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सरकारी जॉब योग-

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*सरकारी जॉब योग-* *1.जन्म-कुंडली में दशम स्थान-* *जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है।* *कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें।* *2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न-* *जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं।* *3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।* *4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है।* *5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है।* *6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।* *7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है।* *8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है।* *9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है।* *10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।* *11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है।* *12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।* *13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।* *14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।* *15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है ।* *16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है ।* *17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।* *18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है ।* *19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो,* *20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो।* *21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो.* *22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो।* *23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो।* *24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो।* *25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा।* *26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे में जान सकते हैं।* *27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है।* *28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम्‌ भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है।* *29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है।* *30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए।* *31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए।* *32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए।* *33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता है।* *34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं।* *कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम:* *1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में* *2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में* *3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में* *4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में* *5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में* *6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में* *7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से ।* *8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है।* *9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है।* *10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है।* *11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में *जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है।* *12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में ।* *13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है।* *14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है।* *15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।*

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सरकारी जॉब योग-
posted Oct 6 by Rakesh Periwal

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सरकारी जॉब योग- 1. जन्म-कुंडली में दशम स्थान जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें। 2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं। 3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। 4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है। 5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है। 6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है। 7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है। 8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है। 9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है। 10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है। 11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है। 12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है। 13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है । 14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है । 15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है । 16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है । 17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है । 18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है । 19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो, 20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो। 21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो. 22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो। 23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो। 24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो। 25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा। 26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे मैं जान सकते हैं। 27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है। 28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम्‌ भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है। 29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है। 30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए। 31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए। 32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए। 33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता 34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं। कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम: 1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में 2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में 3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में 4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में 5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में 6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में 7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से । 8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है। 9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है। 10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है। 11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में : जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है। 12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में । 13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है 14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है। 15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।
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ग्रह योग जो छप्पर फाड़ के देते हैं धन यदि आप Rich बनने का सपना देखते हैं, तो अपनी जन्म कुण्डली में इन ग्रह योगों को देखकर उसी अनुसार अपने प्रयासों को गति दें। १ यदि लग्र का स्वामी दसवें भाव में आ जाता है तब जातक अपने माता-पिता से भी अधिक धनी होता है। २ मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है। ३ जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है। ४ शनि ग्रह को छोड़कर जब दूसरे और नवे भाव के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठे होते हैं तब व्यक्ति को धनवान बना देते हैं। ५ जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बना देते हैं। ६ दूसरे भाव का स्वामी यदि ८ वें भाव में चला जाए तो व्यक्ति को स्वयं के परिश्रम और प्रयासों से धन पाता है। ७ यदि दसवें भाव का स्वामी लग्र में आ जाए तो जातक धनवान होता है। ८ सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होने पर व्यक्ति अपार धन पाता है। विशेषकर जब सूर्य और राहू के ग्रहयोग बने। ९ छठे, आठवे और बारहवें भाव के स्वामी यदि छठे, आठवे, बारहवें या ग्यारहवे भाव में चले जाए तो व्यक्ति को अचानक धनपति बन जाता है। १० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति खेल, जुंए, दलाली या वकालात आदि के द्वारा धन पाता है। ११ मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से, खेती से या भवन से आय प्राप्त होती है, जो निरंतर बढ़ती है। १२ गुरु जब कर्क, धनु या मीन राशि का और पांचवे भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति पुत्र और पुत्रियों के द्वारा धन लाभ पाता है। १३ राहू, शनि या मंगल और सूर्य ग्यारहवें भाव में हों तब व्यक्ति धीरे-धीरे धनपति हो जाता है। १४ बुध, शुक और शनि जिस भाव में एक साथ हो वह व्यक्ति को व्यापार में बहुत