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चन्द्रमा की कुंडली में विभिन्न भावों में स्थित होने के फल

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वैदिक ज्योतिष में भावानुसार उच्च के चंद्र का फल 〰️〰️

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उच्च का चन्द्रमा
posted Nov 12, 2019 by Rakesh Periwal

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जन्मपत्रिका के 12 भावों में छुपे हैं कई राज, हर भाव की है खास बात। अज्ञानता से भय, भय से भ्रांति, भ्रांति से भूल, भूल से गलत परिणाम और गलत परिणाम से असफलता और असफलता से दु:ख अर्थात अगर देखा जाए तो दु:ख का सबसे बड़ा कारण जो है, वो है अज्ञानता और इसको दूर करने तथा सही ज्ञान का मार्ग दिखने का काम एक ज्योतिष करता है। सही ज्ञान देने के लिए कई मार्ग हैं, जैसे- न्यूमरोलोजी (अंक-विज्ञान), सामुद्रिक शास्त्र (हस्त-रेखा) टैरो कार्ड, वास्तु और कुंडली। कुंडली यानी जन्मपत्रिका से भविष्यवाणी करना सबसे पुरातन और सटीक विज्ञान माना जाता है। जातक की कुंडली उसकी जन्मतिथि, समय, स्थान के आधार पर बनाई जाती है। यद्यपि कई कारणों से जन्म समय में संशोधन की आवश्यकता हो जाती है। इसीलिए हर ज्ञानी ज्योतिष को यह मालूम होता है कि संशोधन कैसे किया जाता है। भविष्यवाणी करने से पहले एक योग्य ज्योतिषी को जांच कर लेना चाहिए कि जातक की कुंडली सही है की नहीं। जांच करने से पहले जातक के जीवन और गोचर की मुख्य घटनाओं का मिलान कर लेना चाहिए। यदि मिलान सही हो तो कुंडली सही है और नहीं तो कुंडली में जन्म समय संशोधन की आवश्यकता है। ज्योतिष में मान्य बारह राशियों के आधार पर जन्मकुंडली में बारह भावों की रचना की गई है। प्रत्येक भाव में मनुष्य जीवन की विविध अव्यवस्थाओं, विविध घटनाओं को दर्शाता है। 1. प्रथम भाव : यह लग्न भी कहलाता है। इस स्थान से व्यक्ति की शरीर यष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है। 2. द्वितीय भाव : इसे धन भाव भी कहते हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, परिवार का सुख, घर की स्थिति, दाईं आंख, वाणी, जीभ, खाना-पीना, प्रारंभिक शिक्षा, संपत्ति आदि के बारे में जाना जाता है। 3. तृतीय भाव : इसे पराक्रम का सहज भाव भी कहते हैं। इससे जातक के बल, छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, पराक्रम, धैर्य, कंठ-फेफड़े, श्रवण स्थान, कंधे-हाथ आदि का विचार किया जाता है। 4. चतुर्थ स्थान : इसे मातृ स्थान भी कहते हैं। इससे मातृसुख, गृह सौख्‍य, वाहन सौख्‍य, बाग-बगीचा, जमीन-जायदाद, मित्र, छाती-पेट के रोग, मानसिक स्थिति आदि का विचार किया जाता है। 5. पंचम भाव : इसे सुत भाव भी कहते हैं। इससे संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यश, नौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है। 6. छठा भाव : इसे शत्रु या रोग स्थान भी कहते हैं। इससे जातक के श‍त्रु, रोग, भय, तनाव, कलह, मुकदमे, मामा-मौसी का सुख, नौकर-चाकर, जननांगों के रोग आदि का विचार किया जाता है। 7. सातवां भाव : विवाह सौख्य, शैय्या सुख, जीवनसाथी का स्वभाव, व्यापार, पार्टनरशिप, दूर के प्रवास योग, कोर्ट कचहरी प्रकरण में यश-अपयश आदि का ज्ञान इस भाव से होता है। इसे विवाह स्थान कहते हैं। 