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एकाक्षी नारियल पूजा

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सामान्य नारियल की आकृति में तीन छिद्र दिखाई देते हैं जिन्हें प्रचलित भाषा में दो आंखें व एक मुख कहा जाता है। ध्यान से देखने पर आपको नारियल में तीन खड़ी रेखाएं भी दिखाई देती हैं किन्तु एकाक्षी नारियल अर्थात् श्रीफल में केवल दो छिद्र होते हैं। जिन्हें एक मुख व एक आँख कहा जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है एकाक्षी अर्थात् एक आँख वाला। एकाक्षी नारियल में तीन के स्थान पर केवल दो रेखाएं ही होती हैं। एकाक्षी नारियल प्राप्त होने पर विशेष मुहूर्तों जैसे दीपावली, होली, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, ग्रहण काल आदि पर षोडषोपचार पूजा कर उसे लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान या तिजोरी में रखने या पूजा स्थान में रखने से सदैव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। एकाक्षी नारियल में धन आकर्षण की अद्भुत क्षमता होती है। कैसे करें एकाक्षी नारियल की पूजा एकाक्षी नारियल प्राप्त होने पर किसी शुभ मुहूर्त जैसे दीपावली, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, होली इत्यादि में इसका विधिवत् पूजन करें। पूजाघर में एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं उस पर एकाक्षी नारियल स्थापित करें। घी व सिन्दूर का लेप तैयार करें। उस लेप को एकाक्षी नारियल पर अच्छे से लगाएं ध्यान रहे कि केवल आंख को छोड़कर शेष पूरे नारियल को घी मिश्रित सिन्दूर के लेप से आवेष्टित करना है। तत्पश्चात एकाक्षी नारियल को कलावा या मौली से लपेटकर अच्छी तरह से पूरा ढंककर लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर उसकी षोडषोपचार पूजा करें। पूजा के उपरान्त निम्न मंत्र की कम से कम 11 माला कर एकाक्षी नारियल को सिद्ध करें। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं महालक्ष्मी स्वरूपाय एकाक्षी नारिकेलाय नम: जप के उपरान्त निम्न मंत्र की 1 माला से हवन करें। "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं महालक्ष्मी स्वरूपाय एकाक्षि नारिकेलाय सर्वसिद्धिं कुरू कुरू स्वाहा॥"

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संकलित
posted Feb 3 by Jyotish Vimal Jain

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तुलसी पौधे का नाम सुनते ही हमारे मन में पवित्र भाव आने लगते हैं। यह इस बात का संकेत है कि तुलसी का हमारे जीवन में कितना बड़ा महत्व है। तुलसी कोई आम पौधा नहीं है बल्कि यह अपने चमत्कारिक गुणों के कारण एक विशिष्ट पौधा हो जाता है। शास्त्रों में इसे माँ लक्ष्मी का रूप माना गया है। इसलिए जिस घर में तुलसी का पौधा होता है उस घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। धार्मिक महत्व के साथ-साथ तुलसी पौधे का आयुर्वेदिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व भी है। ज्योतिष शास्त्र में तुलसी के पौधे के अचूक उपाय बताए गए हैं। वहीं आयुर्वेद की दृष्टि से भी यह पौधा कई रोगों के उपचार के लिए रामबाण है और वैज्ञानिक रूप से भी इसके महत्व को कम नहीं आंका जा सकता है। तुलसी के प्रकार राम तुलसी श्याम तुलसी श्वेत/विष्णु तुलसी वन तुलसी नींबू तुलसी तुलसी का धार्मिक महत्व यह तुलसी पौधे की महानता है कि भारत वर्ष में तुलसी विवाह को धार्मिक त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह विवाहोत्सव कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) तिथि को मनाया जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु का विवाह तुलसी जी के साथ किया जाता है। यह प्रक्रिया वैवाहिक मंत्रोच्चारण के साथ होती है और भगवान विष्णु और तुलसी के ऊपर सिंदूरी रंग में रगे हुए चावल डालकर शादी को विधिपूर्वक संपन्न किया जाता है। इसके अलावा घर-घर में इस पौधे की पूजा होती है। तुलसी की आराधना मंत्र सहित करनी चाहिए। तुलसी मंत्र तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी। धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।। लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्। तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।। तुलसी पूजा के नियम सबसे पहले तुलसी को नमन करें उसके बाद तुलसी पर शुद्ध जल चढ़ाएँ अब सिंदूर और हल्दी चढ़ाएँ पूजा हेतु घी का दीया जलाएँ माँ लक्ष्मी का स्मरण कर तुलसी जी की आरती करें अंत में सुख-शांति और भाग्य की कामना करें तुलसी का ज्योतिषीय महत्व ज्योतिषीय दृष्टिकोण से तुलसी का पौधा बेहद अहम है। यह पौधा चंद्र और शुक्र ग्रह के दोषों को दूर करने में सहायक होता है। इसलिए जिस जातक की कुंडली में सूर्य और चंद्रमा की स्थिति कमज़ोर हो तो उस जातक को तुलसी की पूजा और तुलसी की माला धारण करनी चाहिए। तुलसी की आराधना करने से कुंडली में अष्टम और षष्ट भाव से संबंधित दोष दूर होते हैं और सप्तम भाव भी मजबूत होता है। यदि विवाहित जातक तुलसी की नित्य आराधना करते हैं तो उसके वैवाहिक जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और पति-पत्नी के बीच रिश्ता अटूट होता है। तुलसी का पौधा वास्तु दोषों को दूर करता है। तुलसी का आयुर्वेदिक महत्व आयुर्वेदिक औषिधि के लिए तुलसी बहुत काम आती है। यह विष और दुर्गंध नाषक औषिधि है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी तुलसी मदद करती है। यदि रोजाना तुलसी की एक पत्ती को चबाकर खाया जाए तो व्यक्ति को कफ विकार की समस्या नहीं होगी। तुलसी के पत्ते को काली मिर्च के साथ खाने से सर्दी-जुकाम तथा खांसी जैसी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। इससे स्वाइन फ्लू जैसी गंभीर बीमारी का इलाज संभव है। तुलसी का पौधा घर में नकारात्मक प्रभावों और प्रदूषण को दूर करता है। तुलसी का वैज्ञानिक महत्व विज्ञान की दृष्टि से तुलसी एक महत्वपूर्ण पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम ऑसीमम सैंक्टम है। तुलसी का पौधा वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड गैस को सोख कर ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है। इसलिए इसके आसपास का लगभग 50 मीटर का क्षेत्र पूर्ण रूप से शुद्ध रहता है। इसके साथ ही तुलसी के प्रभाव से घर में पिस्सू और मलेरिया के जीव आदि नहीं पनपते हैं। तुलसी का मुख्य गुण डी-टॉक्सिफिकेशन करना है जो शरीर में रक्त को शुद्ध करता है। सावधानियाँ वास्तु के अनुसार घर में तुलसी का पौधा ईशान कोण में लगाना चाहिए रविवार को छोड़कर स्नान के बाद प्रातः तुलसी को जल चढ़ाएँ गणेशजी, शिवजी और भैरव जी के ऊपर तुलसी के पत्ते न चढ़ाएं तुलसी के पत्ते 11 दिनों तक शुद्ध रहते हैं अतः इन पर गंगा जल छिड़कर पूजा के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है रविवार, एकादशी, द्वादशी, संक्रांति और संध्याकाल के समय तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए!
