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सन्तान सुख जाने अपनी जन्मकुंडली में

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पत्रिका से जानें सन्तान सुख ज्योतिष शास्त्र में सन्तान सम्बन्धी विचार विशेष रूप से विचारणीय विषय है| फलित ज्योतिष की सभी विधाओं में इसका पृथक् से विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है| फलित शास्त्र की सबसे महत्त्वपूर्ण विधा जन्मपत्रिका द्वारा फलकथन में पञ्चम भाव से सन्तान विचार किया जाता है| इस भाव की सुत भाव के रूप में संज्ञा दी गई है| आज के सन्दर्भ में जब सन्तानोत्पत्ति तथा उनकी संख्याओं का विचार करते हैं, तो पूर्व शास्त्रों में कथित योग पूर्ण रूप से फलीभूत नहीं हो पाते हैं, क्योंकि इन शास्त्रों में सन्तान सम्बन्धी सभी फल उस समय के देशकाल तथा परिस्थिति के अनुसार कहे गए हैं| उस समय एक से अधिक विवाह सामान्य बात थी तथा अधिक सन्तानोत्पत्ति पर भी कोई कानून नहीं था| चूँकि सन्तान विचार मानव जीवन से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण विषय है, अत: आज के परिप्रेक्ष्य में यह विचार कैसे किया जाए? इस विषय पर मन्थन आवश्यक है| आज के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिष से सन्तान विचार में मूलभूत तथ्य तो वही रहेंगे, जो कि ज्योतिष के पुरातन ग्रन्थों में थे, लेकिन उन्हें आज के अनुसार विचार करने का माध्यम पृथक् होगा| प्राय: ज्योतिष ग्रन्थों में सन्तान विचार से सम्बन्धित योगों का निर्णय पति-पत्नी में से किसी एक की जन्मपत्रिका के आधार पर किया जाता है, लेकिन यह निर्णय कभी भी तर्कसंगत नहीं हो सकता| सन्तान विचार करते समय सर्वदा पत्नी एवं पति दोनों की ही जन्मपत्रिकाओं का अध्ययन करना चाहिए| दोनों के ही जन्मचक्रों में निम्नलिखित तथ्यों का विचार करने के पश्‍चात् ही सन्तान सम्बन्धी फल का निर्णय करना चाहिए| 1. विवाह पूर्व जन्मपत्रिका मिलान| 2. स्वयं की जन्मपत्रिका में सन्तान योग| 3. सन्तान प्राप्ति का समय| 4. गर्भाधान संस्कार का महत्त्व| विवाह पूर्व जन्मपत्रिका मिलान प्राय: विवाह से पूर्व जब वर-वधू की जन्मपत्रिका का मिलान किया जाता है, तो अष्टकूट तथा मङ्गली सम्बन्धी विचार तक ही यह अध्ययन सीमित रह जाता है| कई बार यह भी देखने में आता है कि श्रेष्ठ मेलापक विचार तथा मङ्गली विचार करने के पश्‍चात् भी विवाह के पश्‍चात् कई दम्पतियों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है, अत: उपर्युक्त विचार के साथ ही जन्मपत्रिका में वैवाहिक सुख, आयु तथा सन्तान सम्बन्धी फल का भी विचार अवश्य करना चाहिए| सन्तान सम्बन्धी विचार करते समय निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए : 1. वर एवं वधू दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चम तथा पञ्चमेश की स्थिति पर विचार करना चाहिए| 2. पञ्चम भाव में यदि बुध अथवा शनि में से कोई भी ग्रह बली होकर वर एवं वधू दोनों की जन्मपत्रिका में स्थित हो, तो सन्तान का अभाव रहता है| 3. वर एवं वधू दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चमेश पाप ग्रहों से पीड़ित हो तथा पञ्चम भाव को भी पाप ग्रह देखते हों, तो सन्तानोत्पत्ति का अभाव रह सकता है| 4. दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चम भाव में बली मङ्गल राहु अथवा केतु से युति करते हुए स्थित हो, तो भी सन्तान सम्बन्धी नकारात्मक