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क्यों होती है भगवान गणेश की सर्वप्रथम पूजा Gift code FS497

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--- पौराणिक कथाओं कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और पार्वती के दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। भगवान शिव ने काफी सोच-विचार कर एक प्रतियोगिता आयोजित की और कहा कि जो अपने वाहन पर सवार होकर समस्त तीर्थ और संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा वही पृथ्वी पर प्रथम पूजनीय होगा। कार्तिकेय ने शिवजी एवं पार्वती जी का आशीर्वाद लिया और अपने वाहन मोर पर तुरंत सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। इधर गणेश जी सोच में पड़ गए कि मेरा वाहन तो चूहा है। चूहा थोड़ा छोटा है और हम थोडे़ मोटे हैं। इस तरह तो हमारी हार पक्की है। तब गणेश जी ने सोचा कि माता-पिता में संपूर्ण तीर्थ होते हैं यदि मैं इनकी परिक्रमा कर लूंगा तो मुझे समस्त तीर्थ और समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करने का फल मिल जाएगा। ये सोचकर श्री गणेश जी महाराज ने अपनी मां पार्वती और पिता शिव जी से आशीर्वाद लिया और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा कर शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। इधर कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार हो पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे तो श्री गणेश को स्थान पर खड़ा पाकर कार्तिकेय ने कहा कि यह प्रतियोगिता मैंने जीत ली है क्योंकि गणेश जी अभी तक यहीं खड़े हैं। तब शिव जी ने कहा- पुत्र गणेश आपसे पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा कर चुका है, वही प्रथम पूजा का अधिकारी होगा। कार्तिकेय गुस्सा होकर बोले, पिताजी, यह कैसे संभव है? गणेश अपने वाहन चूहे पर बैठकर कई वर्षों में भी पूरी परिक्रमा नहीं कर सकता है! पिताजी आप मजाक क्यों कर रहे हैं ? तब भगवान भोले नाथ बोले- नहीं बेटे! गणेश अपने माता-पिता की परिक्रमा करके यह प्रमाणित कर चुका है कि इस ब्रह्माड में मात-पिता से बढ़कर कुछ नही है। गणेश ने संपूर्ण जगत् को इस बात का ज्ञान कराया है इसलिए इस दुनिया में सबसे पहले गणेश को ही पूजा जाएगा। इस तरह गणेश प्रथम पूजनीय बन गए।

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क्यों होती है भगवान गणेश की सर्वप्रथम पूजा
posted Jan 22 by Deepika Maheshwary

