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कुंडली में हैं ये योग, तो आपको बड़ा राजनेता बनाकर छोडेगे ।।

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आपकी कुंडली में हैं ये योग, तो आपको बड़ा राजनेता बनाकर छोडेगे ।। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो उसी समय से उस पर ग्रहों का प्रभाव पडऩा शुरू हो जाता है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक हर व्यक्ति के जीवन में जो अच्छे या बुरे परिणाम आते रहते हैं, यह सब ग्रहों का ही प्रभाव होता है। ज्योतिषशास्त्र एक ऐसी विद्या है जो लोगों के भूतकाल से लेकर भविष्य तक को उजागर करने में सक्षम है। कुंडली अध्ययन के समय मुख्य पांचों तत्वों (आकाश, जल, पृथ्वी,अग्रि व वायु)के साथ ही नक्षत्र और राशियों को ध्यान में रखा जाता है। इसमें भी गगन या आकाश तत्व को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।  किसी की भी कुंडली में लग्न सबसे प्रभावी माना जाता है, क्योंकि यह 'स्व' अर्थात स्वयं को सूचित करता है और इस पर आकाश तत्व का आधिपत्य होता है। जानकारों के मुताबिक ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों के योगों का बड़ा महत्व है। पराशर से लेकर जैमनी तक सभी ने ग्रह योग को ज्योतिष फलदेश का आधार माना है। योग के आंकलन के बिना सही फलादेश कर पाना संभव नहीं है। ऐसे समझे क्या होता है योग ... ग्रह योग की जब हम बात कर रहे हैं तो सबसे पहले यह जानना होगा कि ग्रह योग क्या है और यह बनता कैसे है। विज्ञान की भाषा में बात करें तो दो तत्वों के मेल से योग बनता है ठीक इसी प्रकार दो ग्रहों के मेल से योग का निर्माण होता है। ग्रह योग बनने के लिए कम से कम किन्हीं दो ग्रहों के बीच संयोग, सहयोग अथवा सम्बन्ध बनना आवश्यक होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों के बीच योग बनने के लिए कुछ विशेष स्थितियों का होना आवश्यक होता है।जैसे: दो या दो से अधिक ग्रह मिलकर एक दूसरे से दृष्टि सम्बन्ध बनाते हों। भाव विशेष में कोई अन्य ग्रह आकर संयोग करते हों। कारक तत्व शुभ स्थिति में हों। कारक ग्रह का अकारक ग्रह से सम्बन्ध बन रहा हो। एक भाव दूसरे भाव से सम्बन्ध बना रहे हों। नीच ग्रहों से मेल हो अथवा शुभ ग्रहों से मेल हो। इन सभी स्थितियों के होने पर या कोई एक स्थिति होने पर योग का निर्माण होता है। ज्योतिष रिसर्चर यतिन एस उपाध्याय के अनुसार जिन लोगों की कुंडली वृश्चिक लग्न की है और उसके लग्न भाव का स्वामी बारहवें में गुरु से दृ्ष्ट हो, शनि लाभ भाव में हो, राहु-चंद्र चतुर्थ भाव में हो, शुक्र स्वराशि के सप्तम में लग्न भाव के स्वामी से दृ्ष्ट हो और सूर्य ग्यारहवें भाव के स्वामी के साथ युति करता है तो व्यक्ति प्रसिद्ध राजनेता बनता है। यहां हम आपको बता रहे हैं ऐसे ही कुंडली के कुछ और खास योग, जिनसे राजनिति में सफलता की बातें मालूम चल जाती हैं... 1.कुंडली में शनि दशम भाव में हो या दशम भाव के स्वामी से संबध बनाए और दशम भाव में मंगल भी हो तो व्यक्ति समाज के लोगों के हित में काम करता है और राजनीति में सफल होता है। 2. राहु, शनि, सूर्य व मंगल की युति दशम या एकादश भाव हो या दृष्टि संबंध हो तो राजनेता बनने के गुण प्रदान करता है। 3 .सूर्य, चंद्र, बुध और गुरु धन भाव में हों, छठे भाव में मंगल हो, एकादश भाव में घर में शनि, बारहवें घर में राहु व छठे घर में केतु हो तो ऐसे व्यक्ति को राजनीति विरासत में मिलती है। 4. कर्क लग्न की कुंडली में दशम भाव का स्वामी मंगल दूसरे भाव में, शनि लग्न भाव में, छठे भाव में राहु पर लग्न भाव के स्वामी की दृष्टि हो, साथ ही सूर्य-बुध पंचम या ग्यारहवें भाव में हो तो व्यक्ति यश प्राप्त करता है और राजनीति में सफल होता है।
posted Sep 12, 2017 by Yatin S Upadhyay