फल प्राप्त होते हैं| 5. पञ्चम भाव में बली गुरु भाव मध्य में स्थित हो तथा किसी भी ग्रह से युति नहीं करे, तो सन्तान सम्बन्धी नकारात्मक फल प्राप्त होते हैं| 6. पञ्चम भाव में सूर्य विषम राशि में स्थित होकर बली हो तथा किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि पञ्चम भाव पर नहीं पड़ती हो, तो भी नकारात्मक फल ही प्राप्त होंगे| 7. पञ्चमेश बली हो अथवा शुभ ग्रहों के साथ त्रिकोणादि शुभ भावों में स्थित हो, तो सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी शुभ फलों की प्राप्ति होती है| 8. शुभ ग्रहों के साथ बुध पञ्चम भाव में स्थित हो, तो सरलता से सन्तान प्राप्ति होती है| 9. पञ्चम भाव में कोई ग्रह नहीं हो तथा पञ्चमेश अथवा शुभ ग्रह इस भाव को देखते हों, तो भी सन्तानोत्पत्ति में किसी प्रकार की समस्या नहीं होती है| उपर्युक्त योगों से सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी फलों को ज्ञात किया जा सकता है| यदि नकारात्मक योग वर एवं वधू दोनों की जन्मपत्रिका में उपस्थित हों, तो ऐसा विवाह सन्तानोत्पत्ति के दृष्टिकोण से अच्छा नहीं होता है| वहीं दोनों में से किसी एक की जन्मपत्रिका में सन्तान सम्बन्धी शुभ योग होने पर थोड़े प्रयास से अथवा विलम्ब से सन्तान रत्न की प्राप्ति हो जाती है| यदि दोनों की ही जन्मपत्रिका में शुभ योग उपस्थित हों, तो नाड़ी आदि दोष होने पर भी उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है| स्वयं की जन्मपत्रिका में सन्तान योग किसी भी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में पञ्चम भाव अथवा पञ्चमेश ग्रह पीड़ित होने पर सन्तानोत्पत्ति में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है| यदि अत्यधिक अशुभ योग इस भाव में बनते हों साथ ही सप्तम भाव भी बुरे योगों से पीड़ित हो, तो सन्तान का ऐसे व्यक्ति के जीवन में अभाव होता है| पञ्चम भाव से सन्तान का विचार करते समय निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए: 1. पञ्चम भाव में कौनसे ग्रह स्थित हैं? 2. यदि पञ्चमेश पञ्चम भाव में स्थित हो साथ ही वह बली भी हो तथा सप्तम भाव की स्थिति भी दृढ़ हो, तो सन्तानोत्पत्ति में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती| 3. पञ्चम भाव में पाप ग्रह स्थित होने पर भी अथवा पञ्चमेश पीड़ित होने पर भी यदि शुभ ग्रह पञ्चम भाव को देखते हों तथा सप्तम एवं सप्तमेश की स्थिति भी श्रेष्ठ हो, तो कुछ विलम्ब से सन्तान सुख की प्राप्ति हो जाती है| 4. पञ्चम भाव मध्य में बिना किसी ग्रह की युति के बली गुरु, सूर्य अथवा बुध ग्रह स्थित हों, तो वह सन्तान सुख प्राप्ति में समस्या उत्पन्न करते हैं| 5. पञ्चम भाव में स्थित किसी भी प्रकार की स्थिति वाला मङ्गल यदि राहु अथवा केतु से सम्बन्ध बनाए, तो यह सन्तान सुख में कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न करता है| ऐसे व्यक्ति को बहुत प्रयासों के पश्‍चात् ही सन्तान प्राप्त होती है| 6. किसी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में सप्तम-सप्तमेश तथा द्वितीय-द्वितीयेश की स्थिति अच्छी नहीं हो, तो पञ्चम-पञ्चमेश बली होने पर भी सन्तान प्राप्ति में कई प्रकार की समस्याएँ होती हैं| 7. पञ्चम, द्वितीय तथा सप्तम भाव पाप ग्रहों अथवा त्रिकेश ग्रहों से पीड़ित हों तथा इनके भावेशों की स्थिति भी श्रेष्ठ नहीं हो, तो कितने ही प्रयासों