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राशि अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ

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*राशि अनुसार करें दुर्गा सप्तशती के पाठ, पूरी होगी मनोकामना* *यदि आप अपनी राशि के अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ करें तो निश्चय ही आपकी सभी इच्छाएं पूरी होंगी* *मां शक्ति की आराधना करने वालों के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ करना अनिवार्य माना जाता है। समय की कमी के चलते सप्तशती के पूरे पाठ को सभी लोग नहीं कर सकते। ऎसे में यदि आप अपनी राशि अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ करें तो निश्चय ही आपकी भौतिक, दैहिक और आध्यात्मिक इच्छाएं पूरी होंगी।* *मेष (Aries): इस राशि वाले मंगल प्रधान होते हैं। इनमें क्रोध की अधिकता रहती है। इन्हें दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय का पाठ करना चाहिए।* *वृष (Taurus): शुक्र ग्रह की प्रधानता होने से वृष राशि वाले अत्यन्त भावुक होते हैं। इन्हें कोई भी इमोशनल कर कुछ भी करवा सकता है। वृष राशि वालों को दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय का पाठ करना चाहिए।* *मिथुन (Gemini): इस राशि के व्यक्ति बुध ग्रह के असर में रहते हैं। बुध के प्रभाव से ही इनकी वाणी से दूसरे लोग जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। इन्हें दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का पाठ करना चाहिए।* *कर्क (Cancer): कर्क राशि के व्यक्ति चन्द्रमा प्रधान होते हैं। इसी कारण वह मानसिक रूप से उद्वेलित रहते हैं। इन्हें दुर्गा सप्तशती के पांचवे अध्याय का विधिवत पाठ करना चाहिए जिससे भाग्य के बंद द्वार भी खुल जाते हैं।* *सिंह (Leo): सूर्य प्रधान होने के कारण आप अन्य लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ने में सफल होते हैं। फिर भी कई बार न चाहते हुए भी आप अनिश्चितता का शिकार हो जाते हैं। आपके लिए दुर्गा सप्तशती के तीसरे अध्याय का पाठ करना चाहिए।* *कन्या (Virgo): बुध प्रधान होने से आप अत्यधिक बुदि्धमान है परन्तु सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाने की क्षमता आपके भाग्य को दबा देती है। इसके लिए आपको दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का विधिवत पाठ करना चाहिए।* *तुला (Libra): शुक्र प्रधान होने से आपमें काम-भावना की प्रबलता रहती है। इसे कम करने और शुक्र ग्रह के अनुकूल प्रभावों को प्राप्त करने के लिए तुला राशि वालों को दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय का पाठ करना चाहिए।* *वृश्चिक (Scorpio): मंगल प्रधान होने से आपका स्वभाव रूखा-सूखा व क्रोधी होता है। दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय का पाठ आपके स्वभाव को अनुकूल बना कर बंद भाग्य के दरवाजे खोलता है।* *धनु (Sagittarius): इस राशि वाले व्यक्ति गुरू ग्रह से प्रभावित होते हैं। इन्हें दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करने से समस्त कष्टों से मुक्ति मिलती है।* *मकर (Capricorn): शनि प्रधान होने से मकर राशि वाले न्याय के लिए लड़ने को हमेशा तैयार रहते हैं। ऎसे में इनके विरोधियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती रहती है, इन्हें दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय का विधिवत पाठ करना शनि से मनवांछित फल की प्राप्ति कराता है।* *कुंभ (Aquarius): शनि से प्रभावित होने के कारण कुंभ राशि वालों का भाग्य हमेशा अधर-झूल में झूलता रहता है। दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय का पाठ करने से इन्हें जीवन में सुख-समृदि्ध प्राप्त होती है।* *मीन (Pisces): गुरू प्रधान होने के कारण मीन राशि वाले यूं तो हर समस्या से पार पा ही लेते हैं फिर भी भौतिक सुख-समुदि्ध से दूर रहते हैं। दुर्गा सप्तशती के नौवें अध्याय का पाठ करने से उनकी भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाएं पूरी होती है।*
posted Oct 6 by Sourabh Tripathi

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दुर्गा सप्तशती पाठ में रखें 10 बातों का विशेष ध्यान...

देवी आराधना हेतु दुर्गा सप्तशती पाठ का विशेष महत्व है। परंतु विशेष फल प्राप्ति के लिए इसका पाठ विधि-विधान और नियम के साथ किया जाना आवश्यक है।

1 किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन का विधान है। अत: सप्तशती पाठ से पूर्व भी इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। अगर कलश स्थापना की गई है तो कलश पूजन, नवग्रह पूजन एवं ज्योति पूजन किया जाना आवश्यक है।

2 सप्तशती पाठ से पूर्व श्रीदुर्गा सप्तशती की पुस्तक को शुद्ध आसन पर लाल कपड़ा बिछाकर रखें। और इसका विधि पूर्वक कुंकुम,चावल और पुष्प से पूजन करें। तत्पश्चात स्वयं अपने माथे पर भस्म, चंदन या रोली लगाकर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए 4 बार आचमन करें।  

