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Daily knowledge of subhashini

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*न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।* *अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥*  भावार्थ : *कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है।* *No one knows what will happen tomorrow, so the person who can do his tomorrow's work today, is wise.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय माता दी* *जय सीताराम*
posted Oct 2 by anonymous

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संसारविषवॄक्षस्यज्ञन्ब्स्प; द्वे एव मधुरे फले | सुभाषितं च सुस्वादु सद्भिश्र्च सह संगम: || Poisonous tree (in the form of materialistic world ) has only two sweet fruits. Sweetest Subhashit and company of good people ! संसार रूपी विषवृक्ष में दो ही मधुर फल है – एक सुभाषित और दूसरा साधू पुरुषोंका संगत। *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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*शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा ।* *ऊहापोहोऽर्थ विज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥*  भावार्थ : *शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, चिंतन, उहापोह, अर्थविज्ञान, और तत्त्वज्ञान – ये बुद्धि के गुण हैं ।* *Service (care), hearing, eclipse, holding, contemplation, logic, semantics, and philosophy - these are the qualities of wisdom.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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*विरला जानन्ति गुणान् विरला: कुर्वन्ति निर्धने स्नेहम्।* *विरला: परकार्यरता: परदु:खेनापि दु:खिता विरला:॥* *ऐसे विरले सज्जन (बहुत कम ही) होते हैं, जो दूसरों के गुणों का सम्मान करते हैं, जो निर्धन व्यक्तियों से सम्बन्ध रखते हैं, जो दूसरों के सुख में सुख का अनुभव करते हैं तथा दूसरों का दुःख देखकर दुःखी होते हैं।* *Such gentlemen rare (rarely) are those. Who respect the qualities of others, who belong to the poor people, who experience happiness in the happiness of others and are sad when others see their grief.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीता राम*
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*सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्ति: क्षमाशिखा ।* *अंधकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन वार्यताम् ॥* *घना अंधकार फैल रहा हो, ऑंधी सिर पर बह रही हो तो हम जो दिया जलाएं, उसकी दीवट सत्य की हो, उसमें तेल तप का हो, उसकी बत्ती दया की हो और लौ क्षमा की हो। समाज में फैले अंधकार को नष्ट करने के लिए ऐसा ही दीप प्रज्जवलित करने की आवश्यकता है।* *The thick darkness is spreading, the gale is flowing over the head. So, the lamp which we burn, its lamp is of truth, In it there is oil of penance, its light is of mercy and flame is forgiveness. In order to destroy the darkness that is spread in society, there is a need to light such a lamp.!* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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*प्रदोषे दीपकश्चंद्र प्रभाते दीपको रवि:।* *त्रैलोक्ये दीपको धर्म सुपुत्र: कुलदीपक:॥* भावार्थ : *शाम को चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिन को सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकों को धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुल को प्रकाशित करता है।* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
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