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कुण्डली के लग्न भाव में बुध का प्रभाव

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कुण्डली के लग्न भाव में बुध का प्रभाव लग्नस्थ बुध जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमान बनाता है. जातक स्वभाव से विनम्र, शांत धैर्यवान, उदार तथा सत्य प्रेमी होता है. लग्नस्थ बुध का जातक परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको ढालने की अद्भुद क्षमता होती है। वह परिस्थितियों का आंकलन कर उचित समय पर निर्णय ले लेता है। बुध जिस भी राशि में हो उसका गुण आत्मसात कर लेता है फलतः ऐसे जातक बहुत जल्दी दूसरों से घुल मिल जाते हैं तथा किसी भी बात को बहुत शीघ्रता से समझ लेते हैं. लग्न में बैठा बुध जातक को बुद्धिमान तथा जिज्ञासु बनाता है. ऐसा जातक गणित में कुशल होता है। लग्नस्थ बुध का जातक आत्म केन्द्रित होता है तथा तर्क सांगत दृष्टिकोण रखता है. व्यवहार से हास परिहास प्रेमी तथा वार्ता में कुशल होता है. ऐसे जातक अक्सर विवादों को बहुत कुशलता से सुलझा देते हैं. लग्नस्थ बुध जातक को गहन अध्यन में रूचि देता है. लग्नस्थ बुध के जातक के जीवन में यात्राओं का विशेष महत्व होता है. जीवन में अनेक बार वह यात्राएं करता है कभी मौज मस्ती के लिए तो कभी व्यापार के लिए। यदि लग्न में बुध हो तो कुंडली के अनेक दोषों का नाश होता है. लग्नस्थ बुध जातक को धनि , यशस्वी तथा एक प्रतिभासंपन्न विद्वान् बनाता है. लग्नस्थ बुध के जातक अधिकतर ललित कला प्रेमी होते हैं. शुभ ग्रहों की दृष्टि/ प्रभाव या युति के कारण जातक के गुणों में और अधिक वृद्धि होती है। सूर्य + बुध = व्यापार कुशल तथ कर्तव्यनिष्ठ चन्द्रमा + बुध = कमीशन के कार्यों या अनाज के थोक कार्यों से लाभ। मंगल + बुध = भवन निर्माण या मशीनरी कार्यों में दक्षता बुध + गुरू = स्वभाव में धार्मिकता और अध्यात्मिकता बुध + शुक्र = ललित कलाओं में रूचि बुध + शनि = आंकड़ो के विश्लेषण में दक्षता विषम राशि यानी (मेष , मिथुन, सिंह, तुला , धनु , कुम्भ) का बुध शुभ माना गया है ऐसा जातक पत्रकारिता, लेखन या सम्पादन के क्षेत्र में सफलता पाते हैं वहीँ सम(even) राशि ( वृषभ, कर्क, कन्या , वृश्चिक, मकर और मीन) का बुध जातक को पुत्रों का सुख एवं लाभ देता है। अग्नि तत्व राशि (मेष, सिंह, धनु ) का बुध जातक को लाभ तो देता है परन्तु भ्रष्ट और अनैतिक मार्ग द्वारा। भू तत्व राशि (वृषभ, मकर, कन्या ) का बुध जातक को अंतर्मुखी एवं एकांत प्रिय बनाता है । वायु तत्व राशि (तुला, कुम्भ, मिथुन) का बुध जातक की कल्पना शक्ति को बहुत बढ़ावा देता है तथा लेखन, अन्वेषण या शोध कार्यों में सफलता दिलाता है। जल तत्व राशी (कर्क, वृश्चिक, मीन) का बुध जातक को प्रकाशन कार्यों में सफल बनाता है।

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कुण्डली के लग्न भाव में बुध का प्रभाव
posted Oct 16, 2019 by Rakesh Periwal

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सभी ग्रहों में से शुक्र ग्रह को सबसे चमकीला ग्रह माना जाता है, जो प्रेम का प्रतीक होता है। जहाँ शास्त्रों अनुसार शुक्र को असुरों के देवता शुक्राचार्य बताया गया है, तो वहीं ज्योतिष विज्ञान में इसे स्त्री गृह माना गया है। शुक्र मनुष्य की कामुकता, उसके सौंदर्य, भौतिक सुख और ऐश्वर्य का कारक प्राप्त होता है। जिसके कारण जिस भी जातक की कुंडली में शुक्र शुभ स्थिति में या मजबूत होता है तो उसके परिणामस्वरूप जातक व्यक्तित्व से आकर्षक, सुंदर और मनमोहक होता है। शुक्र के सकारात्मक प्रभाव से व्यक्ति जीवनभर सुखी रहता है। इसीलिए शुक्र को सुंदरता और सुख का कारक माना जाता है। कुंडली में शुक्र की स्थिति का प्रभाव सौरमंडल के सभी ग्रहों में से शुक्र की चमक एवं शान सबसे अलग व निराली मानी जाती है, जिस कारण हर किसी की राशि में शुक्र की