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पूजा करते समय कहीं आप भी भूल तो नही जाते यह काम

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ईश्वर का नाम रोज स्मरण करने और नियमित रूप से पूजा पाठ करने से मन में आत्मिक शांति का एहसास होता है। ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव से नकारात्मक समय में भी लोग उम्मीद की एक छोटी सी किरण पर भी विश्वास कर पाते हैं। आस्था आपके मन को भीतर से मजबूत बनाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईश्वर की आराधना करते वक्त कुछ नियमों का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी होता है। कई लोग घर में पूजाघर बनाते वक्त छोटा सा मंदिर बनवाना पसंद करते हैं क्योंकि हमेशा तो मंदिर नहीं जाया जा सकता है। लेकिन इस बात का ख्याल रखें कि पूजाघर में कोई भी मूर्ति स्थापित करने से पहले मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा जरूर करें। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जिस घर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा होती है वहां प्रभु साक्षात निवास करते हैं। आपकी कुलदेवी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती हैं। ऐसी भी मान्यता है कि अगर लोग अपनी राशियों के अनुसार देवियों का पूजा पाठ करेंगे तो उनका भाग्य अच्छा रहेगा और उनके ऊपर ईश्वर की कृपा भी बरसती रहेगी। कई लोग नियमित तौर से पूजा करते वक्त तुलसी पूजन करना भूल जाते हैं जबकि हिंदू धर्म में तुलसी को भी माना गया है और तुलसी पूजन के लाभ भी बताये गए हैं। मान्यता है कि जिस घर में मां तुलसी की पूजा अर्चना होती है वहां सुख समृद्धि का वास होता है और घर की स्त्रियां और गृहस्वामी प्रसन्न रहते हैं।

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पूजा करते समय कहीं आप भी भूल तो नही जाते यह काम
posted Feb 3 by Deepika Maheshwary

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ईश्वर का नाम रोज स्मरण करने और नियमित रूप से पूजा पाठ करने से मन में आत्मिक शांति का एहसास होता है। ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव से नकारात्मक समय में भी लोग उम्मीद की एक छोटी सी किरण पर भी विश्वास कर पाते हैं। आस्था आपके मन को भीतर से मजबूत बनाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईश्वर की आराधना करते वक्त कुछ नियमों का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी होता है। कई लोग घर में पूजाघर बनाते वक्त छोटा सा मंदिर बनवाना पसंद करते हैं क्योंकि हमेशा तो मंदिर नहीं जाया जा सकता है। लेकिन इस बात का ख्याल रखें कि पूजाघर में कोई भी मूर्ति स्थापित करने से पहले मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा जरूर करें। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जिस घर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा होती है वहां प्रभु साक्षात निवास करते हैं। आपकी कुलदेवी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती हैं। ऐसी भी मान्यता है कि अगर लोग अपनी राशियों के अनुसार देवियों का पूजा पाठ करेंगे तो उनका भाग्य अच्छा रहेगा और उनके ऊपर ईश्वर की कृपा भी बरसती रहेगी। कई लोग नियमित तौर से पूजा करते वक्त तुलसी पूजन करना भूल जाते हैं जबकि हिंदू धर्म में तुलसी को भी माना गया है और तुलसी पूजन के लाभ भी बताये गए हैं। मान्यता है कि जिस घर में मां तुलसी की पूजा अर्चना होती है वहां सुख समृद्धि का वास होता है और घर की स्त्रियां और गृहस्वामी प्रसन्न रहते हैं।