3 श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ में कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र के पाठ से पहले शापोद्धार करना जरूरी है। दुर्गा सप्तशती का हर मंत्र, ब्रह्मा, वशिष्ठ और  विश्वामित्र जी द्वारा शापित किया गया है। अत: शापोद्धार के बिना इसका सही प्रतिफल प्राप्त नहीं होता।  

4 यदि एक दिन में पूरा पाठ न किया जा सके, तो पहले दिन केवल मध्यम चरित्र का पाठ करें और दूसरे दिन शेष 2 चरित्र का पाठ करें। या फिर दूसरा विकल्प यह है कि एक, दो, एक चार, दो एक और दो अध्यायों को क्रम से सात दिन में पूरा करें।   

5  श्रीदुर्गा सप्तशती में श्रीदेव्यथर्वशीर्षम स्रोत का नित्य पाठ करने से वाक सिद्धि और मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है, परंतु इसे पूरे विधान के साथ किया जाना आवश्यक है।  

6 श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले और बाद में नर्वाण मंत्र ''ओं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे'' का पाठ करना अनिवार्य है। इस नर्वाण मंत्र का विशेष महत्व है। इस एक मंत्र में ऊंकार, मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां काली के बीजमंत्र निहित हैं।  

7 अगर श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ संस्कृत में करना कठि‍न लगता हो और आप इसे पढ़ने में असमर्थ हों तो हिन्दी में ही सरलता से इसका पाठ करें। हिन्दी में पढ़ते हुए आप इसका अर्थ आसानी से समझ पाएंगे।  

8 श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय यह विशेष ध्यान रखें कि पाठ स्पष्ट उच्चारण में करें, लेकिन जो़र से न पढ़ें और उतावले भी न हों। शारदीय नवरात्र में मां अपने उग्र स्वरूप में होती है। अत: विनयपूर्वक उनकी आराधना करें। नित्य पाठ के बाद कन्या पूजन करना अनिवार्य है।  

9 श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ में कवच, अर्गला, कीलक और तीन रहस्यों को भी सम्मिलत करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद क्षमा प्रार्थना अवश्य करना चा हिए, ताकि अनजाने में आपके द्वारा हुए अपराध सेमुक्ति मिल सके।  

10 श्रीदुर्गा सप्तशती के प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र का क्रम से पाठ करने से, सभी मनोकामना पूरी होती है। इसे महाविद्या क्रम कहते हैं। दुर्गा सप्तशती के उत्तर,प्रथम और मध्य चरित्र के क्रमानुसार पाठ करने से, शत्रुनाश और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसे महातंत्री क्रम कहते हैं। देवी पुराण में प्रात:काल पूजन और प्रात में विसर्जन करने को कहा गया है।   

Arvind Shukla ..8571064245

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कैसे करें दुर्गा-सप्‍तशती का पाठ

देवी स्‍थापना – कलश स्‍थापना

दुर्गा सप्‍तशती एक महान तंत्र ग्रंथ के रूप में उपल्‍बध जाग्रत शास्‍त्र है। इसलिए दुर्गा सप्‍तशती के पाठ को बहुत ही सावधानीपूर्वक सभी जरूरी नियमों व विधि का पालन करते हुए ही करना चाहिए क्‍योंकि यदि इस पाठ को सही विधि से व बिल्‍कुल सही तरीके से किया जाए, तो मनचाही इच्‍छा भी नवरात्रि के नौ दिनों में ही जरूर पूरी हो जाती है, लेकिन यदि नियमों व विधि का उल्‍लंघन किया जाए, तो दुर्घटनाओं के रूप में भयंकर परिणाम भी भोगने पडते हैं और ये दुर्घटनाऐं भी नवरात्रि के नौ दिनों में ही घटित होती हैं।

इसलिए किसी अन्‍य देवी-देवता की पूजा-आराधना में भले ही आप विधि व नियमों पर अधिक ध्‍यान न देते हों, लेकिन यदि आप नवरात्रि में दुर्गा पाठ कर रहे हैं, तो पूर्ण सावधानी बरतना व विधि का पूर्णरूपेण पालन करना जरूरी है।