स्थिति का खासा महत्व होता है। इसके विपरीत जिस भी कुंडली में शुक्र निर्बल या कमज़ोर होता है तो ज्योतिषी अनुसार वो व्यक्ति शुक्र की आराधना कर उसे अपनी राशि में बलवान बनाकर उनसे सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति कर सकता है। शुक्र की शान्ति के लिए करें कुछ विशेष उपाय जैसा सभी जानते हैं कि आज हम अपने जीवन में सुख-सुविधाओं की वस्तुओं पर अधिक खर्च करते हैं, जिसका संबंध सीधे तौर पर शुक्र से होता है। इसलिए ही कहा गया है कि यदि अपने स्थान परिवर्तन के दौरान शुक्र की स्थिति किसी भी कुंडली में खराब या नकारात्मक हो जाती है या कोई भी अपने जीवन को ऐश्वर्य और आराम से भरपूर बनाना चाहते हैं तो उस व्यक्ति को विशेष तौर से शुक्र के कारगर उपाय करने चाहिए। शुक्र का गोचर ऐसे में शुक्र देव हमेशा की तरह एक बार पुनः अपना राशि परिवर्तन करते हुए अपने शत्रु ग्रहण सूर्य की राशि सिंह से निकलकर अपने मित्र ग्रह बुध की राशि कन्या में अपना स्थान परिवर्तन करने वाले हैं। जिसके चलते शुक्र मंगलवार, 10 सितंबर 2019 को 01:24 बजे कन्या राशि में गोचर करेगा जो वहां 4 अक्टूबर 2019 तक इसी राशि में स्थित रहेगा। इसलिए इससे करीब-करीब हर राशि प्रभावित होंगी। अशुभ शुक्र के लिए अवश्य करें ये काम वैदिक ज्योतिष में अशुभ शुक्र की शांति के लिए जातक को उससे संबंधित कारगर उपाय करने की सलाह दी गई है। अपनी राशि में शुक्र की मज़बूती के लिए कुछ विशेष वस्तुओं का दान करना चाहिए। जिसमें चाँदी, चावल, दूध, श्वेत वस्त्र आदि शामिल होते हैं। इसके अलावा शुक्र के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए जातक को हर शुक्रवार दुर्गाशप्तशती का पाठ करना भी उचित माना गया है। कन्या पूजन एवं शुक्रवार का व्रत करने से भी शुक्र के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शुक्र को बली या मजबूत करने के लिए जातक को अच्छी क्वालिटी का हीरा धारण करना चाहिए। इसके साथ ही यदि किसी कारणवश हीरा पहनना संभव न हो तो व्यक्ति अर्किन, सफेद मार्का, ओपल, स्फटिक आदि किसी भी शुभ वार, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्न में धारण कर सकता है। हर शुक्रवार शुक्र देव की पूजा के दौरान शुक्र के बीज मंत्र का जाप करना भी शुभ माना गया है ॐ शुं शुक्राय नमः। ॐ हृीं श्रीं शुक्राय नमः। शुक्र की शान्ति के लिए कारगर तांत्रिक उपाय काली चींटियों को चीनी खिलाना शुक्र से शुभ फलों की प्राप्ति हेतु बेहद कारगर होता है। शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना भी शुभ होता है। शुक्र को प्रबल बनाने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करें जिसकी एक आँख खराब हो। 10 वर्ष से कम आयु की कन्याओं का हर शुक्रवार पूजन करें। घर के फर्श पर और रसोई घर में सफेद पत्थर लगाएँ। किसी कन्या के विवाह में कन्यादान से भी शुक्र के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शुक्र देव से जुड़े कुछ विशेष मंत्र जीवन में आर्थिक संपन्नता, प्रेम और आकर्षण में वृद्धि हेतु जातक को शुक्र के बीज मंत्र “ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः” का उच्चारण करने की सलाह दी जाती है। इस मन्त्र का कम से कम 16000 बार उच्चारण करने से मान्यता अनुसार शुक्र के गोचर के दौरान उसके अशुभ प्रभावों से मुक्ति पाई जा सकती है। इसके अलावा देश-काल-पात्र सिद्धांत के अनुसार शुक्र के अशुभ प्रभावों को कम करने और राशि में उसके शुभ फलों की प्राप्ति के लिए इस बीज मंत्र का 64000 बार जाप करना चाहिए। इसके अलावा शुक्र को शांत करने के लिए “ॐ शुं शुक्राय नमः।” मंत्र का जाप भी किया जा सकता है। *********