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हिन्दू धर्म में यूँ तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जिसका पालन हर किसी को करना चाहिए लेकिन उनमें से भी कुछ ही ऐसी बातें होती है जिसका पालन लोग कर पाते हैं। लेकिन जब बात आती है ईश्वर भक्ति की तो विशेष रूप से इस दौरान भूलकर भी कोई ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए जिसके दुष्परिणाम आपको बाद में झेलने पड़े। पूजा पाठ के लिए अक्सर लोग कुछ ख़ास बर्तनों का प्रयोग करते हैं, आज कल बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो पूजा के लिए स्टील के बर्तनों का प्रयोग करते हैं, जबकि उन्हें ऐसा भूलकर भी नहीं करना चाहिए। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर क्यों स्टील के बर्तनों को पूजा पाठ के लिए वर्जित माना जाता है। आइये जानते हैं क्या है इसके पीछे की मुख्य वजह। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा पाठ के लिए हर किसी को ख़ास नियमों का पालन जरूर करना चाहिए। खासतौर से जो नियम हमारे शास्त्रों में बताये गए हैं उसकी अवहेलना भूलकर भी नहीं करनी चाहिए। ईश्वर की पूजा अर्चना के लिए विशेष रूप से स्टील के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना गया है। माना जाता है कि ईश्वर की पूजा के लिए प्रयोग किये जाने वाले विभिन्न धातुओं का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। पूजा के लिए इन धातुओं के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना जाता है आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विशेष रूप से हिन्दू धर्म में पूजा पाठ के दौरान स्टील, एल्मुनियम और लोहे के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। अगर आप इन धातु से बने ईश्वर की मूर्ती की भी पूजा करते हैं तो उसका फल आपको ना के बराबर ही मिलता है। आपके मन में ये सवाल जरूर उठ रहा होगा की आखिर इस धातु के बर्तनों को अशुभ क्यों माना जाता है। बता दें कि स्टील के बर्तन मानव निर्मित होते हैं इसलिए उसका प्रयोग वर्जित माना गया है। एल्मुनियम के बर्तनों में जल्द कालिख लग जाती है इसलिए उसे भी वर्जित माना जाता है। बात रही लोहे के बर्तनों की तो उनमें जंग लग जाने की वजह से पूजा के प्रयोग के लिए वर्जित माना गया है। पूजा के लिए इन बर्तनों का प्रयोग माना जाता है शुभ हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा पाठ के लिए जिन बर्तनों को शुभ माना जाता है वो खासतौर से प्राकृतिक धातु के बने होने चाहिए। इसलिए पूजा के दौरान पीतल, तांबा, सोना और चांदी के बर्तनों का प्रयोग करना शुभ फलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ईश्वर को प्रसाद चढ़ाने या जलाभिषेक करते समय केवल इन्हीं धातुओं से बने बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए। बहरहाल अब आप जान चुके होंगें की आखिर क्यों स्टील आदि के धातुओं का प्रयोग पूजा-पाठ के दौरान करना वर्जित माना जाता है। अगर आप भी आजतक पूजा के लिए स्टील के बर्तनों का प्रयोग करते आ रहे हैं तो इसे तत्काल रूप से बंद कर दें।
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मां दुर्गा की पूजा में भूलकर भी ना करें ये काम मां दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, व्रत करके आप भी मां भगवती से विशेष आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। जानिए मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए क्या करें और क्या ना करें। क्या करें: 1- मां दुर्गा के 108 नामों का जाप करें। 2- अपने घर में अखण्ड ज्योति अवश्य जलाएं। 3- सुबह, शाम मां दुर्गा की पूजा करें पूजा शुरु करने से पहले गणेश जी का ध्यान अवश्य करें। 4- मंत्र जाप या पूजा के तुरंत बाद भोजन ना करें। 5- 12 साल के कम उम्र की कन्याओं को प्रतिदिन फल, पेटा का प्रसाद दें। क्या ना करें : 1- दुर्गा मां का मंत्र जाप करते समय शरीर को हिलाएं नहीं, गा गा कर मंत्र जाप ना करें। 2- मन और विचारों में पवित्रता बनाए रखें। 3- नवरात्र में अपनी मां और मां की उम्र की महिलाओं का अपमान ना करें, उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। 4- छल,कपट प्रपंच और अपशब्दों का प्रयोग ना करें। 5- ब्रह्मचर्य का पालन करें, गलत लोगों की संगति ना करें। इस मंत्र का जाप करें: शरणागत दीनार्थ परित्राण परायणे सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणी नमोस्तुते । ।
