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क्‍या है मारकेश, कुंडली में मृत्युकारक ग्रहों की कैसे करें पहचान, MyGift Code FS497

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कब बनता है कुंडली में ग्रह मारकेश, अष्टम द्वादश सिद्धांत, 8th to 12th Theory in Horoscope जन्म कुण्डली द्वारा मारकेश का विचार करने के लिए कुण्डली के दूसरे भाव, सातवें भाव, बारहवें भाव, अष्टम भाव आदि को समझना आवश्यक होता है. जन्म कुण्डली के आठवें भाव से आयु का विचार किया जाता है. लघु पाराशरी के अनुसार से तीसरे स्थान को भी आयु स्थान कहा गया है क्योंकि यह आठवें से आठवा भाव है (अष्टम स्थान से जो अष्टम स्थान अर्थात लग्न से तृतीय स्थान आयु स्थान है) और सप्तम तथा द्वितीय स्थान को मृत्यु स्थान या मारक स्थान कहते हैं इसमें से दूसरा भाव प्रबल मारक कहलाता है. बारहवां भाव व्यय भाव कहा जाता है, व्यय का अर्थ है खर्च होना, हानि होना क्योंकि कोई भी रोग शरीर की शक्ति अथवा जीवन शक्ति को कमजोर करने वाला होता है,इसलिये बारहवें भाव से रोगों का विचार किया जाता है. इस कारण इसका विचार करना भी जरूरी होता है. मारकेश की दशा में व्यक्ति को सावधान रहना जरूरी होता है क्योंकि इस समय जातक को अनेक प्रकार की मानसिक, शारीरिक परेशनियां हो सकती हैं. इस दशा समय में दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. जातक के जीवन में मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा आती ही हैं. लेकिन इससे डरने की आवश्यकता नहीं बल्कि स्वयं पर नियंत्रण व सहनशक्ति तथा ध्यान से कार्य को करने की ओर उन्मुख रहना चाहिए.

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क्‍या है मारकेश, कुंडली में मृत्युकारक ग्रहों की कैसे करें पहचान,
posted Jan 21, 2020 by Deepika Maheshwary

