उपरोक्त तीनों भावों के स्वामी तीसरे , छठे , आठवें और बाहरवें भाव में स्थित होते हैं। इन भावों में स्थित ग्रहों के रत्न भी धारण नहीं किये जा सकते। इस स्थिति में व्रत-पूजन और दान ही उचित रहेगा। जिनके पास कुंडली हैं वे तो यह जान सकते हैं कि उनके ईष्ट देव कौन है। लेकिन जिनके पास कुंडली नहीं है और ना ही कोई विवरण है तो वे क्या करे या कैसे जाने कि उनका ईष्ट कौन है ! हर इंसान की प्रकृति और व्यवहार ग्रहों से ही तय होती है। किसी भी इंसान को उसके ईष्ट उसके अंतर्मन को आकर्षित करते हैं। अपनी पसंद के रंगो के अनुसार भी तय कर सकते हैं कि उनका ईष्ट देव कौन हो सकता है। उपासना सियाग ( अबोहर , पंजाब ) ॐ शांति।।
posted Sep 22 by Upasna Siag

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सबसे पहले तो यह समझना चाहिए कि भारत का यह ज्योतिष विज्ञान कितना सदुपयोग करने लायक है आप यह जान लें कि हमारे ऋषि प्रभु पराशर वैदिक ज्योतिष का जो उन्होंने सूत्र दिए वह आज अचंभित करने वाले हैं किसी की जन्म पत्रिका को देखकर यह बताया जा सकता है कि वह किस क्षेत्र में तरक्की करेगा उसको लाभ होगा तो आप भी जानिए क्या आप राजनीति में आप भविष्य बना सकते हैं या आप सेना पुलिस में जाकर देश की सेवा कर सकते हैं या आप वरिष्ठ अधिकारी बनकर देश की सेवा कर सकते हैं या आपकी कुंडली में डॉक्टर बनने के योग हैं या आज के जमाने की तकनीकी कंप्यूटर इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में आप विशेष योग्यता हासिल करके इंजीनियर बन कर अपने भविष्य को संवार सकते हैं इस प्रकार के ग्रह योग आपकी जन्मकुंडली में है अगर आप जान जाते हैं आपके लिए अच्छा होगा तो हमारे यहां फ्यूचर स्टडी ऑनलाइन ऐप के अंदर बहुत सारे विद्वान आपको दिखाई दे रहे हैं इन सभी विद्वानों की नॉलेज वैदिक लाल किताब केपी एस्ट्रोलॉजी फॉर मिस्ट्री वास्तु न्यूमैरोलॉजी एवं पारंपरिक ज्योतिष ज्ञान के साथ आधुनिक समावेश में आपको भविष्य के लिए अच्छी राय मिल सकती है तो हमारे विद्वानों से बात करने के लिए बहुत ही सरल तरीका है अगर आप अनलिमिटेड कॉल पर क्लिक करते हैं तो आपको समय की कोई लिमिट नहीं है बात करने में अन्यथा आप पर मिनट कॉल का ऑप्शन प्रयोग कर सकते हैं और आप अपने लिए भविष्य के लिए अच्छी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं
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अपने शुभ अंको के हिसाब से ख़रीदे माकन , वाहन और मोबाइल नंबर अंक शास्त्र में नौ अंक है और उन सबके एक स्वामी ग्रह है ,अंक शास्त्र में 0 (शून्य) को कोई महत्व नहीं दिया गया। इस शास्त्र में इकाई 1 से 9 तक के अंको का विश्लेषण करते हुए भविष्य कथन किया जाता है जैसे - अंक 1 का स्वामी ग्रह सूर्य होता है. अंक 2 का स्वामी ग्रह चंद्रमा होता है। अंक 3 का स्वामी ग्रह बृहस्पति होता है। अंक 4 का स्वामी ग्रह यूरेनस अथवा राहु को माना गया है। अंक 5 का स्वामी ग्रह बुध है। अंक 6 का स्वामी ग्रह शुक्र है। अंक 7 का