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होलाष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है। होली और अष्टक, अर्थात होली से पहले के आठ दिन। सबसे पहले समझिये क्या है होलाष्टक…. देश भर में होली की तैयारी की शुरुआत हो चुकी है। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक के समय को होलाष्टक कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार होली के पहले आठ दिनों में कोई भी शुभ काम करने की मनाही होती है। इस बार होलाष्टक 3 मार्च से शुरू हो कर 9 मार्च तक रहेगा। होलाष्टक की शुरुआत में क्या करें? होलाष्टक के दिनों में ही होलिका दहन की लकड़ी और बाकी ज़रूरी सामान जुटाने शुरू कर देने की परंपरा है। इस दौरान भगवान कृष्ण और भगवान शिव की पूजा की जाती है। होलाष्टक के दौरान अलग-अलग दिनों में अलग-अलग चीज़ों से होली खेले जाने की भी परंपरा है। कहा जाता है कि इस दौरान प्रेम और ख़ुशियों के लिए अगर हम कुछ भी प्रयास करें तो वो सफल अवश्य होता है। होलाष्टक से जुड़ी पौराणिक मान्यता होलाष्टक से जुड़ी मान्यता के अनुसार बताया जाता है कि होली के पहले के इन आठ दिनों में प्रह्लाद को काफी यातनाएं दी गई थी। जानकारी के लिए बता दें कि जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को बंदी बनाया था वो दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी का ही दिन था। उसी दिन से प्रह्लाद को यातनाएं देनी शुरू कर दी गयी थीं। हालाँकि प्रह्लाद विष्णु भक्त थे जिसके चलते उन्होंने हर तरह के कष्ट और परेशानियाँ झेले और अंत में भगवान की कृपा से बच भी गए। तब अपने भाई हिरणकश्यप की परेशानी देखकर उसकी बहन होलिका मदद करने के लिए आई। होलिका को आग में ना जलने का वरदान प्राप्त था। ऐसे में वो प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ गयी। तब भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद तो आग से बच गए लेकिन होलिका इस अग्नि में जल गयी। इन आठ दिनों में प्रह्लाद के साथ जो यातनाएं हुईं उसी के चलते होलाष्टक के समय को अशुभ माना जाने लग गया। होलाष्टक के आठ दिनों में भूल से भी ना करें ये काम होलाष्टक के दौरान किसी भी तरह के शुभ काम को करने की मनाही होती है। इस बात के पीछे की मान्यता के अनुसार होलाष्टक की शुरुआत वाले दिन ही भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। होलाष्टक के इन आठ दिनों में हर एक दिन ग्रह उग्र रूप में होते हैं इसलिए इस दौरान कोई भी शुभ काम टाल दिया जाता है। हाँ लेकिन जहाँ इस दौरान मांगलिक काम वर्जित माने गए हैं वहीं इस दौरान जन्म-और-मृत्यु के बाद किये जाने वाले काम करने की कोई मनाही नहीं होती है। अब विस्तार से समझिये इन आठ दिनों में आपको क्या काम नहीं करने हैं : सबसे पहले तो इस दौरान किसी भी तरह का कोई भी मांगलिक काम, जैसे शादी, भूमि पूजन, गृह प्रवेश, या कोई नया व्यवसाय शुरू करना वर्जित माना गया है। होलाष्टक काल में नामकरण संस्कार, जनेऊ संस्कार, गृह प्रवेश, विवाह संस्कार, इत्यादि शुभ संस्कार भी नहीं किये जाने चाहिए। इस दौरान किसी भी तरह का यज्ञ, हवन इत्यादि भी नहीं करना चाहिए। होलाष्टक के दौरान नवविवाहित लड़कियों को अपने मायके में ही रहने की सलाह दी जाती है। होलाष्टक के दौरान ज़रूर करें ये काम होलाष्टक में जहाँ मांगलिक कार्य वर्जित बताये गए हैं वहीं इस दौरान