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ऐसा करने से होता है विवाह के बाद भाग्योदय

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भाग्योदय कराने वाले कुछ ग्रह जन्मकुण्डली में महत्वपूर्ण होते हैं। ये प्रत्येक जन्मकुण्डली में अलग-अलग भी हो सकते हैं जैसे लग्नेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश, आत्मकारक, अमात्यकारक, नवांश कुण्डली के दशमेश, दशमांश कुण्डली के दशमेश, चतुर्थांश कुण्डली के नवमेश आदि। इनमें से यदि एक भी ग्रह शक्तिशाली हो तो भाग्योदय करा सकता है। ज्योतिष में सर्वाधिक कौशल का काम होता है `भाग्योदय कारक ग्रह` को पहचानना। उपरोक्त ग्रहों में से यदि एक भी अनुकूल हों तो तकदीर बना देते हैं।

सबसे शानदार नियम तो यही होगा कि पहले भाग्योदय कारक ग्रह को खोज लीजिए, यदि इस ग्रह का जन्मकुण्डली के सप्तमेश, नवांश कुण्डली के सप्तमेश या दाराकारक ग्रह के साथ युति-दृष्टि या परिवर्तन का संबंध हों तो ऐसे युवक-युवतियों का विवाह के बाद भाग्योदय होता है। विवाह होने के बाद ही जीवन को या कॅरियर को सही दिशा मिल पाती है। अनेक ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिनके वास्तविक कॅरियर या जीवन की शुरुआत ही विवाह के बाद हुई। कुछ ऐसे भी मिलेंगे जिनका विवाह के बाद पतन हो गया इसलिए यह सार्वभौम रूप से नहीं कहा जा सकता कि हर किसी का विवाह के बाद भाग्योदय होगा। ज्योतिष विद्या इस विषय में ज्यादा सहायक सिद्ध होती है। अनुकूल जन्मकुण्डली वालों का विवाह सदैव उन्नतिकारक रहता है। कभी-कभी कुछ युवक-युवतियों की कुण्डलियाँ तो थोड़ी कमजोर होती हैं फिर भी उनके पारिवारिक संस्कार इतने श्रेष्ठ होते हैं कि दुर्योग अधिक प्रभावी नहीं हो पाते, इसलिए श्रेष्ठ कुल और परिवार के तथा सदाचार व उत्तम व्यवहार वाले, शिक्षित वर और कन्या, विवाह हेतु उपयुक्त होते हैं।

जिस कन्या की पत्रिका में प्रबल राजयोग हो और राजयोग कारक किसी भी ग्रह की दशा-अंतर्दशा 20 से 30 वर्ष की आयु में प्राप्त होती है तो ऐसी कन्या का विवाह जिस भी युवक से होगा, उसके भाग्य में चार चाँद लग जाएंगे अथवा यदि वह कन्या भी अपना कारोबार करती हो या नौकरी करती हो तो पति को मिलने वाले परिणाम आधे हो जायेंगे परंतु पति के जीवन में भी उन्नति तो आयेगी ही। 

भाग्यशाली वर : जिस लड़के की कुण्डली में निम्न योग हों और उसकी कुण्डली जिस कन्या से मेल रखती हो तो विवाह उपरांत उस कन्या का भाग्य अवश्य उदय होता है -

  1. जन्मकुण्डली में भाग्येश (नवमेश) केन्द्र, त्रिकोण या लाभ भाव में अपनी उच्च राशि में हों तो ऐसा युवक भाग्यशाली होता है।
  2. नवमेश पंचम भाव में, पंचमेश नवम भाव में और दशमेश दशम में हों।
  3. तृतीयेश व नवमेश की युति हो और उन पर बलवान शुभ ग्रह की दृष्टि हो।
  4. नवमेश की चतुर्थेश से युति हो और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो।
  5. नवमेश लग्न में, लग्नेश नवम में एवं दशमेश लाभ भाव में स्थित हों।
  6. नवमेश या पंचमेश शुक्र हों और किसी शुभ ग्रह से दृष्ट हों।
  7. नवमेश व दशमेश की युति केन्द्र में हो तथा नवम भाव में एक भी शुभ ग्रह हो तो लड़का भाग्यशाली होता है।
  8. लग्नेश लाभ भाव में, लाभेश नवम भाव में और नवमेश लग्न में हों तो ऐसे जातक का पुन: पुन: भाग्योदय होता है।