दुर्गा-सप्‍तशती पाठ शुरू करते समय सर्व प्रथम पवित्र स्थान (नदी किनारे की मिट्टी) की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं। हमारे द्वारा किया गया दुर्गा पाठ किस मात्रा में और कैसे स्‍वीकार हुआ, इस बात का पता इन जौ या गेंहू के अंकुरित होकर बडे होने के अनुसार लगाया जाता है। यानी यदि जौ/गेहूं बहुत ही तेजी से अंकुरित होकर बडे हों, तो ये इसी बात का संकेत है कि हमारा दुर्गा पाठ स्‍वीकार्य है जबकि यदि ये जौ/गेहूं अंकुरित न हों, अथवा बहुत धीमी गति से बढें, तो तो ये इसी बात की और इशारा होता है कि हमसे दुर्गा पाठ में कहीं कोई गलती हो रही है।
फिर उसके ऊपर कलश को पंचोपचार विधि से स्थापित करें।
कलश के ऊपर मूर्ति की भी पंचोपचार विधि से प्रतिष्ठा करें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों ओर त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र, पुस्तक तथा शालीग्राम को विराजित कर विष्णु का पूजन करें।
पूजन सात्विक होना चाहिए क्‍योंकि सात्विक पूजन का अधिक महत्‍व है। जबकि कुछ स्‍थानों पर असात्विक पूजन भी किया जाता है जिसके अन्‍तर्गत शराब, मांस-मदिरा आदि का प्रयोग किया जाता है।
फिर नवरात्र-व्रत के आरंभ में स्वस्ति वाचक शांति पाठ कर हाथ की अंजुली में जल लेकर दुर्गा पाठ प्रारम्‍भ करने का संकल्प करें।
फिर सर्वप्रथम भगवान गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह एवं वरुण का विधि से पूजन करें।
फिर प्रधानदेवी दुर्गा माँ का षोड़शोपचार पूजन करें।
फिर अपने ईष्टदेव का पूजन करें। पूजन वेद विधि या संप्रदाय निर्दिष्ट विधि से होना चाहिए।
दुर्गा-सप्‍तशती पाठ विधि

विभन्‍न भारतीय धर्म-शास्‍त्रों के अनुसार दुर्गा सप्‍तशती का पाठ करने की कई विधियां बताई गर्इ हैं, जिनमें से दो सर्वाधिक प्रचलित विधियाें का वर्णन निम्‍नानुसार है:

इस विधि में नौ ब्राह्मण साधारण विधि द्वारा पाठ करते हैं। यानी इस विधि में केवल पाठ किया जाता है, पाठ करने के बाद उसकी समाप्ति पर हवन आदि नहीं किया जाता।

इस विधि में एक ब्राह्मण सप्तशती का आधा पाठ करता है। (जिसका अर्थ है- एक से चार अध्याय का संपूर्ण पाठ, पांचवे अध्याय में ‘देवा उचुः- नमो दैव्ये महादेव्यै’ से आरंभ कर ऋषिरुवाच तक, एकादश अध्याय का नारायण स्तुति, बारहवां तथा तेरहवां अध्याय संपूर्ण) इस आधे पाठ को करने से ही संपूर्ण पाठ की पूर्णता मानी जाती है। जबकि एक अन्य ब्राह्मण द्वारा षडंग रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है।

पाठ करने की दूसरी विधि अत्यंत सरल मानी गई है। इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ (प्रथम अध्याय), दूसरे दिन दो पाठ (द्वितीय व तृतीय अध्याय), तीसरे दिन एक पाठ (चतुर्थ अध्याय), चौथे दिन चार पाठ (पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय), पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ (नवम व दशम अध्याय), छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ (द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय) करने पर सप्तशती की एक आवृति होती है। इस विधि में आंठवे दिन हवन तथा नवें दिन पूर्णाहुति किया जाता है।

अगर आप एक ही बार में पूरा पाठ नही कर सकते है, तो आप त्रिकाल संध्‍या के रूप में भी पाठ को तीन हिस्‍सों में वि‍भाजित करके कर सकते है।

चूंकि ये विधियां अपने स्‍तर पर पूर्ण सावधानी के साथ करने पर भी गलतियां हो जाने की सम्‍भावना रहती है, इसलिए बेहतर यही है कि ये काम आप किसी कुशल ब्राम्‍हण से करवाऐं।