किये जाने वाले कुछ ऐसे भी काम बताये गए हैं जिन्हें करने से आपको शुभ फल की प्राप्ति हो सकती है। जानिए क्या हैं वो काम, मान्यता है कि होलाष्टक के दौरान किये गए व्रत और दान से इंसान को भगवान का आशीर्वाद मिलता है और उनके सभी कष्ट भी दूर हो जाते हैं। इस दौरान दान-पुण्य का विशेष लाभ बताया गया है। इन दिनों में आप अपनी इच्छानुसार किसी ज़रूरतमंद को कुछ भी दान दे सकते हैं। होलाष्टक का महत्व ये आठ दिनों का समय जिसे होलाष्टक कहते हैं वो भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना गया है। कहते हैं कि इस समय के दौरान यदि तप किया जाये तो बहुत शुभ होता है। होलाष्टक पर पेड़ की एक शाखा काटकर उसे जमीन में लगाने का रिवाज़ हैं। उसके बाद इस शाखा पर रंग-बिरंगे कपड़े बांधे जाते हैं। बता दें कि इसी शाखा को प्रह्लाद का रूप माना जाता है।
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वर वधु कि कुण्डली मिलान करते समय किन किन बातो का ध्यान रखना आवश्यक है ? *** वर वधु कि कुण्डली मिलान करते समय किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है? आज के समय में धीरे धीरे कुण्डली मिलान का मूल स्वरूप नष्ट होता जा रहा है । अब केवल मात्र गुण मिलान ओर मांगलिक दोष को ही ध्यान में रखा जाने लगा है । कुण्डली में 1,4,7,8,12 वे स्थान पर मंगल ग्रह को देखते ही मांगलिक दोष कि घोषणा कर दी जाती है । जब कि यह गलत है, क्यों कि कुण्डली में कभी कभी मांगलिक दोष भंग भी हो रहा होता है, किन्तु उस ओर किसी किसी का ही ध्यान जाता है। मांगलिक दोष केवल मात्र मंगल से ही नहीं बनता है, मंगल दोष के समान ही शनि, सूर्य, राहु ओर क्षीण चन्द्रमा से भी दुर्योग बनते है । कई बार गुण ना मिलने पर नाम बदलकर गुण मिलान कर दिये जाते है, यह भी 100% गलत है । विधाता के लेख को एक इन्सान नही बदल सकता है । कुण्डली मिलान में ध्यान रखने योग्य बाते:-- 1. (प्रथमं आयु परिक्ष्येत) सर्वप्रथम वर, वधु आयु का विचार करना चाहिये । 2. वर वधु का चरित्र केसा है ?कही चरित्रहीन तो नही है । 3. वर वधु का भाग्य केसा है ? विवाह के बाद जीवन में अच्छा या बुरा किस प्रकार का परिवर्तन होगा । 4. वर वधु कि कुण्डली में कहीं क्लीब योग ( नपुंसक योग) तो नही है । 5. वर वधु कि कुण्डली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं । 6. आपका जीवनसाथी आपके प्रति कितना वफादार होगा । 7.वर ओर वधु कि ग्रह दशा कहीं एक साथ ही तो खराब नहीं हो रही है ? क्यों कि दोनो का एक साथ समय खराब होना, जीवन को नर्कमय बना देता है । दोनो में से एक का समय ठीक हो तो परिस्थिति पर विजय मिल जाती है । 8.वर वधु कि कुण्डली में धन योग है या नहीं । क्यों कि धन के बिना जीवन असम्भव है । 9. वर वधु का स्वभाव किस प्रकार का है ? दोनो मे से किसी एक का खराब स्वभाव वैवाहिक जीवन को नष्ट कर देता है । इन सब बातो का विचार कुण्डली मिलान के समय करना चाहिये । प्रेम विवाह करने वालो को अपने आप पर पूर्ण भरोसा होता है, उन्हे पूरा विश्वास होता है कि उनका जीवन सुखी रहेगा, किन्तु सबसे अधिक तलाक प्रेम विवाह करने वालो के ही होते है । अधिकांश लोग तर्क देते है कि विदेशो में इन सब बातो पर कोइ ध्यान नही दिया जाता है, फिर भी वहाँ के लोग सुखी क्यों है ? उत्तर:-- विदेशो में सबसे अधिक तलाक होते है, ओर उन्हे तलाक से कोइ फर्क नही पडता है यह उनके लिये आम बात है । जब तक मन रहा साथ रहते है, जब मन किया छोड देते है । विवाह मानव जीवन कि एक महत्वपूर्ण घटना है । हमारे भारतीय समाज में एक ही विवाह को श्रेष्ठ माना गया है । तलाक लेकर दूसरा विवाह करने वालो को अच्छी दृष्टि से नही देखा जाता है । अतः विवाह का फैसला बहुत ही सोच समझकर लेना चाहिये । पं.पुष्पेन्द्र भारद्वाज
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