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जानिए स्टडीरूम से जुड़ी कुछ वास्तु टिप्स...Use gift code FS497

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सभी माता-पिता की यही इच्छा होती है कि उनके बच्चे पढ़ाई के मामले में अव्वल रहें। इसी इच्छा को पूरा करने के लिए बच्चों की शिक्षापर विशेष ध्यान भी दिया जाता है। बच्चों का परिणाम श्रेष्ठ रहे, इसके लिए वास्तु की टिप्स का भी ध्यान रखना चाहिए। वास्तु घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म करके सकारात्मकऊर्जा बढ़ाता है। घर का वातावरण सकारात्मक रहेगा तो बच्चों का मन पढ़ाई में भी अच्छी तरह लगा रहेगा। वास्तु में स्टडी रूम के लिए भी कई बातें बताई गई हैं, जिनसे विद्यार्थियों को काफी लाभ मिल सकता है। ☆☆ विद्यार्थियों को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व काकोना) की ओर मुंह करके पढ़ाई करनी चाहिए।यदि इस दिशा में पढ़ाई करना संभव न हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके पढ़ाई कर सकते हैं। ☆☆ यदि स्टडी रूम में चाय-पानी या नाश्ता भी किया हो तो जूठे बर्तन, प्लेट आदि को पढ़ाई करने से पहले वहां से हटा देना चाहिए। ☆☆ स्टडी रूम में पूर्व-उत्तर की ओर खिड़की होगी तो श्रेष्ठ रहता है। ☆☆ पढ़ाई करते समय अपने आस-पास का वातावरण शुद्ध होना चाहिए। सुगंध वाला वातावरण होना चाहिए, कमरे में दुर्गंध नहीं होना चाहिए। ☆☆पढ़ाई की टेबल पर आवश्यक सामग्री हीहोनी चाहिए। अनावश्यक सामग्री को तुरंत हटा देना चाहिए, अन्यथा पढ़ाई के समय मन भटक सकता है। ☆☆पढ़ने का समय सबसे अच्छा समय है ब्रह्ममुहूर्त। सूर्योदय से पहले यानी सुबह 4.30 बजेसे सुबह 10 बजे तक पढ़ाई करना लाभदायक रहता है। रात को अधिक देर तक पढऩा स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। ☆☆अपने स्टडी रूम में माता सरस्वती,गणेशजी या अपने प्रिय देवी-देवता की फोटोलगा सकते हैं। स्टडी रूम में ऐसी चीजें, फोटोहोने चाहिए जो पढ़ाई से संबंधित हों।। नकारात्मक विचारों वाले फोटो, फिल्मी फोटो, प्रेम से संबंधित फोटो नहीं लगाना चाहिए। ☆☆ स्टडी रूम में किताबें दक्षिण-पश्चिम दिशा के कोने में रख सकते हैं। उत्तर-पूर्व दिशा केकोने में हल्के सामान रखना चाहिए। ☆☆इस रूम का कलर हल्का पीला या सफेद होगा तो सबसे अच्छा रहेगा। गहरे रंगों के उपयोग से बचना चाहिए। इस रूम में दर्पणनहीं रखना चाहिए।

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जानिए स्टडीरूम से जुड़ी कुछ वास्तु टिप्स...
posted Jan 28, 2020 by Deepika Maheshwary

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आमतौर पर हमारे देश में हर विशेष दिन कुछ न कुछ दान करने की परंपरा रही है। महाभारत के एक दृष्टांत में कहा गया है कि माघ मास के दिनों में अनेक तीर्थों का समागम होता है, वहीं पद्मपुराण में कहा गया है कि अन्य मास में जप, तप और दान से भगवान विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वे माघ मास में स्नान करने से होते हैं। यही वजह है कि प्राचीन ग्रंथों में नारायण को पाने का सुगम मार्ग माघ मास के पुण्य स्नान को बताया गया है, विशेषकर आज के दिन गंगा स्नान का खास महत्व माना गया है। * माघ मास में पवित्र नदियों में स्नान करने से एक विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है। * अमावस्या के दिन जप-तप, ध्यान-पूजन करने से विशेष धर्मलाभ प्राप्त होता है। * मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर आचरण तथा स्नान-दान करने का विशेष महत्व है। * शास्त्रों के अनुसार माघ मास में पूजन-अर्चन व नदी स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है तथा इन दिनों नदी में स्नान करने से स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग मिल जाता है। * जो लोग घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करना चाहिए। * इस दिन सूर्यनारायण को अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होती है। * जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, व गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी। * आज के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें। * इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है। * इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। क्या करें दान :- मौनी अमावस्या के दिन तेल, तिल, सूखी लकड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, काले कपड़े, जूते दान करने का विशेष महत्व है। वहीं जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा नीच ग्रह का है तो उन्हें दूध, चावल, खीर, मिश्री, बताशा दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी।