Arvind Shukla .8571064245

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*दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्व* = माँ दुर्गा की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ सर्वोत्तम है . . भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से ''वेद'' अनादि है, उसी प्रकार ''सप्तशती'' भी अनादि है . . = दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है . दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं . . दुर्गा सप्तशती के सभी तेरह अध्याय अलग अलग इच्छित मनोकामना की सहर्ष ही पूर्ति करते है . . = प्रथम अध्याय: - इसके पाठ से सभी प्रकार की चिंता दूर होती है एवं शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु का भी भय दूर होता है शत्रुओं का नाश होता है . . = द्वितीय अध्याय:- इसके पाठ से बलवान शत्रु द्वारा घर एवं भूमि पर अधिकार करने एवं किसी भी प्रकार के वाद विवाद आदि में विजय प्राप्त होती है . . = तृतीय अध्याय: - तृतीय अध्याय के पाठ से युद्ध एवं मुक़दमे में विजय, शत्रुओं से छुटकारा मिलता है . . = चतुर्थ अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से धन, सुन्दर जीवन साथी एवं माँ की भक्ति की प्राप्ति होती है . = पंचम अध्याय: - पंचम अध्याय के पाठ से भक्ति मिलती है, भय, बुरे स्वप्नों और भूत प्रेत बाधाओं का निराकरण होता है . . = छठा अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से समस्त बाधाएं दूर होती है और समस्त मनवाँछित फलो की प्राप्ति होती है . . = सातवाँ अध्याय: - इस अध्याय के पाठ से ह्रदय की समस्त कामना अथवा किसी विशेष गुप्त कामना की पूर्ति होती है . = आठवाँ अध्याय: - अष्टम अध्याय के पाठ से धन लाभ के साथ वशीकरण प्रबल होता है . . = नौवां अध्याय:- नवम अध्याय के पाठ से खोये हुए की तलाश में सफलता मिलती है, संपत्ति एवं धन का लाभ भी प्राप्त होता है . = दसवाँ अध्याय:- इस अध्याय के पाठ से गुमशुदा की तलाश होती है, शक्ति और संतान का सुख भी प्राप्त होता है . ., = ग्यारहवाँ अध्याय:- ग्यारहवें अध्याय के पाठ से किसी भी प्रकार की चिंता से मुक्ति , व्यापार में सफलता एवं सुख-संपत्ति की प्राप्ति होती है . = बारहवाँ अध्याय:- इस अध्याय के पाठ से रोगो से छुटकारा, निर्भयता की प्राप्ति होती है एवं समाज में मान-सम्मान मिलता है . = तेरहवां अध्याय:- तेरहवें अध्याय के पाठ से माता की भक्ति एवं सभी इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है . . = मनुष्य की इच्छाएं अनंत है और इन्ही की पूर्ति के लिए दुर्गा सप्तशती से सुगम और कोई भी मार्ग नहीं है . . इसीलिए नवरात्र में विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करने का विधान है . .
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श्री दुर्गा सप्तशती भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से ''वेद'' अनादि है, उसी प्रकार ''सप्तशती'' भी अनादि है। श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में ''मार्कण्डेय पुराण'' के माध्यम से मानव मात्र के कल्याण के लिए इसकी रचना की गई है। जिस प्रकार योग का सर्वोत्तम ग्रंथ गीता है उसी प्रकार ''दुर्गा सप्तशती'' शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ है | 'दुर्गा सप्तशती'के सात सौ श्लोकों को तीन भागों प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) तथा उत्तम चरित्र (महा सरस्वती) में विभाजित किया गया है। प्रत्येक चरित्र में सात-सात देवियों का स्तोत्र में उल्लेख मिलता है प्रथम चरित्र में काली, तारा, छिन्नमस्ता, सुमुखी, भुवनेश्वरी, बाला, कुब्जा, द्वितीय चरित्र में लक्ष्मी, ललिता, काली, दुर्गा, गायत्री, अरुन्धती, सरस्वती तथा तृतीय चरित्र में ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही तथा चामुंडा (शिवा) इस प्रकार कुल 21 देवियों के महात्म्य व प्रयोग इन तीन चरित्रों में दिए गये हैं। नन्दा, शाकम्भरी, भीमा ये तीन सप्तशती पाठ की महाशक्तियां तथा दुर्गा, रक्तदन्तिका व भ्रामरी को सप्तशती स्तोत्र का बीज कहा गया है। तंत्र में शक्ति के तीन रूप प्रतिमा, यंत्र तथा बीजाक्षर माने गए हैं। शक्ति की साधना हेतु इन तीनों रूपों का पद्धति अनुसार समन्वय आवश्यक माना जाता है। सप्तशती के सात सौ श्लोकों को तेरह अध्यायों में बांटा गया है प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरा, तीसरा व चौथा अध्याय तथा शेष सभी अध्याय उत्तम चरित्र में रखे गये हैं। प्रथम चरित्र में महाकाली का बीजाक्षर रूप ऊँ 'एं है। मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) का बीजाक्षर रूप 'हृी' तथा तीसरे उत्तम चरित्र महासरस्वती का बीजाक्षर रूप 'क्लीं' है। अन्य तांत्रिक साधनाओं में 'ऐं' मंत्र सरस्वती का, 'हृीं' महालक्ष्मी का तथा 'क्लीं' महाकाली बीज है। तीनों बीजाक्षर ऐं ह्रीं क्लीं किसी भी तंत्र साधना हेतु आवश्यक तथा आधार माने गये हैं। तंत्र मुखयतः वेदों से लिया गया है ऋग्वेद से शाक्त तंत्र, यजुर्वेद से शैव तंत्र तथा सामवेद से वैष्णव तंत्र का अविर्भाव हुआ है यह तीनों वेद तीनों महाशक्तियों के स्वरूप हैं तथा यह तीनों तंत्र देवियों के तीनों स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं।'