स्वामी ग्रह नेप्च्यून अथवा केतु को माना जाता है। अंक 8 का स्वामी ग्रह शनि है। अंक 9 का स्वामी ग्रह मंगल है। मूलांक के अनुसार शुभ दिन: मूलांक दिन 1 रविवार 2 सोमवार 3 गुरुवार 4 शनिवार 5 बुधवार 6 शुक्रवार 7 रविवार 8 शनिवार 9 मंगलवार जीवन में अंकों का गहरा प्रभाव होता है कई बार अशुभ नंबर से जीवन में अनेक परेशानियां उठानी पड़ती है यो चाहे आप के घर , दुकान , गाडी अथवा मोबाइल का नंबर अगर आप के मूलांक के अनुसार शुभ नहीं है तो आप के लिए परेशानी पैदा कर सकता है इस लेख के माध्यम से आप सब को अपने मूलांक के आधार पर शुभ और अशुभ अंक बताने का प्रयास कर रहा हूँ आशा है की आप सब को इसका लाभ मिलेगा , जन्म की तारीख का कुल योग मूलांक कहलाता है और जन्म , महीना और वर्ष का कुल योग भाग्यांक कहलाता है , 2015 का कुल योग हुआ 8 और इस अंक के स्वामी है शनि देव है किसी व्यक्ति का मूलांक और भाग्यांक अलग-अलग हों तो ऐसी स्थिति में जीवन की घटनाओं का विश्लेषण करते हुए यह देखना चाहिए कि कौन सा मूलांक अधिक शुभप्रद रहा है। फिर उसी के अनुरूप वाहन के नंबर का चयन करना चाहिए। जानिए किस मूलांक और भाग्यांक के जातक के लिए कौन सा अंक और रंग शुभ रहेगा मूलांक या भाग्यांक 1: जिन लोगों का जन्म 1,10,19 या 28 तारीख को हुआ हो, उनका मूलांक 1 होगा। 1 मूलांक या भाग्यांक वाले व्यक्ति को 1, 2, 4 और 7 मूलांक वाले वाहन रखने चाहिए । 1 मूलांक या भाग्यांक वाले किसी व्यक्ति को 6 या 8 मूलांक वाला वाहन नहीं रखना चाहिए। इन्हें पीले, सुनहरे अथवा क्रीम रंग का वाहन क्रय करना चाहिए, नीले, भूरे, बैंगनी या काले रंग का वाहन नहीं। मूलांक या भाग्यांक 2: जिन लोगों का जन्म 2, 11, 20 या 29 तारीख को हुआ हो, उनका मूलांक 2 होगा। 2 मूलांक वाले किसी व्यक्ति को 1,2,4 और 7 मूलांक वाला वाहन रखना चाहिए। इसके लिए मूलांक 9 वाला वाहन अशुभ होगा। ऐसे लोग सफेद अथवा हल्के हरे रंग का वाहन क्रय करें लाल और गुलाबी रंग का नहीं। मूलांक या भाग्यांक 3: जिनका जन्म 3,12,21 या 30 तारीख को हुआ हो उनका मूलांक 3 होगा। ऐसे लोग 3,6 या 9 मूलांक वाला वाहन रखें, 5 या 8 वाला वाहन अशुभ सिद्ध हो सकता है। 3 मूलांक वालों को पीले, बैंगनी, नीले या गुलाबी रंग का वाहन खरीदना चाहिए, हल्के हरे, सफेद या भूरे रंग का वाहन नहीं। मूलांक या भाग्यांक 4: जिन व्यक्ति का जन्म 4,13,22 या 31 तारीख को हुआ हो उनका मूलांक 4 होगा। इन्हें 4, 1, 2 या 7 मूलांक वाला वाहन रखना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए मूलांक 9, 6 और 8 वाला वाहन अशुभ होगा। नीले या भूरे रंग का वाहन क्रय करना ऐसे लोगों के लिए शुभ होगा, गुलाबी या काले रंग का नहीं। मूलांक या भाग्यांक 5: 5, 14 या 23 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 5 होगा, ऐसे लोगों को 5 मूलांक वाले वाहन रखने चाहिए, 3, 8 या 9 मूलांक वाले वाहन अशुभ साबित होंगे। ऐसे लोग हल्के हरे, सफेद या भूरे रंग का वाहन रखें, पीले, गुलाबी या काले रंग का नहीं। मूलांक या भाग्यांक 6: जिन व्यक्ति का जन्म 6, 15 एवं 24 तारीख को हुआ हो, उनका मूलांक 6 होगा। इन्हें 3, 6 या 9 मूलांक वाला वाहन रखना चाहिए। 