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कुण्डली का अष्टम भाव ( 8 हाउस) और शनि ********************* फलित ज्योतिष में कुंडली का आठवा भाव और शनि दोनों ही बड़े महत्वपूर्ण और चर्चित विषय हैं कुंडली में अष्टम भाव को मृत्यु, कारागार, यानी जेल दुर्घटना, बड़े संकट, आकस्मिक दुर्घटनाएं, शरीर कष्ट आदि का कारक होने से दुःख भाव या पाप भाव के रूप में देखा जाता है तो वहीँ शनि को – कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, मशीन, औजार, तपश्या और अध्यात्म का करक मन गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन–तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांतों को भी नियंत्रित करता है। कुंडली में अष्टम भाव को पाप या दुःख भाव होने से अष्टम भाव में किसी भी ग्रह का होना अच्छा नहीं माना गया है इसमें भी विशेषकर पाप या उग्र ग्रह का अष्टम में होना अधिक समस्या कारक माना गया है कुंडली में कोई भी ग्रह अष्टम भाव में होने से वह ग्रह पीड़ित और कमजोर स्थिति में आ जाता है साथ ही स्वास्थ की दृष्टि से भी बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं अब विशेष रूप से शनि की बात करें तो शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना निश्चित रूप से अच्छा नहीं है इससे जीवन में बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं शनि के अष्टम भाव में होने को लेकर एक सकारात्मक बात यह तो है के कुंडली में अष्टम का शनि व्यक्ति को दीर्घायु देता है यदि कुंडली में अन्य बहुत नकारात्मक योग न बने हुए हों तो अष्टम भाव में स्थित शनि व्यक्ति की आयु को दीर्घ कर देता है पर इसके अलावा शनि अष्टम में होने से बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। यदि शनि कुंडली के आठवे भाव में स्थित हो तो ऐसे में व्यक्ति को पाचन तन्त्र और पेट से जुडी समस्याएं लगी ही रहती हैं इसके अलावा जोड़ो का दर्द, दाँतों तथा नाखूनों से जुडी समस्याएं भी अक्सर परेशान करती हैं, शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना व्यक्ति की आजीविका या करियर को भी अक्सर बाधित करता है करियर को लेकर कभी कभी संघर्ष की स्थिति बनी रहती है करियर में स्थिरता नहीं आ पाती और मेहनत करने पर भी व्यक्ति को अपनी प्रोफेशनल लाइफ में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते जो लोग राजनैतिक क्षेत्र में आगे जान चाहते हैं उनके लिए भी अष्टम भाव का शनि संघर्ष उत्पन्न करता है वैसे राजनीति और सत्ता का सीधा कारक सूर्य को माना गया है पर शनि जनता और जनसमर्थन का कारक होता है इस कारण राजनैतिक सफलता में शनि की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है कुंडली में शनि अष्टम भाव में होने से व्यक्ति को जनता का अच्छा सहयोग और जनसमर्थन नहीं मिल पाता जिससे व्यक्ति सीधे चुनावी राजनीती में सफल नहीं हो पाता या बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ता है शनि अष्टम में होने से व्यक्ति को अपने कार्यों के लिए अच्छे एम्पलॉयज या सर्वेंट नहीं मिल पाते यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बिजनेस या व्यापार में सफलता के अच्छे योग हों पर शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो ऐसे में लोहा, स्टील, काँच, पुर्जे, पेंट्स, केमिकल प्रोडक्ट्स, पेट्रोल आदि का कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सभी वस्तुएं शनि के ही अंतर्गत आती हैं और अष्टम में शनि होने पर इन क्षेत्रों में किया गया इन्वेस्टमेंट लाभदायक नहीं होता हानि की अधिक संभावनाएं रहती हैं यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो ऐसे में शनि दशा स्वास्थ कष्ट और संघर्ष उत्पन्न करने वाली होती है। अष्टम में शनि होना किसी भी स्थिति में शुभ तो नहीं है पर यदि यहाँ स्व उच्च राशि में हो या बृहस्पति से दृष्ट हो तो समस्याएं बड़ा रूप नहीं लेती और उनका समाधान होता रहता है। यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में होने से ये समस्याएं उत्पन्न हो रही हों तो निम्नलिखित उपाय करना लाभदायक होगा। 1.रोज़ ॐ शम शनैश्चराय नमः का जप करें। 2. साबुत उड़द का दान करें। 3. शनिवार को पीपल पर सरसों के तेल का दिया जलायें। ।। श्री हनुमते नमः ।।. ॐ शनिदेवाय नमः