8. आठवां भाव : इस भाव को मृत्यु स्थान कहते हैं। इससे आयु निर्धारण, दु:ख, आर्थिक स्थिति, मानसिक क्लेश, जननांगों के विकार, अचानक आने वाले संकटों का पता चलता है। 9. नवां भाव : इसे भाग्य स्थान कहते हैं। यह भाव आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताता है। 10. दसवां भाव : इसे कर्म स्थान कहते हैं। इससे पद-प्रतिष्ठा, बॉस, सामाजिक सम्मान, कार्य क्षमता, पितृ सुख, नौकरी व्यवसाय, शासन से लाभ, घुटनों का दर्द, सासु मां आदि के बारे में पता चलता है। 11. ग्यारहवां भाव : इसे लाभ भाव कहते हैं। इससे मित्र, बहू-जंवाई, भेंट-उपहार, लाभ, आय के तरीके, पिंडली के बारे में जाना जाता है। 12. बारहवां भाव : इसे व्यय स्थान भी कहते हैं। इससे कर्ज, नुकसान, परदेश गमन, संन्यास, अनैतिक आचरण, व्यसन, गुप्त शत्रु, शैय्या सुख, आत्महत्या, जेल यात्रा, मुकदमेबाजी का विचार किया जाता है। किसी घटना के फलित होने या घटित होने के लिए हमें घटना के फलित होने का एक ही संगत घर नहीं देखना चाहिए अपितु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभाव डालने वाले सभी घरों का अध्ययन भी करना चाहिए। किसी घटना की भविष्यवाणी करते समय अन्य घरों के प्रभाव भी विचारणीय हैं।
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लग्नेश का विभिन्न भावों में फल लग्न के स्वामी का प्रथम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी अपने ही भाव में स्थित हो तो जातक के लिए यह स्थिति बहुत ही शुभ मानी गई है इसका मुख्य कारण यह है कि ऐसी स्थिति होने पर लग्न मजबूत हो जाता है कहा भी गया है — सैया भई कोतवाल तो डर काहे का अर्थात यदि घर का मालिक घर में ही कोतवाली करता है तो उस घर से मिलने वाले सभी फल सहज रूप में मिलेगा ही इसमें कोई संदेह नहीं है. शास्त्र में कहा गया है ——- लोमेश संहिता के अनुसार — लग्नेशे लग्नगे पुंसः सुदेहे स्वभुजकर्मी मनस्वी चातिचांचल्यो द्विभार्यो परगामी वा। अर्थात यदि लग्न का अधिपति लग्न में ही हो तो वैसा जातक शरीर से मजबूत वा आकर्षक स्वावलंबी, अपने मेहनत से धनोपार्जन करने वाला, चिंतन करने वाला अति चंचल स्वभाव वाला होता है तथा ऐसे जातक की दो पत्नी होती है अथवा अन्य स्त्रियों के प्रति आसक्त रहने वाला होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का दूसरे भाव में फल दूसरा भाव धन, वाणी, नेत्र इत्यादि का होता है यदि इस स्थान में लग्न का अधिपति स्वयं बैठा है तो ऐसा जातक अपने प्रयास से धन कमाता है। वह अपने जीवन में धन की कमी नहीं महसूस करेगा और अपने सम्पूर्ण जीवन काल में खूब धन कमाएगा। यदि धन भाव का स्वामी भी अपने ही भाव में स्थित है तब तो क्या कहना ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में धन का अभाव महसूस नहीं करता है। जीवन भर धन का लाभ मिलता रहता है । इनकी वाणी मधुर अथवा दम्भ युक्त होता है। खाने और पीने का भी शौक़ीन होता है। इनकी रूचि ज्योतिष तथा मनोविज्ञान जैसे विषयो में होती है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का तृतीय भाव में फल तीसरा भाव सहोदर और परिश्रम का भाव है यदि इस भाव में लग्न का स्वामी बैठा है तो ऐसा जातक अपने परिश्रम से भविष्य का निर्माण करता है। यदि ऐसा व्यक्ति कभी भी अपने भाग्य को कोसना नहीं चाहिए। यदि लग्न का स्वामी इस भाव में है तो