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गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् । वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥ One should not mourn over the past and should not remain worried about the future. The wise operate in present. बीते हुए समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य के लिए परेशान नहीं होना चाहिए, बुद्धिमान तो वर्तमान में ही कार्य करते हैं | *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
posted Jan 17 by anonymous

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*य ईर्षुः परवित्तेषु रुपे वीर्ये कुलान्वये।* *सुखसौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तकः॥* भावार्थ : *जो व्यक्ति दूसरों की धन -सम्पति ,सौंदर्य ,पराक्रम ,उच्च कुल ,सुख ,सौभाग्य और सम्मान से ईर्ष्या व द्वेष करता है वह असाध्य रोगी है। उसका यह रोग कभी ठीक नहीं होता।* *The person who is jealous and hated by the wealth, beauty, power, good family, happiness, good fortune and honor of others is an abominable patient. This disease is never cured.* *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
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*रथः शरीरं पुरुषस्य राजत्रात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्चाः।* *तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वैर्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥* यह मानव -शरीर रथ है ,आत्मा (बुद्धि ) इसका सारथी है ,इंद्रियाँ इसके घोड़े हैं। जो व्यक्ति सावधानी ,चतुराई और बुद्धिमानी से इनको वश में रखता है वह श्रेष्ठ रथवान की भांति संसार में सुखपूर्वक यात्रा करता है। *हरि
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*विद्या विवादाय धनं मदाय,* *प्रज्ञाप्रकर्षः परवंचनाय।* *अत्युन्नतिर्लोकपराभवाय,* *येषां प्रकाशः तिमिरं हि तेषाम्।।* भावार्थ-- *जिस व्यक्ति के लिए विद्या विवाद का साधन है, धन मद का साधन है, ज्ञान का प्रकर्ष दूसरे को ठगने का साधन है एवं अत्यधिक उन्नति लोगों के तिरस्कार का साधन है , ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रकाश भी अन्धकार है।।* *For a person, Vidya is the instrument of controversy, money is the instrument of arrogance, the scope of knowledge is the means of deceiving others, and excessive advancement is the means of disgusting people, light for such persons is also darkness* *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
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*त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् |* *कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ||* श्लोकार्थ :- *दुष्टों का साथ छोड़ दो, सज्जनों का साथ करो, रात-दिन अच्छे कर्म करो एवं सदैव ईश्वर का स्मरण करो | यही मानव का धर्म है |* *Leave the fellowship of the wicked, do the fellowship with the gentlemen, do good deeds day and night and always remember God. This is the religion of human beings.* *हरि ओम् प्रणाम, जय सीताराम*
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*परस्य पीडया लब्धं धर्मस्योल्लंघनेन च ।* *आत्मावमानसंप्राप्तं न धनं तत् सुखाय वै ।।* भावार्थ - *दूसरों को दु:ख देकर , धर्म का उल्लंघन करके या खुद का अपमान सहकर मिले हुए धन से कभी सुख नही प्राप्त होता ।* *It does not get any pleasure by harassing others, violating religion or wealth received by getting insulted yourself.* *हरि ओम्, प्रणाम, जय सीताराम*
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