8 या 4 मूलांक वाला वाहन इनके लिए अशुभ होगा। इन्हें हल्के नीले, गुलाबी या पीले रंग का वाहन क्रय करना चाहिए, काले रंग का वाहन अनिष्टकर हो सकता है। मूलांक या भाग्यांक 7: तारीख 7,16 या 25 को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 7 होगा। मूलांक या भाग्यांक 7 वाले व्यक्ति को मूलांक 7,1,2 या 4 वाला वाहन रखना चाहिए। 8 या 9 मूलांक वाला वाहन इनके लिए अशुभ होगा। वाहन नीले या सफेद रंग का हो तो शुभ रहेगा। मूलांक या भाग्यांक 8: जिन लोगों का जन्म 8, 17 या 26 तारीख को हुआ हो, उनका मूलांक 8 होगा। इस मूलांक वालों को 8 मूलांक वाला वाहन खरीदना चाहिए और 1 और 4 मूलांक वाले वाहन से परहेज करना चाहिए। काले, नीले, भूरे एवं बैंगनी रंगों के वाहन रखना इनके लिए उपयुक्त होगा। मूलांक या भाग्यांक 9: तारीख 9, 18 यां 27 को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 9 होगा। ऐसे लोगों के लिए 9, 3 या 6 मूलांक वाला वाहन शुभ और 5 या 7 मूलांक वाला अशुभ होगा। वाहन का रंग लाल या गुलाबी रखें तो शुभ हो।
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सभी ग्रहों में से शुक्र ग्रह को सबसे चमकीला ग्रह माना जाता है, जो प्रेम का प्रतीक होता है। जहाँ शास्त्रों अनुसार शुक्र को असुरों के देवता शुक्राचार्य बताया गया है, तो वहीं ज्योतिष विज्ञान में इसे स्त्री गृह माना गया है। शुक्र मनुष्य की कामुकता, उसके सौंदर्य, भौतिक सुख और ऐश्वर्य का कारक प्राप्त होता है। जिसके कारण जिस भी जातक की कुंडली में शुक्र शुभ स्थिति में या मजबूत होता है तो उसके परिणामस्वरूप जातक व्यक्तित्व से आकर्षक, सुंदर और मनमोहक होता है। शुक्र के सकारात्मक प्रभाव से व्यक्ति जीवनभर सुखी रहता है। इसीलिए शुक्र को सुंदरता और सुख का कारक माना जाता है। कुंडली में शुक्र की स्थिति का प्रभाव सौरमंडल के सभी ग्रहों में से शुक्र की चमक एवं शान सबसे अलग व निराली मानी जाती है, जिस कारण हर किसी की राशि में शुक्र की स्थिति का खासा महत्व होता है। इसके विपरीत जिस भी कुंडली में शुक्र निर्बल या कमज़ोर होता है तो ज्योतिषी अनुसार वो व्यक्ति शुक्र की आराधना कर उसे अपनी राशि में बलवान बनाकर उनसे सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति कर सकता है। शुक्र की शान्ति के लिए करें कुछ विशेष उपाय जैसा सभी जानते हैं कि आज हम अपने जीवन में सुख-सुविधाओं की वस्तुओं पर अधिक खर्च करते हैं, जिसका संबंध सीधे तौर पर शुक्र से होता है। इसलिए ही कहा गया है कि यदि अपने स्थान परिवर्तन के दौरान शुक्र की स्थिति किसी भी कुंडली में खराब या नकारात्मक हो जाती है या कोई भी अपने जीवन को ऐश्वर्य और आराम से भरपूर बनाना चाहते हैं तो उस व्यक्ति को विशेष तौर से शुक्र के कारगर उपाय करने चाहिए। शुक्र का गोचर ऐसे में शुक्र देव हमेशा की तरह एक बार पुनः