भाई से सम्बन्ध ख़राब हो सकता है। यदि लग्नाधिपति यहाँ शुभ स्थिति में है तो भाइयो के साथ बढ़िया सम्बन्ध होता है। ऐसा जातक लघु यात्रा का शौक़ीन होता है वह देश विदेश में भ्रमण करता है। इस व्यक्ति संगीतकार, नर्तक, अभिनेता, खिलाड़ी, लेखक आदि के रूप में प्रसिद्ध होता है। ऐसा जातक कला का पुजारी होता है कोई एक कला तो उसके पास अवश्य ही होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का चतुर्थ भाव में फल चतुर्थ भाव वाहन, बंधू-बान्धव, मकान, माता इत्यादि का भाव है यदि लग्न का स्वामी चतुर्थ स्थान में स्थित है तो ऐसे जातक को उपर्युक्त विषय-वस्तु का सुख प्राप्त होता है। ऐसा जातक अपने माता पिता से बहुत ही प्यार करता है और माता पिता के सुख का भागी बनता है। ऐसा जातक आध्यात्मिक विषयों में रुचि लेता है। इसके लिए अपना कार्य बहुत ही प्यारा होता है। लोमेश संहिता में कहा गया है….. लग्नेशे दशमे तुर्ये पितृमातृसुखान्वितः बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौदर्यसंयुतः। अर्थात यदि लग्न वा प्रथम भाव का स्वामी चतुर्थ स्थान में है तो जातक को माता- पिता का सुख मिलता है। अनेक भाइयो का प्यार मिलता है। अत्यंत कामी गुणवान और सौन्दर्य से युक्त होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का पंचम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी पंचम भाव में स्थित है तो वैसा जातक बहुत ही चालाक होता है वह छोटी छोटी बातो को लेकर परेशान भी होते रहता है। पंचम भाव संतान का भाव होता है अतः यदि लग्नाधिपति इस स्थान में स्थित है तो जातक को अपने संतान से सुख के साथ साथ दुःख भी मिलता है। संतान सुख में कमी भी देखा गया है। शास्त्रानुसार एक संतान की मृत्यु भी संभावित होती है। ऐसा जातक तुनुकमिजाजी होता है तुरत ही किसी बात पर गुस्सा जाता है। ऐसे जातक को सामाजिक कार्यो में रूचि होती है। आप प्रशासनिक अधिकारी होते है। लाभ के पद पर कार्य करते है। कई बार तो ऐसा जातक बीच में ही पढाई छोड़कर कार्य करना शुरू कर देता है। लोमेश संहिता में कहा गया है —- लग्नेशे पंचमे मानी सुतै: सौख्यम च मध्यम प्रथमापत्यनाशः स्यात क्रोधी राजप्रवेशिक: । अर्थात ऐसा व्यक्ति क्रोधी राजकार्य करने वाला होता है। जातक के प्रथम पुत्र की हानि होती है। पुत्र तथा मित्र का सुख कम मिलता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का षष्ठ भाव में फल यदि लग्न का स्वामी छठे भाव में हो तो वह व्यक्ति शरीर से कमजोर होता है। प्रायः वह कर्ज लेते हुए देखा गया है परन्तु यदि लग्नेश की दशा चल रही है तो वैसी स्थिति में जातक कर्ज वा ऋण से मुक्त भी हो जाता है वह किसी न किसी प्रकार से कर्ज से मुक्ति पाना चाहता है। ऐसा जातक सेना अथवा पुलिस डिपार्टमेंट में नौकरी करने वाला होता है और यदि वहां नौकरी नहीं भी करेगा तो उसका स्वभाव सेनानायक जैसा ही होगा। आप मेडिकल से जुड़े कार्य कर सकते है अर्थात डॉक्टर बन सकते है। ऐसा व्यक्ति दुसरो के कार्यो में हस्तक्षेप करता है। लोमेश संहिता के अनुसार — लग्नेशे सहजे षष्ठे सिंहतुल्यपराक्रमी सर्वसम्पद्युतो मानी द्विभार्यो मतिमान सुखी। अर्थात ऐसा जातक सिंह के सामान पराक्रमी बलशाली होता है। धन धान्य से परिपूर्ण होता है तथा दो पत्नी का सुख प्राप्त होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का