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पंचम भाव– जन्म कुंडली में पंचम भाव मुख्य रूप से संतान और ज्ञान का भाव होता है। ऋषि पाराशर के अनुसार इसे सीखने के भाव के तौर पर भी देखा जाता है। यह भाव किसी भी बात को ग्रहण करने की मानसिक क्षमता को दर्शाता है कि, कैसे आप आसानी से किसी विषय के बारे में जान सकते हैं। पंचम भाव गुणात्मक संभावनाओं को भी प्रकट करता है। कुंडली में पंचम भाव को निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है। सम्राट की निशानी, कर, बुद्धि, बच्चे, पुत्र, पेट, वैदिक ज्ञान, पारंपरिक कानून, पूर्व में किये गये पुण्य कर्म कुंडली में पंचम भाव से क्या देखा जाता है बुद्धिमता, लगाव, आत्मन बच्चे, प्रसिद्धि, संचित कर्म पद का बोध पंचम भाव से लगाया जाता है ज्योतिष विद्या से संबंधित पुस्तकों में पंचम भाव प्रश्नज्ञान में भट्टोत्पल कहते हैं कि मंत्रों का उच्चारण या धार्मिक भजन, आध्यात्मिक गतिविधियां, बुद्धिमता और साहित्यिक रचनाएँ पंचम भाव से प्रभावित होती हैं। पंचम भाव प्रथम संतान की उत्पत्ति, खुशियां, समाज और सामाजिक झुकाव का प्रतिनिधित्व करता है। यह भाव स्वाद और प्रशंसा, कलात्मक गुण, नाट्य रुपांतरण, मनोरंजन, हॉल और पार्टी, रोमांस, प्यार, प्रेम प्रसंग, सिनेमा, मनोरंजन का स्थान, रंगमंच आदि को दर्शाता है। यह भाव सभी प्रकार की वस्तुओं और भौतिक सुखों जैसे- खेल, ओपेरा, ड्रामा, संगीत, नृत्य और मनोरंजन को दर्शाता है। उत्तर कालामृत के अनुसार पंचम भाव कुंडली में एक महत्वपूर्ण भाव होता है क्योंकि यह उच्च नैतिक मूल्य, मैकेनिकल आर्ट, विवेक, पुण्य और पाप के बीच भेदभाव, मंत्रों के द्वारा प्रार्थना, वैदिक मंत्र और गीतों का उच्चारण, धार्मिक प्रवृत्ति, गहरी सोच, गहन शिक्षा और ज्ञान, विरासत में मिला उच्च पद, साहित्यिक रचना, त्यौहार, संतुष्टि, पैतृक संपत्ति, वेश्या के साथ संबंध और चावल से निर्मित उपहार को दर्शाता है। ऋषि पाराशर के अनुसार, पंचम भाव, दशम भाव से अष्टम पर स्थित होता है इसलिए पंचम भाव उच्च पद और प्रतिष्ठा में गिरावट को दर्शाता है। इससे पूर्व जन्म में किये जाने वाले पुण्य कर्मों का पता चलता है। यह भाव प्राणायाम, आध्यात्मिक कार्य, मंत्र-यंत्र, इष्ट देवता, शिष्य और धार्मिक कार्यक्रमों के लिए आमंत्रण को दर्शाता है। यह भाव मानसिक चेतना से आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति को प्रकट करता है। काल पुरुष कुंडली में पंचम भाव पर सिंह राशि का नियंत्रण रहता है और इसका स्वामी सूर्य है। पंचम भाव की विशेषताएँ पंचम भाव विशेष विषयों में उच्च शिक्षा, फैलोशिप, पोस्ट ग्रेजुएशन, लेखन, पढ़ना, वाद-विवाद, रिसर्च, मानसिक खोज और कौशल को दर्शाता है। इस भाव से सट्टेबाजी में होने वाले लाभ, शेयर बाजार, जुआ, मैच फिक्सिंग और लॉटरी से जुड़े मामलों को भी देखा जाता है। पंचम भाव के संबंध में जातक परिजात में उल्लेख मिलता है कि यह बुद्धिमता, पुत्र, धर्म, शासक या राजा को दर्शाता है। तीर्थयात्रा को द्वितीय, पंचम, सप्तम और एकादश भाव से देखा जाता है। पंचम भाव प्रेम-प्रसंग, किस प्रेम-प्रसंग में सफलता मिलेगी, लाइसेंस, वैध और तर्कसंगत आकर्षण, बलात्कार, अपहरण आदि को दर्शाता है। यह भाव दो लोगों के बीच शारीरिक और चुंबकीय व्यक्तित्व को आकर्षित करता है। यह भाव पेट की चर्बी और ह्रदय का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अलावा यह दायें गाल, ह्रदय का दायां भाग या दायें घुटने को भी दर्शाता है। मेदिनी ज्योतिष में पंचम भाव बुद्धिमता, संवेदना की स्थिरता, सांप्रदायिक सौहार्द, लोगों में सट्टेबाजी की प्रवृत्ति, निवेश, स्टॉक एक्सचेंज, बच्चे, आबादी, विश्वविद्यालय, लोगों