ऊंचाई देकर धनकुबेर बनाता है १५ दसवें भाव का स्वामी वृषभ राशि या तुला राशि में और शुक्र या सातवें भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति को विवाह के द्वारा और पत्नी की कमाई से बहुत धन लाभ होता है। १६ शनि जब तुला, मकर या कुंभ राशि में होता है, तब आंकिक योग्यता जैसे अकाउण्टेट, गणितज्ञ आदि बनकर धन अर्जित करता है। १७ बुध, शुक्र और गुरु किसी भी ग्रह में एक साथ हो तब व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धनवान होता है। जिनमें पुरोहित, पंडित, ज्योतिष, प्रवचनकार और धर्म संस्था का प्रमुख बनकर धनवान हो जाता है। १८ कुण्डली के त्रिकोण घरों या चतुष्कोण घरों में यदि गुरु, शुक्र, चंद्र और बुध बैठे हो या फिर ३, ६ और ग्यारहवें भाव में सूर्य, राहू, शनि, मंगल आदि ग्रह बैठे हो तब व्यक्ति राहू या शनि या शुक या बुध की दशा में अपार धन प्राप्त करता है। १९ गुरु जब दसर्वे या ग्यारहवें भाव में और सूर्य और मंगल चौथे और पांचवे भाव में हो या ग्रह इसकी विपरीत स्थिति में हो व्यक्ति को प्रशासनिक क्षमताओं के द्वारा धन अर्जित करता है। २० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में केतु को छोड़कर अन्य कोई ग्रह बैठा हो, तब व्यक्ति व्यापार-व्यवसार द्वारा अपार धन प्राप्त करता है। यदि केतु ग्यारहवें भाव में बैठा हो तब व्यक्ति विदेशी व्यापार से धन प्राप्त करता है।
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कुंडली मे कुछ विशेष योग- 1. रज्जू योग- सब गृह चर राशियों में हो तो रज्जु योग होता है। इस योग में उत्पन्न मनुष्य भ्रमणशील, सुन्दर, परदेश जाने में सुखी, क्रूर, दुष्ट स्वभाव एवं स्थानांतर में उन्नति करने वाला होता है। 2. मुसल योग- समस्त गृह स्थिर राशियों में हो तो मुसल योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक मानी, ज्ञानी, धनी, राजमान्य, प्रसिद्ध, बहुत, पुत्रवाला, एम्.एल.ऐ एवं शासनाधिकारी होता है। 3. माला योग- बुध, गुरु और शुक्र ४|७|१० वें स्थान में हो और शेष ग्रह इन स्थानों से भिन्न स्थानों में हो तो माला योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, भोजनादि से सुखी, अधिक स्त्रियों से प्रेम करने वाला एवं एम्.पी होता है। पंचायत के निर्वाचन में भी उसे पूर्ण सफलता मिलती है। 4. गदा योग- समीपस्थ दो केंद्र १|४ या ७|१० में समस्त ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है। इस योग वाला जातक धनी, धर्मात्मा, शास्त्राग्य, संगीतप्रिय और पुलिस बिभाग में नौकरी प्राप्त करता है। इस योग वाले जातक का भाग्योदय २८ वर्ष की अवस्था में होता है। 5. शकत योग- लग्न और सप्तम में समस्त ग्रह हों तो शकट योग होता है। इस योग वाला रोगी, मुर्ख, ड्राईवर, स्वार्थी एवं अपना काम निकलने में बहुत प्रवीन होता है। 6. पक्षी योग- चतुर्थ और दशम भाव में समस्त ग्रह हो तो विहंग पक्षी होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक राजदूत, गुप्तचर, भ्रमणशील, कलहप्रिय एवं सामान्यत: धनी होता है। शुभग्रह उक्त स्थान में हो और पापग्रह ३|६|११ वें स्थान में हो तो जातक न्यायाधीश और मंडलाधिकारी होता है। 7. श्रृंगाटक योग- समस्त ग्रह १|५|९ वें स्थान में हो तो श्रृंगाटक योग होता है। इस योग वाला जातक सैनिक, योद्धा, कलहप्रिय, राजकर्मचारी, सुन्दर पत्निवाला एवं कर्मठ होता है। वीरता के कार्यों में इसे सफलता प्राप्त होती है। इस योगवाले का भाग्य २३ वर्ष की अवस्था से उदय हो जाता है। 8. वज्र योग- समस्त शुभग्रह लग्न और सप्तम स्थान में हो अथवा समस्त पापग्रह चतुर्थ और दशम भाव में स्थित हो तो वज्र योग होता है। इस योग वाला वार्धक्य अवस्था में सुखी, शुर-वीर, सुन्दर, भाग्यवाला, पुलिस या सेना में नौकरी करने वाला होता है। 9. कमल योग- समस्त ग्रह १|४|७|१० वें स्थान में हो तो कमल योग होता है। इस योग का जातक धनी, गुनी, दीर्घायु, यशस्वी, सुकृत करने वाला, विजयी, मंत्री या राज्यपाल होता है। कमल योग बहुत ही प्रभावक योग है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति शासनधिकारी अवश्य बनता है। यह सभी के ऊपर शासन करता है। बड़े-बड़े व्यक्ति उससे सलाह लेते है। 10. शक्ति योग- सप्तम भाव से आगे के चार भावो में समस्त ग्रह हों, तो शक्ति योग होता ही। इस योग के होने से जातक धनहीन, निष्फल जीवन, दुखी, आलसी, दीर्घायु, दीर्घसूत्री, निर्दय और छोटा व्यापारी होता ही। शक्तियोग में जन्म लेने वाला व्यक्ति छोटे स्तर की नौकरी भी करता ही। 11. छत्र योग- सप्तम भाव से आगे के सात स्थानों में समस्त ग्रह हो तो छत्र योग होता है। इस योग वाला व्यक्ति धनी, लोकप्रिय, राजकर्मचारी, उच्चपदाधिकारी, सेवक, परिवार के व्यक्तियों का भरण-पोषण करने वाला एवं अपने कार्य में ईमानदार होता है। 