दुर्गा सप्तशती' के सात सौ श्लोकों का प्रयोग विवरण इस प्रकार से है। प्रयोगाणां तु नवति मारणे मोहनेऽत्र तु। उच्चाटे सतम्भने वापि प्रयोगाणां शतद्वयम्॥ मध्यमेऽश चरित्रे स्यातृतीयेऽथ चरित्र के। विद्धेषवश्ययोश्चात्र प्रयोगरिकृते मताः॥ एवं सप्तशत चात्र प्रयोगाः संप्त- कीर्तिताः॥ तत्मात्सप्तशतीत्मेव प्रोकं व्यासेन धीमता॥ अर्थात इस सप्तशती में मारण के नब्बे, मोहन के नब्बे, उच्चाटन के दो सौ, स्तंभन के दो सौ तथा वशीकरण और विद्वेषण के साठ प्रयोग दिए गये हैं। इस प्रकार यह कुल 700 श्लोक 700 प्रयोगों के समान माने गये हैं। ________________________ दुर्गा सप्तशती पाठ विधि दुर्गा सप्तशती को सिद्ध कैसे करें- सामान्य विधि : नवार्ण मंत्र जप और सप्तशती न्यास के बाद तेरह अध्यायों का क्रमशः पाठ, प्राचीन काल में कीलक, कवच और अर्गला का पाठ भी सप्तशती के मूल मंत्रों के साथ ही किया जाता रहा है। आज इसमें अथर्वशीर्ष, कुंजिका मंत्र, वेदोक्त रात्रि देवी सूक्त आदि का पाठ भी समाहित है जिससे साधक एक घंटे में देवी पाठ करते हैं। वाकार विधि : यह विधि अत्यंत सरल मानी गयी है। इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है। संपुट पाठ विधि : किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है। सार्ध नवचण्डी विधि : इस विधि में नौ ब्राह्मण साधारण विधि द्वारा पाठ करते हैं। एक ब्राह्मण सप्तशती का आधा पाठ करता है। (जिसका अर्थ है- एक से चार अध्याय का संपूर्ण पाठ, पांचवे अध्याय में ''देवा उचुः- नमो देव्ये महादेव्यै'' से आरंभ कर ऋषिरुवाच तक, एकादश अध्याय का नारायण स्तुति, बारहवां तथा तेरहवां अध्याय संपूर्ण) इस आधे पाठ को करने से ही संपूर्ण कार्य की पूर्णता मानी जाती है। एक अन्य ब्राह्मण द्वारा षडंग रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है। इस प्रकार कुल ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा नवचण्डी विधि द्वारा सप्तशती का पाठ होता है। पाठ पश्चात् उत्तरांग करके अग्नि स्थापना कर पूर्णाहुति देते हुए हवन किया जाता है जिसमें नवग्रह समिधाओं से ग्रहयोग, सप्तशती के पूर्ण मंत्र, श्री सूक्त वाहन तथा शिवमंत्र 'सद्सूक्त का प्रयोग होता है जिसके बाद ब्राह्मण भोजन,' कुमारी का भोजन आदि किया जाता है। वाराही तंत्र में कहा गया है कि जो ''सार्धनवचण्डी'' प्रयोग को संपन्न करता है वह प्राणमुक्त होने तक भयमुक्त रहता है, राज्य, श्री व संपत्ति प्राप्त करता है। शतचण्डी विधि : मां की प्रसन्नता हेतु किसी भी दुर्गा मंदिर के समीप सुंदर मण्डप व हवन कुंड स्थापित करके (पश्चिम या मध्य भाग में) दस उत्तम ब्राह्मणों (योग्य) को बुलाकर उन सभी के द्वारा पृथक-पृथक मार्कण्डेय पुराणोक्त श्री दुर्गा सप्तशती का दस बार पाठ करवाएं। इसके अलावा प्रत्येक ब्राह्मण से एक-एक हजार नवार्ण मंत्र भी करवाने चाहिए। शक्ति संप्रदाय वाले शतचण्डी (108) पाठ विधि हेतु अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा का दिन शुभ मानते हैं। इस अनुष्ठान विधि में नौ कुमारियों का पूजन करना चाहिए जो दो से दस वर्ष तक की होनी चाहिए तथा इन कन्याओं को क्रमशः कुमारी, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, कालिका, शाम्भवी, दुर्गा, चंडिका तथा मुद्रा नाम मंत्रों से पूजना चाहिए। इस कन्या पूजन में संपूर्ण मनोरथ सिद्धि हेतु ब्राह्मण कन्या, यश हेतु क्षत्रिय कन्या, धन के लिए वेश्य तथा पुत्र प्राप्ति हेतु शूद्र कन्या का पूजन करें। इन सभी कन्याओं का आवाहन प्रत्येक देवी का नाम लेकर यथा ''मैं मंत्राक्षरमयी लक्ष्मीरुपिणी, मातृरुपधारिणी तथा साक्षात् नव दुर्गा स्वरूपिणी कन्याओं का आवाहन करता हूं तथा प्रत्येक देवी को नमस्कार करता हूं।'' इस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए। वेदी पर सर्वतोभद्र मण्डल बनाकर कलश स्थापना कर पूजन करें। शतचण्डी विधि अनुष्ठान में यंत्रस्थ कलश, श्री गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तऋषी, सप्तचिरंजीव, 64 योगिनी 50 क्षेत्रपाल तथा अन्याय देवताओं का वैदिक पूजन होता है। जिसके पश्चात् चार दिनों तक पूजा सहित पाठ करना चाहिए। पांचवें दिन हवन होता है। इन सब विधियों (अनुष्ठानों) के अतिरिक्त प्रतिलोम विधि, कृष्ण विधि, चतुर्दशीविधि, अष्टमी विधि, सहस्त्रचण्डी विधि (1008) पाठ, ददाति विधि, प्रतिगृहणाति विधि आदि अत्यंत गोपनीय विधियां भी हैं जिनसे साधक इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति कर सकता है।