के नैतिक मूल्य आदि बातों को दर्शाता है। यह भाव जन्म दर और उससे संबंधित रुचि, मनोरंजन स्थल, सिनेमा, रंगमंच, कला, स्पोर्ट्स, सभी प्रकार के मनोरंजन और खुशियों को प्रदर्शित करता है। यह भाव राजदूत, सरकार के प्रतिनिधि और विदेशों में स्थित राजनयिकों पर शासन करता है। यह मानव संसाधन मंत्रालय, शिक्षा, स्कूल, संभावनाओं पर आधारित देश की अर्थव्यवस्था, लोगों की खुशियां या दुःख, शिक्षा से संबंधित सुविधाएँ, कला और देश की कलात्मक रचना आदि का बोध कराता है। पंचम भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध पंचम भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध हो सकता है। जैसे कि पंचम भाव संतान, कला, मीडिया, सृजनात्मकता, रंगमंच प्रस्तुति, सिनेमा, मनोरंजन से संंबंधित अन्य साधन, रोमांस और अस्थाई आश्रय या निवास से संबंधित होता है। पंचम भाव चतुर्थ भाव से द्वितीय स्थान पर होता है। तृतीय भाव हमारे अहंकार, अपरिपक्व व्यवहार और सोचने-समझने की शक्ति व ज्ञान को दर्शाता है लेकिन असल में इनका निर्धारण कुंडली में पंचम भाव से होता है। पंचम भाव उन बिन्दुओं को दर्शाता है, जिनसे जीवन में आप कुछ सीखते हैं। चतुर्थ भाव शुरुआती शिक्षा का कारक होता है, यह प्राथमिक शिक्षा, निवास और भवन को दर्शाता है। पंचम भाव गणित, विज्ञान, कला आदि से संबंधित होता है। इससे तात्पर्य है कि आप किस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त करेंगे। शेयर बाजार, सट्टे से लाभ, सिनेमा, अचानक होने वाला धन लाभ और हानि कुंडली में पंचम भाव से देखा जाता है। पंचम भाव राजनीति, मंत्री, मातृ भूमि से लाभ की प्राप्ति, स्थाई और पारिवारिक संपत्ति को दर्शाता है। आपके पास कितना धन होगा यह कुंडली में चतुर्थ भाव से देखा जाता है। वहीं आपके परिवार के पास कितना धन होगा यह पंचम भाव से जाना जाता है। पंचम भाव बुद्धिमता, अहंकार और आपके बड़े भाई-बहनों की संवाद क्षमता को दर्शाता है। आपकी माता का धन और उन्हें होने वाले लाभ, बच्चों से जुड़े खर्च, आपके जीवनसाथी और भाई-बहनों की इच्छा व उन्हें प्राप्त होने वाले लाभ का बोध भी पंचम भाव से होता है। यह भाव अंतर्ज्ञान और जीवनसाथी के परिवार की छवि के प्रभाव को भी दर्शाता है। यह भाव धर्म, दर्शन, धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं का सबसे उच्च भाव है। यह दर्शाता है कि आपके पिता और गुरु से आप किस प्रकार ज्ञान प्राप्त करेंगे। ज्योतिष शास्त्र की पुस्तकों में पंचम भाव कर्म या नौकरी का अंत और शुरुआत को दर्शाता है। इसका मतलब है कि आप नौकरी खो देंगे और आपको नई नौकरी मिलेगी या जॉब के लिए नये अवसर मिलेंगे। पंचम भाव बॉस की गुप्त संपत्तियाँ, इच्छाओं का अंत, बड़े भाई-बहनों के जीवनसाथी, दादी की सेहत, मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति की राह में आने वाली कठिनाइयों को दर्शाता है।
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चतुर्थ भाव– जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव को प्रसन्नता या सुख का भाव कहा जाता है। इसे माता के भाव के तौर पर भी जाना जाता है। यह भाव आपके निजी जीवन, घर में आपकी छवि, माता के साथ आपके संबंध, परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आपके संबंध, आपकी सुख-सुविधाएँ और स्कूली व शुरुआती शिक्षा से संबंधित होता है। चतुर्थ भाव का महत्व और विशेषताएँ चतुर्थ भाव मानसिक शांति, पारिवारिक जीवन, निजी रिश्तेदार, घर, समृद्धि, उल्लास, सुविधाएँ, जमीन और पैतृक संपत्ति, छोटी-छोटी खुशियां, शिक्षा, वाहन और गर्दन व कंधों से संबंध रखता है। ज्योतिष में चतुर्थ भाव से क्या देखा जाता है? माता सुख-सुविधा वाहन अचल संपत्ति घर चतुर्थ भाव को लेकर ज्योतिषीय व्याख्या प्रसन्नज्ञान में भट्टोत्पल कहते हैं कि मूल्यवान जड़ी-बूटी, खजाना, छिद्र और गुफाओं को दर्शाता