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राहु केतु का गोचर बदलने के बाद आज शनि भी मकर राशि में वक्री से मार्गी हो गए हैं आपकी लग्न जन्म कुंडली और चंद्र राशि से यह ग्रह आपके जीवन पर कैसा प्रभाव डालेंगे इसकी पूरी जानकारी के लिए आप मुझसे कॉल पर संपर्क करें मेरी ओर से दिया गया गिफ्ट कोड यूज करने के बाद आपको अपने वॉलेट में मनी मिलेगी जिसका उपयोग आप मुझसे बात करने के लिए कर सकते हैं
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होली का त्‍योहार बुराई पर अच्‍छाई की जीत का प्रतीक है. होली में जितना महत्‍व रंगों का है उतना ही महत्‍व होलिका दहन का भी है. रंग वाली होली से एक दिन पहले होली जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहते हैं. होलिका दहन की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं. सूखी टहनियां, लकड़ी और सूखे पत्ते इकट्ठा कर उन्‍हें एक सार्वजनिक और खुले स्‍थान पर रखा जाता है,पूर्णिमा की तिथि पर सूर्य अस्त होने के बाद प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन की अग्नि को पवित्र माना जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत की अग्नि होती है। कुछ लोग इस अग्नि में नई फसल को भूनकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और भगवान की पूजा की जाती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहे। इस शुभ दिन पर कुछ लोग भगवान के प्रति आस्था मजबूत करने के लिए व्रत भी रखते हैं और कथा पढ़ते हैं।होलिका दहन के साथ ही बुराइयों को भी अग्नि में जलाकर खत्‍म करने की कामना की जाती है.   होलिका दहन कब है? हिन्‍दू पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात्रि ही होलिका दहन किया जाता है. यानी कि रंग वाली होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है. इस बार होलिका दहन 9 मार्च को किया जाएगा, जबकि रंगों वाली होली 10 मार्च को है. होलिका दहन के बाद से ही मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं. मान्‍यता है कि होली से आठ दिन पहले तक भक्त प्रह्लाद को अनेक यातनाएं दी गई थीं. इस काल को होलाष्टक कहा जाता है. होलाष्टक में मांगलिक कार्य नहीं होते हैं. कहते हैं कि होलिका दहन के साथ ही सारी नकारात्‍मक ऊर्जा समाप्‍त हो जाती है. होलिका दहन का शुभ मुहूर्त  जानते हैं कि होलिका दहन का शुभ मुहूर्त क्या है और इस मौके शुभ मुहूर्त देखने के लिए दो बातों को ध्यान रखा जाता है.  पहला, उस दिन “भद्रा” न हो। दूसरा, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए। इस बार 9 मार्च 2020 सोमवार को होलिका दहन के समय भद्राकाल की बाधा नहीं रहेगी। फाल्गुन माह की पूर्णिमा यानी होलिका दहन के दिन भद्राकाल सुबह सूर्योदय से शुरू होकर दोपहर करीब डेढ़ बजे ही खत्म हो जाएगा।  इसलिए शाम को प्रदोषकाल में होलिका दहन के समय भद्राकाल नहीं होने से होलिका दहन शुभ फल देने वाला रहेगा। जिससे रोग, शोक और दोष दूर होंगे।9 मार्च 2020 को सुबह 3 बजकर 3 मिनट से पूर्णिमा तिथि शुरू हो जाएगी 9 मार्च को सोमवार है और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र है वहीं पूर्णिमा तिथि सोमवार को होने से चंद्रमा का प्रभाव ज्यादा रहेगा। क्योंकि ज्योतिष के अनुसार सोमवार को चंद्रमा का दिन माना जाता है। इसके साथ ही स्वराशि धनु में स्थित देवगुरु बृहस्पति की दृष्टि चंद्रमा पर रहेगी। जिससे गजकेसरी योग का प्रभाव रहेगा।इस बार होली भद्रा रहित, ध्वज एवं गजकेसरी योग भी बन रहा है। इसके बाद 10 मार्च को रंग वाली होली में त्रिपुष्कर योग बनेगा। इस साल होली पर गुरु और शनि का विशेष योग बन रहा है। ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी राशि में रहेंगे।  तो इस बार होली का यह पावन पर्व ग्रहों के शुभ संयोग के कारण शुभ फलदाई मानी गई है होलिका दहन का शुभ मुहूर्त  होलिका दहन की तिथि: 9 मार्च 2020 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 9 मार्च 2020 को सुबह 3 बजकर 3 मिनट से  पूर्णिमा तिथि समाप्‍त: 9 मार्च 2020 को रात 11 बजकर 17 मिनट तक  होलिका दहन मुहूर्त: शाम 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 52 मिनट तक होली का दहन की महिमा रंग वाली होली से भी ज्यादा मानी गई है .