सप्तम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी सप्तम भाव में हो तो ऐसे जातक को दो पत्नी का सुख मिलता है। कभी-कभी एक पत्नी को मरते हुए भी देखा गया है। आप अपने मन के अनुसार अपनी पत्नी का चयन करेंगे है। ऐसा जातक हमेशा देश – विदेश भ्रमण करता है अथवा देश – विदेश में अपना निवास स्थान बनाता है। ऐसा जातक अपने पारिवारिक माहौल से ऊबकर सन्यासी भी बन जाता है। लोमेश संहिता में भी यही कहा गया है — लग्नेश सप्तमे यस्य भार्या तस्य न जीवति विरक्तो वा प्रवासी च दरिद्रो वा नृपोपि वा। परंतु यह सब सप्तम स्थान में स्थित ग्रह के ऊपर निर्भर करता है यदि इस भाव में अशुभ ग्रह बैठा है तो अशुभ फल की प्राप्ति होगी और यदि शुभ ग्रह बैठा है तो शुभ फल की प्राप्ति होगी। प्रथम वा लग्न के स्वामी का अष्टम भाव में फल यदि लग्न का स्वामी अष्टम भाव में स्थित है तो ऐसा जातक बहुत ही विद्वान होता है। आप जोखिम वाला कार्य करना पसंद करते है आप चाहते है की मैं ऐसा काम करू जिससे खूब पैसा आये तथा खूब नाम और यश मिले और आप इसमें कुछ हद तक सफल भी होते है। आपको तंत्र मन्त्र में रूचि होती है। आध्यात्मिक कार्यो में आप बढ़-चढ़कर भाग लेते है। लोमेश संहिता में कहा गया है —– लग्नेश व्ययगे चाष्टे शिल्पविद्याविशारद : द्युति चौरो महाक्रोधी परभार्यातिभोगकृता। अर्थात ऐसा जातक शिल्प विद्या में रूचि रखता है। जुआ तथा चोरी जैसे काम करना पसंद करता है। आप अत्यंत ही क्रोधी स्वभाव के होते है तथा अन्य स्त्रियों का उपभोग करना पसंद करते है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का नवम भाव में फल किसी भी जातक की कुंडली में नवम भाव भाग्य तथा पिता का स्थान होता है। यदि प्रथम भाव का स्वामी नवम भाव में है तो ऐसा जातक धार्मिक विचारो से युक्त होता है। तथा धार्मिक कार्यो में आप बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते है। आप बहुत ही भाग्यवान व्यक्ति है। आप को पिता का प्यार तथा धन सुख अवश्य ही मिलेगा। आपको अपने पिता के कथनानुसार कार्य करने के लिए कृत संकल्प होते है। लोमेश संहिता में कहा गया है —- लग्नेशे नवमे पुंसां भाग्यवान जनवल्लभ विष्णुभक्तो पटुर्वाग्भी पुत्रदारधनैरयुक्त। अर्थात यदि लग्नाधिपति नवम स्थान हो तो वह जातक भाग्यवान लोगो का प्रतिनिधित्वकर्ता होता है। आप विष्णु के भक्त होंगे। आप बोलने में कुशल पुत्र पत्नी तथा धन से युक्त होंगे। प्रथम वा लग्न के स्वामी का दशम भाव में फल जन्मकुंडली में दशम भाव कर्म भाव कहलाता है। किसी भी जातक का कर्म कैसा होगा उसका निर्धारण इसी भाव के आधार पर किया जाता है। यदि लग्न का स्वामी दशम भाव में स्थित है तो वैसा जातक अपने परिश्रम के बल पर बहुत ही आगे बढ़ता है। परन्तु यह तब जब आप तन मन और धन से कार्य करे तब अन्यथा काम के लिए भटकते रह सकते है। आप जैसे व्यक्ति अपने अपने हाथ से घर का निर्माण करा कर उस घर में रहते है। यदि शुभ ग्रहो के प्रभाव से प्रभावित है तो आपके पास अचूक प्रॉपर्टी होगी। आप जिस भी क्षेत्र में काम करेंगे उसमे अपना नाम रौशन करेंगे। लोमेश संहिता में कहा गया है —— लग्नेशे दशमे तुर्ये पितृमातृसुखान्वितः बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौन्दर्यसंयुतः। अर्थात यदि लग्नाधिपति दशम स्थान में है तो जातक को