12. चक्र योग- लग्न से आरम्भ कर एकांतर से छह स्थानों में-प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम और एकादश भाव में सभी ग्रह हो तो चक्र योग होता है। इस योग वाला जातक राष्ट्रपति या राज्यपाल होता है। चक्र योग राजयोग का ही रूप है, इसके होने से व्यक्ति राजनीति में दक्ष होता है और उसका प्रभुत्व बीस वर्ष की अवस्था के पश्चात बढने लगता है। 13. समुद्र योग- द्वितीय भाव से एकांतर कर छह राशियों में २|४|६|१०|१२ वें स्थान में समस्त ग्रह हो तो समुद्र योग होता है। इस योग के होने से जातक धनी, रहमानी, भोगी, लोकप्रिय, पुत्रवान और वैभवशाली होता है। 14. पाश योग- पांच राशियों में समस्त ग्रह हो तो पाश योग होता है। इस योग के होने से जातक बहुत परिवारवाला, प्रपंची, बन्धनभागी, काराग्रह का अधिपति, गुप्तचर, पुलिस या सेना की नौकरी करने वाला होता है। 15. वीणा योग- सात राशियों में समस्त ग्रह स्थित हो तो वीणा योग होता है। इस योगवाला जातक गीत,नृत्य, वाध से स्नेह करता है। धनी, नेता और राजनीति में सफल संचालक बनता है। 16. गजकेसरी योग- लग्न अथवा चन्द्रमा से यदि गुरु केंद्र में हो और केवल शुभग्रहो से दृष्ट या युत हो तथा अस्त, नीच और शत्रु राशी में गुरु न हो तो गजकेसरी योग होता है। इस योगवाला जातक मुख्यमंत्री बनता है। 17. पर्वत योग- यदि सप्तम और अष्टम भाव में कोई ग्रह नही हो अथवा ग्रह हो भी तो कोई शुभग्रह हो तथा सब शुभग्रह केंद्र में हो तो पर्वत नामक योग होता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति भाग्यवान, वक्ता, शास्त्रग्य, प्राध्यापक, हास्य-व्यंग्य लेखक, यशस्वी, तेजस्वी और मुखिया होता है। मुख्यमंत्री बनाने वाले योगों में भी पर्वत योग की गणना है। 18. मृदंग योग- लग्नेश वली हो और अपने उच्च या स्वगृह में हो तथा अन्य ग्रह केंद्र स्थानों में स्थित हो तो मृदंग योग होता है। इस योग के होने से व्यक्ति शासनाधिकारी होता है। 19. कूर्म योग- शुभग्रह ५|६|७ वें भाव में और पापग्रह १|३|११ वें स्थान में अपने-अपने उच्च में हो तो कूर्म योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति राज्यपाल, मंत्री, धीर, धर्मात्मा, मुखिया और नेता होता है। 20. लक्ष्मी योग- लग्नेश बलवान हो और भाग्येश अपने मूल-त्रिकोण, उच्च या स्वराशी में स्थित होकर केन्द्रस्थ हो तो लक्ष्मी योग होता है। इस योगवाला जातक पराक्रमी, धनी, मंत्री, राज्यपाल एवं गुनी होता है। 21. कलानिधि योग- बुध शुक्र से युत या दृष्ट गुरु २|५ वें भाव में हो या बुध शुक्र की राशि में स्थिति हो तो कलानिधि योग होता है। इस योगवाला गुनी, राजमान्य, सुखी, स्वस्थ, धनी, और विद्वान होता है। 22. केमद्रुम योग- यदि चन्द्रमा के साथ में या उससे द्वितीय, द्वादश स्थान में तथा लग्न से केंद्र में सूर्य को छोड़कर अन्य कोई ग्रह नही हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति दरिद्र और निन्दित होता है। 23. धन-सुख योग- दिन में जन्म होने पर चन्द्रमा अपने या अधिमित्र के नवांश में स्थित हो और उसे गुरु देखता हो तो धन सुख होता है। इसी प्रकार रात्रि में जन्म प्र्ताप्वादी पर चन्द्रमा को शुक्र देखता हो तो धन-सुख योग होता है। यह अपने नामानुसार फल देता है। 24. विशिष्ट योग- जिसके जन्मकाल में बुध सूर्य के साथ अस्त होकर भी अपने ग्रह में हो अथवा अपने मूला त्रिकोण में हो तो जातक विशिष्ट विद्वान होता है। 25. भास्कर योग- यदि सूर्य से द्वितीय भाव में बुध हो। बुध से एकादश भाव में चन्द्रमा और चन्द्रमा से त्रिकोण में वृहस्पति स्थिति हो तो भास्कर योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला मनुष्य पराक्रमी, प्रभुसदृश, रूपवान, गन्धर्व विधा का ज्ञाता, धनी, गणितग्य, धीर और समर्थ होता है। यह योग २४ वर्ष की अवस्था से घटित होने लगता है। 26. इन्द्र योग- यदि चंद्रमा से तृतीय स्थान में मंगल हो और मंगल से सप्तम शनि हो। शनि से सप्तम शुक्र हो और शुक्र से सप्तम गुरु हो तो इन्द्रसंज्ञक योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक प्रसिद्ध शीलवान, गुणवान, राजा के समान धनी, वाचाल और अनेक प्रकार के धन, आभूषण प्राप्त करने वाला होता है। 27. मरुत योग- यदि शुक्र से त्रिकोण में गुरु हो, गुरु से पंचम चंद्रमा और चन्द्रमा से केंद्र में सूर्य हो तो मरुत योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य वाचाल, विशाल ह्रदय, स्थूल उदार, शास्त्र का ज्ञाता, क्रय-विक्रय में निपुण, तेजस्वी, किसी आयोग का सदस्य होता है।