भाग्यशाली कन्या : जिस कन्या की पत्रिका में निम्न योग हों वह सौभाग्यशाली होती है। कुण्डली मिलान होने पर जिस वर के साथ ऐसी कन्या का विवाह होता है उसकी किस्मत खुल जाती है।

  1. जिस कन्या की पत्रिका में भाग्येश सिंहासनांश में हो तथा उस पर लग्नेश या दशमेश की दृष्टि हो तो कन्या सौभाग्यशालिनी होती है।
  2. जिसकी कुण्डली में नवमेश शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो और नवम भाव में कोई भी शुभ ग्रह स्थित हो तो वह कन्या बहुत भाग्यशाली होती है।
  3. जिस कन्या की पत्रिका में चंद्रमा, बुध और गुरु लग्न में हों, वह कन्या भाग्यशाली होती है।
  4. जन्म लग्न में बुध-गुरु और शुक्र तीनों स्थित हों, वह कन्या बहुत यश प्राप्त करती है।
  5. जिस कन्या की कुण्डली में लग्न, पंचम व नवम भाव पर शुभ ग्रहों का अधिक प्रभाव हो वह बहुत भाग्यशाली होतीहै।
  6. भाग्यवान वर या कन्या से विवाह होने पर विवाह के बाद जीवन में बहुत उन्नति मिलती है।.....
  7. for details book call here or call 8571064245...Astrologer Dr Arvind Shukla
posted Sep 11, 2017 by anonymous

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चैत्र मास की शुक्‍ल पक्ष की तृतीया को गणगौर तीज का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर देवों के देव महादेव और उनकी अर्धांगिनी देवी पार्वती का पूजन किया जाता है। इस पर्व को ईसर गौर भी कहा जाता है जिसका अर्थ है ईश्‍वर-गौरी। कब है गणगौर तीज का त्‍योहार जैसा कि हमने पहले भी बताया कि ये त्‍योहार चैत्र मास की शुक्‍ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है इसलिए इस बार ये पर्व 27 मार्च, शुक्रवार के दिन है। इस पर्व पर कुंवारी कन्‍याएं और विवाहित महिलाएं पूरे हर्ष और उल्‍लास के साथ व्रत और पूजन करती हैं। गणगौर तीज का महत्‍व इस पर्व की सबसे खास बात ये है कि इसे 16 दिनों तक मनाया जाता है। ये मुख्‍य रूप से राजस्‍थान का लोकपर्व है लेकिन देश के कई हिस्‍सों में इस पर्व को मनाया जाता है। राजस्‍थान में कन्‍याओं के विवाह के बाद प्रथम चैत्र शुक्‍ल तृतीया तक गणगौर का पूजन करना जरूरी माना जाता है। चैत्र कृष्‍ण प्रतिपदा के दिन होलिका दहन की भस्‍म और तालाब की मिट्टी से ईसर-गौर की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। 16 दिनों तक मां पार्वती के गीत गाए जाते हैं। व्रत और पूजन विवाह योग्‍य कन्‍याएं मनचाहा वर पाने के लिए गणगौर तीज का व्रत रखती हैं। वहीं विवाहित स्त्रियां सौभाग्‍य की कामना के लिए ये पर्व मनाती हैं। चैत्र शुक्‍ल तृतीया की सुबह पूजन के पश्‍चात् किसी तालाब, सरोवर, बावड़ी या कुएं पर जाकर मंगल गीत गाते हुए गणगौर की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। इस विसर्जन का दृश्‍य देखने योग्‍य होता है। गणगौर तीज के उपाय गणगौर तीज के पर्व के दौरान मां पार्वती को घी का भोग लगाएं और उसका दान भी करें। ये उपाय निरोगी काया प्रदान कर सभी तरह के रोगों से मुक्‍ति दिलाता है। भगवान शिव आंकड़े के फूल से प्रसन्‍न होते हैं इसलिए उन्‍हें लाल और सफेद आंकड़े के फूल अर्पित करें। इससे भोग एवं मोक्ष की प्राप्‍ति होगी। गणगौर तीज के पर्व पर मां पार्वती को शक्‍कर का भोग लगाएं और इसका दान करें। इस उपाय से दान करने वाले व्‍यक्‍ति की आयु लंबी होती है। दूध भगवान शिव को अर्पित कर उसका दान करने से सभी तरह के दुखों का अंत होता है। मालपुआ चढ़ाकर उसका दान करने से सभी तरह की मुसीबतें खत्‍म हो जाती हैं। भगवान शिव को चमेली के फूल अर्पित करने से वाहन सुख की प्राप्‍ति होती है। अगर आपका विवाह तय होने में देरी हो रही है या कोई ना कोई रुकावट आ जाती है तो आप इस दिन मां गौरी और भगवान शंकर का पूजन जरूर करें। ये पर्व मनचाहे वर और उत्तम जीवनसाथी की प्राप्‍ति के लिए बहुत शुभ और मंगलकारी माना जाता है।
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विवाह में देरी सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है। चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है। सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं। चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है। सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है। सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है। लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है। महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है। राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है