के बावजूद सन्तान सुख की प्राप्ति नहीं होती है| उपर्युक्त तथ्यों का विचार करने के पश्‍चात् ही सन्तान सम्बन्धी फल का विचार करना चाहिए| यदि हम बिना द्वितीय एवं सप्तम भाव की स्थिति के ही पञ्चम भाव से सन्तान का विचार करते हैं अथवा पति या पत्नी में से किसी एक की जन्मपत्रिका से सन्तान सम्बन्धी फलों का विचार करेंगे, तो ऐसे फल में कभी सटीकता नहीं होगी| सन्तान प्राप्ति का समय सन्तान सम्बन्धी योगों को जानने के पश्‍चात् सन्तान प्राप्ति का समय जानना भी महत्त्वपूर्ण है| प्राय: विवाह होने के पश्‍चात् जब सन्तान प्राप्ति के योगों को देखा जाता है, तो विंशोत्तरी दशा एवं गोचर का विचार भी पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका से करना चाहिए| पञ्चम अथवा पञ्चमेश कितने ही बली क्यों नहीं हों? यदि अशुभ गोचर अथवा दशा में सन्तानोत्पत्ति होती हो, तो उसमें कई प्रकार की समस्याएँ हो सकती हैं| वहीं जन्मपत्रिका में पञ्चम-पञ्चमेश की अशुभ स्थिति होने पर भी यदि विवाह के पश्‍चात् शुभ गोचर और दशाएँ चल रही हों, तो सन्तान प्राप्ति में समस्याएँ आने पर भी उसकी प्राप्ति अवश्य हो जाती है| पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका में यदि विवाह के पश्‍चात् केन्द्र तथा त्रिकोण भावेशों की दशा चल रही हो साथ ही गोचर में पञ्चम भाव के अन्तर्गत शुभ ग्रहों का गोचर हो रहा हो, तो सन्तान प्राप्ति में समस्याएँ नहीं होती हैं| विवाह के पश्‍चात् त्रिकेश अथवा पाप ग्रहों की दशा हो साथ ही गोचर में पञ्चम, सप्तम तथा द्वितीय भाव में अशुभ ग्रहों का गोचर हो, विशेष रूप से पञ्चम भाव में मङ्गल, शनि, सूर्य अथवा राहु-केतु में से किन्हीं दो अथवा तीन ग्रहों का गोचर हो, अथवा ये ग्रह पञ्चम भाव को देखते हों, तो कितने ही शुभ योग होने के पश्‍चात् भी सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है| उपर्युक्त सन्तान प्राप्ति के समय का विचार गर्भाधान के समय विशेष रूप से करना चाहिए| इन विचारों के साथ ही गर्भाधान संस्कार का भी विशेष महत्त्व होता है| गर्भाधान संस्कार का महत्त्व ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार का षोडश संस्कारों के अन्तर्गत उल्लेख प्राप्त होता है| इन ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार के लिए विशेष मुहूर्त का प्रावधान है तथा उसके लिए त्याज्य समय का भी उल्लेख है, जो इस प्रकार है| गर्भाधान संस्कार में गण्डान्त नक्षत्र (ज्येष्ठा, रेवती, आश्‍लेषा इन नक्षत्रों की अन्तिम दो घटी तथा मूल, अश्‍विनी एवं मघा नक्षत्र की प्रारम्भिक दो घटी), जन्म नक्षत्र भरणी, ग्रहण के दिवस, व्यतिपात-वैधृति योग, माता-पिता के श्राद्ध का दिन, जन्म राशि से अष्टम लग्न, पाप ग्रह युक्त लग्न, भद्रा, रिक्ता तिथि (4, 9, 14), सन्ध्या का समय, मङ्गल-शनिवार तथा रजोदर्शन से चार रात्रियॉं त्याज्य होती हैं, वहीं उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद तथा उत्तराफाल्गुनी, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा नक्षत्र तथा शुभ ग्रह की केन्द्र त्रिकोण में स्थिति एवं पापग्रहों की 3, 6, 11 भावों में स्थिति, सूर्य, मङ्गल तथा गुरु की लग्न पर दृष्टि तथा 6, 8, 10 आदि सम रात्रियों में गर्भाधान श्रेष्ठ होता है| उपर्युक्त सभी तथ्यों को मिलाकर गर्भाधान का मुहूर्त निकालना बहुत ही कठिन है, अत: शुभ नक्षत्र एवं लग्न