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*आप ग्रस्त है काल सर्प दोष से या राहु की कुंडली मे स्तिथि से* कालसर्प एक ऐसा योग है जो जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है। व्यावहारिक रूप से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है, मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह के रोग भी उसे परेशान किये रहते हैं। जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह राहु और केतु के बीच अवस्थित रहते हैं तो उससे ज्योतिष विद्या मर्मज्ञ व्यक्ति यह फलादेश आसानी से निकाल लेते हैं कि संबंधित जातक पर आने वाली उक्त प्रकार की परेशानियां कालसर्प योग की वजह से हो रही हैं। परंतु याद रहे, कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। किस भाव में कौन सी राशि अवस्थित है और उसमें कौन-कौन ग्रह कहां बैठे हैं और उनका बलाबल कितना है - इन सब बातों का भी संबंधित जातक पर भरपूर असर पड़ता है। इसलिए मात्रा कालसर्प योग सुनकर भयभीत हो जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुद्धिमत्ता कही जायेगी। जब असली कारण ज्योतिषीय विश्लेषण से स्पष्ट हो जाये तो तत्काल उसका उपाय करना चाहिए। नीचे हम कुछ ज्योतिषीय स्थितियां दे रहे हैं जिनमें कालसर्प योग बड़ी तीव्रता से संबंधित जातक को परेशान किया करता है। जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भूत-प्रेतों की बाधा सताती रहती हो, या किसी के टोने-टोटके से पीड़ित होने की बीमारी आम रूप से परेशान करने लगती है। जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है। चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है। जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है। जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है। जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियां बढ़ती हैं। जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियां बढ़ती हैं। जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियां बढ़ती हैं। जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, देर होती है, अथवा उसे वैधव्य या विाुरत्व की प्राप्ति होती है। यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्ति में भी फंसना पड़ जाता है। जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है। जब दशम भाव का नवांशेश मंगलराहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक भयंकर अग्निकांड का शिकार होता है। जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक की दम घुटने से मौत या मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है। जब अष्टम भाव में पाप ग्रह युक्त राहु अवस्थित हो तब संबंधित जातक की मृत्यु सांप काटने से होती है। जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंाित जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो। जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1वे3वे4वे5वे 6ए 7वे 8वे 11 या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्राी, पुत्रा, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है। जब राहु छठे भाव में स्तिथ हो तथा बृहस्पति केंद्र में हो तब जातक का जीवन खुशहाल व्यतीत होता है। जब राहु व चंद्रमा की युति केंद्र (1वे 4वे7वे 10वेंभाव) या त्रिाकोण में हो तब जातक के जीवन में सुख-समृद्धि की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं। जब शुक्र दूसरे य12वें भाव में स्तिथ हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं। जब बुधादित्य योग हो और बुध अस्त न हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं। जब लग्न व लग्नेश सूर्य व चंद्र कुंडली में बलवान हों साथ ही किसी शुभ भाव में स्तिथ हों और शुभ ग्रहों द्वारा देखे जा रहे हों। तब कालसर्प योग की प्रतिकूलता कम हो जाती है। जब दशम भाव में मंगल बली हो तथा किसी अशुभ भाव से युक्त या दृष्ट न हों। तब संबंधित जातक पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। जब मंगल की युति चंद्रमा से केंद्र में अपनी राशि या उच्च राशि में हो, अथवा अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों। तब कालसर्प योग की सारी परेशानियां कम हो जाती है। जब राहु अदृश्य भावों में स्थित हो तथा दूसरे ग्रह दृश्य भावों में स्थित हों तब संबंधित जातक का कालसर्प योग समृद्धिदायक होता है। जब राहु छठे भाव में तथा बृहस्पति केंद्र या दशम भाव मेंस्तिथ हो तब जातक के जीवन में धन-धान्य की जरा भी कमी महसूस नहीं होती। उक्त लक्षणों का उल्लेख इस दृष्टि से किया गया है ताकि सामान्य पाठकों को कालसर्प योग के बुरे प्रभावों की पर्याप्त जानकारी हासिल हो सके। किंतु ऐसा नहीं है कि कालसर्प योग सभी जातकों के लिए बुरा ही होता है। विविध लग्नों व राशियों में अवस्थित ग्रह जन्म-कुंडली के किस भाव में हैं, इसके आधार पर ही कोई अंतिम निर्णय किया जा सकता है। कालसर्प योग वाले बहुत से ऐसे व्यक्ति हो चुके हैं, जो अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए भी ऊंचे पदों पर पहुंचे। जिनमें भारत के प्रथम प्राानमंत्राी स्व पं ज़वाहर लाल नेहरू का नाम लिया जा सकता है। स्व मोरारजी भाई देसाई व श्री चंद्रशेखर सिंह,फ़िल्म एक्टर रजनी कांत,सन्त मोरारी बापू,धीरू भाई अम्बानी, विजया राजे सिंधिया, की कुंडलियो में भी कालसर्प आदि योग से ग्रसित थे व है,किंतु इन्होंने बेसुमार सफलता प्राप्त की अच्छे व उच्चस्थ पद पर रहे। अत: किसी भी स्थिति में व्यक्ति को मायूस नहीं होना चाहिए और उसे अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हमेशा अपने चहुंमुखी प्रगति के लिए सतत सचेष्ट रहना चाहिए। यदि कालसर्प योग का प्रभाव किसी जातक के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे दूर करने के उपाय भी किये जा सकते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में ऐसे कई उपायों का उल्लेख है, जिनके माध्यम से हर प्रकार की ग्रह-बाधाएं व पूर्वकृत अशुभ कर्मों का प्रायश्चित किया जा सकता है।
