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कलश स्थापना मुहूर्त

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चिंता न करें, इस बार घट स्थापना के लिए खूब मुहूर्त इस जगत की सृष्टि, संचालन और संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी सामर्थ्य प्रदान करने वालीं माँ जगदम्बा ही इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री शक्ति हैं जिनका ममतामयी और करुणामयी स्वरुप जीवमात्र के लिए सदैव कल्याणकारी रहता है। वैसे तो देवी माँ की पूजा के लिए प्रत्येक दिन और प्रति क्षण ही श्रेष्ठ है परंतु नवरात्र के नो दिन देवी माँ की उपासना के लिए बहुत विशेष महत्व रखते हैं जगत के कल्याण के लिए उस आदि शक्ति अपने तेज को नो अलग अलग रूपों में प्रकट किया जिन्हें हम नव-दुर्गा कहते हैं। नवरात्र का समय माँ दुर्गा के इन्ही नौ रूपों की उपासना का समय होता है जिसमें प्रत्येक दिन देवी माँ के अलग अलग रूप की पूजा की जाती है - नवरात्र में देवी के नो रूपों में से प्रथम दिन "माँ शैलपुत्री" की पूजा की जाती है दूसरे दिन "ब्रह्मचारिणी" स्वरुप की तीसरे दिन "चंद्रघंटा" चौथे दिन "कुष्मांडा" पांचवे दिन "स्कन्दमाता" छटे दिन "कात्यायनी" सातवे दिन "कालरात्रि" आठवे दिन "महागौरी" तथा नवरात्रि के नौवे दिन माँ "सिद्धिदात्री" की पूजा की जाती है। .....          श्लोक -     प्रथमं शैलपुत्री च द्वितयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कुष्मांडेति चतुर्थकं।।                    पंचमं स्कन्दमातेति षष्टम कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरी चाष्टमम ।।                      नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तितः।  घट स्थापना के मुहूर्त ये होगा घट स्थापना का शुभ समय -  नवरात्र में घट स्थापना के लिए शुभ चौघड़िया मुहूर्त का विशेष महत्व है इस आधार पर इस बार 21 सितम्बर गुरुवार को "प्रातः 6 बजकर 14 मिन्ट से 7 बजकर 44 मिन्ट तक" का समय घट स्थापना के लिए विशेष शुभ है  पर जो व्यक्ति इस समय में घट स्थापना ना कर पाएं तो इसके बाद "प्रातः 10 बजकर 44 मिन्ट से दोपहर 12 बजकर 13 मिन्ट के बीच" चर चौघड़िया और अभिजीत मुहूर्त की उपस्थिति में भी घट स्थापना का शुभ मुहूर्त होगा।   पहली बार मुहूर्त ही मुहूर्त   प्रात:   6.03 से 8.22 बजे तक दोपहर-  12.20 से 1.51 तक ( लाभ की चौघड़िया) अपराह्न-   1.51 से 3.22 तक ( राहू काल 1.30 से 3 बजे तक है। इस मध्य घट स्थापना नहीं करें) सायंकाल- 4.53 से 7.53 तक भी घट स्थापना का समय है (लेकिन जहां तक संभव हो, पूर्वाह्न 12 बजे से पहले-पहले घट-स्थापना कर लें। ) ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय वाराणसी  

References

ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय
9450537461
posted Sep 19, 2017 by anonymous

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कलश स्थापना शुभ मुहूर्त-
शारदीय नवरात्रि के शुभ मुहूर्त इस साल 21 सितंबर से शुरू हो रहा है। नवरात्रि के नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। माता दुर्गा नवरात्रि में नौ दिनों तक अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं।

शुभ मुहूर्त-
21 सितंबर को माता दुर्गा के प्रथम रूप शैलपुत्री की पूजा होगी। 21 सितंबर को सुबह 6:03 बजे से 8:22 बजे तक का समय अमृत योग है। अगर आप घर में कलश स्थापना चाहते हैं तो अमृत योग का समय सबसे अच्छा है।

कलश स्थापना -
कलश स्थापना के लिए सबसे पहले जौ को फर्श पर डालें, उसके बाद उस जौ पर कलश को स्थापित करें। फिर उस कलश पर स्वास्तिक बनाएं उसके बाद कलश पर मौली बांधें और उसमें जल भरें। कलश में अक्षत, साबुत सुपारी, फूल, पंचरत्न और सिक्का डालें।