है। ज्योतिष विद्वानों के अनुसार, चतुर्थ भाव माता का भाव होता है। यह भाव घर, निवास, पारिवारिक जीवन और व्यक्ति के सामान्य जीवन को दर्शाता है। यह भाव घर-परिवार से जुड़ी गुप्त बातों का बोध कराता है। काल पुरुष कुंडली में चतुर्थ भाव पर कर्क राशि का नियंत्रण रहता है और इस राशि का स्वामी ग्रह चंद्रमा होता है। उत्तर-कालामृत में कालिदास कहते हैं चतुर्थ भाव माता, तेल, स्नान, रिश्ते, जाति, वाहन, छोटी नाव, कुएँ, पानी, दूध, गाय, भैंस, मक्का और वृद्धि आदि को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त आर्द्र भूमि में उत्पादन, दवाई, विश्वास, झूठे आरोप, तंबू, तालाब की खुदाई या जन कल्याण के लिए इसका इस्तेमाल, हवेली, कला, घर में मनोरंजन, पैतृक संपत्ति, चोरी हुई संपत्ति का पता लगाने की कला, वैदिक और पवित्र ग्रन्थों का विकास आदि। चतुर्थ भाव जमीन या अचल संपत्ति को भी दर्शाता है, साथ ही किराये या लीज पर ली गई जमीन या वस्तुएँ। यह भाव वाहन सुख और अन्य व्यक्तियों के माध्यम से मिलने वाले वाहन सुख को भी प्रकट करता है। कुंडली में चतुर्थ भाव सभी प्रकार की संपत्ति को प्रभावित करता है (संपत्ति जैसे- क्षेत्र, चारागाह, रियल इस्टेट, खेत, बिल्डिंग, गार्डन, माइंस और स्मारक आदि) चतुर्थ भाव व्यक्ति की शिक्षा और शैक्षणिक योग्यता का बोध कराता है इसलिए इससे व्यक्ति की शुरुआती शिक्षा और कॉलेज की पढ़ाई के बारे में जाना जाता है। चतुर्थ भाव पैतृक घर जहां व्यक्ति का जन्म हुआ है, घर या जन्मभूमि से दूर जाने की संभावना, भूमिगत स्थान, प्राचीन स्मारक, आर्किटेक्चर, वाहन, घोड़े, हाथी और व्यक्ति का माँ के साथ संबंधों को दर्शाता है। चतुर्थ भाव सुख, विजय और आराम, पवित्र स्थान, नैतिक गुण, धार्मिक आचरण, स्तन, छाती, विद्रोह, मन, बुद्धिमता, व्यक्ति की योग्यता, हाई स्कूल और कॉलेज की शिक्षा आदि को व्यक्त करता है। मेदिनी ज्योतिष में चतुर्थ भाव राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन, माइंस, गार्डन, सार्वजनिक इमारतें, फसलें, कृषि, खनिज, जमीन, शांति, राजनीतिक स्थिरता, प्राकृतिक आपदाएँ, शैक्षणिक संस्थान, स्कूल, कॉलेज, कानून और व्यवस्था, घर व अन्य समुदायों से सद्भाव को दर्शाता है। इसे सिंहासन भाव भी कहा जाता है। इस भाव को राष्ट्र के लोगों के जीने की स्थिति, रियल इस्टेट, हाउसिंग, फार्मिंग और उत्पादन से भी जोड़कर देखा जाता है। यह भाव मातृभूमि, राष्ट्रवाद, झंडा और राजा के सिंहासन को भी दर्शाता है। इससे मौसम की स्थिति, ज्वालामुखी विस्फोट, भूकंप, बाढ़, सुनामी, भू-स्खलन, वनों में आग या अन्य प्राकृतिक आपदाओं को भी देखा जाता है। पश्चिमी ज्योतिष में चतुर्थ भाव का विचार कैबिनेट (मंत्रिमंडल) के तौर पर किया जाता है। वहीं वैदिक ज्योतिष में मंत्रिमंडल को प्रथम भाव से देखा जाता है। चतुर्थ भाव भौगोलिक मंत्रालय को भी दर्शाता है। यह किसी भी प्रकार सहमति या समझौते को निरस्त करने का निर्धारण भी करता है। चतुर्थ भाव का अन्य भावों से अंतर्संबंध चतुर्थ भाव का कुंडली के अन्य भावों से अंतर्संबंध हो सकता है। यह हमारे निजी जीवन या अफेयर को दर्शाता है, साथ ही आपके छोटे भाई-बहनों का धन, संचार में वृद्धि, यात्रा करने की क्षमता, वस्त्र, फर्नीचर, घर के अंदर की कलात्मक वस्तुएँ, कार, ऑर्किटेक्चर की पढ़ाई, पेशेवर और वाणिज्यिक स्थान को भी दर्शाता है। यह भाव निकटवर्ती रिश्ते और रिश्तेदारों के साथ संबंध व उनके घर आने का बोध कराता है। सामान्य रूप से यह सभी प्रकार के रिश्तों और रिश्तेदारों का प्रतिनिधित्व करता है, जो आपके घर आया करते हैं। छोटे भाई-बहनों के संसाधन, बच्चों को खोने का भय, आपके बच्चे कहां दान करते हैं, वह स्थान जहां वे धन दान करते हैं। यह सभी कुंडली में चतुर्थ भाव से देखा जाता है। चतुर्थ भाव विवाह के बाद आपके परिवार यानि बीवी और बच्चे आदि को दर्शाता है, साथ ही संयुक्त