अपना राशि परिवर्तन करते हुए अपने शत्रु ग्रहण सूर्य की राशि सिंह से निकलकर अपने मित्र ग्रह बुध की राशि कन्या में अपना स्थान परिवर्तन करने वाले हैं। जिसके चलते शुक्र मंगलवार, 10 सितंबर 2019 को 01:24 बजे कन्या राशि में गोचर करेगा जो वहां 4 अक्टूबर 2019 तक इसी राशि में स्थित रहेगा। इसलिए इससे करीब-करीब हर राशि प्रभावित होंगी। अशुभ शुक्र के लिए अवश्य करें ये काम वैदिक ज्योतिष में अशुभ शुक्र की शांति के लिए जातक को उससे संबंधित कारगर उपाय करने की सलाह दी गई है। अपनी राशि में शुक्र की मज़बूती के लिए कुछ विशेष वस्तुओं का दान करना चाहिए। जिसमें चाँदी, चावल, दूध, श्वेत वस्त्र आदि शामिल होते हैं। इसके अलावा शुक्र के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए जातक को हर शुक्रवार दुर्गाशप्तशती का पाठ करना भी उचित माना गया है। कन्या पूजन एवं शुक्रवार का व्रत करने से भी शुक्र के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शुक्र को बली या मजबूत करने के लिए जातक को अच्छी क्वालिटी का हीरा धारण करना चाहिए। इसके साथ ही यदि किसी कारणवश हीरा पहनना संभव न हो तो व्यक्ति अर्किन, सफेद मार्का, ओपल, स्फटिक आदि किसी भी शुभ वार, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्न में धारण कर सकता है। हर शुक्रवार शुक्र देव की पूजा के दौरान शुक्र के बीज मंत्र का जाप करना भी शुभ माना गया है ॐ शुं शुक्राय नमः। ॐ हृीं श्रीं शुक्राय नमः। शुक्र की शान्ति के लिए कारगर तांत्रिक उपाय काली चींटियों को चीनी खिलाना शुक्र से शुभ फलों की प्राप्ति हेतु बेहद कारगर होता है। शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना भी शुभ होता है। शुक्र को प्रबल बनाने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करें जिसकी एक आँख खराब हो। 10 वर्ष से कम आयु की कन्याओं का हर शुक्रवार पूजन करें। घर के फर्श पर और रसोई घर में सफेद पत्थर लगाएँ। किसी कन्या के विवाह में कन्यादान से भी शुक्र के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शुक्र देव से जुड़े कुछ विशेष मंत्र जीवन में आर्थिक संपन्नता, प्रेम और आकर्षण में वृद्धि हेतु जातक को शुक्र के बीज मंत्र “ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः” का उच्चारण करने की सलाह दी जाती है। इस मन्त्र का कम से कम 16000 बार उच्चारण करने से मान्यता अनुसार शुक्र के गोचर के दौरान उसके अशुभ प्रभावों से मुक्ति पाई जा सकती है। इसके अलावा देश-काल-पात्र सिद्धांत के अनुसार शुक्र के अशुभ प्रभावों को कम करने और राशि में उसके शुभ फलों की प्राप्ति के लिए इस बीज मंत्र का 64000 बार जाप करना चाहिए। इसके अलावा शुक्र को शांत करने के लिए “ॐ शुं शुक्राय नमः।” मंत्र का जाप भी किया जा सकता है। *********