अखंड दीप जलाने का विशेष महत्व
दुर्गा सप्तशती के अनुसार नवरात्रि की अवधि में अखंड दीप जलाने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जिस घर में अखंड दीप जलता है वहां माता दुर्गा की विशेष कृपा होती है।
लेकिन अखंड दीप जलाने के कुछ नियम हैं, इसमें अखंड दीप जलाने वाले व्यक्ति को जमीन पर ही बिस्तर लगाकर सोना पड़ता है। किसी भी हाल में जोत बुझना नहीं चाहिए और इस दौरान घर में भी साफ सफाई का खास ध्यान रखा जाना चाहिए।

शारदीय नवरात्र‌ि इस साल 21 सितंबर से शुरू हो रहा है। माता दुर्गा नवरात्र में नौ दिनों तक अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। नवरात्र के नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
नवरात्रि साल में दो बार मनाई जाती है। पहला चैत्र मास में, जिसे चैत्र नवरात्र कहते हैं और दूसरा आश्व‍िन मास में, जिसे शारदीय नवरात्र‍ि कहते हैं। नवरात्रि के दिनों में नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। हम आपको बता रहे हैं कि इस साल शारदीय नवरात्रि में किस दिन कौन सी पूजा होगी। 
जानिए इस नवरा‌त्र‌ि भगवती दुर्गा के नौ रुपों की पूजा कब-कब होगी
कब-कब होगी किस देवी की पूजा.......................................
21 सितंबर को प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा होगी। 
22 सितंबर को दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी। 
23 सितंबर को तीसरे दिन माता चन्द्रघंटा की पूजा होगी। 
24 सितंबर को चौथे दिन माता कुष्मांडाँ की पूजा होगी। 
25 सितंबर को पांचवें दिन माता स्कंदमाता की पूजा होगी।
इसे भी पढ़ें: दुर्गा पूजा 2017: जानें नवरात्रि से पहले महालया का महत्व
26 सितंबर को छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा होगी। 
27 सितंबर को सातवें दिन माता कालरात्रि की पूजा होगी। 
28 सितंबर को आठवें दिन माता महागौरी की पूजा होगी। 
29 सितंबर को नौवें दिन माता सिद्धिदात्रि की पूजा होगी। 
Source Acharya Arvind

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कलश स्थापना..............................
किसी भी धार्मिक समय में और योजना आदि में कलश स्थापना का बहुत महत्व है,पृथ्वी को कलश रूप में स्थापित किया जाता है,फ़िर कलश में सम्बन्धित देवी देवता का आवाहन कर विराजित किया जाता है,चूंकि पृथ्वी एक कलश की भांति है,और जल को संभाल कर लगातार गोल घूम रही है,जल का एक एक बूंद कितने ही अणुओं की भण्डारिणी है,कलश स्थापना का वैदिक महत्व समझने के बाद किसी भी पूजा पाठ या श्रीदुर्गा स्थापना आदि में कलश से सम्बन्धित भ्रान्तियां अपने आप समाप्त हो जायेंगी।

कलश का रूप
एक मिट्टी का कलश जो कि काला न हो,कभी कभी अधिक आग से कलश का रंग कहीं कहीं काला हो जाता है,उसे नही लेना चाहिये पीले कलर का कलश लेकर उसे पवित्र जल से साफ़ कर लेना है,और कलश के गले में तीन धागा वाली मोटी मोली को उसी प्रकार से बांधना है जिस प्रकार से गले में धागा आदि बांधते है,फ़िर कलश के चारों तरफ़ चावल का आटा पीसकर चार स्वास्तिक के निशान बना लेने है,और प्रत्येक स्वास्तिक के अन्दर चार चार टीका लगा देने है,जहां पर कलश को स्थापित किया जाना है,उस स्थान को साफ़ करने के बाद कुमकुम या रोली से अष्टदल कमल बना लेना है उसके बाद भूमि का स्पर्श करने के बाद इस मंत्र को पढना है-

ऊँ भूरशि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री, पृथ्वीं यच्छ पृथ्वीं दृ ँ ह पृथ्वीं मा हिं सी:।

इस मन्त्र को पढकर पूजित भूमि पर सप्तधान्य अथवा गेंहूँ या चावल या जौ एक अंजुलि भर कर रख दें।
धान्य को रखकर इस मंत्र को पढें-
ऊँ धान्यमसि धिनुहि देवान प्राणाय त्वो दानाय त्वा व्यानाय त्वा,दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो व: सविता हिरण्यपाणि: प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

इस मंत्र को पढने के बाद कलश को धान्य के ऊपर स्थापित कर दें।
इसके बाद इस मंत्र को पढें-
ऊँ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्वन्दव: पुनुरूर्जा नि वर्तस्व सा न: सहस्त्रं धुक्ष्वोरूधारा पयस्वती पुनर्मा विशाद्रयि:।