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रंगों का अपना एक विशेष महत्व है। रंग व्यक्तित्व को निखारते हैं। खुशी का अहसास कराते हैं। मन की भावनाएँ भी दर्शाते हैं। कई रोग भी रंगों द्वारा ठीक किए जाते हैं जिन्हें हम कलर थैरेपी के नाम से जानते हैं। तो क्या रंग हमारे भाग्य को तय करने में भी कोई भूमिका निभाते हैं? जो लोग इस पर विश्वास करते हैं, उनका तो जवाब यही है कि हाँ! दिनों के हिसाब से रंगों का चुनाव फायदेमंद है। जानते हैं सप्ताह के दिनों के हिसाब से कौन सा रंग कौन से दिन पहना जा सकता है सोमवार- सोमवार यानी शीतल चंद्रमा का दिन। इसलिए इस दिन का रंग है सफेद । मंगलवार - यह हनुमानजी का दिन है। उनकी मूर्तियों में भगवा रंग में देखा है। इसलिए इस दिन का विशेष रंग है भगवा, जिसे अंग्रेजी में ऑरेंज कलर कहते हैं। बुधवार- तीसरा दिन होता है देवों के देव गणपति का, जिन्हें सबसे ज्यादा प्रिय है दूर्वा। इसलिए इस दिन हरे रंग का महत्व है। गुरुवार- यानी हफ्ते का चौथा दिन, जो बृहस्पति देव और साईं बाबा का है। बृहस्पति देव स्वयं पीले हैं, तो इस दिन का रंग है पीला। शुक्रवार- यह देवी माँ का दिन होता है, जो सर्वव्यापी जगतजननी हैं। इसलिए यह दिन सभी रंगों का मिक्स या प्रिंटेड कपड़ों का होता है। वैसे शुक्र ग्रह से संबंधित सफेद रंग या गुलाबी रंग का प्रयोग किस दिन किया जा सकता है शनिवार- शनि देवता को समर्पित इस दिन नीला कलर पहना जाता है। रविवार- सूर्य की उपासना के इस दिन लाल रंग ,मरून लालिमा युक्त रंग का विशेष महत्व है। कुछ रंगों से हमारा अच्छा तालमेल होता है, जो हमें 'पॉजीटिव एनर्जी' देते हैं। इसलिए कुछ खास रंग हमें ज्यादा आकर्षित करते हैं। इसे ही 'कलर साइंस' या रंग विज्ञान कहा जाता है। लेकिन ज्योतिष पर यकीन करने वाले भी दिन के लिहाज से रंगों का चयन करने लगे हैं।
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कुण्डली का अष्टम भाव ( 8 हाउस) और शनि ********************* फलित ज्योतिष में कुंडली का आठवा भाव और शनि दोनों ही बड़े महत्वपूर्ण और चर्चित विषय हैं कुंडली में अष्टम भाव को मृत्यु, कारागार, यानी जेल दुर्घटना, बड़े संकट, आकस्मिक दुर्घटनाएं, शरीर कष्ट आदि का कारक होने से दुःख भाव या पाप भाव के रूप में देखा जाता है तो वहीँ शनि को – कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलयम प्रोडक्ट, मशीन, औजार, तपश्या और अध्यात्म का करक मन गया है। स्वास्थ की दृष्टि से शनि हमारे पाचन–तंत्र, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांतों को भी नियंत्रित करता है। कुंडली में अष्टम भाव को पाप या दुःख भाव होने से अष्टम भाव में किसी भी ग्रह का होना अच्छा नहीं माना गया है इसमें भी विशेषकर पाप या उग्र ग्रह का अष्टम में होना अधिक समस्या कारक माना गया है कुंडली में कोई भी ग्रह अष्टम भाव में होने से वह ग्रह पीड़ित और कमजोर स्थिति में आ जाता है साथ ही स्वास्थ की दृष्टि से भी बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं अब विशेष रूप से शनि की बात करें तो शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना निश्चित रूप से अच्छा नहीं है इससे जीवन में बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं शनि के अष्टम भाव में होने को लेकर एक सकारात्मक बात यह तो है के कुंडली में अष्टम का शनि