संपत्ति में आपका भाग्य, ससुराल पक्ष के लोगों का भाग्य, बिजनेस में की जाने वाली संभावनाओं से होने वाला नुकसान, आपके अंकल को होने वाला लाभ, कर्ज से मुक्ति, रोग और शत्रु, विरोधियों से होने वाला लाभ आदि का बोध होता है। चतुर्थ भाव आपके जीवनसाथी के करियर और प्रोफेशन का बोध भी कराता है। समाज में आपके जीवनसाथी की छवि या प्रतिष्ठा, आपके ससुराल पक्ष के लोगों के गुरु, ससुराल पक्ष के लोगों की शिक्षा और उनके द्वारा की जाने वाली लंबी दूरी की यात्राओं को भी व्यक्त करता है। चतुर्थ भाव आपके पिता और गुरु के जीवन में होने वाले बड़े परिवर्तन या मृत्यु, पिता की सर्जरी, धन के संबंध में पिता और गुरु से संबंधित गुप्त तथ्य, आपके नैतिक मूल्यों में होने वाले बड़े बदलाव, उच्च शिक्षा या लंबी यात्राओं को व्यक्त करता है। यह भाव आपके जीवनसाथी के अधिकारी और बॉस के साथ कानूनी साझेदारी का बोध भी कराता है। यह भाव स्वास्थ्य, कर्ज और बड़े भाई-बहनों के विरोधी, इच्छाओं की पूर्ति, कानूनी कार्रवाई शत्रुओं के माध्यम से पूरी होने वाली इच्छाओं को व्यक्त करता है। चतुर्थ भाव आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आपकी आस्था को दर्शाता है। आपके अंदर मौजूद संवेदना, संपत्ति को खरीदने या बेचने को लेकर आपके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों का बोध कराता है। यदि किसी व्यक्ति का चतुर्थ भाव पीड़ित है तो उस व्यक्ति को यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
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तृतीय भाव जन्म कुंडली में तृतीय भाव को वीरता और साहस का भाव कहा जाता है। यह हमारी संवाद शैली और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किये जाने वाले प्रयासों को दर्शाता है। किसी भी तरह के कार्य को करने की इच्छाशक्ति का निर्धारण भी इस भाव से देखा जाता है। यह भाव आपके छोटे भाई-बहनों से भी संबंधित होता है। तृतीय भाव को विभिन्न माध्यमों से भी व्यक्त किया जाता है। धैर्य भाव: बुरे विचार, स्तन, कान, विशेषकर दायां कान, वीरता, पराक्रम, भाई-बहन, मानसिक शक्ति तृतीय भाव का महत्व और विशेषता तृतीय भाव भाई-बहन, बुद्धिमत्ता, पराक्रम, कम दूरी की यात्राएँ, पड़ोसी, नज़दीकी रिश्तेदार, पत्र और लेखन आदि का प्रतिनिधित्व करता है। तृतीय भाव से किसी भी व्यक्ति के साहस, पराक्रम, छोटे भाई-बहन, मित्र, धैर्य, लेखन, यात्रा और दायें कान का विचार किया जाता है। यह भाव दायें कान व स्तन, दृढता, वीरता और शौर्य को भी दर्शाता है। अष्टम भाव से अष्टम होने की वजह से तृतीय भाव जातक की आयु और चतुर्थ भाव से द्वादश होने के कारण माता की आयु का विचार भी इसी भाव से किया जाता है। ज्योतिष में तृतीय भाव से क्या देखा जाता है? पराक्रम छोटे भाई-बहन कम दूरी की यात्राएँ लेखन कला मित्रता आयु तृतीय भाव की ज्योतिषीय व्याख्या ‘सत्याचार्य’ के अनुसार किसी व्यक्ति की मानसिक शक्ति, दृढ़ संकल्प और भाषा के बारे में जानने के लिए यह भाव देखा जाता है। ‘सर्वार्थ चिन्तामणि’ के अनुसार, यह भाव कुंडली में किसी भी व्यक्ति के लिए दवाई, मित्र, शिक्षा और कम दूरी की यात्राओं को दर्शाता है। ‘ऋषि पाराशर’ ने तृतीय भाव की व्याख्या करते हुए लिखा है कि, यह साहस और वीरता का भाव है। यह हमारी मानसिक क्षमता व स्थिरता, याददाशत और दिमागी प्रवृत्ति आदि को व्यक्त करता है। यह भाव मुख्य रूप से शिक्षा या ज्ञान प्राप्ति के लिए किये गये प्रयासों व झुकाव को दर्शाता है। काल पुरुष कुंडली में तृतीय भाव पर मिथुन राशि का नियंत्रण रहता है और इसका स्वामी बुध ग्रह होता है। तृतीय भाव छोटे भाई-बहन, कजिन, प्रियजन, कर्ज से मुक्ति और पड़ोसियों के बारे में बताता है। सहज स्थान होने की वजह से यह भाव व्यक्ति को मिलने वाली मदद और अपने कार्य को पूरा करने के लिए मिलने वाली सहायता को दर्शाता है। उत्तर कालामृत