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प्रेम विवाह के लिए कुंडली में आवश्यक होते हैं ये योग

प्रेम विवाह के लिए कुंडली में आवश्यक होते हैं ये योग

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आजकल अधिकतर युवा वर्ग ये जानना चाहता है कि उसका प्रेम विवाह होगा या नहीं, अगर आप भी इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहते हैं तो अपनी कुंडली में छिपे इस प्रेम विवाह योग के बारे में जानें। अगर आपकी कंडली में प्रेम विवाह योग है तो आपके प्रेम विवाह को कोई नहीं रोक सकता है। चलिए आपको बताते हैं किन योगों के कुडली में होने से प्रेम विवाह होता है...

जन्म कुंडली में विवाह कारक ग्रह पंचम के साथ संबंध बनाता हो अथवा 5 का 2, 7, 11 से संबंध हो तो प्रेम विवाह होता है।

सप्तम भाव का सब लॉर्ड पंचम भाव का प्रबल कार्येश हो तो प्रेम विवाह अवश्य होता है।

जिस जातक के दोनों हाथों पर हृदय रेखा में द्वीप चिन्ह हो और शुक्र रेखा स्वास्थ्य रेखा को काटकर ऊपर जाए, निश्चय ही ऐसे व्यक्ति का अवैध प्रेम संबंध होता है।

जिस जातक के हाथ की हृदय रेखा या बुध क्षेत्र पर जाए, उसका किसी निकट संबंधी या रिश्तेदार से प्रेम संबंध होता है।

 