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कुंडली के ये ग्रहयोग धन को अस्थिर बनाते है। हमारी जन्मकुंडली में द्वित्य अर्थात "दूसरा भाव" धन और हमारे पास एकत्रित धन का प्रतिनिधित्व करता है कुंडली का 'बारहवा भाव" व्यय, हानि, खर्चा या अस्थिरता का कारक होता है अतः कुंडली में धन भाव, धनेश तथा द्वादश भाव द्वादशेश के द्वारा कुछ विशेष ग्रहस्थितियां बनने पर व्यक्ति को जीवन में धन की अस्थिरता की समस्या होती है" 1 कुंडली में यदि धनेश (दूसरे भाव का स्वामी) बारहवे भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति के पास कभी धन नहीं रूक पाता और धन की अस्थिरता बनी रहती है। 2 यदि राहु या शनि कुंडली के बारहवे भाव में शत्रु राशि में बैठे हों तो व्यक्ति के पास धन नहीं रूक पाता या अनचाहे खर्चे बहुत होते हैं। 3 धनेश और द्वादशेश का योग भी धन को स्थिर नहीं होने देता। 4 यदि कुंडली के बारहवे भाव में कोई पाप योग (ग्रहण योग, गुरुचांडाल योग, अंगारक योग आदि) बन रहा हो तो ऐसे में भी व्यक्ति धन प्राप्ति के बाद भी धन को अधिक समय तक अपने पास नहीं रोक पाता। 5 बारहवे भाव में यदि कोई पाप ग्रह नीच राशि में हो तो भी धन के नुकसान की समस्या या धन की अस्थिरता की समस्या बनी रहती है। 6 धन भाव में कोई पाप योग बनने या धनेश के नीच राशि में होने पर भी धन की स्थिरता नहीं बन पाती। धन हानि से बचने के उपाय 1 अपनी कुंडली के धनेश (दूसरे भाव के स्वामी) ग्रह के मन्त्र का नियमित कम से कम 3 माला जाप करें। 2 यदि बारहवे या दूसरे भाव में कोई पाप ग्रह हो तो उस ग्रह से सम्बंधित पदार्थो का नियमित दान करना चाहिए। 3 श्री सूक्त का प्रतिदिन पाठ करें।
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जिन भी जातको के घर मे अशांति और बिना वजह कलह रहती हो वह आज शाम(देर शाम से दिन छिपने के बाद)गाय के उपले पर गूगल और लोवान कपूर से जलाकर उसकी धूनी पूरे घर मे दे, इससे घर की शुद्धि होकर नकारात्मक ऊर्जा घर से बाहर निकलेगी।
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अंतर्जातीय प्रेम विवाह या अंतर्जातीय विवाह वह विवाह होता है जो जाति या धर्म से बाहर किया जाता है।विवाह होने के लिए कुंडली का 7वा भाव/इसका स्वामी तो प्रेम विवाह होने के लिए 7+5वा दोनो भाव भावेश जिम्मेदार है, साथ ही अंतर्जातीय प्रेम विवाह तब ही होता है जब सातवे और 9वे भाव पर पाप शनि या राहु का प्रभाव होगा क्योंकि शनि और राहु ही अंतर्जातीय धर्म या जाति से बाहर विवाह या प्रेम विवाह करवाते है।