का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, खासकर जन्मकालीन चन्द्र राशि से अष्टम भाव की राशि का लग्न एवं जिस लग्न से पञ्चम भाव में मङ्गल, सूर्य, शनि आदि पाप ग्रह स्थित हों, ऐसे लग्न वाले समय को त्याग देना चाहिए, शेष त्याज्य समय उतना अधिक विचारणीय नहीं है| यदि जन्मपत्रिका में अशुभ योग हों, लेकिन दम्पती सन्तान प्राप्ति के लिए गर्भाधान का ऐसे समय प्रयोग करे, जब उनके गोचर से पञ्चम भाव में शुभ ग्रह गमन कर रहे हों एवं विंशोत्तरी दशा भी श्रेष्ठ ग्रहों की हो, तो सन्तान प्राप्ति के योग निश्‍चित रूप से बन जाते हैं| ऐसी स्थिति में सिर्फ नक्षत्र एवं लग्न की शुद्धि करके भी गर्भाधान किया जाए, तो स्वस्थ एवं सुन्दर सन्तान की प्राप्ति होती है| वहीं विंशोत्तरी दशा एवं गोचर से समय अनुकूल नहीं हो, तो श्रेष्ठ गर्भाधान संस्कार का मुहूर्त भी इतना कारगर नहीं हो पाएगा| उपर्युक्त सभी तथ्यों का विचार कर सन्तान सम्बन्धी फल कथन कहा जाए, तो निश्‍चित रूप से फलादेश में सटीकता होगी| पुत्र होगा अथवा पुत्री? इसके विचार के लिए पुरुष एवं स्त्री ग्रहों की विशेष भूमिका होती है| गर्भाधान के समय यदि विंशोत्तरी दशाओं में एवं गोचर में स्त्री ग्रह बली हों साथ ही वे लग्न और पञ्चम भाव को देखते हों, तो कन्या सन्तति की प्राप्ति होती है| वहीं इस समय में पुरुष ग्रहों की दशा हो, गोचर में वे पञ्चम और लग्न भाव से सम्बन्ध बनाते हों, तो पुत्र सन्तति के योग बनते हैं| यह स्थिति भी पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका में विचारी जानी चाहिए| यदि किसी दम्पती की जन्मपत्रिका में सन्तान प्राप्ति सम्बन्धी योग बिल्कुल नहीं बनते हों, तो उन्हें तत्सम्बन्धी अशुभ ग्रह का उपाय करने के साथ ही शुभ दशाओं में, शुभ गोचर में एवं शुद्ध गर्भाधान मुहूर्त के समय गर्भाधान करने से सन्तान प्राप्ति अवश्य होती है|

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सन्तान सुख
posted Sep 25, 2019 by Rakesh Periwal

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द्वितीय भाव कुंडली के 12 भावों में से द्वितीय भाव को कुंटुंब भाव और धन भाव के नाम से जाना जाता है। यह भाव धन से संबंधित मामलों को दर्शाता है, जिसका हमारे दैनिक जीवन में बड़ा महत्व है। द्वितीय भाव परिवार, चेहरा, दाईं आँख, वाणी, भोजन, धन या आर्थिक और आशावादी दृष्टिकोण आदि को दर्शाता है। यह भाव ग्रहण करने, सीखने, भोजन और पेय, चल संपत्ति, पत्र व दस्तावेज का प्रतिनिधित्व करता है। द्वितीय भाव का महत्व और विशेषताएँ वैदिक ज्योतिष में द्वितीय भाव से धन, संपत्ति, कुटुंब परिवार, वाणी, गायन, नेत्र, प्रारंभिक शिक्षा और भोजन आदि बातों का विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह भाव जातक के द्वारा जीवन में अर्जित किये गये स्वर्ण आभूषण, हीरे तथा अन्य बहुमूल्य पदार्थों के बारे में भी बोध कराता है। द्वितीय भाव को एक मारक भाव भी कहा जाता है। ज्योतिष में द्वितीय भाव से क्या देखा जाता है? द्वितीय भाव का कारक ग्रह बृहस्पति को माना गया है। इस भाव से धन, वाणी, संगीत, प्रारंभिक शिक्षा और नेत्र आदि का विचार किया जाता है। आर्थिक स्थिति: कुंडली में आमदनी और लाभ का विचार एकादश भाव के अलावा द्वितीय भाव से भी किया जाता है। जब द्वितीय भाव और एकादश भाव के स्वामी व गुरु मजबूत स्थिति में हों, तो व्यक्ति धनवान होता है। वहीं यदि कुंडली में