इसके बाद कलश के अन्दर जल भरते समय इस मन्त्र को पढना है-
ऊँ वरुणस्योत्त्म्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद।

इसके बाद किसी साफ़ पत्थर पर सफ़ेद चंदन की लकडी को घिसकर चंदन को किसी साफ़ कटोरी में समेट कर कलश के चारों तरफ़ चन्दन के टीके चारों स्वास्तिकों पर लगाने है,और इस मन्त्र को पढते जाना है-
ऊँ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पति:,त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान यक्ष्मादमुच्यत।

कलश के अन्दर सर्वोषधि (मुरा,जटामांसी,वच,कुष्ठ,शिलाजीत,हल्दी,दारूहल्दी,सठी,चम्पक,मुस्ता) को डालते वक्त यह मन्त्र पढना है-
ऊँ या औषधी: पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा,मनै नु बभ्रूणामहँ शतं धामानि सप्त च ।

इसके बाद किसी नदी या तालाब के किनारे से सफ़ेद और हरे रंग की दूब जिसकी लम्बाई एक बलिस्त की हो लानी है,उसे कलश के अन्दर डालते वक्त यह मन्त्र पढना है-
ऊँ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुष: परुषस्परि,एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्त्रेण शतेन च।

कलश के ऊपर पंचपल्लव (बरगद,गूलर,पीपल,आम,पाकड के पत्ते) रखते समय यह मन्त्र पढना है-
ऊँ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता,गोभाज इत्किलासथ यत्सन्वथ पूरुषम।

इसके बाद कुशा नामकी घास जो कि अश्विन मास की अमावस्या को विधि पूर्वक लायी गयी हो,उसे कलस के अन्दर डालना है,और इस मन्त्र को पढना है-
ऊँ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व: प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभि:,तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्काम: पुने तच्छकेयम।

इसके बाद कलश में सप्तमृत्ति को ( घुडसाल हाथीसाल बांबी नदियों के संगम तालाब राजा के द्वार और गोशाला के मिट्टी) को डालते समय इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ स्योना पृथ्वी नो भवानृक्षरा निवेशनी,यच्छा न: शर्म सप्रथा:।

इसके बाद कलश में सुपारी को डालते वक्त यह मंत्र पढते हैं-
ऊँ या: फ़लिनीर्या अफ़ला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:,बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुंचन्त्वँहस:।

इसके बाद कलश में पंचरत्न (सोना हीरा मोती पद्मराग और नीलम) डालने के समय इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ परि वाजपति: कविरग्निअर्हव्यान्यक्रमीत,दधद्रत्नानि दाशुषे।

कलश में द्रव्य (चलती हुई मुद्रा) को डालते वक्त इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत,स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।

कलश के ऊपर वस्त्र पहिनाने के समय इस मंत्र को पढें-
ऊँ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्व:,वासो अग्ने विश्वरूपँ व्ययस्व विभावसो।

कलश के ऊपर पूर्ण पात्र (मिट्टी का बना प्याला जो कलश के साथ कुम्हार से लावें) को रखते समय इस मन्त्र को पढें-
ऊँ पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरा पत,वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जँ शतक्रतो।

चावल से भरे पूर्णपात्र को कलश पर स्थापित करें और उसपर लाल कपडा लपेट हुये नारियल को इस मंत्र पढकर रखें-
ऊँ या: फ़लिनीर्या अफ़ला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:,बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुंचन्त्वँहस:।

इसके बाद कलश में देवी देवताओं का आवाहन करना चाहिये,सबसे पहले हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र से वरुण का आवाहन करे-
कलश में वरुण का ध्यान और आवाहन-
ऊँ तत्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भि:,अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशँ स मा न आयु: प्र मोषी:।
अस्मिन कलशे वरुणं सांड्ग सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि। ऊँ भूभुर्व: स्व: भो वरुण ! इहागच्छ इह तिष्ठ स्थापयामि,पूजयामि मम पूजां गृहाण,ऊँ अपां पतये नम:।

इस मन्त्र को कह कर कलश पर अक्षत और फ़ूल छोड दें,फ़िर हाथ में अक्षत और फ़ूल लेकर चारों वेद एवं अन्य देवी देवताओं का आवाहन करे-
कलश में देवी-देवताओं का आवाहन
कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्रळ समाश्रित:,मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा,ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:।
अंगेश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:,अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा।
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारका:,गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन संनिधिं कुरु।
सर्वे समुद्रा: सरितीर्थानि जलदा नदा:,आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका:।