माता- पिता का सुख मिलता है। अनेक भाइयो का प्यार मिलता है। अत्यंत कामी गुणवान और सौन्दर्य से युक्त होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का एकादश भाव में फल जन्मकुंडली में एकादश भाव को लाभ भाव भी कहा जाता है। यह स्थान जातक के इच्छापूर्ति का स्थान होता है अतः यदि किसी जातक के कुंडली में लग्न वा प्रथम स्थान का स्वामी इस भाव में होता है तो येन केन प्रकारेण उसकी इच्छापूर्ति होती है। ऐसा जातक अपने भाइयो या बहनो में सबसे बड़ा होता है। आप अपने व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ कमाते है और यदि लग्नेश की दशा चल रही हो तो क्या कहना। लोमेश संहिता में कहा गया है —– लग्नेशे द्वितीये लाभे स लाभी पंडितो नरः सुशीलो धर्मवित्त मानी बहुदारगुणैर्युत:। अर्थात यदि लग्नेश लाभ स्थान में हो तब ऐसा व्यक्ति सुशील, धार्मिक, अनेक पत्नियों वाला तथा विभिन्न गुणों से युक्त होता है। ऐसा जातक अनेक प्रकार से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। प्रथम वा लग्न के स्वामी का बारहवें भाव में फल किसी भी जन्मकुंडली में बारहवां स्थान व्यय, हॉस्पिटल जेल इत्यादि का भाव होता है। इस भाव से पूर्व में कथित विषय-वस्तु के सम्बन्ध में फल की प्राप्ति होती है। इस जातक बहुत ही खर्चीला होता है। ऐसा जातक धार्मिक यात्रा पर जाता है। प्रायः ऐसे जातक को व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती है यदि सफलता मिल भी जाती है तो अंतिम चरण में नुकसान भी हो जाता है। आप जैसे लोग सामाजिक कार्यो में अपना अहम् भूमिका निभाते है। लोमेश संहिता में कहा गया है —– लग्नेश व्ययगे चाष्टे शिल्पविद्याविशारद: द्युति चौरो महाक्रोधी परभार्यातिभोगकृता। अर्थात ऐसा जातक शिल्प विद्या में रूचि रखता है जुआ तथा चोरी जैसे काम करना पसंद करता है। आप अत्यंत ही क्रोधी स्वभाव के होते है तथा अन्य स्त्रियों का उपभोग करना पसंद करते है।
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चन्द्र और मनोविज्ञान ********************* चन्द्रमा और मनोविज्ञान का आपस में बड़ा गहरा सम्बन्ध है ! खगोलशास्त्र और विज्ञान के अनुसार जब जब समुद्र में ज्वारभाटा आता है या सुनामी आती है तब तब उसके पीछे चन्द्र जिसे की मून भी कहते हैं वही कारण बनता है , तो साइंस के मुताबिक भी हमारी धरती पर सूर्य के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव चन्द्र का ही माना जाता है , इसे हम सीधे तौर पर इस तरह से भी समझ सकते हैं की सूर्य जो की सौरमंडल में उर्जा का स्रोत है या कारक है उससे हमें प्रकाश मिलता है , एनेर्जी मिलती है जो के इस धरती पर रहने वाले चर अचर के लिए बहुत ही ज़रूरी है और साथ ही मून यानी चन्द्र जो के शीतलता का कारक है सूर्य से उर्जा लेकर इस धरती के चर अचर पर शीतल उर्जा की छिडकाव करता है जो की हमारे अन्तर्मन यानी मन के की खुराक की लिए ज़रूरी बनता है ! अब बात जब चन्द्र की हो रही है तो हम इसे कारक मन का ही मानेंगे और साथ ही देखेंगे की क्यों चन्द्र मन का स्वामी माना जाता है ! चन्द्र को लूनर भी कहा जाता है और जो व्यक्ति अर्धविक्षप्त हो जाता है उसे भी लुनैटिक कहा जाता है तो इसका अभिप्राय यही निकलता है की हर मानव के मन को चन्द्रमा बहुत प्रभावित करता है और पागलपन के पीछे भी चन्द्र ही कारण रहता