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जन्म कुण्डली में बनें अनफा-सुनफा योग कैसे दिलाते है, समाज में प्रसिद्धि

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अनफा और सुनफा योग। ये दोनों ही योग जातक की कुंडली में चंद्र की मजबूत स्थिति के कारण बनते हैं। यदि कुंडली में चंद्र कमजोर है तो राजयोग जैसे शुभ योग होते हुए भी उनका फल नहीं मिल पाता। यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में चंद्र से ठीक अगले भाव में सूर्य को छोड़कर कोई भी ग्रह मौजूद हो और चंद्र मजबूत स्थिति में तथा किसी पाप ग्रहों से युक्त न हों तो सुनफा योग बनता है। लेकिन यह योग तभी बनता है जब चंद्र से अगले घर में मौजूद ग्रह शुभ हो। यदि एक शुभ तथा दूसरा अशुभ ग्रह हो तो योग मध्यम स्तर का होता है तथा यदि दोनों अशुभ ग्रह हों तो सुनफा योग बेहद खराब स्तर का होता है और उसका अनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं हो पाता है। सुनफा योग वाला व्यक्ति देश के प्रतिष्ठित और बड़े सरकारी पदों पर पहुंचता है। यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में चंद्र से ठीक एक घर पीछे सूर्य को छोड़कर कोई शुभ ग्रह मौजूद हो तो अनफा योग बनता है। इसमें भी शर्त यही है कि चंद्र की स्थिति मजबूत होनी चाहिए। जिन जातक की कुंडली में अनफा योग होता है वे बेहद शांत और उदार प्रकृति के होते हैं। ललित कलाओं में विशेष सफलता और सम्मान अर्जित करते हैं। इनके मन में प्रारंभ से ही वैराग्य की भावना होती है और जीवन के उत्तरार्ध में सन्यास जैसी अवस्था तक पहुंच जाते हैं।इन दोनों ही योग में सूर्य के साथ राहु-केतु का विचार नहीं किया जाता है। यानी ये तीनों ग्रह हों तो अनफा-सुनफा योग नहीं बनता है। जिन लोगों की कुंडली में ये योग होते है वह अपने जीवन में उच्च पदों तक पहुंचते है। उनकी यश-कीर्ति चारों दिशाओं में फैलती हैं। धनी-समृद्ध होता है और समाज का नेतृत्वकर्ता होता है।

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जन्म कुण्डली में बनें अनफा-सुनफा योग कैसे दिलाते है, समाज में प्रसिद्धि
posted Dec 30, 2019 by Deepika Maheshwary

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कब बनता है कुंडली में ग्रह मारकेश, अष्टम द्वादश सिद्धांत, 8th to 12th Theory in Horoscope जन्म कुण्डली द्वारा मारकेश का विचार करने के लिए कुण्डली के दूसरे भाव, सातवें भाव, बारहवें भाव, अष्टम भाव आदि को समझना आवश्यक होता है. जन्म कुण्डली के आठवें भाव से आयु का विचार किया जाता है. लघु पाराशरी के अनुसार से तीसरे स्थान को भी आयु स्थान कहा गया है क्योंकि यह आठवें से आठवा भाव है (अष्टम स्थान से जो अष्टम स्थान अर्थात लग्न से तृतीय स्थान आयु स्थान है) और सप्तम तथा द्वितीय स्थान को मृत्यु स्थान या मारक स्थान कहते हैं इसमें से दूसरा भाव प्रबल मारक कहलाता है. बारहवां भाव व्यय भाव कहा जाता है, व्यय का अर्थ है खर्च होना, हानि होना क्योंकि कोई भी रोग शरीर की शक्ति अथवा जीवन शक्ति को कमजोर करने वाला होता है,इसलिये बारहवें भाव से रोगों का विचार किया जाता है. इस कारण इसका विचार करना भी जरूरी होता है. मारकेश की दशा में व्यक्ति को सावधान रहना जरूरी होता है क्योंकि इस समय जातक को अनेक प्रकार की मानसिक, शारीरिक परेशनियां हो सकती हैं. इस दशा समय में दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. जातक के जीवन में मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा आती ही हैं. लेकिन इससे डरने की आवश्यकता नहीं बल्कि स्वयं पर नियंत्रण व सहनशक्ति तथा ध्यान से कार्य को करने की ओर उन्मुख रहना चाहिए.
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वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक योग का निर्माण किसी भी कुंडली में उस स्थिति में होता है, जब एक ही भाव में मंगल ग्रह के साथ राहु अथवा केतु उपस्थित हों। इसके अलावा, यदि मंगल का दृष्टि सम्बन्ध भी राहु अथवा केतु से हो रहा हो तो भी इस योग का निर्माण हो सकता है। आमतौर पर अंगारक योग को एक बुरा और अशुभ योग माना जाता है और इससे जीवन में समस्याओं की बढ़ोतरी होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक दोष बुरे योगों में सम्मिलित किया गया है। अंगारक की प्रकृति से समझें तो अंगारे जैसा फल देने वाला योग बनता है। यह जिस भी भाव में बनता है, उस भाव के कारकत्वों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन आते हैं, और उसमें गुस्से की अधिकता हो सकती है। यह योग व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है और वह अपने क्रोध तथा दुर्घटना आदि के कारण समस्याओं को निमंत्रण देता है। मंगल को भाई का कारक कहा जाता है, इसलिए इस योग के प्रभाव से कई बार व्यक्ति की अपने भाइयों से नहीं बनती तथा दुर्घटना होने की संभावना रहती है। इस प्रकार के योग वाले व्यक्तियों पर शत्रुओं का प्रभाव भी अधिक पड़ता है और वे मानसिक तनाव में बने रहते हैं। किसी योग्य विद्वान से अंगारक योग निवारण पूजा कराना सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इससे ग्रह शांत हो जाते हैं और उनके नकारात्मक प्रभाव कम हो जाते हैं। मंगल राहु अंगारक योग अथवा मंगल केतु अंगारक योग उपाय के रूप में इन ग्रहों की शांति मंत्र जाप तथा हवन द्वारा कराना भी उत्तम परिणाम देता है। -मंगल केतु अंगारक योग उपाय के रूप में मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में लाल रंग का झंडा लगाना चाहिये। -अंगारक योग निवारण के लिए माता महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए और यह पूजा तब करनी चाहिए, जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में स्थित हो। -मंगलवार के दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय की आराधना करने से भी अंगारक दोष से मुक्ति मिलती है। -अंगारक योग निवारण के लिए आप बजरंग बाण का नियमित पाठ कर सकते हैं और हनुमान जी को चोला चढ़ा सकते हैं। -यदि मंगल और राहु दोनों ही अशुभ परिणाम दे रहे हों तो मंगल और राहु का दान करना चाहिए। -अपने शरीर पर चाँदी धारण करें क्योंकि इससे इन दोनों ही ग्रहों को शांत करने में मदद मिलती है। -समय-समय पर अपने भाइयों की मदद करें और अपने ससुराल पक्ष से अपने संबंध सुधारें। -राह के कुत्तों को मीठी रोटी खिलानी चाहिए। -अंगारक योग का उपाय यह भी है कि आप अपने दाहिने हाथ में तांबे का कंगन पहनें और ॐ अं अंगारकाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें। -आप रात को सोते समय अपने सिरहाने या तकिए के निकट तांबे के जग अथवा लोटे में पानी भर कर रखें और सुबह किसी काँटे वाले पौधे या कैक्टस में इस पानी को डाल दें। -अनामिका उंगली में मंगलवार के दिन तांबे की अंगूठी पहनना भी अच्छा परिणाम देता है।
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