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सम्पूर्ण जीवन और सुख-दु:ख का विचार कुण्डली के बारह भावों से किया जाता है। ग्रह और उनकी दशायें हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करती हैं। ऐसे ही हम कुन्डली में उपस्थिति होने वाले एक प्रमुख दोष अर्थात ग्रहण दोष के बारे मे जानकारी देना चाहते है। सबसे पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि आखिर ये दोष होता क्या है और इसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पडता है। सबसे पहले जान लेते हैं कि कुण्डली में ग्रहण दोष बनता कैसे है। किसी भी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में किसी भी भाव में जब आत्मा कारक सूर्य या मन के कारक चंद्रमा के साथ राहू और केतु में से कोई भी एक ग्रह उपस्थित होता है तो सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण योग बनता है। इसके इलावा यदि जन्म कुण्डली के लग्न भाव में राहू आ जाये तो भी ग्रहण योग बनता है अर्थात सूर्य, कुण्डली के किसी भी अन्य भाव में बैठा हो तो भी शुभ फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। ज्योतिष का एक नियम है यदि किसी ग्रह के सामने उसका शत्रु ग्रह बैठ जाये तो वह ग्रह फ़लहीन हो जाता है । याने कि ना ही उसका शुभ फ़ल मिल पाता है और ना ही बुरा फ़ल। जैसे कई बार देखा जाता है कि किसी व्यक्ति की कुण्डली में राजयोग नजर नहीं आता परन्तु कुंडली में राजयोग उपस्थित होता है। कई बार आपने देखा होगा कि व्यक्ति के पास उच्च शिक्षा नहीं होती परन्तु उसके अनुभव के आधार पर बडे-२ पदाधिकारी उनसे अनुभव अर्जित करने के लिये आते हैं । इसी प्रकार यदि यदि जन्म कुण्डली में सूर्य और शनि आमने सामने हो और लग्न भाव में राहू आ जाये तो गुप्त राजयोग का निर्माण हो जाता है ! ऐसी कुंडली में लग्न में बैठा हुआ राहू शुभ फल देता है और उस व्यक्ति के शत्रु कभी भी उस पर चाहते हुये भी हावी नहीं हो पाते। अर्थात उसके शत्रुओं का नाश हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को अक्सर देखा जाता है कि इनकी पहुंच बहुत ऊंचे पद तक होती है और ये लोग प्रतिष्ठा भी बहुत पाते हैं। मान, सम्मान, यश और कीर्ति की इन लोगों के पास कोई कमी नहीं होती। राजनीति में भी ये लोग बहुत अच्छी पहचान रखते है। इनके मित्रों की सख्या भी बहुत अधिक होती है और मित्रों के सहयोग से भी ये बडे-२ कामों को अन्जाम दे जाते हैं। ऐसी कुंडली में भी लग्न में बैठा हुआ राहु, ग्रहण योग का निर्माण करता है जो कहीं ना ना कहीं और किसी ना किसी मोड पर सम्मान को ठेस पहुंचाने का दम रखता है। किसी भी कुण्डली में ग्रहण दोष मुख्य रूप से तो प्रकार का होता है एक सूर्य ग्रहण और दूसरा चन्द्र ग्रहण। सूर्य सम्बन्धि दोष का निवारण सूर्य ग्रहण के दिन और चन्द्र सम्बन्धि दोष का निवारण चन्द्र ग्रहण के दिन करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। अगर इस दोष की शान्ति शास्त्रीय पध्दत्ति से की जाय तो निश्चित रूप से जिस भाव में ये दोष बना हो उसके फ़ल में इजाफ़ा होता है। और पितृ सुख के साथ राज सुख की प्राप्ति होती है। इस दोष की सही जानकारी के लिये किसी विद्वान ज्योतिषी से ही कुण्डली का अवलोकन कराया जाना चाहिये।
