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कब और कैसे मनाई जाएगी मकर सक्रांति ,मकर संक्रांति का महत्व

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इस वर्ष 15 जनवरी 2020 को मकर सक्रांति का पावन पर्व मनाया जाएगा, सबसे पहले जानते हैं कि सक्रांति होती क्या है और उसमें भी मकर सक्रांति किसे कहते हैं सूर्य का किसी विशेष राशि में जाना या गोचर करना सक्रांति कहलाता है जब सूर्य किसी खास राशि में भ्रमण करते हैं तो उसे सक्रांति कहते हैं जैसे मेष राशि में जाएंगे तो मेष सक्रांति वृष राशि में सूर्य भ्रमण करेंगे तो उसे वृष सक्रांति कहा जाएगा इसी तरह से जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे तो उसे मकर सक्रांति कहा जाता है सूर्य लगभग 1 महीने तक एक राशि में रहते हैं और 1 महीने के बाद वह दूसरी राशि में गोचर करते हैं और कुल मिलाकर 12 राशियां होती है तो वर्ष में 12 सक्रांति होती है लेकिन सभी सक्रांति मे दो सक्रांतियों का विशेष महत्व होता है उनमें से एक है मकर संक्रांति और एक है कर्क संक्रांति !मकर संक्रांति यानी जब सूर्य मकर राशि में जाते हैं और कर्क सक्रांति को कर्क राशि में जाते हैं , मकर संक्रांति से अग्नि तत्व की शुरुआत होती है यानी मौसम और वातावरण में गर्मी आनी शुरू होती है क्योंकि सूर्य जब 14 और 15 जनवरी के आसपास मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो मौसम में धीरे-धीरे गर्माहट होनी शुरू हो जाती है और अग्नि तत्व का प्रभाव आना शुरू होता है !कर्क संक्रांति है जो तकरीबन जुलाई में आती है उससे जल तत्व की शुरुआत होती है यहां से बरसाती मौसम और धीरे-धीरे सर्दियां शुरू हो जाती है तो जुलाई से कर्क सक्रांति और जनवरी से मकर सक्रांति की शुरुआत होती है इस समय सूर्य उत्तरायण होते हैं सूर्य के पास दो आयन है उत्तरायण और दक्षिणायन सूर्य जुलाई के बाद दक्षिणायन में चले जाते हैं जिसे दैत्यों का समय भी कहा जाता है और जब सूर्य जनवरी के समय मकर सक्रांति में उत्तरायण होते हैं तो उसे देवताओं का समय कहा जाता है उत्तरायण सूर्य को बेहद शुभ माना जाता है ! हम अपने पर्व और त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार बनाते हैं जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे तभी मकर सक्रांति मानी जाएगी 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाए जाने के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि इस साल सूर्य का मकर राशि में आगमन 14 जनवरी मंगलवार की मध्य रात्रि के बाद रात 2 बजकर 7 मिनट पर हो रहा है। मध्य रात्रि के बाद संक्रांति होने की वजह से इसके पुण्य काल का विचार अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर दोपहर तक होगा।इस लिये मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाना ज्यादा बेहतर होगा! मकर सक्रांति और ज्योतिषीय महत्व अब जानेंगे कि मकर सक्रांति का ज्योतिष से क्या संबंध है ज्योतिष शास्त्र मे सूर्य और शनि का संबंध इस पर्व से होने से यह पर्व काफी महत्वपूर्ण है ऐसा माना जाता है कि सूर्य इस त्यौहार पर अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए आते हैं क्योंकि मकर राशि शनिदेव की है इसके अलावा शुक्र मकर सक्रांति पर उदय हो जाते हैं शुभ कार्य की शुरुआत हो जाती है मकर सक्रांति एक ऐसा दिन है जिस दिन उपायों द्वारा सूर्य और शनि के बुरे प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है मकर सक्रांति पर नया अनाज भी आता है और उस नए अनाज से से नवग्रह की पूजा की जाती है जिससे कि पारिवारिक शांति बनी रहे इस तरह मकर सक्रांति सूर्य और शनि दोनों की कृपा प्राप्त करने का दिन है मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं इसलिए बहुत खास माना जाता है भीष्म पितामह जब बाणों की शैया पर लेटे