भारतीय परंपरा में पुराने साल को विदाई देते हुए नए साल के आगमन की खुशियां मनाई जाती है पुराना साल जिसे संवत कहते हैं को विदाई देने के लिए होली का पावन पर्व मनाया जाता है इसलिए होलिका दहन को संवत जलाना भी कहते चैत्र शुक्ल पक्ष के पहले दिन से जब नवरात्रि शुरू होते हैं तो भारतीय नव संवत की शुरुआत हो जाती है होलिका की अग्नि में पुराने साल और संवत की यादों को समस्याओं को परेशानियों को जलाते हुए जीवन की सारी पुरानी साल की मुश्किलों से निजात पाया जाता है माना जाता है कि इस राख को घर पर लाकर उससे अपने सभी परिवार के लोग अपने माथे पर तिलक करें तो निश्चित ही पिछले साल की सारी नकारात्मकता खत्म हो जाती है पुराने साल की विदाई और नए साल की खुशियां बनाने के साथ-साथ होलिका दहन के पर्व पर किसी भी तरह की आर्थिक समस्या व मानसिक परेशानी हो धन संबंधी समस्याओं से लेकर स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या का समाधान किया जा सकता है.. ज्योतिष के हिसाब से कुछ ऐसे उपाय होते हैं जिन्हें अगर आप होलिका दहन के अवसर पर करें और होलिका के जलने के साथ उन चीजों को अग्नि में डाले तीन बार परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें तो आपकी प्रार्थना जरूर पूरी होती है तो चलिए उन्हीं सभी छोटे-छोटे उपायों की बात करते हैं 1. बीमारी से मुक्ति के लिए और सेहत में लाभ के लिए अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए इस दिन एक मुट्ठी काले तिल होलिका की अग्नि में डाले ,कोई बीमारी से मुक्ति पाना चाहता है तो हरी इलायची और कपूर डालें तीन परिक्रमा करते हुए बीमारी से मुक्ति की प्रार्थना करें 2. धन प्राप्ति के लिए और किसी भी तरह की आर्थिक समस्या से जूझ रहे हैं. तू होली के दिन एक छोटी सी चंदन की लकड़ी होली की अग्नि में डाल देतीन बार परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें 3. अगर किसी को रोजगार की समस्या है यह व्यापार या व्यवसाय में परेशानी आ रही है तो इसके लिए एक मुट्ठी पीली सरसों के दाने होलिका की अग्नि में डालें निश्चित ही व्यापार संबंधी रोजगार संबंधी सारी समस्याएं दूर होंगी 4. अगर किसी को विवाह की समस्या आ रही है विवाह नहीं हो पा रहा, वैवाहिक जीवन में परेशानी और दिक्कतें आ रही हैं खुशहाली नहीं है तो उसके लिए हवन सामग्री लेकर जरा सा देसी घी मिलाकर उसे होलिका की अग्नि में डालें तो निश्चित ही जीवन में सभी तरह की समस्याएं दूर होती हैं 5. किसी भी तरह के तंत्र मंत्र नजर दोष और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए एक मुट्ठी काली सरसों को अपने सिर पर से एंटी क्लॉक वाइज 7 बार घुमाकर होली की जलती हुई अग्नि में डाल दिया जाए तो जीवन की सारी नकारात्मकता खत्म हो जाती हैहोलिकादहन करने या फिर उसके दर्शन मात्र से भी व्यक्ति को शनि-राहु-केतु के साथ नजर दोष से मुक्ति मिलती है। होली की भस्म का टीका लगाने से नजर दोष तथा प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है। 6. जिन लोगों को अपनी नाम राशि लग्न राशि नहीं पता यह जिनको अपनी जन्म कुंडली के बारे में ज्ञान नहीं है वह लोग होलिका दहन के दिन गोबर के उपले गेहूं की बालियां और काले तिल लेकर होलिका की जलती अग्नि में डालकर तीन बार परिक्रमा करके प्रार्थना करें तो उनके जीवन में से सभी तरह की समस्याएं विघ्न बाधाएं अपने आप खत्म हो जाते हैं ..और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है 7. किसी को मन संबंधी समस्याएं मानसिक परेशानी है या किसी की कुंडली में चंद्रमा पीड़ित है तो वह होलिका दहन के बाद घर आकर अपने हाथ पैर धोकर अगर चंद्रमा के दर्शन करते हुए चंद्रमा की रोशनी में बैठे और श्री कृष्ण के किसी भी मंत्र ओम नमो भगवते वासुदेवाय ,ओम क्लीम कृष्णाय नमः, या गीता का पाठ करें तो निश्चित रूप से उनके सभी तरह की मानसिक परेशानियां दूर होने के साथ-साथ जीवन के सभी दिक्कत और परेशानियां खत्म हो जाती है मन मजबूत होता है
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★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। ★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। ★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। ★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। ★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। ★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। ★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। ★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। ★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। ★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, ★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। ★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। ★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। ★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। ★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए । ★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। ★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। ★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती। ★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे। ★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे। ★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। ★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। ★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। ★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। ★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। ★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे। ★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। ★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है। ★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। ★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए। ★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। ★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें। ★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।