इस तरह जलाधिपति वरुणदेव तथा वेदों तीर्थों नदों नदियों सागरों देवियों एवं देवताओं के आवाहन के बाद हाथ में अक्षत पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र से कलश की प्रतिष्ठा करें-
प्रतिष्ठा मंत्र
ऊँ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु,विश्वे देवास इह मादयन्तामोउम्प्रतिष्ठ। कलशे वरुणाद्यावाहितदेवता: सुप्रतिष्ठता वरदा भवन्तु,ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:।

यह कहकर कलश के पास अक्षत और फ़ूल छोड दें।
कलश में जल के रूप में वरुण की स्थापना की गयी है,सभी प्रधान वस्तुओं के रूप में पृथ्वी के रूप में स्थल कारक सप्तमृत्तिका,औषधि के रूप में सर्वोषधि,स्थल बीज के रूप में सुपाडी,जल बीज के रूप में नारियल,क्योंकि बीज के अन्दर जीव है,और जब जीव है तो आत्मा का आना जरूरी है,कारक कलश है,इस प्रकार वरुणदेवता का ध्यान पूजा आदिक का विवरण इस प्रकार से सम्पन्न किया जाता है।
ध्यान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,ध्यानार्थे पुष्पं समर्पयामि। (ध्यान के लिये फ़ूल कलश पर छोडें)

आसन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि। (कलश के पास चावल रखें)

पाद्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,पादयो: पाद्यम समर्पयामि। (जल चढायें)

अर्ध्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,हस्तयोर्ध्यं समर्पयामि। (जल चढायें)

स्नानीय जल
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:.स्नानीयं जलं समर्पयामि। (स्नानीय जल चढायें)

स्नानांग आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,स्नानते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमनीय जल चढायें)

पंचामृत स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,पंचामृतस्नानं समर्पयामि। (पंचामृत से स्नान करवायें,पंचामृत के लिये दूध,दही,घी,शहद,शक्कर का प्रयोग करें)

गन्धोदक स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,गन्धोदकस्नानं समर्पयामि। (पानी में चन्दन को घिस कर पानी में मिलाकर स्नान करवायें)

शुद्धोदक स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:.स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। ( शुद्ध जल से स्नान करवायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

वस्त्र
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: वस्त्रं समर्पयामि। (वस्त्र चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के जल चढायें)

यज्ञोपवीत
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: यज्ञोपवीतं समर्पयामि। (यज्ञोपवीत चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

उपवस्त्र
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: उपवस्त्रं समर्पयामि। (उपवस्त्र को चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: उपवस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

चन्दन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: चन्दनं समर्पयामि। (चन्दन को चढायें)

अक्षत
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: अक्षतान समर्पयामि। (चावलों को चढायें)

पुष्पमाला
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: पुष्पमालां समर्पयामि। (पुष्पमाला चढायें)

नानापरिमल द्रव्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: नानापरिमल द्रव्यं समर्पयामि। (नाना परिमल द्रव्य चढायें)

सुगन्धित द्रव्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि। (सुगन्धित द्रव्य चढायें)

धूप
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: धूपमाघ्रापयामि। (धूपबत्ती को आघ्रापित करायें)

दीप
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: दीपं दर्शयामि। (दीपक दिखायें)

हस्तप्रक्षालन
दीपक दिखाकर हाथ धो लें।

नैवैद्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: सर्वविधं नैवैद्यम निवेदयामि। (नैवैद्य निवेदित करें)

आचमनादि
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: आचमनीयं जलम,मध्ये पानीयं,उत्तरापोऽशने मुखप्रक्षालनार्थे हस्तप्रक्षालनार्थे च जलं समर्पयामि। (आचमनीय जल एवं पानीय तथा मुख और हस्तप्रक्षालन के लिये जल चढायें)

करोद्वर्तन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: करोद्वर्तनं समर्पयामि। (करोद्वर्तन के लिये गन्ध समर्पित करें)

ताम्बूल
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: ताम्बूलं समर्पयामि। (सुपारी इलायची लौंग सहित पान का ताम्बूल समर्पित करें)

दक्षिणा
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: कृताया: पूजाया: सादुर्गण्यार्थे द्रव्य दक्षिणां समर्पयामि। (दक्षिणा प्रदान करें)

आरती
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: आरार्तिकं समर्पयामि। (आरती करें)

प्रदक्षिणा
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: प्रदक्षिणां समर्पयामि। (प्रदक्षिणा करें)