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ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म शुक्रवार को हुआ है उन पर माँ लक्ष्मी और शुक्र दोनों का शुभ प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि शुक्रवार के स्वामी शुक्र देव है और इसकी देवी लक्ष्मी है। यही कारण है कि इस दिन जन्म लने वाले व्यक्ति भौतिक सुख सुविधाओं के आदी और शौकीन मिजाज होते है l शुक्रवार को जन्मे लोग जीवन को मौज मस्ती से व्यतीत करने के पक्षधर होते है। इस दिन जन्मे लोग विरोधियों को भी अपने पक्ष में करने की कला जानते है, इनमे एक अलग ही आकर्षण होता है। जिससे ये अपने मित्रों के दायरे में काफी लोकप्रिय होते है। शुक्रवार को जन्में लोग बड़े ही खुशमिजाज होते है और जिंदगी को एक जश्न की तरह जीते है। इनको कलात्मक चीजों और कला से गहरा लगाव होता है, इसलिये ये अपना कैरियर भी संगीत, लेखन, चित्रकला, फिल्म, फैशन, ब्यूटी इंडस्ट्री में बनाना पसंद करते है। ऐसे व्यक्ति आमतौर पर प्रसन्न दिखाई देते है। इनके चेहरे पर रौनक होती है।
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★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। ★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। ★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। ★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। ★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। ★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। ★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। ★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। ★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। ★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, ★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। ★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। ★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। ★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। ★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए । ★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। ★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। ★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती। ★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे। ★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे। ★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। ★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। ★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। ★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। ★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। ★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे। ★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। ★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है। ★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। ★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए। ★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। ★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें। ★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।
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कब बनता है कुंडली में ग्रह मारकेश, अष्टम द्वादश सिद्धांत, 8th to 12th Theory in Horoscope जन्म कुण्डली द्वारा मारकेश का विचार करने के लिए कुण्डली के दूसरे भाव, सातवें भाव, बारहवें भाव, अष्टम भाव आदि को समझना आवश्यक होता है. जन्म कुण्डली के आठवें भाव से आयु का विचार किया जाता है. लघु पाराशरी के अनुसार से तीसरे स्थान को भी आयु स्थान कहा गया है क्योंकि यह आठवें से आठवा भाव है (अष्टम स्थान से जो अष्टम स्थान अर्थात लग्न से तृतीय स्थान आयु स्थान है) और सप्तम तथा द्वितीय स्थान को मृत्यु स्थान या मारक स्थान कहते हैं इसमें से दूसरा भाव प्रबल मारक कहलाता है. बारहवां भाव व्यय भाव कहा जाता है, व्यय का अर्थ है खर्च होना, हानि होना क्योंकि कोई भी रोग शरीर की शक्ति अथवा जीवन शक्ति को कमजोर करने वाला होता है,इसलिये बारहवें भाव से रोगों का विचार किया जाता है. इस कारण इसका विचार करना भी जरूरी होता है. मारकेश की दशा में व्यक्ति को सावधान रहना जरूरी होता है क्योंकि इस समय जातक को अनेक प्रकार की मानसिक, शारीरिक परेशनियां हो सकती हैं. इस दशा समय में दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. जातक के जीवन में मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा आती ही हैं. लेकिन इससे डरने की आवश्यकता नहीं बल्कि स्वयं पर नियंत्रण व सहनशक्ति तथा ध्यान से कार्य को करने की ओर उन्मुख रहना चाहिए.
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जब-जब धरती पर पाप बढ़ता है तब-तब भगवान विष्णु किसी ना किसी रुप में अवतार लेते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है लेकिन शेषनाग उनके साथ हर अवतार में जुड़े हुए हैं। शेषनाग अनंत अर्थात् जिसकी कोई सीमा नहीं, का प्रतीक है। भगवान विष्णु उपयुक्त समय पर मानव जाति का मार्गदर्शन करते हैं। यही कारण है कि उन्हें सांपों के बिस्तर पर लेटा हुआ दिखाया जाता है। शेषनाग भगवान विष्णु को केवल आराम करने के लिए जगह ही नहीं देते बल्कि वे उनके रक्षक भी हैं। भगवान कृष्ण के जन्म के समय जब पिता वासुदेव उन्हें नंद के घर ले जा रहे थे तब शेषनाग ने ही तूफान से भगवान कृष्ण की रक्षा की थी। भगवान विष्णु और शेषनाग के बीच का संबंध शाश्वत है। भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार में बुरी शक्तियों का नाश करने के लिए शेषनाग उनके साथ जुड़े हुए हैं। त्रेता युग में शेषनाग ने लक्ष्मण का रूप लिया था जबकि द्वापर में वे बलराम के रूप में थे और दोनों ही जन्मों में उन्होंने राम और कृष्ण की सहायता की थी।
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शनिदेव के बारे में पुराणों में कई कथाएं प्रचलित हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि शनिदेव को न्याय का देवता कहा जाता है। शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करते हैं और सभी प्राणियों के साथ न्याय करते हैं। इनके संबंध में कई भ्रान्तियां सुनने को भी मिलती हैं जैसे- शनिदेव ही जीवन में अशुभ और दुख का कारक हैं लेकिन वास्तविकता तो ये है कि शनिदेव उतने अशुभ नहीं होते, जितना लोग उन्हें मानते हैं। कहा जाता है कि शनिदेव अपने भक्तों पर शीघ्र ही नाराज और प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यताएं है कि शनिदेव को यदि विधिवत पूजा जाए तो वे अपने भक्तों को कभी दुखी नहीं रखते हैं। शनिदेव की पूजा में तिल और तेल का विशेष महत्व है। शनिदेव की पूजा में तिल और तेल क्यों? --------------------------------------------- • काला तिल, तेल, काला वस्त्र, काली उड़द शनि देव को अत्यंत प्रिय हैं। मान्यता है कि काला तिल और तेल से शनिदेव जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं। यदि शनिदेव की पूजा इन वस्तुओं से की जाए तो ऐसी पूजा सफल मानी जाती है। • शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के से दिन शुरू कर सकते हैं लेकिन मान्यता है कि श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी होता है। इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा का विधिवत पूजा करनी चाहिए। शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवन्ती का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए। • शनिदेव को तेल चढ़ाए जाने के संदर्भ में भी एक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एकबार युद्ध के दौरान हनुमानजी ने शनि देव पर ऐसे तीखे प्रहार किए जिस कारण शनिदेव के शरीर पर काफी घाव बन गए। वह पीड़ा उनसे सहन नहीं हो रही थी। इसके बाद हनुमान जी ने शनिदेव को तिल का तेल लगाने के लिए दिया, जिससे उनका पूरा दर्द गायब हो गया। इसी कारण शनिदेव ने कहा कि जो मनुष्य मुझे सच्चे मन से तेल चढ़ाएगा मैं उसकी सभी पीड़ा हर लूंगा और सभी मनोकामनाएं पूरी करूंगा।
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