व्यक्ति को दीर्घायु देता है यदि कुंडली में अन्य बहुत नकारात्मक योग न बने हुए हों तो अष्टम भाव में स्थित शनि व्यक्ति की आयु को दीर्घ कर देता है पर इसके अलावा शनि अष्टम में होने से बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। यदि शनि कुंडली के आठवे भाव में स्थित हो तो ऐसे में व्यक्ति को पाचन तन्त्र और पेट से जुडी समस्याएं लगी ही रहती हैं इसके अलावा जोड़ो का दर्द, दाँतों तथा नाखूनों से जुडी समस्याएं भी अक्सर परेशान करती हैं, शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना व्यक्ति की आजीविका या करियर को भी अक्सर बाधित करता है करियर को लेकर कभी कभी संघर्ष की स्थिति बनी रहती है करियर में स्थिरता नहीं आ पाती और मेहनत करने पर भी व्यक्ति को अपनी प्रोफेशनल लाइफ में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते जो लोग राजनैतिक क्षेत्र में आगे जान चाहते हैं उनके लिए भी अष्टम भाव का शनि संघर्ष उत्पन्न करता है वैसे राजनीति और सत्ता का सीधा कारक सूर्य को माना गया है पर शनि जनता और जनसमर्थन का कारक होता है इस कारण राजनैतिक सफलता में शनि की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है कुंडली में शनि अष्टम भाव में होने से व्यक्ति को जनता का अच्छा सहयोग और जनसमर्थन नहीं मिल पाता जिससे व्यक्ति सीधे चुनावी राजनीती में सफल नहीं हो पाता या बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ता है शनि अष्टम में होने से व्यक्ति को अपने कार्यों के लिए अच्छे एम्पलॉयज या सर्वेंट नहीं मिल पाते यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बिजनेस या व्यापार में सफलता के अच्छे योग हों पर शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो ऐसे में लोहा, स्टील, काँच, पुर्जे, पेंट्स, केमिकल प्रोडक्ट्स, पेट्रोल आदि का कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सभी वस्तुएं शनि के ही अंतर्गत आती हैं और अष्टम में शनि होने पर इन क्षेत्रों में किया गया इन्वेस्टमेंट लाभदायक नहीं होता हानि की अधिक संभावनाएं रहती हैं यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो ऐसे में शनि दशा स्वास्थ कष्ट और संघर्ष उत्पन्न करने वाली होती है। अष्टम में शनि होना किसी भी स्थिति में शुभ तो नहीं है पर यदि यहाँ स्व उच्च राशि में हो या बृहस्पति से दृष्ट हो तो समस्याएं बड़ा रूप नहीं लेती और उनका समाधान होता रहता है। यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में होने से ये समस्याएं उत्पन्न हो रही हों तो निम्नलिखित उपाय करना लाभदायक होगा। 1.रोज़ ॐ शम शनैश्चराय नमः का जप करें। 2. साबुत उड़द का दान करें। 3. शनिवार को पीपल पर सरसों के तेल का दिया जलायें। ।। श्री हनुमते नमः ।।. ॐ शनिदेवाय नमः
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कुण्डली के लग्न भाव में बुध का प्रभाव लग्नस्थ बुध जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमान बनाता है. जातक स्वभाव से विनम्र, शांत धैर्यवान, उदार तथा सत्य प्रेमी होता है. लग्नस्थ बुध का जातक परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको ढालने की अद्भुद क्षमता होती है। वह परिस्थितियों का आंकलन कर उचित समय पर निर्णय ले लेता है। बुध जिस भी राशि में हो उसका गुण आत्मसात कर लेता है फलतः ऐसे जातक बहुत जल्दी दूसरों से