top button
    Futurestudyonline Community

Daily knowledge of subhashini

0 votes
19 views
*आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते।* *नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥*  भावार्थ : *आयु का एक क्षण भी सारे रत्नों को देने से प्राप्त नहीं किया जा सकता है, अतः इसको व्यर्थ में नष्ट कर देना महान असावधानी है ।* *A moment of age can not be obtained by giving all the gems. Therefore, it is a great mistake to waste it in vain.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
posted 4 days ago by anonymous

  Promote This Article
Facebook Share Button Twitter Share Button Google+ Share Button LinkedIn Share Button Multiple Social Share Button

Related Articles
0 votes
*दर्शने स्पर्शणे वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा।* *यत्र द्रवत्यन्तरङ्गं स स्नेह इति कथ्यते॥*  भावार्थ : *यदि किसी को देखने से या स्पर्श करने से, सुनने से या बात करने से हृदय द्रवित हो तो इसे स्नेह कहा जाता है ।* *If your heart feels emotionally attach by looking at someone or by touching, listening or speaking, it is called affection.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
0 votes
*उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा।* *सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥*  भावार्थ : *उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है, सत्य है महापुरुष सुख और दुःख में समान रहते हैं।* *While rising, the sun is red and when it is sunset, it is red. it is true, the great men live in happiness and misery in the same way.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
0 votes
अमित्रो न विमोक्तव्य: कृपणं वणपि ब्रावुन् कृपा | न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणाम् || Never let your enemy free (if you catch him) even if he asks for (and you feel pity on him). Assuming he will harm you in future, kill him. शत्रु अगर क्षमायाचना करे, तो भी उसे क्षमा नही करनी चाहिये| वह अपने जीवित को हानि पहुंचा सकता है,यह सोचके उसको समाप्त करना चाहिये। *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
0 votes
*मुखो पवित्रं यदि रामनामं।* *हृदय पवित्रं यदि ब्रह्म ज्ञानं।।* *चरणौ पवित्रं यदि तीर्थ गमनं।* *हस्तौ पवित्रं यदि पुण्य दानं।।* भावार्थ - *"राम नाम से मुख पवित्र होता है, ब्रह्मज्ञान से ह्रदय पवित्र होता है, तीर्थ गमन से चरण पवित्र होते है, और दान पुण्य से हाथ पवित्र होते है।* *The mouth is sanctified by the name of Ram, the heart is sanctified by the science of Brahmagnan, feet are sanctified by the visit of pilgrimage, and hands are sanctified by the charity.* *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय माता दी* *जय सीताराम*
0 votes
माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रतयं हितम् | कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धय: || Mother, father and friend are the one who think about our interests (well-being) in a very much natural manner. [It's part of their nature ('swaBAv').They think this without expecting any thing in return.] All others having the similar feelings towards us do so due to their personal benefits or any other reason [It is not part of their nature ('swaBAv')]. माता,पिता और मित्र ये तीनो कहने के लिए तो तीन होते है पर ये एक ही होते है क्योंकि ये तीनो ही अपने स्वभाव से हमेशा हित ही करते है। जब कोई विशेष कार्य या विशेष परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है तब ये तीनो ही हमें सही दिशा या सही बुद्धि देते है जो हमारे हित में होता है।। *ॐ हरि ॐ, प्रणाम, जय सीताराम*
Dear friends, futurestudyonline given book now button (unlimited call)24x7 works , that means you can talk until your satisfaction , also you will get 3000/- value horoscope free with book now www.futurestudyonline.com
...