हुए थे उन्होंने भी इस चीज को बहुत ध्यान में रखते हुए दक्षिणायन सूर्य में अपना शरीर नहीं त्यागा जैसे ही सूर्य उत्तरायण हुए तभी अपने शरीर का त्याग किया उत्तरायण सूर्य की महत्ता काफी बढ़ जाती है और यही कारण है कि इस दिन के लिए दान पुण्य का बहुत महत्व माना जाता है भारत में मकर संक्रांति का बहुत गहरा धार्मिक महत्व है। इसके अलावा ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों को पराजित किया था। कहा जाता है कि भगवान ने असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। ऐसे में इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी मानाया जाता है। क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है।ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नहीं है, क्योंकि दोनों आपस में शत्रु का भाव रखते हैं लेकिन इस दिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते हैं। इसलिए इस त्यौहार के पीछे पिता-पुत्र के संबंधों को भी माना जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार गंगा को महाराज भगीरथ ने इस दिन अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए इस दिन गंगा में स्नान करने को पवित्र समझा जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से व्यक्ति का पुण्य प्रभाव हजार गुना बढ़ जाता है। इस दिन से मलमास खत्म होने के साथ शुभ माह प्रारंभ हो जाता है। इस खास दिन को सुख और समृद्धि का दिन माना जाता है।मकर संक्राति के दिन विशेष रूप से गंगा स्नान का महत्व है। उत्तर प्रदेश और उससे सटे राज्यों में इसे खिचड़ी' भी कहते हैं। इस दिन पवित्र नदियों में डुबकी लेना सबसे शुभ माना जाता है। कहते हैं कि इस अवसर पर गंगा स्नान करने से इंसान के सारे पाप धुल जाते हैं। वैसे तो इस मौके पर पूरे देश में मेला लगता है लेकिन प्रयागराज (इलाहाबाद) में इस दौरान एक महीना माघ मेला चलता है। हर साल गंगा सागर में एक बहुत बड़ा मेला आयोजित किया जाता है। पुराणों में मकर संक्रान्ति का काफी विस्तार से वर्णन मिलता है। पौराणिक विवरण के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का एक दिन एवं दक्षिणायन एक रात्रि मानी जाती है। मकर सक्रांति के दिन आपको दो ग्रहों का वरदान मिल सकता है सूर्य और सूर्य पुत्र शनि से लाभ पाने के लिए विशेष चीजों से विशेष प्रयोग किए जाएं तो शुभ फल मिलेगा मकर सक्रांति पर किए जाने वाले शुभ कर्मों में सबसे पहले प्रात काल स्नान कर लेना चाहिए 1. तांबे के पात्र में पानी भरकर लाल फूल, अक्षत, कुमकुम डालकरी सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए और सूर्य के बीज मंत्र का 108 बार जप कीजिए( ओम घृणि सूर्याय नमः) 2. श्रीमद्भागवत के 1 अध्याय का पाठ करें गीता का पाठ करें और अगर पूरी गीता का पाठ नहीं कर पाते तो गीता के 11 अध्याय का पाठ करें 3. नई अनाज का खासतौर से दाल ,चावल का खिचड़ी, तिल, गुड, तांबा ,लाल वस्त्र ,कंबल का ,मोटे कपड़ों का और शुद्ध देसी घी, गेहूं का दान किसी निर्धन व्यक्ति को इस दिन जरूर करें 4. भोजन में नए अनाज, काली दाल व चावल की खिचड़ी बनाएं प्याज लहसुन आदि का प्रयोग ना करें सात्विक भोजन बनाए भगवान को भोग लगाएं और इसके बाद इसको प्रसाद रूप में ग्रहण करें और अपने घर में परिवार में बांटे तो आपके लिए बहुत शुभ होगा 5. लोहे के बर्तन में या कटोरी में काले तिल रखकर 108 बार ओम शं शनिश्चराय नमः मंत्र का जाप करके उसे निर्धन व्यक्ति को दान कर दीजिए इस उपाय से शनि से मिल रही पीड़ा से मुक्ति मिलेगी अगर तिल और गुड़ के लड्डू या मिठाई किसी गरीब को दी जाए तो आपकी कुंडली की खराब सूर्य और शनि बेहतर हो जाते हैं 6. मकर सक्रांति पर नये अनाज की खिचड़ी खाने से पूरे वर्ष आरोग्य की प्राप्ति होती है खिचड़ी खाने से व बाटंने से आपके सारे ग्रह मजबूत होते हैं सूर्य अगर कुंडली में खराब है तो शाम को अन्न का सेवन नहीं करना चाहिएयह सब उपाय करने से कुंडली के बिगड़े हुए सूर्य निश्चित रूप से बेहतर होगा सूर्य देव की कृपा बरसेगी और शुभ फल मिलेगा