इनकी स्थिति कमजोर हो तो, आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शुरुआती शिक्षा: चूंकि द्वितीय भाव का व्यक्ति की बाल्य अथवा किशोरावस्था से गहरा संबंध होता है इसलिए इस भाव से व्यक्ति की प्रारंभिक शिक्षा देखी जाती है। वाणी, गायन और संगीत: द्वितीय भाव का संबंध मनुष्य के मुख और वाणी से होता है। यदि द्वितीय भाव, द्वितीय भाव के स्वामी और वाणी का कारक कहे जाने वाले बुध ग्रह किसी प्रकार से पीड़ित हो, तो व्यक्ति को हकलाने या बोलने में परेशानी रह सकती है। चूंकि द्वितीय भाव वाणी से संबंधित है इसलिए यह भाव गायन अथवा संगीत से भी संबंध को दर्शाता है। नेत्र: द्वितीय भाव का संबंध व्यक्ति के नेत्र से भी होता है। इस भाव से प्रमुख रूप से दायें नेत्र के बारे में विचार करते हैं। यदि द्वितीय भाव में सूर्य अथवा चंद्रमा पापी ग्रहों से पीड़ित हों या फिर द्वितीय भाव व द्वितीय भाव के स्वामी पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो, तो व्यक्ति को नेत्र पीड़ा या विकार हो सकते हैं। रूप-रंग और मुख: द्वितीय भाव मनुष्य के मुख और चेहरे की बनावट को दर्शाता है। यदि द्वितीय भाव का स्वामी बुध अथवा शुक्र हो और बलवान होकर अन्य शुभ ग्रहों से संबंधित हो, तो व्यक्ति सुंदर चेहरे वाला होता है, साथ ही व्यक्ति अच्छा बोलने वाला होता है। वैदिक ज्योतिष के पुरातन ग्रन्थों में द्वितीय भाव उत्तर-कालामृत के अनुसार, द्वितीय भाव नाखून, सच और असत्य, जीभ, हीरे, सोना, तांबा और अन्य मूल्यवान स्टोन, दूसरों की मदद, मित्र, आर्थिक संपन्नता, धार्मिक कार्यों में विश्वास, नेत्र, वस्त्र, मोती, वाणी की मधुरता, सुंगधित इत्र, धन अर्जित करने के प्रयास, कष्ट, स्वतंत्रता, बोलने की बेहतर क्षमता और चांदी आदि को दर्शाता है। द्वितीय भाव आर्थिक संपन्नता, स्वयं द्वारा अर्जित धन या परिवार से मिले धन को दर्शाता है। यह भाव पैतृक, वंश, महत्वपूर्ण वस्तु या व्यक्ति आदि का बोध भी कराता है। कालपुरुष कुंडली में द्वितीय भाव की राशि वृषभ होती है जबकि इस भाव का स्वामी शुक्र को कहा जाता है। प्रसन्नज्ञान में भट्टोत्पल कहते हैं कि द्वितीय भाव मोती, माणिक्य रत्न, खनिज पदार्थ, धन, वस्त्र और व्यवसाय को दर्शाता है। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार, द्वितीय भाव का आर्थिक मंत्रालय, राज्य की बचत, बैंक बेलैंस, रिजर्व बैंक की निधि या धन व आर्थिक मामलों से संबंध है। प्रश्न ज्योतिष के अनुसार, द्वितीय भाव धन से जुड़े प्रश्न का निर्धारण करता है। इनमें लाभ या हानि, व्यवसाय से वृद्धि आदि बातें प्रमुख हैं। द्वितीय भाव का अन्य भावों से अंतर्संबंध द्वितीय भाव कुंडली के अन्य भावों से भी अंतर्संबंध रखता है। यह भाव छोटे भाई-बहनों को हानि, उनके खर्च, छोटे भाई-बहनों से मिलने वाली मदद और उपहार, जातक के हुनर और प्रयासों में कमी को दर्शाता है। द्वितीय भाव आपकी माँ के बड़े भाई-बहन, आपकी माँ को होने वाले लाभ और वृद्धि, समाज में आपकी माँ के संपर्क आदि को भी प्रकट करता है। वहीं द्वितीय भाव आपके बच्चों की शिक्षा, विशेषकर पहले बच्चे की, समाज में आपके बच्चों की छवि और प्रतिष्ठा का बोध कराता है। द्वितीय भाव प्राचीन ज्ञान से संबंधित कर्म, मामा का भाग्य, उनकी लंबी यात्राएँ और विरोधियों के माध्यम से लाभ को दर्शाता है। यह आपके जीवनसाथी की मृत्यु, पुनर्जन्म, जीवनसाथी की संयुक्त संपत्ति, साझेदार से