श्री दुर्गासप्तशती अनुष्ठान विधि श्री दुर्गासप्तशती महायज्ञ / अनुष्ठान विधि भगवती मां दुर्गाजी की प्रसन्नता के लिए जो अनुष्ठान किये जाते हैं उनमें दुर्गा सप्तशती का अनुष्ठान विशेष कल्याणकारी माना गया है। इस अनुष्ठान को ही शक्ति साधना भी कहा जाता है। शक्ति मानव के दैनन्दिन व्यावहारिक जीवन की आपदाओं का निवारण कर ज्ञान, बल, क्रिया शक्ति आदि प्रदान कर उसकी धर्म-अर्थ काममूलक इच्छाओं को पूर्ण करती है एवं अंत में आलौकिक परमानंद का अधिकारी बनाकर उसे मोक्ष प्रदान करती है। दुर्गा सप्तशती एक तांत्रिक पुस्तक होने का गौरव भी प्राप्त करती है। भगवती शक्ति एक होकर भी लोक कल्याण के लिए अनेक रूपों को धारण करती है। श्वेतांबर उपनिषद के अनुसार यही आद्या शक्ति त्रिशक्ति अर्थात महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। इस प्रकार पराशक्ति त्रिशक्ति, नवदुर्गा, दश महाविद्या और ऐसे ही अनंत नामों से परम पूज्य है। श्री दुर्गा सप्तशती नारायणावतार श्री व्यासजी द्वारा रचित महा पुराणों में मार्कण्डेयपुराण से ली गयी है। इसम सात सौ पद्यों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक प्रक्रियाओं का इसके पाठ में बहुधा उपयोग होता आया है। पूरे दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। इस पुस्तक में तेरह अध्याय हैं। शास्त्रों के अनुसार शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य माना गया है। अतः अष्टोत्तरशतनाम रूप बटुक भैरव की नामावली का पाठ भी दुर्गासप्तशती के अंगों में जोड़ दिया जाता है। इसका प्रयोग तीन प्रकार से होता है। [ 1.] नवार्ण मंत्र के जप से पहले भैरवो भूतनाथश्च से प्रभविष्णुरितीवरितक या नमोऽत्त नामबली या भैरवजी के मूल मंत्र का 108 बार जप। [ 2.] प्रत्येक चरित्र के आद्यान्त में 1-1 पाठ। [ 3.] प्रत्येक उवाचमंत्र के आस-पास संपुट देकर पाठ। नैवेद्य का प्रयोग अपनी कामनापूर्ति हेतु दैनिक पूजा में नित्य किया जा सकता है। यदि मां दुर्गाजी की प्रतिमा कांसे की हो तो विशेष फलदायिनी होती है। ________________________ श्री दुर्गासप्तशती का अनुष्ठान कैसे करें। 1. कलश स्थापना 2. गौरी गणेश पूजन 3. नवग्रह पूजन 4. षोडश मातृकाओं का पूजन 5. कुल देवी का पूजन 6. मां दुर्गा जी का पूजन निम्न प्रकार से करें। आवाहन : आवाहनार्थे पुष्पांजली सर्मपयामि। आसन : आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। पाद : पाद्यर्यो : पाद्य समर्पयामि। अर्घ्य : हस्तयो : अर्घ्य स्नानः । आचमन : आचमन समर्पयामि। स्नान : स्नानादि जलं समर्पयामि। स्नानांग : आचमन : स्नानन्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि। दुधि स्नान : दुग्ध स्नान समर्पयामि। दहि स्नान : दधि स्नानं समर्पयामि। घृत स्नान : घृतस्नानं समर्पयामि। शहद स्नान : मधु स्नानं सर्मपयामि। शर्करा स्नान : शर्करा स्नानं समर्पयामि। पंचामृत स्नान : पंचामृत स्नानं समर्पयामि। गन्धोदक स्नान : गन्धोदक स्नानं समर्पयामि शुद्धोदक स्नान : शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि वस्त्र : वस्त्रं समर्पयामि
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दुर्गा शप्तशती आज के कलयुग में एक बहुत ही प्रभावी और तीव्र प्रभाव देने वाला चरित्र है इसको यदि समुचित तरीके से प्रयोग किया जाये तो एक व्यक्ति को उसके सभी प्रश्नों और समस्यायों का निवारण इसके श्लोकों में निहित है -! मेरा अपना मानना तो ये हैं की इस पुस्तक कि जरुरत हर एक घर में है और साथ ही इसके विधानों कि जानकारी भी प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है -! लेकिन विधि का विधान भी बहुत बड़ा है - मैंने स्पष्ट देखा है कि यदि आपके भाग्य में कष्ट लिखा हुआ है तो सामने आपका समाधान लिए हुए कोई व्यक्ति खड़ा है और बार - बार दोहरा रहा है कि ऐसे कर लो तो समस्यायों से मुक्त हो जाओगे लेकिन आपके पास समय ही नहीं होता कि आप किसी कि बात सुन सकें या किसी विधान को कर सकें -! आज का समाज इतना भौतिक हो गया है कि सभी खुश रहना चाहते हैं लेकिन खुद को खुश रखने के लिए जब प्रयास करने कि बारी आती है तो प्रतिनिधि तलाश करने लग जाते हैं जो उनके बदले कुछ ले देकर जो भी करना है कर दे और जिसका फल उन्हें मिल जाये -! लेकिन कोई भी ये नहीं सोचता कि ऐसा कैसे सम्भव हो सकता