है ! चन्द्र को काल पुरुष का मन भी कहा जाता है और जिसकी कलाएं पहले पंद्रह दिन घटती है और बाकी पंद्रह दिन बढती हैं , जिन्हें हम क्रिशन पक्ष और शुक्ल पक्ष भी कहते हैं, चन्द्र सताईस नक्षत्रों का अधिपति भी माना जाता है और रोहणी नक्षत्र में उच्च का मान जाता है क्यों की उस नक्षत्र में चन्द्र की कलाएं पूरनता की तरफ बढती हैं ! आम तौर पर ये देखने में आता है की जब जब पूरणमाशी का वक़्त आता है तो उस वक़्त समुद्र में ज्वारभाटा आता है क्यों की पानी जिसे जल भी कहते हैं उसका कारक भी चंद्रमा माना जाता है और जिस दिन पूरण चन्द्र होता है उस दिन जल अपने कारक की तरफ आकर्षित होता है और उस वक़्त जिन व्यक्तियों का चन्द्र कमजोर होता है उन्हें दिमागी परेशानी होनी शुरू हो जाती है यानी उनकी बेचैनी बढ़ जाती है , इसी प्रकार से अमावस्या के दिन भी होता है जब चन्द्र क्षीण माना जाता है तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है की चन्द्र का मन के साथ बड़ा गहरा नाता है और अगर हम किसी होरोस्कोप में चन्द्र की पोजीशन देखें तो हमें साफ़ साफ़ पता चल जाता है की हमारा मन कितना चंचल होगा या मजबूत होगा जब किसी का चन्द्र राहू , केतु के साथ होगा तो वह उसे भ्रमित रखेगा और शनि के साथ तनाव ग्रसित और अंदर से दुखी और दुनियादारी से दूर रखेगा और वही चन्द्र जब शुक्र के साथ होगा तो भौतिक सुखों की तरफ लालायित रखेगा और वृहस्पति के साथ गज केसरी योग बनाता हुआ उसे आंतरिक सुख प्रदान करता है मतलब की चन्द्र के साथ सच्ची ख़ुशी वृहस्पति के मेल से ही पौसिबल हो पाती है परन्तु इतना ही काफी नहीं चन्द्र की कलाएं और उसका अच्छे घरों में बैठना भी देखा जाता है यानी की शुक्ल पक्ष का बढ़ता हुआ चन्द्र अच्छा माना जाता है , चन्द्र का पक्ष बल इसे ही कहा जाता है तो चन्द्र के कमजोर होने पर कुंडली भी कमजोर हो जाती है मतलब की प्रकाश पुंज सूर्य और चन्द्र दोनों की किसी भी कुंडली में बलबान स्तिथि उस जातक को बलबान , शक्तिशाली और सफल बना देती है , और अंत में ये ही कहा जाएगा की हमें अपने अपने कर्मों का फल जैसे जैसे मिलता है वैसे वैसे ही कुंडली में गृह रिफ्लेक्ट करते हैं इसमें किसी और का कोई दोष नहीं दोष हमारा खुद का ही होता है क्यों की हम दुनिया दारी के भ्रम और मायाजाल में हरदम रहते हैं तो वेवजह एक दुसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं , हमारा भ्रम सिर्फ इतना ही होता है की हम बादलों से आसमा के ढकने पर ये मान लेते हैं की सूर्य है ही नहीं जब की सूर्य अमर है बादलों के पीछे है तो गृह और हमारे करम भी कुछ इसी तरह से हमें भ्रमित करते रहते हैं या ये कहना ठीक होगा की हम भ्रमित रहते हैं,तो वेवजह का भ्रम पालना हमें मानसिक तौर पर बीमार कर देता है अब ये सब कुछ हमारे हाथ में है या नहीं इस बहस में क्या पड़ना , जो है सामने है और जो सामने है उसे ठीक करने का हमारा प्रयास होना चाहिए और वो चाहे कैसे भी हो मतलब अच्छे करम , अच्छे विचार सद्व्यवहार इश्वर पर भरोसा तो सब गृह चाहे पूरी तरह से शांत न भी हों तब भी हम कुछ हद तक अच्छा जीवन जरूर गुज़ार सकते हैं पर कंडीशन वही है की कोशिश मन , वचन और क्रम से होनी चाहिए न की बनावटीपन से क्यों की उससे सिर्फ हम अपने आप को ही धोखा देते रहते हैं , तो अगर हम चाहते हैं की हमारे गृह सुधरें