हानि या साझेदार के साथ मुनाफे की हिस्सेदारी का बोध कराता है। द्वितीय भाव आपके सास-ससुर, आपके ससुराल पक्ष के व्यावसायिक साझेदार, ससुराल के लोगों से कानूनी संबंध, ससुराल के लोगों के साथ-साथ बाहरी दुनिया से संपर्क और पैतृक मामलों को दर्शाता है। यह भाव स्वास्थ्य, रोग, पिता या गुरु की बीमारी, शत्रु, मानसिक और वैचारिक रूप से आपके विरोधी, निवेश, करियर की संभावना, शिक्षा, ज्ञान और आपके अधिकारियों की कलात्मकता को प्रकट करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, कुंडली में द्वितीय भाव बड़े भाई-बहनों की सुख-सुविधा, मित्रों का सुख, मित्रों के लिए आपका दृष्टिकोण, बड़े भाई-बहनों का आपकी माँ के साथ संबंध को दर्शाता है। यह भाव लेखन, आपकी दादी के बड़े भाई-बहन और दादी के बोलने की कला को भी प्रकट करता है। द्वितीय भाव गुप्त शत्रुओं की वजह से की गई यात्राओं पर हुए खर्च और प्रयासों को भी दर्शाता है।
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जन्म कुंडली में पंचम भाव संतान सुख का भाव होता है। इस भाव में जितने ग्रह हों और जितने ग्रहों की दृष्टि हों उतनी संख्या में संतान प्राप्त होती है। पुरुष ग्रहों के योग और दृष्टि से पुत्र और स्त्री ग्रहों के योग और दृष्टि से कन्या की संख्या का अनुमान लगाया जाता है। गर्भाधान के लिए पंचम भाव एवं पंचमेश की शक्ति की परख या परीक्षण आवश्यक है। इसी शक्ति के आधार पर प्रजनन क्षमता का पता लगाया जाता है। पुरुष की कुण्डली के पंचम भाव से बीज एवं स्त्री की कुण्डली के पंचम भाव से क्षेत्र की क्षमता बताई जाती है। जब बीज और क्षेत्र दोनों का कमजोर सम्बन्ध बने तो सन्तान सुख की प्राप्ति कमजोर ही रहती है। इस स्थिति में अनुकूल ग्रह स्थितियां ही गर्भाधान कराती हैं बृहस्पति का लग्न में या भाग्य में या एकादश में बैठना और महादशा में चलना भी संतान उत्पति का प्रबल योग बनाता है। जब शुक्र पंचम को देख रहा हो या वह पंचमेश में हो तो इन परिस्थितियों में संतान पैदा होने की तमाम संभावनाएं जन्म लेती हैं। इस प्रकार यदि कोई जातक संतान को लेकर चिंतित है तो उसे स्वास्थ्य जांच के साथ-साथ अपनी कुंडली का अध्ययन विद्वान ज्योतिषाचार्यों से अवश्य करवाना चाहिये और जानना चाहिये कि कहीं ग्रहों की दशा प्रतिकूल तो नहीं। कहीं संतान उत्पति में देरी का कारण ग्रहों की यह प्रतिकूल दशा तो नहीं।
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क्या है हस्तरेखा ज्ञान? ****************** हस्तरेखा को भारतीय ज्योतिष का एक प्रमुख अंग माना जाता है। प्राचीन काल से इस विद्या का महत्त्व बहुत ज्यादा रहा है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस विद्या का ज्ञान प्राप्त कर लेता है वह किसी का भी हाथ देखकर उसके भविष्य में घटने वाली घटनाओं को जान सकता है। हस्त रेखा की दुनिया में सबसे बड़ा नाम है कीरो का और भारत में हस्त रेखा की सबसे ज्यादा पुस्तक कीरो की ही मिलती है. कीरो ने वैज्ञानिक पद्धति से भविष्य की गणना करना आरंभ किया था जो बहुत ही सटीक बैठती है और भारतीय ज्योतिष के ज्ञानी भी कीरो को अपना आदर्श मानते है। हस्त रेखा विज्ञान के दो भेद माने जाते है। जहाँ हाथ की रेखाओं से व्यक्ति के भूतकाल और भविष्य की घटनाओं का आकलन करने में सहायक होती है वाही हाथ एवं उँगलियों की बनावट से व्यक्ति के स्वभाव, उसका कार्य क्षेत्र इत्यादि का आकलन करने में