प्रार्थना
हाथ में पुष्प लेकर इस प्रकार से प्रार्थना करें-

देवदानव संवादे मद्यमाने महोदधौ,उत्पन्नोऽसि तथा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयं।
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवा: सर्वे त्वयि स्थिता:,त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणा: प्रतिष्ठता:।
शिव: स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापति,आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा: सपैतृका:।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यत: कामफ़लप्रदा:,त्वत्प्रसादादिमां पूजां कर्तुमीहे जलोद्भव।
सांनिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा।
नमो नमस्ते स्फ़टिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमंगलाय,सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते।
ऊँ अपां पतये वरुणाय नम:।

नमस्कार
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान समर्पयामि। (इस मन्त्र से नमस्कार पूर्वक पुष्प समर्पित करें)

अब हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण कर जल कलश के पास छोडते हुये समस्त पूजन कर्म भगवान वरुणदेव को निवेदित करें-

समर्पण
कृतेन अनेन पूजनेन कलशे वरुनाद्यावाहितदेवता: प्रीयन्तां न मम।

इति 

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शारदीय नवरात्रि 2017 कलश स्थापना का मुर्हत:- 21 सितम्बर 2017 गुरूवार को प्रात 6 बजे से 7 बजकर 30 मिनट तक शुभ का चौघड़िया है इसमें घट स्थापना कर सकते हैं क्यों कि कुछ साधक प्रातः काल घट स्थापना होने तक कुछ भी खाते पीते नहीं है उनको प्रात काल के इस महुर्त में घट स्थापना कर लेनी चाहिये। कुछ साधक अभिजीत मर्हंत में घट स्थापना करना चाहते हैं उनको दोपहर 12 बजे से 12 बजकर 24 मिनट के बीच में घट स्थापना करनी होगी क्यों कि इस दिन 12 बजे से लेकर 1 बजकर 30 मिनट तक लाभ का चौघड़िया है जो लोग दुकानों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों में घट स्थापना करना चाहते हैं उनके लिये भी लाभ के चौघड़िया में घट स्थापना करना उतम है। यहा स्पष्ट रहे कि अभिजित महुर्त 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक है व लाभ का चौघड़िया 12 बजे से लेकर 1 बजकर 30 मिनट तक माना गया है इसलिये 12 बजे से 12 बजकर 24 मिनट का समय ऐसा है कि उसमें लाभ का चौघड़िया एवम अभिजित मर्हुत दोनो ही है। प्रतिपदा तिथि – घटस्थापना , श्री शैलपुत्री पूजा द्वितीया तिथि – श्री ब्रह्मचारिणी पूजा तृतीय तिथि – श्री चंद्रघंटा पूजा चतुर्थी तिथि – श्री कुष्मांडा पूजा पंचमी तिथि – श्री स्कन्दमाता पूजा षष्ठी तिथि – श्री कात्यायनि पूजा सप्तमी तिथि – श्री कालरात्रि पूजा अष्टमी तिथि – श्री महागौरी पूजा , महा अष्टमी पूजा , सरस्वती पूजा नवमी तिथि – चैत्र नवरात्रा – राम नवमी , शारदीय नवरात्रा – श्री सिद्धिदात्री पूजा , महानवमी पूजा , आयुध पूजानवरात्री में घट स्थापना का बहुत महत्त्व होता है। नवरात्री की शुरुआत घट स्थापना से की जाती है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित किया जाता है। घट स्थापना प्रतिपदा तिथि के पहले एक तिहाई हिस्से में कर लेनी चाहिए। इसे कलश स्थापना भी कहते है। कलश को सुख समृद्धि , ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु , गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है। इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है। घट स्थापना की सामग्री – Ghat Sthapna Samagri — जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र। यह वेदी कहलाती है। — जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी जिसमे कंकर आदि ना हो। — पात्र में बोने के लिए जौ ( गेहूं भी ले सकते है ) — घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश ( सोने, चांदी या तांबे का कलश भी ले सकते है ) — कलश में भरने के लिए शुद्ध जल — गंगाजल — रोली , मौली — इत्र — पूजा में काम आने वाली साबुत सुपारी — दूर्वा — कलश में रखने के लिए सिक्का ( किसी भी प्रकार का कुछ लोग चांदी या सोने का सिक्का भी रखते है ) — पंचरत्न ( हीरा , नीलम , पन्ना , माणक और मोती ) — पीपल , बरगद , जामुन , अशोक और आम के पत्ते ( सभी ना मिल पायें तो कोई भी दो प्रकार के पत्ते ले सकते है ) — कलश ढकने के लिए ढक्कन ( मिट्टी का या तांबे का ) — ढक्कन में रखने के लिए साबुत चावल — नारियल — लाल कपडा — फूल माला — फल तथा मिठाई — दीपक , धूप , अगरबत्ती घट स्थापना की विधि – Ghat Sthapna Vidhi सबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें जिसमे कलश रखने के बाद भी आस पास जगह रहे। यह पात्र मिट्टी की थाली जैसा कुछ हो तो श्रेष्ठ होता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी शुद्ध होनी चाहिए । पात्र के बीच में कलश रखने की जगह छोड़कर बीज डाल दें। फिर एक परत मिटटी की बिछा दें। एक बार फिर जौ डालें। फिर से मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल का छिड़काव करें। कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनायें। कलश के गले में मौली बांधें। अब कलश को थोड़े गंगा जल और शुद्ध जल से पूरा भर दें। कलश में साबुत सुपारी , फूल और दूर्वा डालें। कलश में इत्र , पंचरत्न तथा सिक्का डालें। अब कलश में पांचों प्रकार के पत्ते डालें। कुछ पत्ते थोड़े बाहर दिखाई दें इस प्रकार लगाएँ। चारों तरफ पत्ते लगाकर ढ़क्कन लगा दें। इस ढ़क्कन में अक्षत यानि साबुत चावल भर दें। नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर मौली बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुँह आपकी तरफ होना चाहिए। यदि नारियल का मुँह ऊपर की तरफ हो तो उसे रोग बढ़ाने वाला माना जाता है। नीचे की तरफ हो तो शत्रु बढ़ाने वाला मानते है , पूर्व की और हो तो धन को नष्ट करने वाला मानते है। नारियल का मुंह वह होता है जहाँ से वह पेड़ से जुड़ा होता है । अब यह कलश जौ उगाने के लिए तैयार किये गये पात्र के बीच में रख दें। अब देवी देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें कि ” हे समस्त देवी देवता आप सभी नौ दिन के लिए कृपया कलश में विराजमान हों “। आह्वान करने के बाद ये मानते हुए कि सभी देवता गण कलश में विराजमान है। कलश की पूजा करें। कलश को टीका करें , अक्षत चढ़ाएं , फूल माला अर्पित करें , इत्र अर्पित करें , नैवेद्य यानि फल मिठाई आदि अर्पित करें। घट स्थापना या कलश स्थापना के बाद देवी माँ की चौकी स्थापित करें।देवी माँ की चौकी की स्थापना और पूजा विधि – Choki Sthapna Vidhi लकड़ी की एक चौकी को गंगाजल और शुद्ध जल से धोकर पवित्र करें। साफ कपड़े से पोंछ कर उस पर लाल कपड़ा बिछा दें। इसे कलश के दायी तरफ रखें। चौकी पर माँ दुर्गा की मूर्ति अथवा फ्रेम युक्त फोटो रखें। माँ को चुनरी ओढ़ाएँ। धूप , दीपक आदि जलाएँ। नौ दिन तक जलने वाली माता की अखंड ज्योत जलाएँ। देवी मां को तिलक लगाए । माँ दुर्गा को वस्त्र, चंदन, सुहाग के सामान यानि हलदी, कुमकुम, सिंदूर, अष्टगंध आदि अर्पित करें । काजल लगाएँ । मंगलसूत्र, हरी चूडियां , फूल माला , इत्र , फल , मिठाई आदि अर्पित करें। श्रद्धानुसार दुर्गा सप्तशती के पाठ , देवी माँ के स्रोत , सहस्रनाम आदि का पाठ करें। देवी माँ की आरती करें। पूजन के उपरांत वेदी पर बोए अनाज पर जल छिड़कें। रोजाना देवी माँ का पूजन करें तथा जौ वाले पात्र में जल का हल्का छिड़काव करें। जल बहुत अधिक या कम ना छिड़के । जल इतना हो कि जौ अंकुरित हो सके। ये अंकुरित जौ शुभ माने जाते है। । यदि इनमे से किसी अंकुर का रंग सफ़ेद हो तो उसे बहुत अच्छा माना जाता है। यह दुर्लभ होता है।नवरात्री के व्रत उपवास – Navratri Vrat Upvas नवरात्री में लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी माँ की भक्ति करते है। कुछ लोग पलंग के ऊपर नहीं सोते। कुछ लोग शेव नहीं करते , कुछ नाखुन नहीं काटते। इस समय नौ दिन तक व्रत , उपवास रखने का बहुत महत्त्व है। अपनी श्रद्धानुसार एक समय भोजन और एक समय फलाहार करके या दोनों समय फलाहार करके उपवास किया जाता है। इससे सिर्फ आध्यात्मिक बल ही प्राप्त नहीं होता , पाचन तंत्र भी मजबूत होता है तथा मेटाबोलिज्म में जबरदस्त सुधार आता है। व्रत के समय अंडा , मांस , शराब , प्याज , लहसुन , मसूर दाल , हींग , राई , मेथी दाना आदि वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसके अलावा सादा नमक के बजाय सेंधा नमक काम में लेना चाहिए। नवरात्री में कन्या पूजन – Navratri Kanya Poojan महाअष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। कुछ लोग अष्टमी के दिन और कुछ नवमी के दिन कन्या पूजन करते है। परिवार की रीति के अनुसार किसी भी दिन कन्या