घुल मिल जाते हैं तथा किसी भी बात को बहुत शीघ्रता से समझ लेते हैं. लग्न में बैठा बुध जातक को बुद्धिमान तथा जिज्ञासु बनाता है. ऐसा जातक गणित में कुशल होता है। लग्नस्थ बुध का जातक आत्म केन्द्रित होता है तथा तर्क सांगत दृष्टिकोण रखता है. व्यवहार से हास परिहास प्रेमी तथा वार्ता में कुशल होता है. ऐसे जातक अक्सर विवादों को बहुत कुशलता से सुलझा देते हैं. लग्नस्थ बुध जातक को गहन अध्यन में रूचि देता है. लग्नस्थ बुध के जातक के जीवन में यात्राओं का विशेष महत्व होता है. जीवन में अनेक बार वह यात्राएं करता है कभी मौज मस्ती के लिए तो कभी व्यापार के लिए। यदि लग्न में बुध हो तो कुंडली के अनेक दोषों का नाश होता है. लग्नस्थ बुध जातक को धनि , यशस्वी तथा एक प्रतिभासंपन्न विद्वान् बनाता है. लग्नस्थ बुध के जातक अधिकतर ललित कला प्रेमी होते हैं. शुभ ग्रहों की दृष्टि/ प्रभाव या युति के कारण जातक के गुणों में और अधिक वृद्धि होती है। सूर्य + बुध = व्यापार कुशल तथ कर्तव्यनिष्ठ चन्द्रमा + बुध = कमीशन के कार्यों या अनाज के थोक कार्यों से लाभ। मंगल + बुध = भवन निर्माण या मशीनरी कार्यों में दक्षता बुध + गुरू = स्वभाव में धार्मिकता और अध्यात्मिकता बुध + शुक्र = ललित कलाओं में रूचि बुध + शनि = आंकड़ो के विश्लेषण में दक्षता विषम राशि यानी (मेष , मिथुन, सिंह, तुला , धनु , कुम्भ) का बुध शुभ माना गया है ऐसा जातक पत्रकारिता, लेखन या सम्पादन के क्षेत्र में सफलता पाते हैं वहीँ सम(even) राशि ( वृषभ, कर्क, कन्या , वृश्चिक, मकर और मीन) का बुध जातक को पुत्रों का सुख एवं लाभ देता है। अग्नि तत्व राशि (मेष, सिंह, धनु ) का बुध जातक को लाभ तो देता है परन्तु भ्रष्ट और अनैतिक मार्ग द्वारा। भू तत्व राशि (वृषभ, मकर, कन्या ) का बुध जातक को अंतर्मुखी एवं एकांत प्रिय बनाता है । वायु तत्व राशि (तुला, कुम्भ, मिथुन) का बुध जातक की कल्पना शक्ति को बहुत बढ़ावा देता है तथा लेखन, अन्वेषण या शोध कार्यों में सफलता दिलाता है। जल तत्व राशी (कर्क, वृश्चिक, मीन) का बुध जातक को प्रकाशन कार्यों में सफल बनाता है।
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सभी ग्रहों में से शुक्र ग्रह को सबसे चमकीला ग्रह माना जाता है, जो प्रेम का प्रतीक होता है। जहाँ शास्त्रों अनुसार शुक्र को असुरों के देवता शुक्राचार्य बताया गया है, तो वहीं ज्योतिष विज्ञान में इसे स्त्री गृह माना गया है। शुक्र मनुष्य की कामुकता, उसके सौंदर्य, भौतिक सुख और ऐश्वर्य का कारक प्राप्त होता है। जिसके कारण जिस भी जातक की कुंडली में शुक्र शुभ स्थिति में या मजबूत होता है तो उसके परिणामस्वरूप जातक व्यक्तित्व से आकर्षक, सुंदर और मनमोहक होता है। शुक्र के सकारात्मक प्रभाव से व्यक्ति जीवनभर सुखी रहता है। इसीलिए शुक्र को सुंदरता और सुख का कारक माना जाता है। कुंडली में शुक्र की स्थिति का प्रभाव सौरमंडल के सभी ग्रहों में से शुक्र की चमक एवं शान सबसे अलग व निराली मानी जाती है, जिस कारण हर किसी की राशि में शुक्र की स्थिति का खासा महत्व होता है। इसके विपरीत जिस भी कुंडली में शुक्र निर्बल या कमज़ोर होता है तो ज्योतिषी अनुसार वो व्यक्ति शुक्र की आराधना कर उसे अपनी राशि में बलवान बनाकर उनसे सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति कर सकता है। शुक्र की शान्ति के लिए करें कुछ विशेष उपाय जैसा