सहायक होती है। हाथ की रेखाएं:- हाथ एवं उँगलियों की बनावट मैं आपको हस्त रेखा की मुख्य-मुख्य रेखाओं और उनका मानव जीवन पर प्रभाव से सम्बंधित जानकारी देने वाला हूँ. हाथ की प्रमुख रेखाएं :- हाथ की हथेली में मुख्यत: सात बड़ी और सात छोटी रेखाओं का महत्त्व सबसे ज्यादा है क्यूँकि ये रेखाए व्यक्ति के जीवन से सम्बंधित समस्त बातों को अपने में समेट लेती है और व्यक्ति के वर्तमान एवं भविष्य का निर्धारण करती है और वो सात बड़ी रेखाएं है 1. आयु रेखा 2. ह्रदय रेखा 3. मस्तिष्क रेखा 4. भाग्य रेखा 5. सूर्य रेखा 6. स्वास्थ्य रेखा 7. शुक्र मुद्रिका इसके अलावा सात और छोटी रेखाएं हैं- 1. मंगल रेखा 2. चन्द्र रेखा 3. विवाह रेखा 4. निकृष्ट रेखा इसके अतिरिक्त तीन मणिबंध रेखाएं होती हैं इनका स्थान हथेली की जड़ और हाथ की कलाई है। यह सात रेखाएं व्यक्ति के जीवन के बारे में बहुत कुछ बता देती है. उदाहरण के लिए जीवन रेखा से किसी भी व्यक्ति की आयु का अनुमान हो जाता है जबकि वहीँ मस्तिष्क रेखा व्यक्ति की मनोदशा, उसकी विद्या बुद्धि एवं जीवन में सफलता के आयाम इत्यादि की सूचक होती है, इसी तरह ह्रदय रेखा से व्यक्ति के स्वाभाव, उसके वैवाहिक जीवन का आकलन, और आपसी रिश्ते इत्यादि का आकलन होता है और भाग्य रेखा स्वयं अपने नाम से ही अपना परिचय दे देती है. आइये इन सात महत्त्वपूर्ण रेखाओं के बारे में थोडा सा विस्तार से जानते है. सबसे पहले जानते हैं आयु रेखा के बारे में:- 1. आयु रेखा आयु रेखा यानी जीवन रेखा शब्द से ही इस रेखा का अनुमान हो जाता है. जीवन रेखा हाथ के अंगूठे और तर्जनी उंगली के मध्य से आरम्भ होकर हथेली के आधार तक जाती है. जीवन रेखा जितनी लम्बी और स्पष्ट होती है व्यक्ति की आयु उतनी ही लम्बी होती है यदि जीवन रेखा बीच में कही अस्पष्ट या टूटी हुई होती है तो उसे अल्प आयु या स्वाथ्य का नुक्सान होने का आभास कराता है. यदि जीवन रेखा पूर्ण स्पष्ट होकर हथेली के आधार तक जाती है तो व्यक्ति स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है जबकि अस्पष्ट और और टूटी हुई रेखा आयु में बाधा का आभास कराती है। 2. ह्रदय रेखा यह रेखा सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठिका) के नीचे से निकलकर तर्जनी उंगली के मध्य तक पहुँचती है. यह रेखा व्यक्ति के स्वाभाव को दर्शाती है. ह्रदय रेखा जितनी लम्बी होती है व्यक्ति उतना ही मृदुभाशी, सरल और जनप्रिय होता है इस प्रकार के व्यक्ति समाज में सर्व स्वीकार होते है और व्यक्तिगत जीवन में सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ जीवन यापन करते है. इन लोगों के मन में छल कपट बहुत ही कम पाया जाता है और संतोषी प्रवत्ति के होते है. और जिन लोगों की ह्रदय रेखा छोटी होती है वह व्यक्ति असंतोषी, चिडचिडा, शंकालु अवं समाज से दूर रहने वाले वाली प्रवत्ति के होते है. ऐसे व्यक्ति छोटी सोच वाले होते है और जल्दी किसी पर विश्वास नहीं करते है. आम तौर पर इस प्रकार के व्यक्ति क्रूर प्रवत्ति के होते है। 