कि करे कोई और पाये कोई और - इसलिए अपने लिए समय आप ही निकालें - इस दुनिया का नियम है और सबको पता भी है की जितनी मेहनत आप करेंगे - सुख भी उसका उतना ही आप भोगेंगे - इसलिए जहाँ जरुरत महसूस हो वहाँ अपने पुरोहित या जानकारों कि मदद अवश्य लें संकोच न करें - लेकिन जहाँ जरुरत न हो वहाँ हर विधान को खुद ही पूरा करने कि कोशिश करें - क्या पता आप जिस उद्देश्य से या जिस इच्छा कि पूर्ति के लिए धन देकर प्रतिनिधि खरीद रहे हैं वह प्रतिनिधि जिस विधान को करेगा तो उतनी आर्द्र भावना को व्यक्त करेगा भी या नहीं -! फिर क्या होगा ? परिणाम भी उसी भावना के अनुसार मिलेगा ना क्योंकि किसी भी साधना या आराधना में भावना प्रधान होती है -! नवरात्रों का आगमन होने ही वाला है इस क्रम में मैं कुछ विशिष्ट उपाय जो शप्तशती कि पुस्तक साथ रखकर किये जा सकते हैं वर्णित करने जा रहा हूँ - आशा करता हूँ कि माँ महामाया आप सबको उन्नति और समस्यारहित जिंदगी का वरदान अवश्य प्रदान करेंगी दुर्गा सप्तशती से कामनापूर्ति :- १. लक्ष्मी, ऐश्वर्य, धन संबंधी प्रयोगों के लिए पीले रंग के आसन का प्रयोग करें २. वशीकरण, उच्चाटन आदि प्रयोगों के लिए काले रंग के आसन का प्रयोग करें ३. बल, शक्ति आदि प्रयोगों के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें ४. सात्विक साधनाओं, प्रयोगों के लिए कुश के बने आसन का प्रयोग करें ५. वस्त्र- लक्ष्मी संबंधी प्रयोगों में आप पीले वस्त्रों का ही प्रयोग करें ६. यदि पीले वस्त्र न हो तो मात्र धोती पहन लें एवं ऊपर शाल लपेट लें ७. आप चाहे तो धोती को केशर के पानी में भिगोंकर पीला भी रंग सकते हैं हवन करने से आपको ये लाभ मिलते हैं :- १. जायफल से कीर्ति २. किशमिश से कार्य की सिद्धि ३. आंवले से सुख और ४. केले से आभूषण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथाविधि हवन करें अ. खांड ब. घी स गेंहू ड. शहद य. जौ र. तिल ल. बिल्वपत्र व. नारियल म. किशमिश झ. कदंब से हवन करें ५. गेंहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ६. खीर से परिवार वृद्धि ७. चम्पा के पुष्पों से धन और सुख की प्राप्ति होती है ८. आवंले से कीर्ति ९. केले से पुत्र प्राप्ति होती है १०. कमल से राज सम्मान ११. किशमिश से सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है १२. खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है विधि :- व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यंत नम्रता के साथ प्रमाण करें और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दें। इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। नवार्ण मंत्र को मंत्रराज कहा गया है और इसके प्रयोग भी अनुभूत होते हैं :- नर्वाण मंत्र :- ।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।। परेशानियों के अन्त के लिए :- ।। क्लीं ह्रीं ऐं चामुण्डायै विच्चे ।। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए :- ।। ओंम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।। शीघ्र विवाह के लिए :- ।। क्लीं ऐं ह्रीं चामुण्डायै विच्चे ।। सप्त-दिवसीय श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ सप्तशती :- जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि ऐसा चरित्र या एक ऐसा संग्रह जो सात सौ (श्लोकों) का समूह है - दुर्गा शप्तशती में कुल सात सौ श्लोकों का संग्रह है -! इसमें पाठ करने का जो क्रम बताया गया है वह निम्न प्रकार है :- दिनअध्यायप्रथमअध्याय १द्वितीयअध्याय २ – ३तृतीयअध्याय ४चतुर्थअध्याय ५ – ६ – ७ – ८पँचमअध्याय ९ -१०षष्ठअध्याय ११सप्तमअध्याय १२ – १३ इस प्रकार से सात दिनों में तेरहों अध्यायों का पाठ किया जाता है -! १. पहले दिन एक अध्याय २. दूसरे दिन दो अध्याय ३. तीसरे दिन एक अध्याय ४. चौथे दिन चार अध्याय ५. पाँचवे दिन दो अध्याय ६. छठवें दिन एक अध्याय ७. सातवें दिन दो अध्याय पाठ कर सात दिनों में श्रीदुर्गा-सप्तशती के तीनो चरितों का पाठ कर सकते हैं श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ विधि :- सबसे पहले अपने सामने ‘गुरु’ और गणेश जी आदि को मन-ही-मन प्रणाम करते हुए दीपक को जलाकर स्थापित करना चाहिए। फिर उस दीपक की ज्योति में भगवती दुर्गा का ध्यान करना चाहिए। ध्यान :- ॐ विद्युद्दाम-सम-प्रभां मृग-पति-स्कन्ध-स्थितां भीषणाम्। कन्याभिः करवाल-खेट-विलसद्-हस्ताभिरासेवि ताम् ।। हस्तैश्चक्र-गदाऽसि-खेट-विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम्। विभ्राणामनलात्मिकां शशि-धरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ।। ध्यान के पश्चात् पंचोपचार / दशोपचार / षोडशोपचार से माता का पूजन करें - इसके बाद