सभी जानते हैं कि आज हम अपने जीवन में सुख-सुविधाओं की वस्तुओं पर अधिक खर्च करते हैं, जिसका संबंध सीधे तौर पर शुक्र से होता है। इसलिए ही कहा गया है कि यदि अपने स्थान परिवर्तन के दौरान शुक्र की स्थिति किसी भी कुंडली में खराब या नकारात्मक हो जाती है या कोई भी अपने जीवन को ऐश्वर्य और आराम से भरपूर बनाना चाहते हैं तो उस व्यक्ति को विशेष तौर से शुक्र के कारगर उपाय करने चाहिए। शुक्र का गोचर ऐसे में शुक्र देव हमेशा की तरह एक बार पुनः अपना राशि परिवर्तन करते हुए अपने शत्रु ग्रहण सूर्य की राशि सिंह से निकलकर अपने मित्र ग्रह बुध की राशि कन्या में अपना स्थान परिवर्तन करने वाले हैं। जिसके चलते शुक्र मंगलवार, 10 सितंबर 2019 को 01:24 बजे कन्या राशि में गोचर करेगा जो वहां 4 अक्टूबर 2019 तक इसी राशि में स्थित रहेगा। इसलिए इससे करीब-करीब हर राशि प्रभावित होंगी। अशुभ शुक्र के लिए अवश्य करें ये काम वैदिक ज्योतिष में अशुभ शुक्र की शांति के लिए जातक को उससे संबंधित कारगर उपाय करने की सलाह दी गई है। अपनी राशि में शुक्र की मज़बूती के लिए कुछ विशेष वस्तुओं का दान करना चाहिए। जिसमें चाँदी, चावल, दूध, श्वेत वस्त्र आदि शामिल होते हैं। इसके अलावा शुक्र के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए जातक को हर शुक्रवार दुर्गाशप्तशती का पाठ करना भी उचित माना गया है। कन्या पूजन एवं शुक्रवार का व्रत करने से भी शुक्र के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शुक्र को बली या मजबूत करने के लिए जातक को अच्छी क्वालिटी का हीरा धारण करना चाहिए। इसके साथ ही यदि किसी कारणवश हीरा पहनना संभव न हो तो व्यक्ति अर्किन, सफेद मार्का, ओपल, स्फटिक आदि किसी भी शुभ वार, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्न में धारण कर सकता है। हर शुक्रवार शुक्र देव की पूजा के दौरान शुक्र के बीज मंत्र का जाप करना भी शुभ माना गया है ॐ शुं शुक्राय नमः। ॐ हृीं श्रीं शुक्राय नमः। शुक्र की शान्ति के लिए कारगर तांत्रिक उपाय काली चींटियों को चीनी खिलाना शुक्र से शुभ फलों की प्राप्ति हेतु बेहद कारगर होता है। शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना भी शुभ होता है। शुक्र को प्रबल बनाने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करें जिसकी एक आँख खराब हो। 10 वर्ष से कम आयु की कन्याओं का हर शुक्रवार पूजन करें। घर के फर्श पर और रसोई घर में सफेद पत्थर लगाएँ। किसी कन्या के विवाह में कन्यादान से भी शुक्र के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शुक्र देव से जुड़े कुछ विशेष मंत्र जीवन में आर्थिक संपन्नता, प्रेम और आकर्षण में वृद्धि हेतु जातक को शुक्र के बीज मंत्र “ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः” का उच्चारण करने की सलाह दी जाती है। इस मन्त्र का कम से कम 16000 बार उच्चारण करने से मान्यता अनुसार शुक्र के गोचर के दौरान उसके अशुभ प्रभावों से मुक्ति पाई जा सकती है। इसके अलावा देश-काल-पात्र सिद्धांत के अनुसार शुक्र के अशुभ प्रभावों को कम करने और राशि में उसके शुभ फलों की प्राप्ति के लिए इस बीज मंत्र का 64000 बार जाप करना चाहिए। इसके अलावा शुक्र को शांत करने के लिए “ॐ शुं शुक्राय नमः।” मंत्र का जाप भी किया जा सकता है। *********
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