तो हमें उपायों से ज्यादा अच्छे कर्मों की तरफ जयादा ध्यान देना चाहिए और अच्छे करम भी दिल से करने चाहिए और निष्काम क्यों की “ हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां हमें मुखौटे लगाने पढ़ते हैं जिससे की दुनिया हमें न पहचान पाए पर ईश्वर के आगे कोई मुखौटा नहीं चलता “ जब जब हमारी कोशिश ईश्वर के आगे मुखौटा लगाने की होती है तब तब हम अपने ही मकडजाल या भ्रमजाल में उलझते जाते हैं तो ग्रहों के उपाए भी मात्र यही सन्देश देते हैं की अच्छे करम , शुभ करम और निष्काम करम करते जाओ और फिर देखो की उस परमात्मा की कैसी कृपा होती है !
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बुध ग्रह को बुद्धि का देवता माना गया है। ज्योतिष गणना के अनुसार मिथुन व कन्या राशि का प्रतिनिधित्व (स्वामी) बुध ग्रह को प्राप्त है। कुंडली में इसकी स्थिति काफी अधिक महत्व रखती है। यदि बुध अच्छी स्थिति में हो तो व्यक्ति को बुद्धि संबंधी कार्यों में विशेष सफलताएँ प्राप्त होती हैं। जबकि ये अशुभ स्थिति में हो तो कई प्रकार की मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वहीं अगर हम इंसान के करियर के बारे में बात करें तो इसे भी आकार देने में बुध काफी महत्वपूर्ण निभाता है। बुध एक ऐसा ग्रह है, जो सूर्य के सानिध्य में ही रहता है। जब कोई ग्रह सूर्य के साथ विशेष अंशात्मक दूरी पर होता है तो उसे अस्त माना जाता है। यदि बुध 14 डिग्री या उससे कम में सूर्य के साथ हो, तो उसे अस्त माना जाता है। लेकिन सूर्य के साथ रहने पर बुध ग्रह को अस्त का दोष नहीं लगता और अस्त होने से परिणामों में भी बहुत अधिक अंतर नहीं देखा गया है। बुध ग्रह कालपुरुष की कुंडली में तृतीय और षष्ठ भाव का प्रतिनिधित्व करता है। प्रत्येक ग्रह जातक के ऊपर अपना विशेष प्रभाव देता है। इस लेख के माध्यम से हम आपको बताएँगे कि बुध ग्रह की विभिन्न भावों में स्थिति होने पर आपका कार्यक्षेत्र और प्रोफेशन किस रूप में प्रभावित होगा। प्रथम भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुण्डली के प्रथम भाव में बुध ग्रह स्थित हो तो ऐसा जातक गणितज्ञ एवं परदेश में निवास करने वाला व विदेश से संबंधित व्यापार करता है। ऐसे जातकों को विदेशों से जुड़े कामों में सफलता भी प्राप्त होती है। इसके साथ ही ऐसे लोगों की तर्क क्षमता भी अच्छी होती है। द्वितीय भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुण्डली के द्वितीय भाव में बुध ग्रह स्थित होता है तो ऐसा जातक लेखन तथा प्रकाशन कार्य से धनोपार्जन करने वाला, लेखन कार्य में दक्ष, अच्छा वकील, पिता का आज्ञाकारी, पाप भीरू, अत्यंत सुन्दर, कोमल देह वाला, सत्य वचन बोलने वाला, भ्रमण में रूचि रखने वाला, मिष्ठान सेवन में रूचि रखने वाला, अधिक खर्च करने वाला एवं परदेश में निवास करने वाला होता है। तृतीय भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुण्डली के तृतीय भाव में बुध ग्रह स्थित होता है तो ऐसा जातक व्यवसायी, जन्म स्थल से दूर रहकर धन अर्जित करने वाला, साहसी, सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञाता, भरे पूरे परिवार से युक्त, सदगुणों से युक्त, कुशलता पूर्वक अपने अभीष्ट कार्य सिद्ध करने वाला होता है। चतुर्थ भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुण्डली