में कालिदास कहते हैं कि तृतीय भाव युद्ध, सड़क के किनारे वाला स्थान, मानसिक भ्रम की स्थिति, दुःख, सैनिक, कंठ, भोजन, कान, शुद्ध भोजन, संपत्ति का विभाजन, अंगुली और अंगूठे के बीच का स्थान, महिला सेवक, छोटे वाहन की यात्रा और धर्म को लेकर प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी को दर्शाता है। ‘जातक परिजात’ में कहा गया है कि, तृतीय भाव छोटे भाई-बहनों के कल्याण, प्रतिष्ठान, कान, चुनिंदा गहने, वस्त्र, स्थिरता, वीरता, शक्ति, जड़ युक्त खाद्य पदार्थ और फल आदि को दर्शाता है। तृतीय भाव साहस, छोटी दूरी की यात्रा (साइकिल, ट्रेन, नदी, झील और वायु मार्ग के माध्यम से) का संकेत करता है। यह सभी प्रकार के पत्राचार, लेखन, अकाउंटिंग, गणित, समाचार, संचार के माध्यम जैसे- पोस्ट ऑफिस, लेटर बॉक्स, टेलीफोन, टेलीग्राफ, टेलीप्रिंट, टेलीविजन, टेली कम्युनिकेशन, रेडियो, रिपोर्ट, सिग्नल, एयर मेल आदि का प्रतिनिधित्व करता है। तृतीय भाव किताब और प्रकाशन से संबंधित भी होता है, अतः इस भाव के प्रभाव से कोई भी व्यक्ति भविष्य में संपादक, रिपोर्टर, सूचना अधिकारी और पत्रकार बन सकता है। यह भाव निवास परिवर्तन, बेचैनी, बदलाव और परिवर्तन, पुस्तकालय, बुक स्टोर, भाव-राव, हस्ताक्षर (कॉन्ट्रेक्ट या समझौते पर) मध्यस्थता आदि का कारक भी होता है। इसके अलावा यह भाव हाथ, बांह, श्वसन और तंत्रिका तंत्र को भी दर्शाता है। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार तृतीय भाव परिवहन, टेलीकम्युनिकेशन, पोस्टल सर्विसेज, पड़ोसी देश और अन्य देशों के साथ संधियों को व्यक्त करता है। वहीं नाड़ी ज्योतिष के अनुसार तृतीय भाव जातक के माता-पिता के पुनर्विवाह को भी दर्शाता है, यदि तृतीय भाव में एक से ज्यादा ग्रह स्थित हों। प्रश्न ज्योतिष के अनुसार तृतीय भाव संचार के सभी माध्यमों को दर्शाता है। चाहे वह पत्र, पोस्टल डिलीवरी, टेलीफोन, फैक्स या इंटरनेट हो। तृतीय भाव का अन्य भावों से अंतर्संबंध वैदिक ज्योतिष में तृतीय भाव का संबंध संचार, संवाद, हाथों की मूवमेंट, शारीरिक पुष्टता, स्वयं के द्वारा की जाने वाली लंबी दूरी की यात्रा को दर्शाता है। यदि आप कोई काम अपने हाथों में लेकर उसे पूरा करते हैं, तो इसका बोध कुंडली में तृतीय भाव के माध्यम से किया जाता है। यह ड्राइविंग, कला, मीडिया, एंटरटेनमेंट, रोड, लेखन और आदेश, जो आप अपने नजदीकी रिश्तेदार या भाई-बहनों को संदेश के रूप में देते हैं। किसी भी कार्य को करने की क्षमता या यात्रा के बारे में तृतीय भाव से देखा जाता है। यह भाव धन बढ़ोत्तरी के लिए किये जाने वाले प्रयासों को भी दर्शाता है। यह माता का भाव भी होता है। यद्यपि चतुर्थ भाव माता का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए कुंडली में तृतीय भाव से भी माता के संबंध में अध्ययन किया जाता है। यह भाव जीवन में खुशियों का अभाव या घर की खुशियों की कमी को भी दर्शाता है। यह आशा, कामना और बच्चों की इच्छा (विशेषकर पहली संतान), वृद्धि, सफलता, बच्चों को मिलने वाले पुरस्कार, जॉब, करियर, प्रशासनिक सेवा, बच्चों का व्यावसायिक लोन, वीरता और शत्रुओं से सामना करने का साहस, धर्म, गुरुजन और जीवनसाथी के सलाहकार को भी दर्शाता है। तृतीय भाव बड़े परिवर्तन और ससुराल पक्ष में किसी की मृत्यु का बोध भी कराता है। यह अष्टम भाव से अष्टम पर स्थित होता है इसलिए मृत्यु जैसे विषयों का अनुभव कराता है। यह आपके जीवनसाथी के गुरु और जीवनसाथी के पिता का बोध भी कराता है। यह भाव कर्ज, बीमारी, आपके बड़े भाई-बहनों के बच्चे, आध्यात्मिक कर्मों के संचय को भी दर्शाता है। क्या आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी, क्या आप विदेश यात्रा पर जाएंगे, क्या आप अस्पताल में भर्ती होंगे आदि ये सभी बाते तृतीय भाव द्वारा व्यक्त की जाती है।
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