3. मस्तिष्क रेखा यह रेखा तर्जनी उंगली के नीचे से और जीवन रेखा के आरंभ स्थान से निकलती है और सबसे छोटी छोटी ऊँगली कनिष्का के नीचे हथेली तक जाती है किसी-किसी व्यक्ति के हाथ में यह रेखा कनिष्का तक पहुचने से पहले ही समाप्त हो जाती है मस्तिष्क रेखा कहलाती है. मस्तिष्क रेखा जितनी लम्बी होती है व्यक्ति का मानसिक संतुलन उतना ही अच्छा होता है. ऐसे लोग भाग्य से ज्यादा मेहनत पर विश्वास करते है. इन लोगों की स्मरण शक्ति काफी अच्छी होती है और प्रत्येक कार्य को सोच समझ कर करते है. इस प्रकार के लोगों में हमेशा कुछ न कुछ सीखने की ललक रहती है. जबकि इसके विपरीत छोटी मस्तिस्क रेखा वाले लोग जल्दबाजी में रहते है, कर्म से से ज्यादा भाग्य पर विश्वास करते है और किसी जल्दबाजी में निर्णय लेते है. जिसका पछतावा उन्हें बाद में होता है। 4. भाग्य रेखा यह रेखा मध्यमिका और अनामिका के बीच से निकलकर नीचे हथेली तक जाती है. यह रेखा प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में नहीं पायी जाती है. भाग्य रेखा जितनी स्पष्ट होती है व्यक्ति का जीवन उतना ही सरल होता है जबकि इसके विपरीत जिन व्यक्तियों के हाथ में यह रेखा अस्पष्ट या टूटी हुई हो वह व्यक्ति जीवन में थोडा बहुत संघर्ष करता है और जिन व्यक्ति के हाथ में यह रेखा नहीं होती है इससे तात्पर्य यह होता है कि इस प्रकार के व्यक्ति कर्मवादी, मेहनती होते है और जीवन में संघर्षों से घिरे रहते है. भाग्य रेखा की व्याख्या बहुत कुछ मस्तिस्क रेखा पर भी निर्भर करती है। 5. सूर्य रेखा यह रेखा सभी व्यक्तियों के हाथ में नहीं होती है. यह रेखा चन्द्र पर्वत से आरम्भ होकर ऊपर तीसरी उंगली अनामिका तक जाती जाती है. जिस व्यक्ति के हाथ में यह रेखा होती है वह व्यक्ति निडर, स्वाभिमानी, द्र? इच्छाशक्ति वाला होता है. इस प्रकार के व्यक्ति जीवन में कभी हार नहीं मानते है और नेतृत्व प्रिय होते है। ६. स्वास्थ्य रेखा यह रेखा सबसे छोटी उंगली कनिष्का से आरम्भ होकर हथेली के नीचे की और चली जाती है. यह रेखा व्यक्ति के स्वास्थ की सूचक होती है। 7. शुक्र मुद्रिका यह रेखा कनिष्का और अनामिका के मध्य से आरंभ होकर तर्जनी और अनामिका के मध्य तक चंद्राकार रूप में होती है. यह रेखा आम तौर पर उन लोगों में पायी जाती है जो विलासी जीवन जीते है. इस प्रकार के लोग कामुक, खर्चीले और भौतिकतावादी होते हैं। सात छोटी रेखाओं के बारे में भी जानें- 1. मंगल रेखा यह रेखा जीवन रेखा और अंगूठे के बीच से निकलती है और मंगल पर्वत तक जाती जाती है। मंगल रेखा जितनी स्पस्ट होती है व्यक्ति उन्तना ही तीव्र बुद्धि का होता है, प्रत्येक कार्य को सोच समझ कर करने वाला होता है. ऐसे व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति बहुत ही जुझारू होते है जब किसी कार्य को ठान लेते है उसे पूरा कर के छोड़ते हैं। 2. चन्द्र रेखा यह रेखा कनिष्ठिका और अनामिका के मध्य से निकर कर नीचे मणिबंध तक जाती है. यह रेखा धनुषाकार होती है. इस रेखा को प्रेरणादायक रेखा भी कहते है. जिस व्यक्ति के हाथ में यह रेखा पायी जाती है वह व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए सदैव लगा रहता है. इस प्रकार के व्यक्ति व्यवहार कुशल होते है जल्दी ही लोगों से घुल मिल जाते है। 3. विवाह रेखा कनिष्ठिका उंगली के नीचे एक या दो छोटी-छोटी रेखाएं होती है और ह्रदय रेखा के सामानांतर चलती है विवाह रेखा कहलाती है. इसे प्रेम रेखा भी कहते है. यह रेखाए जितनी स्पष्ट होती है व्यक्ति रिश्तों को उतना ही महत्त्व देता है। 4. निकृष्ट रेखा यह रेखा दु:ख देनी वाली रेखा होती है इसलिए इसे निकृष्ट रेखा कहते है. यह चन्द्र रेखा की ओर से चलती है और स्वास्थ्य रेखा के साथ चलकर शुक्र स्थान में प्रवेश करती है।
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