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--- पौराणिक कथाओं कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और पार्वती के दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। भगवान शिव ने काफी सोच-विचार कर एक प्रतियोगिता आयोजित की और कहा कि जो अपने वाहन पर सवार होकर समस्त तीर्थ और संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा वही पृथ्वी पर प्रथम पूजनीय होगा। कार्तिकेय ने शिवजी एवं पार्वती जी का आशीर्वाद लिया और अपने वाहन मोर पर तुरंत सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। इधर गणेश जी सोच में पड़ गए कि मेरा वाहन तो चूहा है। चूहा थोड़ा छोटा है और हम थोडे़ मोटे हैं। इस तरह तो हमारी हार पक्की है। तब गणेश जी ने सोचा कि माता-पिता में संपूर्ण तीर्थ होते हैं यदि मैं इनकी परिक्रमा कर लूंगा तो मुझे समस्त तीर्थ और समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करने का फल मिल जाएगा। ये सोचकर श्री गणेश जी महाराज ने अपनी मां पार्वती और पिता शिव जी से आशीर्वाद लिया और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा कर शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। इधर कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार हो पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे तो श्री गणेश को स्थान पर खड़ा पाकर कार्तिकेय ने कहा कि यह प्रतियोगिता मैंने जीत ली है क्योंकि गणेश जी अभी तक यहीं खड़े हैं। तब शिव जी ने कहा- पुत्र गणेश आपसे पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा कर चुका है, वही प्रथम पूजा का अधिकारी होगा। कार्तिकेय गुस्सा होकर बोले, पिताजी, यह कैसे संभव है? गणेश अपने वाहन चूहे पर बैठकर कई वर्षों में भी पूरी परिक्रमा नहीं कर सकता है! पिताजी आप मजाक क्यों कर रहे हैं ? तब भगवान भोले नाथ बोले- नहीं बेटे! गणेश अपने माता-पिता की परिक्रमा करके यह प्रमाणित कर चुका है कि इस ब्रह्माड में मात-पिता से बढ़कर कुछ नही है। गणेश ने संपूर्ण जगत् को इस बात का ज्ञान कराया है इसलिए इस दुनिया में सबसे पहले गणेश को ही पूजा जाएगा। इस तरह गणेश प्रथम पूजनीय बन गए।
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श्रीगणेश बुद्धि के देवता हैं । अक्षरों को ‘गण’ कहा जाता है, उनके ईश होने के कारण इन्हें ‘गणेश’ कहा जाता है । इसलिए श्रीगणेश ‘विद्या-बुद्धि के दाता’ कहे गये हैं । आदिकवि वाल्मीकि ने श्रीगणेश की वन्दना करते हुए कहा है—‘गणेश्वर ! आप चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता तथा देवताओं के आचार्य बृहस्पतिजी को भी विद्या प्रदान करने वाले हैं । कठ को भी अभीष्ट विद्या देने वाले आप है (अर्थात् कठोपनिषद् के दाता है) । आप द्विरद हैं, कवि हैं और कवियों की बुद्धि के स्वामी हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ ।’ श्रीगणेश असाधारण बुद्धि व विवेक से सम्पन्न होने के कारण अपने भक्तों को सद्बुद्धि व विवेक प्रदान करते हैं । इसीलिए हमारे ऋषियों ने मनुष्य के अज्ञान को दूर करने, बुद्धि शुद्ध रखने व काम में एकाग्रता प्राप्त करने के लिए बुद्धिदाता श्रीगणेश की सबसे पहले पूजा करने का विधान किया है । श्रीगणेश की कृपा से कैसे मिलता है तेज बुद्धि का वरदान ? श्रीगणेश का ध्यान करने से भ्रमित मनुष्य को सुमति और विवेक का वरदान मिलता है और श्रीगणेश का गुणगान करने से सरस्वती प्रसन्न होती हैं । तीव्र बुद्धि और स्मरण-शक्ति के लिए श्रीगणेश का करें प्रात:काल ध्यान!!!!!! विद्या प्राप्ति के इच्छुक मनुष्य को प्रात:काल इस श्लोक का पाठ करते हुए श्रीगणेश के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए— प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम् उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड- माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम् ।। अर्थात्—जो अनाथों के बन्धु हैं, जिनके दोनों कपोल सिन्दूर से शोभायमान हैं, जो प्रबल विघ्नों का नाश करने में समर्थ हैं और इन्द्रादि देव जिनकी वन्दना करते हैं, उन श्रीगणेश का मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ । विद्या प्राप्ति और तीव्र स्मरण-शक्ति के लिए बुधवार को करें श्रीगणेश के ये उपाय !!!!!! ▪️बुध ग्रह भी बुद्धि देने वाले हैं । बुधवार के दिन गणेशजी की पूजा बहुत फलदायी होती है । श्रीगणेश अपनी संक्षिप्त अर्चना से ही संतुष्ट हो भक्त को ऋद्धि-सिद्धि प्रदान कर देते हैं । गणेशजी को प्रसन्न करना बहुत ही सरल है । इसमें ज्यादा खर्च की आवश्यकता नही है । ▪️स्नान आदि करके पूजा शुद्ध पीले वस्त्र पहन कर करें । ▪️पूजा-स्थान में गणेशजी की तस्वीर या मूर्ति पूर्व दिशा में विराजित करें । श्रीगणेश को रोली, चावल आदि चढ़ाएं । कुछ न मिले तो दो दूब ही चढ़ा दें । घर में लगे लाल (गुड़हल, गुलाब) या सफेद पुष्प (सदाबहार, चांदनी) या गेंदा का फूल चढ़ा दें । ▪️श्रीगणेश को सिंदूर अवश्य लगाना चाहिए । ▪️श्रीगणेश को बेसन के लड्डू बहुत प्रिय हैं यदि लड्डू या मोदक न हो तो केवल गुड़ या बताशे का भोग लगा देना चाहिए । ▪️एक दीपक जला कर धूप दिखाएं और हाथ जोड़ कर छोटा-सा एक श्लोक बोल दें– तोहि मनाऊं गणपति हे गौरीसुत हे । करो विघ्न का नाश, जय विघ्नेश्वर हे ।। विद्याबुद्धि प्रदायक हे वरदायक हे । रिद्धि-सिद्धिदातार जय विघ्नेश्वर हे ।। ▪️एक पीली मौली गणेशजी को अर्पित करते हुए कहें—‘करो बुद्धि का दान हे विघ्नेश्वर हे’ । पूजा के बाद उस मौली को माता-पिता, गुरु या किसी आदरणीय व्यक्ति के पैर छूकर अपने हाथ में बांध लें। ▪️श्रीगणेश पर चढ़ी दूर्वा को अपने पास रखें, इससे एकाग्रता बढ़ती है । ▪️‘ॐ गं गणपतये नम:’ इस गणेश मन्त्र का 108 बार जाप करने से बुद्धि तीव्र होती है । ▪️गणपति अथर्वशीर्ष में कहा गया है—‘जो लाजों (धान की खील) से श्रीगणेश का पूजन करता है, वह यशस्वी व मेधावी होता है ।’ अत: गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने से भी विद्या, बुद्धि, विवेक व एकाग्रता बढ़ती है । बुद्धि के सागर और शुभ गुणों के घर गणेशजी का स्मरण करने से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त हो जाती
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