posted Jan 14 by Deepika Maheshwary

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मकर संक्रांति का महत्व- आज के दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाते हैं। उत्तरायण में सूर्य रहने के समय को शुभ समय माना जाता है और मांगलिक कार्य आसानी से किए जाते हैं। चूंकि पृथ्वी दो गोलार्धों में बंटी हुई है ऐसे में जब सूर्य का झुकाव दाक्षिणी गोलार्ध की ओर होता है तो इस स्थिति को दक्षिणायन कहते हैं और सूर्य जब उत्तरी गोलार्ध की ओर झुका होता है तो सूर्य की इस स्थिति को उत्तरायण कहते हैं। इसके साथ ही 12 राशियां होती हैं जिनमें सूर्य पूरे साल एक-एक माह के लिए रहते हैं। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे मकर संक्रांति कहते है मकर संक्रांति का पर्व इस बार यानी साल 2019 में 14 जनवरी की बजाए 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। 15 जनवरी से पंचक, खरमास और अशुभ समय समाप्त हो जाएगा और विवाह, ग्रह प्रवेश आदि के शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे। 15 जनवरी यानी मकर संक्रांति के दिन ही प्रयागराज में चल रहे कुंभ महोत्सव का पहला शाही स्नान होगा। शाही स्नान के साथ ही देश विदेश के श्रद्धालु कुंभ के पवित्र त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाना शुरू कर देंगे। मकर संक्रांति के पर्व को देश में माघी, पोंगल, उत्तरायण, खिचड़ी और बड़ी संक्रांति आदि नामों से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही गुजरात में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्वस मनाया जाता है। जानें मकर संक्रांति का मुहूर्त, पूजा विधि और अन्य खास बातें- मकर संक्रांति शुभ मुहूर्त- पुण्य काल मुहूर्त - 07:14 से 12:36 तक (15 जनवरी 2019) महापुण्य काल मुहूर्त - 07:14 से 09:01 तक (15 जनवरी 2019 को) मकर संक्रांति पूजा विधि- मकर संक्रांति के दिन सुबह किसी नदी, तालाब, शुद्ध जलाशय में स्नान करें। इसके बाद नए या साफ वस्त्र पहनकर सूर्य देवता की पूजा करें। इसके बाद ब्राह्मणों, गरीबों को दान करें। इस दिन दान में आटा, दाल, चावल, खिचड़ी और तिल के लड्डू विशेष रूप से लोगों को दिए जाते हैं। इसके बाद घर में प्रसाद ग्रहण करने से पहले आग में थोड़ी सा गुड़ और तिल डालें और अग्नि देवता को प्रणाम करें। मकर संक्रांति पूजा मंत्र ऊं सूर्याय नम: ऊं आदित्याय नम: ऊं सप्तार्चिषे नम: मकर संक्रांति का वैज्ञानिक आधार • तिल के लड्डू में बड़ी मात्रा में गुड फैट पाया जाता है जो हृदय, स्किन और बालों के लिए है फायदेमंद होता है। • एंटीऑक्सीडेंट्स सर्दियों में रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। इसके साथ ही एनीमिया को दूर करने के लिए आयरन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। • तिल में तेल की प्रचुरता रहती है, इसके साथ ही गुड़ की तासीर भी गर्म मानी जाती है। तिल और गुड़ को मिलाकर जो खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं उनकी वजह से हमारी शरीर को जरूरत के हिसाब से गर्मी मिलती रहती है। • ठंड के कारण पाचन शक्ति भी मंद हो जाती है। तिल में पर्याप्त मात्रा में फाइबर होता है, जो पाचन शक्ति को बढ़ाता है। • तिल में कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्प्लेक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्व पाये जाते हैं, जो इस मौसम में शरीर के लिए जरूरी होते हैं। • गुड़ मैग्नीशियम का एक बेहीतरीन स्रोत है। ठंड में शरीर को इस तत्व की बहुत आश्यकता होती है। • मकर संक्रांति के समय नदियों में वाष्पन क्रिया होती है। इससे तमाम तरह के रोग दूर हो सकते हैं।