पूजन किया जा सकता है। तीन साल से नौ साल तक आयु की कन्याओं को तथा साथ ही एक लांगुरिया (छोटा लड़का ) को खीर , पूरी , हलवा , चने की सब्जी आदि खिलाये जाते है। कन्याओं को तिलक करके , हाथ में मौली बांधकर, गिफ्ट दक्षिणा आदि देकर आशीर्वाद लिया जाता है , फिर उन्हें विदा किया जाता है। महानवमी और विसर्जन – Maha Navmi Visarjan महानवमी के दिन माँ का विशेष पूजन करके पुन: पधारने का आवाहन कर, स्वस्थान विदा होने के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश के जल का छिड़काव परिवार के सदस्यों पर और पूरे घर में किया जाता है। ताकि घर का प्रत्येक स्थान पवित्र हो जाये। अनाज के कुछ अंकुर माँ के पूजन के समय चढ़ाये जाते है। कुछ अंकुर दैनिक पूजा स्थल पर रखे जाते है , शेष अंकुरों को बहते पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है। कुछ लोग इन अंकुर को शमीपूजन के समय शमी वृक्ष को अर्पित करते हैं और लौटते समय इनमें से कुछ अंकुर केश में धारण करते हैं ।
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हिंदू धर्म में शक्ति की देवी मां दुर्गा की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल दिन मंगलवार से प्रारंभ हो रहा हैं। हिंदू पंचांग में चैत्र मास को हिंदू नववर्ष का प्रथम मास माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाती है और मां दुर्गा के भक्त इस दिन पूरी आस्था के साथ घटस्थापना और जवारे बो कर नौ दिनों तक श्रद्धापूर्वक माता की पूजा करते हैं। नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां भगवती के एक स्वरुप (श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री) की पूजा की जाती है । यह क्रम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रात: काल शुरू होता है । सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है । आइए जानते हैं कैसे करते हैं घट स्थापना- घटस्थापना शुभ मुहूर्त: घटस्थापना मुहूर्त – सुबह 05:58 से 10:14 Am तक घटस्थापना का अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11:56 Am से 12:47 Pm घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – अप्रैल 12, 2021 को 08:00 Am प्रतिपदा तिथि समाप्त – अप्रैल 13, 2021 को 10:16 Am घट स्थापना करना अर्थात नवरात्रि की कालावधि में ब्रह्मांड में कार्यरत शक्ति तत्त्व का घट में आवाहन कर उसे कार्यरत करें। कार्यरत शक्ति तत्त्व के कारण वास्तु में विद्यमान कष्टदायक तरंगें नष्ट हो जाती हैं । सामग्री: जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र जौ बोने के लिए शुद्ध साफ की हुई मिटटी पात्र में बोने के लिए जौ घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल मोली (Sacred Thread) इत्र साबुत सुपारी दूर्वा कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के पंचरत्न अशोक या आम के 5 पत्ते कलश ढकने के लिए ढक्कन ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल पानी वाला नारियल नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपड़ा फूल माला विधि सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें । इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं । अब एक परत जौ की बिछाएं । इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं । अब फिर एक परत जौ की बिछाएं । जौ के बीज चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे । इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं । अब कलश के कंठ पर मोली बांध दें । कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें । कलश में साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल डालें । कलश में थोड़ा सा इत्र डाल दें । कलश में पंचरत्न डालें । कलश में कुछ सिक्के रख दें । कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें । अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें । ढक्कन में चावल भर दें । इसके बाद नारियल पर लाल कपड़ा लपेट कर मोली लपेट दें । अब नारियल को कलश पर रखें । शास्त्रों में उल्लेख मिलता है: “अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय,ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृध्यै। प्राचीमुखं वित विनाशनाय,तस्तमात् शुभं संमुख्यं नारीकेलं”। अर्थात् नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है । नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है । इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहें । ध्यान रहे कि नारियल का मुख उस सिरे पर होता है, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है । अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचों बीच रख दें । अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें । "हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इस में पधारें ।" अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें । धूपबत्ती कलश को दिखाएं । कलश को माला अर्पित करें । कलश को फल मिठाई अर्पित करके कलश को इत्र समर्पित करें । कलश स्थापना के साथ ही भक्त मां की पूजा-अर्चना प्रारंभ कर देता है । घटस्थापना का महत्व नवरात्रि में घटस्थापना का विशेष महत्व होता है। ये नवरात्रि का पहला दिन होता है और इस दिन से नवरात्रि का आरंभ होता है सनातन धर्म में किसी शुभ कार्य को करने से पहले कलश स्थापना करना शुभ माना जाता है और इसी कलश को शास्त्रों में भगवान गणेश की संज्ञा दी गई है। इस लिए हर पूजा या मंगल कार्य की शुरुआत सर्वप्रथम गणेश जी की वंदना से की जाती है, जिसमें कलश की स्थापना पूरे विधि-विधान करने के बाद ही कोई शुभ कार्य किया जाता है। चैत्र नवरात्रि शक्ति देवी मां दुर्गा का पर्व है। नौ दिनों तक अलग-अलग माताओं की पूजन विभिन्न तरीको से जैसे – अखंड दीप साधना, व्रत उपवास, दुर्गा सप्तशती व नवार्ण मंत्र का जाप करें। अष्टमी को हवन व नवमी को नौ कन्याओं का पूजन करें।
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शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते है. नवरात्रि में देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है. इन नौ दिनों में भक्तों नियमों के साथ मां की पूजा करते हैं. इसबार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ेगी, जिसके कारण नवरात्र में देवी आराधना के लिए पूरे 9 दिन मिलेंगे. प्रतिपदा तिथि को माता के प्रथम स्वरूप शैल पुत्री के साथ ही कलश स्थापना के लिए भी अति महत्त्वपूर्ण दिन होता है. कलश स्थापना या कोई भी शुभ कार्य शुभ समय एवं तिथि में किया जाना शुभ माना जाता है, इसलिए इस दिन कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. नवरात्र के 9 दिनों में मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और हर स्वरूप सौभाग्य का प्रतीक होता है. इन शुभ दिनों में मां की हर रोज पूजा की जाती है और ज्यादातर लोग 9 दिन का व्रत भी रखते हैं. वैसे तो मां को श्रद्धा भाव से लगाए गए हर भोग को ग्रहण करती हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में मां के हर स्वरूप का अलग भोग लगता है. कलश स्था‍पना की तिथि और शुभ मुहूर्त कलश स्था‍पना की तिथि: 17 अक्टूबर 2020 कलश स्था‍पना का शुभ मुहूर्त: 17 अक्टूबर 2020 को सुबह 06 बजकर 23 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक। कुल अवधि: 03 घंटे 49 मिनट अभिजीत मुहूर्त सभी शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम होता है। जो मध्यान्ह 11:43 से 12:29 तक होगा। शुभ का चौघड़िया सुबह 07:49 से 09:14 तक होगा जिसने कलश स्थापना की जा सकती है स्थिर लग्न कुम्भ दोपहर 2:30 से 3:55 तक होगा, साथ ही शुभ चौघड़िया भी इस समय प्राप्त होगी, अतः यह अवधि कलश स्थापना हेतु अतिउत्तम है। जानिए कैसे करें नवरात्रि पर कलश पूजन सभी प्राचीन ग्रंथों में पूजन के समय कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. सभी मांगलिक कार्यों में कलश अनिवार्य पात्र है. दुर्गा पूजन में कलश की स्थापना करने के लिए कलश पर रोली से स्वास्तिक और त्रिशूल अंकित करना चाहिए और फिर कलश के गले पर मौली लपेट दें. जिस स्थान पर कलश स्थापित किया जाता है पहले उस स्थान पर रोली और कुमकुम से अष्टदल कमल बनाकर पृथ्वी का स्पर्श करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- ओम भूरसि रस्यादितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धात्रीं। पृथिवीं यच्छ पृथिवी दृह पृथ्वीं माहिसीः।। ओम आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्तिवन्दवः। पुनरूर्जानि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।
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