उपरोक्त वर्णित विधि के अनुसार शप्तशती का पाठ करें :- पंचोपचार पूजन / दशोपचार पूजन / षोडशोपचार पूजन आत्मशुद्धि संकल्प शापोद्धार कवच अर्गला कीलक शप्तशती पाठ ( दिवस भेद क्रम में ) तत्पश्चात माता से क्षमा प्रार्थना करें - क्षमा प्रार्थना का स्तोत्र भी आपको शप्तशती में ही मिल जायेगा - ! इसके द्वारा ज्ञान की सातों भूमिकाओं :- १. शुभेच्छा २. विचारणा ३. तनु-मानसा ४. सत्त्वापति ५. असंसक्ति ६. पदार्थाभाविनी ७. तुर्यगा सहज रुप से परिष्कृत एवं संवर्धित होती है इसके अतिरिक्त किस प्रकार कि समस्या निवारण के लिए कितने पाठ करें इसका विवरण निम्न प्रकार है :- ग्रह-शान्ति हेतु ५ बार महा-भय-निवारण हेतु ७ बार सम्पत्ति-प्राप्ति हेतु ११ बार पुत्र-पौत्र-प्राप्ति हेतु १६ बार राज-भय-निवारण - १७ या १८ बार शत्रु-स्तम्भन हेतु - १७ या १८ बार भीषण संकट - १०० बार असाध्य रोग - १०० बार वंश-नाश - १०० बार मृत्यु - १०० बार धन-नाशादि उपद्रव शान्ति के लिए १०० बार दुर्गा शप्तशती के अध्याय और कामना पूर्ति :- तो अब हम बात करते हैं कि दुर्गा शप्तशती के किस अध्याय से किस कामना कि पूर्ति होती है :- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए। द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए। षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये। वैदिक आहुति विधान एवं सामग्री :- प्रथम अध्याय :- एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना । द्वितीय अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार इसमें गुग्गुल और शामिल कर लें तृतीय अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 38 के लिए शहद प्रयोग करें चतुर्थ अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 1 से 11 मिश्री व खीर विशेष रूप से सम्मिलित करें चतुर्थ अध्याय के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुति नहीं करना चाहिए ऐसा करने से देह नाश होता है - इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर "ॐ नमः चण्डिकायै स्वाहा" बोलकर आहुति दें तथा मंत्रों का केवल पाठ करें इनका पाठ करने से सब प्रकार का भय नष्ट हो जाता है। पंचम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 9 में कपूर - पुष्प - ऋतुफल की आहुति दें षष्टम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 23 के लिए भोजपत्र कि आहुति दें सप्तम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में जौ का प्रयोग करें अष्टम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन नवम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना प्रयोग करें दशम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग/फेन 31 में कत्था प्रयोग करें एकादश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 मे अनार व अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक संख्या 54 एवं 55 मे फूल और चावल द्वादश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 10 मे नीबू काटकर रोली लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च श्लोक संख्या श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या 20 में ऋतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21 पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा, मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और चावल त्रयोदश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल इष्ट आरती विधान :- कई बार हम सब लोग जानकारी के अभाव में मन मर्जी के अनुसार आरती उतारते रहते हैं जबकि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारने का विधान होता है - चार बार चरणों में दो बार नाभि पर एक बार मुख पर सात बार पूरे शरीर पर इस प्रकार चौदह बार आरती की जाती है - जहां तक हो सके विषम संख्या अर्थात १,३,५,७ बत्तियॉं बनाकर ही आरती की जानी चाहिये किस मातृका शक्ति कि साधना करने से क्या प्राप्त होता है आइये अब इस पर एक निगाह डालते हैं :- शैलपुत्री साधना- भौतिक एवं आध्यात्मिक इच्छा पूर्ति।ब्रहा्रचारिणी साधना- विजय एवं आरोग्य की प्राप्ति।चंद्रघण्टा साधना- पाप-ताप व बाधाओं से मुक्ति हेतु।कूष्माण्डा साधना- आयु, यश, बल व ऐश्वर्य की प्राप्ति।स्कंद साधना- कुंठा, कलह एवं द्वेष से मुक्ति।कात्यायनी साधना- धर्म, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति तथा भय नाशक।कालरात्रि साधना- व्यापार/रोजगार/सर्विस संबधी इच्छा पूर्ति।महागौरी साधना- मनपसंद जीवन साथी व शीघ्र विवाह के लिए।सिद्धिदात्री साधना- समस्त साधनाओं में सिद्ध व मनोरथ पूर्ति। -
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