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आमतौर पर हमारे देश में हर विशेष दिन कुछ न कुछ दान करने की परंपरा रही है। महाभारत के एक दृष्टांत में कहा गया है कि माघ मास के दिनों में अनेक तीर्थों का समागम होता है, वहीं पद्मपुराण में कहा गया है कि अन्य मास में जप, तप और दान से भगवान विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वे माघ मास में स्नान करने से होते हैं। यही वजह है कि प्राचीन ग्रंथों में नारायण को पाने का सुगम मार्ग माघ मास के पुण्य स्नान को बताया गया है, विशेषकर आज के दिन गंगा स्नान का खास महत्व माना गया है। * माघ मास में पवित्र नदियों में स्नान करने से एक विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है। * अमावस्या के दिन जप-तप, ध्यान-पूजन करने से विशेष धर्मलाभ प्राप्त होता है। * मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर आचरण तथा स्नान-दान करने का विशेष महत्व है। * शास्त्रों के अनुसार माघ मास में पूजन-अर्चन व नदी स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है तथा इन दिनों नदी में स्नान करने से स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग मिल जाता है। * जो लोग घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करना चाहिए। * इस दिन सूर्यनारायण को अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होती है। * जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, व गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी। * आज के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें। * इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है। * इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। क्या करें दान :- मौनी अमावस्या के दिन तेल, तिल, सूखी लकड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, काले कपड़े, जूते दान करने का विशेष महत्व है। वहीं जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा नीच ग्रह का है तो उन्हें दूध, चावल, खीर, मिश्री, बताशा दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी।
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चन्द्र और चन्द्र लग्न का महत्व:::- ----------------------------------------- दक्षिण भारत को छोड़कर पूरे भारत में प्रत्येक जन्मपत्री में दो लग्न बनाये जाते हैं। एक जन्म लग्न और दूसरा चन्द्र लग्न। जन्म लग्न को देह समझा जाये तो चन्द्र लग्न मन है। बिना मन के देह का कोई अस्तित्व नहीं होता और बिना देह के मन का कोई स्थान नहीं है। देह और मन हर प्राणी के लिए आवश्यक है इसीलिये लग्न और चन्द्र दोनों की स्थिति देखना ज्योतिष शास्त्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। सूर्य लग्न का अपना महत्व है। वह आत्मा की स्थिति को दर्शाता है। मन और देह दोनों का विनाश हो जाता है परन्तु आत्मा अमर है। चन्द्र ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। परन्तु इसकी गति ग्रहों में सबसे अधिक है। शनि एक राशि को पार करने के लिए ढ़ाई वर्ष लेता है, बृहस्पति लगभग एक वर्ष, राहू लगभग १४ महीने और चन्द्रमा सवा दो दिन - कितना अंतर है। चन्द्रमा की तीव्र गति और इसके प्रभावशाली होने के कारण किस समय क्या घटना होगी, चन्द्र से ही पता चलता है। विंशोत्तरी दशा, योगिनी दशा, अष्टोतरी दशा आदि यह सभी दशाएं चन्द्र की गति से ही बनती है। चन्द्र जिस नक्षत्र के स्वामी से ही दशा का आरम्भ होता है। अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक की दशा केतु से आरम्भ होती है क्योंकि अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु है। इस प्रकार जब चन्द्र भरणी नक्षत्र में हो तो व्यक्ति शुक्र दशा से अपना जीवन आरम्भ करता