जब भी कुंडली मे 5वे और 7वे भाव के बीच संबंध बनता है या इन दोनों भावो के स्वामियों में से कोई भी एक दूसरे के भावों को प्रभावित करेगा तब प्रेम विवाह होगा,और सातवे भाव या इस भाव के स्वामी और नवे भाव इस भाव के स्वामी पर शनि या राहु का प्रभाव पड़ने से अंतर्जातीय विवाह/अन्तरधर्म में भी विवाह। हो जाता है, शनि या राहु का सातवे या नवे भाव पर या इनके। स्वामियों पर प्रभाव न होगा तब अंतर्जातीय प्रेम विवाह नही होगाव, अब इसे उदाहरणों से समझते है कैसे? प्रथम_उदाहरण:- वृश्चिक लग्न अनुसार, वृश्चिक लग्न में सातवें भाव। का स्वामी शुक्र बनता है, 5वे भाव का स्वामी गुरु तो 9वे भाव का स्वामी चन्द्र होता है।अब यहाँ सातवें भाव स्वामी शुक्र और पाँचवे भाव स्वामी गुरु का संबंध या शुक्र का 5वे भाव मे बैठना या देखना आदि भी प्रेम विवाह की स्थिति होगी, ऐसी स्थिति में गुरु शुक्र और नवे भाव पर राहु की दृष्टि हो या राहु बैठा होगा तब प्रेम विवाह होगा, जैसे सप्तमेश शुक्र, पंचमेश गुरु, नवमेश चंद्र तीनो एक साथ 5वे भाव मे राहु के साथ होंगे तब यह अंतर्जातीय प्रेम विवाह की बनेगी क्योंकि अब यहाँ 5वे+7वे+9वे तीनों भावो के स्वामी 5वे भाव मे राहु के साथ है और राहु की 5वे भाव से धर्म/जाति के घर। 9वे भाव पर दृष्टि भी है नवमेश चन्द्र, सप्तमेश शुक्र, पंचमेश गुरु तीनो पर प्रभाव है।यह स्थिति अंतरजातीय प्रेम विवाह कराएगी।। द्वितीय_उदाहरण_अनुसार:- कुम्भ लग्न की कुंडली अनुसार, कुम्भ लग्न में 5वे भाव का स्वामी बुध होता है सातवे भाव का स्वामी सूर्य अब यहाँ सूर्य और बुध का किसी तरह कोई संबंध हो और यह संबंध् केंद्र या त्रिकोण भावो में होगा साथ ही राहु और शनि का प्रभाव पाँचवे भाव स्वामी बुध और सातवें भाव स्वामी सुर्य पर होगा साथ ही नवे भाव के स्वामी शुक्र या नवे भाव पर पाप शनि या राहु का असर होगा जैसे, यही कुंभ लग्न में पाचवे भाव स्वामी बुध सातवे भाव स्वामी सूर्य और नवे भाव स्वामी शुक्र तीनो या इनमे से कोई दो ग्रह भी एक साथ हो साथ ही 5वे भाव को प्रभावित कर रहे होंगे साथ ही इन पर राहु या शनि भी साथ हो ,इनको प्रभावित कर रहे हो तब प्रेम विवाह होगा और यह प्रेम विवाह अंतर्जातीय होगा।। कम शब्दों में कहू तो जब 9वे भाव या भावेश पर और साथ ही 5वे+7वे भाव पर राहु शनि का असर होगा तब अंतर्जातीय प्रेम विवाह ही होता है।ऐसी स्थिति में जब राहु या शनि का कोई प्रभाव नही होगा तब अंतर्जातीय न विवाह होता है। , न प्रेम विवाह होगा।। नोट:- प्रेम विवाह संबंन्धी योग कमजोर हुए,या प्रेम विवाह योग बनाने वाले ग्रह अस्त हुए, बहुत ज्यादा पीड़ित हुए तब प्रेम विवाह योग भंग हो जाते है, ऐसी स्थिति में केवल अंतर्जातीय विवाह ही हो पाता है।
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