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मकरसंक्रांति की शुभकामनाएं

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ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च| हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्। जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम। तमोsरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोsस्मि दिवाकर। भगवान सूर्य का उत्तरायण प्रवेश हो चुका है। उत्तरायण सूर्य आप सभी के लिए मंगलमय हो। सूर्य की रश्मियां से जीवन में व्याप्त अंधकार समाप्त हो ग्रह राज्य सूर्य की कृपा आप सब को प्राप्त हो । राष्ट्र विकास में आप सभी सहभागिता बने। राष्ट्र सेवा और देश सेवा के राष्ट्र के गणक ( ज्योतिर्विद) राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों की अनुपालना करे। हम देश के ज्योतिषीय विकास , आध्यात्मिक मूल्यों का संरक्षण कर सके। *मकरसंक्रांति की शुभकामनाएं* 15 जनवरी 2020
posted Jan 15 by anonymous

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आपको शुक्र ग्रह और महिलाओं से जुड़ी कुछ बातें बताने जा रहे हैं। कुछ विद्वान ज्योतिषियों के अनुसार शुक्र ग्रह को शुभ और रजोगुणी ग्रह माना जाता है। इस ग्रह को जीवन, प्यार, रोमांस और यौन संबंधों का कारक माना जाता है। लेकिन शुक्र ग्रह का महिलाओं से एक गहरा संबंध होता है, इसके बारे में शायद कोई नहीं जानता हो। कहा जाता है कि किसी भी स्त्री की कुंडली में जैसे वृहस्पति ग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वैसे ही शुक्र भी दांपत्य जीवन में प्रमुख भूमिका निभाता है। माना जाता है कि अच्छा चेहरा देखने से कुंडली में शुक्र के होने का पता चल जाता है। यह स्त्री के चेहरे को आकर्षण का केंद्र बनाता है। परंतु ज़रूरी नहीं है कि की स्त्री का रंग गोरा है या सांवला। ज्योतिष के अनुसार सुंदर नेत्र और सुंदर केश यानि बालों से पहचाना जा सकता है स्त्री का शुक्र शुभ ग्रहों के सानिध्य में है। जिस किसी स्त्री कुंडली में शुक्र का अच्छा प्रभाव हो तो उसे जीवन में हर सुख सुविधा प्राप्त होती है, जिसमें वाहन, घर, ज्वेलरी, वस्त्र आदि शामिल हैं। किसी भी वर्ग की औरत हो, उच्च, मध्यम या निम्न उसे अच्छा शुक्र सभी वैभव प्रदान करता ही है। वहीं कुंडली का अच्छा शुक्र स्त्री को गायन, अभिनय, काव्य-लेखन की और प्रेरित करता है। इसके अलावा कहा जाता है कि अगर शुक्र ग्रह चन्द्र के साथ संबंध रखता हो तो ऐसी स्त्री भावुक होती हैं। साथ ही अगर बुध का साथ भी मिल जाए तो स्त्री लेखन के क्षेत्र में पारंगत होती है। मगर ऐसा कहा जा सकता है कि अच्छा शुक्र स्त्री में मोटापा भी देता है। परंतु बता दें कि जहां वृहस्पति स्त्री को थुलथुला मोटापा दे कर अनाकर्षक बनता है वही शुक्र से आने वाला मोटापा स्त्री को और भी सुन्दर दिखाता है। अब बता दें कि अगर कुंडली में शुक्र बुरे या पापी ग्रहों का सानिध्य या कुंडली के दूषित भावों के साथ हो तो स्त्री में चारित्रिक दोष भी पैदा कर सकता है। जिसके कारण विवाह में, कष्ट प्रद दांपत्य जीवन, बहु विवाह और तलाक की स्थिति पैदा होने के आसार बढ़ते है। ज्योतिष के अनुसार अगर ऐसा हो तो स्त्री को हीरा पहनने से परहेज़ करना चाहिए। अगर ऐसे हालात में हीरा पहना जाए तो कमज़ोर शुक्र स्त्री में मधुमेह, थाइराईड, यौन रोग, अवसाद और वैभव हीनता लाता है।
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ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म शुक्रवार को हुआ है उन पर माँ लक्ष्मी और शुक्र दोनों का शुभ प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि शुक्रवार के स्वामी शुक्र देव है और इसकी देवी लक्ष्मी है। यही कारण है कि इस दिन जन्म लने वाले व्यक्ति भौतिक सुख सुविधाओं के आदी और शौकीन मिजाज होते है l शुक्रवार को जन्मे लोग जीवन को मौज मस्ती से व्यतीत करने के पक्षधर होते है। इस दिन जन्मे लोग विरोधियों को भी अपने पक्ष में करने की कला जानते है, इनमे एक अलग ही आकर्षण होता है। जिससे ये अपने मित्रों के दायरे में काफी लोकप्रिय होते है। शुक्रवार को जन्में लोग बड़े ही खुशमिजाज होते है और जिंदगी को एक जश्न की तरह जीते है। इनको कलात्मक चीजों और कला से गहरा लगाव होता है, इसलिये ये अपना कैरियर भी संगीत, लेखन, चित्रकला, फिल्म, फैशन, ब्यूटी इंडस्ट्री में बनाना पसंद करते है। ऐसे व्यक्ति आमतौर पर प्रसन्न दिखाई देते है। इनके चेहरे पर रौनक होती है।