है क्योंकि भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। अशुभ और शुभ समय को देखने के लिए दशा, अन्तर्दशा और प्रत्यंतर दशा देखी जाती है। यह सब चन्द्र से ही निकाली जाती है। ग्रहों की स्थिति निरंतर हर समय बदलती रहती है। ग्रहों की बदलती स्थिति का प्रभाव विशेषकर चन्द्र कुंडली से ही देखा जाता है। जैसे शनि चलत में चन्द्र से तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो शुभ फल देता है और दुसरे भावों में हानिकारक होता है। बृहस्पति चलत में चन्द्र लग्न से दूसरे, पाँचवे, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देता है और दूसरे भावों में इसका फल शुभ नहीं होता। इसी प्रकार सब ग्रहों का चलत में शुभ या अशुभ फल देखना के लिए चन्द्र लग्न ही देखा जाता है। कई योग ऐसे होते हैं तो चन्द्र की स्थिति से बनते हैं और उनका फल बहुत प्रभावित होता है। चन्द्र से अगर शुभ ग्रह छः, सात और आठ राशि में हो तो यह एक बहुत ही शुभ स्थिति है। शुभ ग्रह शुक्र, बुध और बृहस्पति माने जाते हैं। यह योग मनुष्य जीवन सुखी, ऐश्वर्या वस्तुओं से भरपूर, शत्रुओं पर विजयी , स्वास्थ्य, लम्बी आयु कई प्रकार से सुखी बनाता है। जब चन्द्र से कोई भी शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बृहस्पति और बुध दसवें भाव में हो तो व्यक्ति दीर्घायु, धनवान और परिवार सहित हर प्रकार से सुखी होता है।चन्द्र से कोई भी ग्रह जब दूसरे या बारहवें भाव में न हो तो वह अशुभ होता है। अगर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि चन्द्र पर न हो तो वह बहुत ही अशुभ होता है। इस प्रकार से चन्द्र की स्थिति से १०८ योग बनते हैं और वह चन्द्र लग्न से ही बहुत ही आसानी के साथ देखे जा सकते हैं। चन्द्र का प्रभाव पृथ्वी, उस पर रहने वाले प्राणियों और पृथ्वी के दूसरे पदार्थों पर बहुत ही प्रभावशाली होता है। चन्द्र के कारण ही समुद्र मैं ज्वारभाटा उत्पन्न होता है। समुद्र पर पूर्णिमा और अमावस्या को २४ घंटे में एक बार चन्द्र का प्रभाव देखने को मिलता है। किस प्रकार से चन्द्र सागर के पानी को ऊपर ले जाता है और फिर नीचे ले आता है। तिथि बदलने के साथ-साथ सागर का उतार चढ़ाव भी बदलता रहता है। प्रत्येक व्यक्ति में ६० प्रतिशत से अधिक पानी होता है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है चन्द्र के बदलने का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता होगा। चन्द्र के बदलने के साथ-साथ किसी पागल व्यक्ति की स्थिति को देख कर इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। चन्द्र साँस की नाड़ी और शरीर में खून का कारक है। चन्द्र की अशुभ स्थिति से व्यक्ति को दमा भी हो सकता है। दमे के लिए वास्तव में वायु की तीनों राशियाँ मिथुन, तुला और कुम्भ इन पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि, राहु और केतु का चन्द्र संपर्क, बुध और चन्द्र की स्थिति यह सब देखने के पश्चात ही निर्णय लिया जा सकता है। चन्द्र माता का कारक है। चन्द्र और सूर्य दोनों राजयोग के कारक होते हैं। इनकी स्थिति शुभ होने से अच्छे पद की प्राप्ति होती है। चन्द्र जब धनी बनाने पर आये तो इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। चन्द्र खाने-पीने के विषय में बहुत प्रभावशाली है। अगर चन्द्र की स्थिति ख़राब हो जाये तो व्यक्ति कई नशीली वस्तुओं का सेवन करने लगता है। जातक पारिजात के आठवें अध्याय के १००वे श्लोक में लिखा है चन्द्र उच्च का वृष राशि का हो तो व व्यक्ति मीठे पदार्थ खाने का इच्छुक होता है।