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वर वधु कि कुण्डली मिलान करते समय किन किन बातो का ध्यान रखना आवश्यक है ? *** वर वधु कि कुण्डली मिलान करते समय किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है? आज के समय में धीरे धीरे कुण्डली मिलान का मूल स्वरूप नष्ट होता जा रहा है । अब केवल मात्र गुण मिलान ओर मांगलिक दोष को ही ध्यान में रखा जाने लगा है । कुण्डली में 1,4,7,8,12 वे स्थान पर मंगल ग्रह को देखते ही मांगलिक दोष कि घोषणा कर दी जाती है । जब कि यह गलत है, क्यों कि कुण्डली में कभी कभी मांगलिक दोष भंग भी हो रहा होता है, किन्तु उस ओर किसी किसी का ही ध्यान जाता है। मांगलिक दोष केवल मात्र मंगल से ही नहीं बनता है, मंगल दोष के समान ही शनि, सूर्य, राहु ओर क्षीण चन्द्रमा से भी दुर्योग बनते है । कई बार गुण ना मिलने पर नाम बदलकर गुण मिलान कर दिये जाते है, यह भी 100% गलत है । विधाता के लेख को एक इन्सान नही बदल सकता है । कुण्डली मिलान में ध्यान रखने योग्य बाते:-- 1. (प्रथमं आयु परिक्ष्येत) सर्वप्रथम वर, वधु आयु का विचार करना चाहिये । 2. वर वधु का चरित्र केसा है ?कही चरित्रहीन तो नही है । 3. वर वधु का भाग्य केसा है ? विवाह के बाद जीवन में अच्छा या बुरा किस प्रकार का परिवर्तन होगा । 4. वर वधु कि कुण्डली में कहीं क्लीब योग ( नपुंसक योग) तो नही है । 5. वर वधु कि कुण्डली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं । 6. आपका जीवनसाथी आपके प्रति कितना वफादार होगा । 7.वर ओर वधु कि ग्रह दशा कहीं एक साथ ही तो खराब नहीं हो रही है ? क्यों कि दोनो का एक साथ समय खराब होना, जीवन को नर्कमय बना देता है । दोनो में से एक का समय ठीक हो तो परिस्थिति पर विजय मिल जाती है । 8.वर वधु कि कुण्डली में धन योग है या नहीं । क्यों कि धन के बिना जीवन असम्भव है । 9. वर वधु का स्वभाव किस प्रकार का है ? दोनो मे से किसी एक का खराब स्वभाव वैवाहिक जीवन को नष्ट कर देता है । इन सब बातो का विचार कुण्डली मिलान के समय करना चाहिये । प्रेम विवाह करने वालो को अपने आप पर पूर्ण भरोसा होता है, उन्हे पूरा विश्वास होता है कि उनका जीवन सुखी रहेगा, किन्तु सबसे अधिक तलाक प्रेम विवाह करने वालो के ही होते है । अधिकांश लोग तर्क देते है कि विदेशो में इन सब बातो पर कोइ ध्यान नही दिया जाता है, फिर भी वहाँ के लोग सुखी क्यों है ? उत्तर:-- विदेशो में सबसे अधिक तलाक होते है, ओर उन्हे तलाक से कोइ फर्क नही पडता है यह उनके लिये आम बात है । जब तक मन रहा साथ रहते है, जब मन किया छोड देते है । विवाह मानव जीवन कि एक महत्वपूर्ण घटना है । हमारे भारतीय समाज में एक ही विवाह को श्रेष्ठ माना गया है । तलाक लेकर दूसरा विवाह करने वालो को अच्छी दृष्टि से नही देखा जाता है । अतः विवाह का फैसला बहुत ही सोच समझकर लेना चाहिये । पं.पुष्पेन्द्र भारद्वाज
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