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--- पौराणिक कथाओं कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और पार्वती के दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। भगवान शिव ने काफी सोच-विचार कर एक प्रतियोगिता आयोजित की और कहा कि जो अपने वाहन पर सवार होकर समस्त तीर्थ और संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा वही पृथ्वी पर प्रथम पूजनीय होगा। कार्तिकेय ने शिवजी एवं पार्वती जी का आशीर्वाद लिया और अपने वाहन मोर पर तुरंत सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। इधर गणेश जी सोच में पड़ गए कि मेरा वाहन तो चूहा है। चूहा थोड़ा छोटा है और हम थोडे़ मोटे हैं। इस तरह तो हमारी हार पक्की है। तब गणेश जी ने सोचा कि माता-पिता में संपूर्ण तीर्थ होते हैं यदि मैं इनकी परिक्रमा कर लूंगा तो मुझे समस्त तीर्थ और समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करने का फल मिल जाएगा। ये सोचकर श्री गणेश जी महाराज ने अपनी मां पार्वती और पिता शिव जी से आशीर्वाद लिया और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा कर शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। इधर कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार हो पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे तो श्री गणेश को स्थान पर खड़ा पाकर कार्तिकेय ने कहा कि यह प्रतियोगिता मैंने जीत ली है क्योंकि गणेश जी अभी तक यहीं खड़े हैं। तब शिव जी ने कहा- पुत्र गणेश आपसे पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा कर चुका है, वही प्रथम पूजा का अधिकारी होगा। कार्तिकेय गुस्सा होकर बोले, पिताजी, यह कैसे संभव है? गणेश अपने वाहन चूहे पर बैठकर कई वर्षों में भी पूरी परिक्रमा नहीं कर सकता है! पिताजी आप मजाक क्यों कर रहे हैं ? तब भगवान भोले नाथ बोले- नहीं बेटे! गणेश अपने माता-पिता की परिक्रमा करके यह प्रमाणित कर चुका है कि इस ब्रह्माड में मात-पिता से बढ़कर कुछ नही है। गणेश ने संपूर्ण जगत् को इस बात का ज्ञान कराया है इसलिए इस दुनिया में सबसे पहले गणेश को ही पूजा जाएगा। इस तरह गणेश प्रथम पूजनीय बन गए।
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कब बनता है कुंडली में ग्रह मारकेश, अष्टम द्वादश सिद्धांत, 8th to 12th Theory in Horoscope जन्म कुण्डली द्वारा मारकेश का विचार करने के लिए कुण्डली के दूसरे भाव, सातवें भाव, बारहवें भाव, अष्टम भाव आदि को समझना आवश्यक होता है. जन्म कुण्डली के आठवें भाव से आयु का विचार किया जाता है. लघु पाराशरी के अनुसार से तीसरे स्थान को भी आयु स्थान कहा गया है क्योंकि यह आठवें से आठवा भाव है (अष्टम स्थान से जो अष्टम स्थान अर्थात लग्न से तृतीय स्थान आयु स्थान है) और सप्तम तथा द्वितीय स्थान को मृत्यु स्थान या मारक स्थान कहते हैं इसमें से दूसरा भाव प्रबल मारक कहलाता है. बारहवां भाव व्यय भाव कहा जाता है, व्यय का अर्थ है खर्च होना, हानि होना क्योंकि कोई भी रोग शरीर की शक्ति अथवा जीवन शक्ति को कमजोर करने वाला होता है,इसलिये बारहवें भाव से रोगों का विचार किया जाता है. इस कारण इसका विचार करना भी जरूरी होता है. मारकेश की दशा में व्यक्ति को सावधान रहना जरूरी होता है क्योंकि इस समय जातक को अनेक प्रकार की मानसिक, शारीरिक परेशनियां हो सकती हैं. इस दशा समय में दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. जातक के जीवन में मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा आती ही हैं. लेकिन इससे डरने की आवश्यकता नहीं बल्कि स्वयं पर नियंत्रण व सहनशक्ति तथा ध्यान से कार्य को करने की ओर उन्मुख रहना चाहिए.
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