के चतुर्थ भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा जातक ज्ञानी, तीव्र स्मरण शक्ति वाला, नीतिज्ञ, भाग्यशाली, स्थूल देह वाला तथा चतुर बुद्धि व किसी राजनीतिज्ञ का गुप्तचर बन कर धन अर्जित करता है। पंचम भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुंडली के पंचम भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा जातक अपनी बुद्धि कौशल के बल पर अनेक बार लोगों को चमत्कृत कर के अपनी आजीविका चलाता है। ईश्वर की भक्ति में लीन, पवित्र हृदय वाला, समाज व परिवार में प्रतिष्ठित, तीव्र बुद्धि से युक्त एवं यांत्रिक विषय सम्बंधित विशेष ज्ञान रख कर समाज को संबोधित करता है। षष्टम भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुंडली के षष्ठम भाव में बुध ग्रह स्थित होता है तो ऐसा जातक, लेखन एवं मुद्रण कार्य करता है और समाज सेवा में अपना पूर्ण योगदान देता है। खासकर ऐसा व्यक्ति जल से जुड़ा हुआ कार्य करता है। सप्तम भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुण्डली के सप्तम भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा जातक व्यवसाय कुशल व स्त्रियों के साथ मिल कर नये व्यापार की योजना बनाता है एवं सुखी जीवन व्यतीत करने वाला होता है। अष्टम भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुंडली के अष्टम भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा जातक न्यायाधीश, वकील व अपने व्यवसाय के माध्यम से आजीविका चलाने वाले होता है एवं धार्मिक कार्य में रूचि रखता है। नवम भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुंडली के नवम भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा जातक व्यवसाय के माध्यम से आजीविका चलाने वाला, सत्पुरूषों की सेवा से लाभ अर्जित करने वाला, ज्योतिष में रूचि रखने वाला, गायन एवं संगीत कला में रूचि रखने वाला एवं धार्मिक प्रवृत्ति का होता है। दशम भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुंडली के दशम भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा जातक अपने माता पिता एवं गुरुजनों का आज्ञाकारी, अनेक प्रकार के व्यवसायों से धन अर्जित करने वाला, वाहन व चौपायों से संबंधित व्यापार करता है। एकादश भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुंडली के एकादश भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा व्यक्ति यशस्वी, शास्त्रों का ज्ञाता, कुल का पोषण क रने वाला, गायन कला में रूचि रखने वाला और इन्हीं क्षेत्रों से आजीविका चलाने वाला होता है। द्वादश भाव में बुध ग्रह का फल किसी जातक की जन्म कुंडली के द्वादश भाव में बुध ग्रह स्थित होता है, तो ऐसा जातक दूसरे के धन का उपयोग करने वाला, व्यसन से रहित, धार्मिक प्रवृत्ति वाला, शास्त्रों का ज्ञाता एवं परोपकारी प्रवृत्ति वाला होता है। दूसरों का सहयोग कर अपना जीवन यापन करता है। इस प्रकार कुंडली के विभिन्न भागों में बुध ग्रह की स्थिति आप की जीवन शैली और कार्यकुशलता को प्रभावित करती है। उपरोक्त वर्णन में केवल सामान्य फल दिया गया है व्यक्तिगत विश्लेषण के लिए अपनी कुंडली का विश्लेषण तथा देश, काल, पात्र की स्थिति के आधार पर अध्ययन किया जाना आवश्यक होता है।
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