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कुण्डली का अष्टम भाव ( 8 हाउस) और शनि ********************* फलित ज्योतिष में कुंडली का आठवा भाव और शनि दोनों ही बड़े महत्वपूर्ण और चर्चित विषय हैं कुंडली में अष्टम भाव को मृत्यु, कारागार, यानी जेल दुर्घटना, बड़े संकट, आकस्मिक दुर्घटनाएं, शरीर कष्ट आदि का कारक होने से दुःख भाव या पाप भाव के रूप में देखा जाता है तो वहीँ शनि को – कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, मशीन, औजार, तपश्या और अध्यात्म का करक मन गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन–तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांतों को भी नियंत्रित करता है। कुंडली में अष्टम भाव को पाप या दुःख भाव होने से अष्टम भाव में किसी भी ग्रह का होना अच्छा नहीं माना गया है इसमें भी विशेषकर पाप या उग्र ग्रह का अष्टम में होना अधिक समस्या कारक माना गया है कुंडली में कोई भी ग्रह अष्टम भाव में होने से वह ग्रह पीड़ित और कमजोर स्थिति में आ जाता है साथ ही स्वास्थ की दृष्टि से भी बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं अब विशेष रूप से शनि की बात करें तो शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना निश्चित रूप से अच्छा नहीं है इससे जीवन में बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं शनि के अष्टम भाव में होने को लेकर एक सकारात्मक बात यह तो है के कुंडली में अष्टम का शनि व्यक्ति को दीर्घायु देता है यदि कुंडली में अन्य बहुत नकारात्मक योग न बने हुए हों तो अष्टम भाव में स्थित शनि व्यक्ति की आयु को दीर्घ कर देता है पर इसके अलावा शनि अष्टम में होने से बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। यदि शनि कुंडली के आठवे भाव में स्थित हो तो ऐसे में व्यक्ति को पाचन तन्त्र और पेट से जुडी समस्याएं लगी ही रहती हैं इसके अलावा जोड़ो का दर्द, दाँतों तथा नाखूनों से जुडी समस्याएं भी अक्सर परेशान करती हैं, शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना व्यक्ति की आजीविका या करियर को भी अक्सर बाधित करता है करियर को लेकर कभी कभी संघर्ष की स्थिति बनी रहती है करियर में स्थिरता नहीं आ पाती और मेहनत करने पर भी व्यक्ति को अपनी प्रोफेशनल लाइफ में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते जो लोग राजनैतिक क्षेत्र में आगे जान चाहते हैं उनके लिए भी अष्टम भाव का शनि संघर्ष उत्पन्न करता है वैसे राजनीति और सत्ता का सीधा कारक सूर्य को माना गया है पर शनि जनता और जनसमर्थन का कारक होता है इस कारण राजनैतिक सफलता में शनि की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है कुंडली में शनि अष्टम भाव में होने से व्यक्ति को जनता का अच्छा सहयोग और जनसमर्थन नहीं मिल पाता जिससे व्यक्ति सीधे चुनावी राजनीती में सफल नहीं हो पाता या बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ता है शनि अष्टम में होने से व्यक्ति को अपने कार्यों के लिए अच्छे एम्पलॉयज या सर्वेंट नहीं मिल पाते यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बिजनेस या व्यापार में सफलता के अच्छे योग हों पर शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो ऐसे में लोहा, स्टील, काँच, पुर्जे, पेंट्स, केमिकल प्रोडक्ट्स, पेट्रोल आदि का कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सभी वस्तुएं शनि के ही अंतर्गत आती हैं और अष्टम में शनि होने पर इन क्षेत्रों में किया गया इन्वेस्टमेंट लाभदायक नहीं होता हानि की अधिक संभावनाएं रहती हैं यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो ऐसे में शनि दशा स्वास्थ कष्ट और संघर्ष उत्पन्न करने वाली होती है। अष्टम में शनि होना किसी भी स्थिति में शुभ तो नहीं है पर यदि यहाँ स्व उच्च राशि में हो या बृहस्पति से दृष्ट हो तो समस्याएं बड़ा रूप नहीं लेती और उनका समाधान होता रहता है। यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में होने से ये समस्याएं उत्पन्न हो रही हों तो निम्नलिखित उपाय करना लाभदायक होगा। 1.रोज़ ॐ शम शनैश्चराय नमः का जप करें। 2. साबुत उड़द का दान करें। 3. शनिवार को पीपल पर सरसों के तेल का दिया जलायें। ।। श्री हनुमते नमः ।।. ॐ शनिदेवाय नमः
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