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आपकी कुंडली में हैं ये योग, तो आपको बड़ा राजनेता बनाकर छोडेगे ।। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो उसी समय से उस पर ग्रहों का प्रभाव पडऩा शुरू हो जाता है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक हर व्यक्ति के जीवन में जो अच्छे या बुरे परिणाम आते रहते हैं, यह सब ग्रहों का ही प्रभाव होता है। ज्योतिषशास्त्र एक ऐसी विद्या है जो लोगों के भूतकाल से लेकर भविष्य तक को उजागर करने में सक्षम है। कुंडली अध्ययन के समय मुख्य पांचों तत्वों (आकाश, जल, पृथ्वी,अग्रि व वायु)के साथ ही नक्षत्र और राशियों को ध्यान में रखा जाता है। इसमें भी गगन या आकाश तत्व को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।  किसी की भी कुंडली में लग्न सबसे प्रभावी माना जाता है, क्योंकि यह 'स्व' अर्थात स्वयं को सूचित करता है और इस पर आकाश तत्व का आधिपत्य होता है। जानकारों के मुताबिक ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों के योगों का बड़ा महत्व है। पराशर से लेकर जैमनी तक सभी ने ग्रह योग को ज्योतिष फलदेश का आधार माना है। योग के आंकलन के बिना सही फलादेश कर पाना संभव नहीं है। ऐसे समझे क्या होता है योग ... ग्रह योग की जब हम बात कर रहे हैं तो सबसे पहले यह जानना होगा कि ग्रह योग क्या है और यह बनता कैसे है। विज्ञान की भाषा में बात करें तो दो तत्वों के मेल से योग बनता है ठीक इसी प्रकार दो ग्रहों के मेल से योग का निर्माण होता है। ग्रह योग बनने के लिए कम से कम किन्हीं दो ग्रहों के बीच संयोग, सहयोग अथवा सम्बन्ध बनना आवश्यक होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों के बीच योग बनने के लिए कुछ विशेष स्थितियों का होना आवश्यक होता है।जैसे: दो या दो से अधिक ग्रह मिलकर एक दूसरे से दृष्टि सम्बन्ध बनाते हों। भाव विशेष में कोई अन्य ग्रह आकर संयोग करते हों। कारक तत्व शुभ स्थिति में हों। कारक ग्रह का अकारक ग्रह से सम्बन्ध बन रहा हो। एक भाव दूसरे भाव से सम्बन्ध बना रहे हों। नीच ग्रहों से मेल हो अथवा शुभ ग्रहों से मेल हो। इन सभी स्थितियों के होने पर या कोई एक स्थिति होने पर योग का निर्माण होता है। ज्योतिष रिसर्चर यतिन एस उपाध्याय के अनुसार जिन लोगों की कुंडली वृश्चिक लग्न की है और उसके लग्न भाव का स्वामी बारहवें में गुरु से दृ्ष्ट हो, शनि लाभ भाव में हो, राहु-चंद्र चतुर्थ भाव में हो, शुक्र स्वराशि के सप्तम में लग्न भाव के स्वामी से दृ्ष्ट हो और सूर्य ग्यारहवें भाव के स्वामी के साथ युति करता है तो व्यक्ति प्रसिद्ध राजनेता बनता है। यहां हम आपको बता रहे हैं ऐसे ही कुंडली के कुछ और खास योग, जिनसे राजनिति में सफलता की बातें मालूम चल जाती हैं... 1.कुंडली में शनि दशम भाव में हो या दशम भाव के स्वामी से संबध बनाए और दशम भाव में मंगल भी हो तो व्यक्ति समाज के लोगों के हित में काम करता है और राजनीति में सफल होता है। 2. राहु, शनि, सूर्य व मंगल की युति दशम या एकादश भाव हो या दृष्टि संबंध हो तो राजनेता बनने के गुण प्रदान करता है। 3 .सूर्य, चंद्र, बुध और गुरु धन भाव में हों, छठे भाव में मंगल हो, एकादश भाव में घर में शनि, बारहवें घर में राहु व छठे घर में केतु हो तो ऐसे व्यक्ति को राजनीति विरासत में मिलती है। 4. कर्क लग्न की कुंडली में दशम भाव का स्वामी मंगल दूसरे भाव में, शनि लग्न भाव में, छठे भाव में राहु पर लग्न भाव के स्वामी की दृष्टि हो, साथ ही सूर्य-बुध पंचम या ग्यारहवें भाव में हो तो व्यक्ति यश प्राप्त करता है और राजनीति में सफल होता है।
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कुंडली में मंगल है मजबूत तो मिलेंगे ये शुभ परिणाम ज्योतिष के आधार नवग्रहों में से प्रत्येक की हमारे जीवन संचालन में एक विशेष भूमिका होती है परंतु इसमें भी मंगल हमारी जन्मकुंडली में कुछ ऐसे विशेष घटकों को नियंत्रित करता है जिनसे हमें अपने जीवन के संघर्षों और बाधाओं का सामना करने की हिम्मत और प्रेरणा मिलती है। ज्योतिष में मंगल अग्नि तत्व ग्रह है जो लाल रंग और क्षत्रिय वर्ण के गुण रखने वाला है, मेष और वृश्चिक राशि पर मंगल का आधिपत्य है अर्थात मंगल मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी है, मकर राशि में मंगल उच्चस्थ तथा कर्क मंगल की नीच राशि है। सूर्य, बृहस्पति और चन्द्रमाँ मंगल के मित्र ग्रह हैं तथा शनि, शुक्र, बुध और राहु से मंगल की शत्रुता है। मंगल किसी भी राशि में लगभग 45 दिन अर्थात डेढ़ महीना गोचर करता है और फिर अगली राशि में प्रवेश करता है। ज्योतिष में वैसे तो मंगल को बहुत सी चीजों का करक माना गया है जैसे तकनीकी कार्यो का कारक मंगल होता है इंजीनियरिंग और