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मकर लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना आकाश के 270 डिग्री से 300 डिग्री तक के भाग को मकर राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जताक के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न मकर माना जाता है. मकर लग्‍न की कुंडली में में मन का स्‍वामी चंद्रमा सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. सूर्य अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्ठेश होने के नाते माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह संबंधी विषयों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि एकादशेश होने के नाते लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. शुक्र पंचम और दशम भाव का स्‍वामी होता है. पंचमेश होने के कारण यह जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का और दशमेश होने के कारण राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का अधिपति होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. एक केंद्र और त्रिकोण का स्वामित्व मिलने शुक्र मकर लग्न में अति योगकारी होता है. मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. बृहस्‍पति द्वादश भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. शनि प्रथम और द्वितीय भाव का स्‍वामी होता है. यह लग्नेश होने के नाते जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि एवम द्वितीयेश होने के कारण कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. मकर लग्न में राहु नवम भाव का अधिपति होकर जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनकर अति शुभ हो जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में विशेष शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. केतु यहां तॄतीयेश होकर जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.
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आज देशभर में बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जा रहा है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा का विधान बताया गया है। कला, संगीत, शिल्प और ज्ञान-विज्ञान की देवी मां सरस्वती व्यक्ति के जीवन से अज्ञानता का अंधकार दूर कर देती हैं, इसके साथ ही उसके जीवन में नए उत्साह की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि अगर इस दिन पढ़ाई में कमजोर बच्चा मां की आराधना कर ले तो सरस्वती जी की कृपा उनपर बरस जाती है। आइए जानते हैं इस बार कब होगा सरस्वती पूजन और क्या है उसका शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व। सरस्वती पूजन शुभ मुहूर्त :- पूजा मुहूर्त– सुबह 10 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर दोपहर के 12 बजकर 52 मिनट तक पंचमी तिथि प्रारंभ– 29 जनवरी बुधवार सुबह 10 बजकर 25 मिनट से शुरू (मघ शुक्ल पंचमी) पंचमी तिथि खत्म– 30 जनवरी गुरुवार दोपहर 1 बजरकर 19 मिनट तक मां सरस्वती की पूजा विधि :- इस पावन दिन सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान करें। सफेद या पीले कपड़े पहनकर मां सरस्वती के चित्र अथवा मूर्ति को घर की उत्तर पूर्व दिशा में स्थापित करें। इसके साथ ही मां को पीले-सफेद फूल और सफेद चंदन अर्पित करें। फिर माता का ध्यान कर ऊं ऐं सरस्वत्यै नम:मंत्र का 108 बार जाप पूरे करें। फिर मां सरस्वती की आरती करें। तुलसी, दूध, दही और शहद मिलाकर पंचामृत प्रसाद तैयार करें और उससे मां सरस्वती को भोग चढ़ाएं। मां सरस्वती के पूजन का महत्व :- इस दिन मां की पूजा का खास महत्व माना गया है। मां सरस्वती को विद्या की देवी कहा जाता है। मान्यता है कि मां सरस्वती की जिस भी बालक पर कृपा बरस जाए उसकी बुद्धि अन्य बालकों से अलग और बहुत ही तेज होती है। ऐसे छात्र कठिन से कठिन विद्या को भी सरल मानकर जीवन में आगे बढ़ते हैं। खासतौर पर बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की आराधना जरूर करनी चाहिए।
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