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कुंडली में शुभ ग्रहों की स्थिति, युति या दृष्टि से राज योग का निर्माण होता है। कुंडली में मौजूद राज योग से आपके जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं। कुंडली में राज योग के होने से सकारात्मकता की भावना आपके अंदर आती है, राज योग के समय काल को जानकर आप इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सकते हैं। जरूरी कदम उठाकर आप अपने स्वर्णिम काल के दौरान अपने जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। आपकी कुंडली में राज योग कुंडली में केंद्र (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण (5, 9) भावों के बीच संबंध से राज योग का निर्माण होता है। इन भावों के स्वामियों के बीच जितना मजबूत संबंध होता है, उतना ही शक्तिशाली राज योग बनता है। लग्न को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है यह केंद्र के साथ-साथ यह त्रिकोण भाव भी माना जाता है। नीचे दी गई परिस्थितियों में जातक की कुंडली में राज योग का निर्माण होता है। जब केंद्र और त्रिकोण भाव के स्वामी एक दूसरे के साथ एक ही घर में होते हैं तो राज योग का निर्माण होता है। जब केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामी एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तो कुंडली में राज योग बनता है। जब केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामी ग्रह परस्पर परिवर्तन योग में हैं तो बहुत मजबूत राज योग का निर्माण होता है। उदाहरण के लिये, वृषभ लग्न का स्वामी शुक्र नवम भाव में विराजमान है, जोकि एक त्रिकोण भाव है और इस भाव का स्वामी शनि लग्न में विराजमान है तो, यह बहुत शक्तिशाली राज योग बनता है। कुंडली में ग्रहों के परिवर्तन से ग्रहों के बीच शक्तिशाली संयोजन बनता है इसलिये यह राज योग बहुत शक्तिशाली होता है। ग्रहों की दृष्टि से सबसे मजबूत राज योग बनता है और उसके बाद ग्रहों की युति से। जितने शुभ ग्रहों का संयोजन एक कुंडली में होगा उतना शक्तिशाली राज योग बनेगा। अगर शुभ ग्रहों पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है तो राज योग की शक्ति कम हो जाती है। अगर किसी की कुंडली में एक से ज्यादा ऐसे संयोग बन रहे हैं जिनसे राज योग का निर्माण होता है तो यह बहुत शुभ माना जाता है। यदि किसी की जन्म कुंडली में सूर्य और बुध दशम भाव में हैं और राहु और मंगल षष्ठम भाव में हैं तो राज योग बनता है। इस राज योग के चलते व्यक्ति को समाज में बहुत मान-सम्मान प्राप्त होता है। जब चतुर्थ, पंचम, नवम और दशम भाव में कोई भी पाप ग्रह विराजमान नहीं होता तो, कुंडली में एक मजबूत राज योग का निर्माण होता है। बृहस्पति की चंद्रमा या मंगल से यदि युति हो रही है तो राज योग का निर्माण होता है। जब चतुर्थ, पंचम और सप्तम भाव के स्वामी केंद्र या लग्न में युति करते हैं तो इसे एक शुभ राज योग माना जाता है। यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न, पंचम और नवम भाव के स्वामी ग्रह एक दूसरे के घरों में विराजमान हों तो ऐसे में राज योग का निर्माण होता है और ऐसा व्यक्ति राजा की जैसी जिंदगी जीता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के एकादश भाव में बहुत सारे शुभ ग्रह विराजमान हों तो ऐसे में राज योग का निर्माण होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में सुख-सुविधाएं पाता है। जिस जातक की कुंडली में त्रिकोण के ग्रह अपने घर में हों या उच्च के हों तो यह स्थिति भी राज योग कहलाती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक प्रकृति का होता है और जीवन में काफी धन कमाता है। जिस जातक की कुंडली में त्रिकोण के ग्रह अपने घर में हों या उच्च के हों तो यह स्थिति भी राज योग कहलाती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक प्रकृति का होता है और जीवन में काफी धन कमाता है। बृहस्पति ग्रह यदि लग्न में चंद्रमा के साथ युति बना रहा हौ और कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत हो तो ऐसा व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करता है।
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