शल्यचिकित्सा के क्षेत्र में मंगल की अहम भूमिका होती है धातु, हथियार, बड़े भाई, विधुत, अग्नि, भूमि, सेना, पुलिस, सुरक्षा कर्मी, लड़ाई झगड़ा, रक्त, मांसपेशियां, पित्त, दुर्घटना और स्त्रियों का मांगल्य आदि बहुतसे घटकों का कारक मंगल होता है, परंतु यहाँ हम मंगल के उन कुछ विशेष कारकतत्वों का वर्णन करना चाहते हैं जो हमारे प्रवाह में हमारे विशेष सहायक होते हैं वे हैं - "हिम्मत, शक्ति, पराक्रम, उत्साह, साहस और प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति" अच्छा और बलि मंगल व्यक्ति को हिम्मत शक्ति और पराक्रम से परिपूर्ण एक उत्साही और निडर व्यक्ति बनाता है। जिन लोगों की कुंडली में मंगल स्व या उच्च राशि (मेष, वृश्चिक, मकर) में हो या अन्य प्रकार बली हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत साहसी और किसी से ना दबने वाला अटल प्रवर्ति का व्यक्ति होता है, बलवान मंगल व्यक्ति को किलिंग स्प्रिट देता है जिससे व्यक्ति जिस काम को करने की ठान ले उसे पूरा करके ही दम लेता है। कुंडली में मंगल बलवान होने पर व्यक्ति अपने कार्य के प्रति बहुत पैशन रखने वाला होता है और ऐसा व्यक्ति विपरीत परिस्थिति में भी मेहनत करना नहीं छोड़ता। कुंडली में बलवान मंगल व्यक्ति को परिस्पर्धा की कुशलता भी देता है जिससे वह अपने विरोधियों पर सदैव हावी रहता है। ज्योतिष में मंगल को किशोरावस्था का कारक माना गया है जो कभी वृद्ध नहीं होता, फलित ज्योतिष में कोई भी ग्रह किसी राशि में 1 से 30 डिग्री के बीच कितनी डिग्री पर है इसका फलित पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है कोई भी ग्रह जब अधिक डिग्री का विशेषकर 30 डिग्री के आसपास का हो तो वह वृद्धावस्था का होकर कमजोर माना जाता है परंतु एक ऐसा ग्रह है जो अधिक डिग्री का होने पर भी बलि ही रहता है क्योंकि यह किशोरावस्था का कारक है, अतः जिन लोगों की कुंडली में मंगल बहुत बलवान होता है वे 50 की उम्र में भी 25 - 30 के सामान प्रतीत होते हैं। मंगल के इन्ही विशेष गुणधर्मों के कारण सेना, नेवी, एयर फ़ोर्स, पुलिस, सुरक्षा गार्ड, एथलीट, स्पोर्ट्समैन, आदि लोगो के जीवन में उनकी कुंडली में स्थित बलवान मंगल की अहम भूमिका होती है हमारे स्वास्थ पक्ष में भी मंगल अपनी विशेष भूमिका निभाता है मुख्य रूप से रक्त, मांसपेशियां, और पित्त को मंगल नियंत्रित करता है यदि कुंडली में मंगल छटे, आठवे भाव में हो, नीच राशि में हो या अन्य प्रकार पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति को रक्त से जुडी समस्याएं, मसल्सपेन, एसिडिटी, गॉलब्लेडर की समस्याएं, फुंसी फोड़े और मुहासे आदि की समस्याएं अधिक होती हैं इसके आलावा पीड़ित या कमजोर मंगल व्यक्ति को कुछ भयभीत स्वाभाव का भी बनाता है और व्यक्ति प्रतिस्पर्धा से घबराता है। कुंडली में मंगल कमजोर होने पर " हनुमान चालीस और सुन्दरकाण्ड का पाठ तथा ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप बहुत लाभकारी होता है।
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कुंडली के ये ग्रहयोग धन को अस्थिर बनाते है। हमारी जन्मकुंडली में द्वित्य अर्थात "दूसरा भाव" धन और हमारे पास एकत्रित धन का प्रतिनिधित्व करता है कुंडली का 'बारहवा भाव" व्यय, हानि, खर्चा या अस्थिरता का कारक होता है अतः कुंडली में धन भाव, धनेश तथा द्वादश भाव द्वादशेश के द्वारा कुछ विशेष ग्रहस्थितियां बनने पर व्यक्ति को जीवन में धन की अस्थिरता की समस्या होती है" 1 कुंडली में यदि धनेश (दूसरे भाव का स्वामी) बारहवे भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति के पास कभी धन नहीं रूक पाता और धन की अस्थिरता बनी रहती है। 2 यदि राहु या शनि कुंडली के बारहवे भाव में शत्रु राशि में बैठे हों तो व्यक्ति के पास धन नहीं रूक पाता या अनचाहे खर्चे बहुत होते हैं। 3 धनेश और द्वादशेश का योग भी धन को स्थिर नहीं होने देता। 4 यदि कुंडली के बारहवे भाव में कोई पाप योग (ग्रहण योग, गुरुचांडाल योग, अंगारक योग आदि) बन रहा हो तो ऐसे में भी व्यक्ति धन प्राप्ति के बाद भी धन को अधिक समय तक अपने पास नहीं रोक पाता। 5 बारहवे भाव में यदि कोई पाप ग्रह नीच राशि में हो तो भी धन के नुकसान की समस्या या धन की अस्थिरता की समस्या बनी रहती है। 6 धन भाव में कोई पाप योग बनने या धनेश के नीच राशि में होने पर भी धन की स्थिरता नहीं बन पाती। धन हानि से बचने के उपाय 1 अपनी कुंडली के धनेश (दूसरे भाव के स्वामी) ग्रह के मन्त्र का नियमित कम से कम 3 माला जाप करें। 2 यदि बारहवे या दूसरे भाव में कोई पाप ग्रह हो तो उस ग्रह से सम्बंधित पदार्थो का नियमित दान करना चाहिए। 3 श्री सूक्त का प्रतिदिन पाठ करें।
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