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शेषनाग पर क्यों सोते हैं भगवान विष्णु

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जब-जब धरती पर पाप बढ़ता है तब-तब भगवान विष्णु किसी ना किसी रुप में अवतार लेते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है लेकिन शेषनाग उनके साथ हर अवतार में जुड़े हुए हैं। शेषनाग अनंत अर्थात् जिसकी कोई सीमा नहीं, का प्रतीक है। भगवान विष्णु उपयुक्त समय पर मानव जाति का मार्गदर्शन करते हैं। यही कारण है कि उन्हें सांपों के बिस्तर पर लेटा हुआ दिखाया जाता है। शेषनाग भगवान विष्णु को केवल आराम करने के लिए जगह ही नहीं देते बल्कि वे उनके रक्षक भी हैं। भगवान कृष्ण के जन्म के समय जब पिता वासुदेव उन्हें नंद के घर ले जा रहे थे तब शेषनाग ने ही तूफान से भगवान कृष्ण की रक्षा की थी। भगवान विष्णु और शेषनाग के बीच का संबंध शाश्वत है। भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार में बुरी शक्तियों का नाश करने के लिए शेषनाग उनके साथ जुड़े हुए हैं। त्रेता युग में शेषनाग ने लक्ष्मण का रूप लिया था जबकि द्वापर में वे बलराम के रूप में थे और दोनों ही जन्मों में उन्होंने राम और कृष्ण की सहायता की थी।

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शेषनाग पर क्यों सोते हैं भगवान विष्णु
posted Feb 13, 2020 by Deepika Maheshwary

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एक जुलाई 2020 को भगवान विष्णु चार महीने के लिए पाताल लोक चले जाएंगे. पंचांग के अनुसार इस दिन एकादशी की तिथि है. इसलिए इस दिन देवशयनी एकादशी का व्रत रखा जाता है. इस एकादशी को आषाढ़ी एकादशी, हरिसैनी एकादशी और वंदना एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. यह एक महत्वपूर्ण एकादशी है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. देवशयनी एकादशी व्रत का महत्व... पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करने से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है. जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और धन संबंधी दिक्कतें भी दूर होती हैं. व्रत के दौरान भगवान विष्णु और पीपल के वृक्ष की पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है. एकादशी का व्रत सभी व्रतों में सर्वोत्तम माना गया है. एकादशी के व्रतों का वर्णन वेद और पुराणों में भी मिलता है. महाभारत में भी एकादशी व्रत का जिक्र आता है. भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं महाभारत में एकादशी व्रत का महामात्य बताया था. मान्यता है कि एकादशी का व्रत रखने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती और हर मनोकामना पूर्ण होती है. देवशयनी एकादशी की तिथि यानि इस दिन से ही चार्तुमास का आरंभ माना जाता है. माना जाता है कि भगवान विष्णु इस एकादशी की तिथि से चार माह के लिए पातललोक में निवास करने के लिए जाते हैं. इसके बाद जब चार माह का समय पूर्ण हो जाता है और सूर्य देव, तुला राशि में प्रवेश करते उस दिन भगवान विष्णु का शयन समाप्त होता है. इस दिन को देव उठानी एकादशी कहते हैं. धार्मिक कार्य नहीं किए जाते हैं भगवान विष्णु के पाताल लोक में जाने के बाद धार्मिक कार्य वर्जित हो जाते हैं. इन चार महीनों तक भगवान विष्णु क्षीर सागर की अंनत शईया पर आराम करते हैं. इसलिए इन चार माह की अवधि में कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है. देवशयनी एकादशी मुहूर्त एकादशी तिथि प्रारम्भ- जून 30, 2020 को 07:49 PM एकादशी तिथि समाप्त- जुलाई 01, 2020 को 05:29 PM 2 जुलाई 2020: पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 05:27 AM से 08:14 AM देवशयनी एकादशी पूजा विधि देवशयनी एकादशी के बारे में मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए शयन के लिए चले जाते हैं। ऐसे में इस दिन भगवान के शयन में जाने से पहले उनकी विधिवत पूजा का विधान बताया गया है। इस दिन भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनके लिए व्रत रखते हैं। जो भी भक्त देवशयनी एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें सुबह जल्दी उठकर स्नान कर के साफ़ कपड़े पहनने चाहिए। इसके बाद पूजा वाली जगह साफ़ कर के वहाँ भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें और फिर षोडशोपचार विधि से पूजन करें। भगवान विष्णु को पीले वस्त्र, पीले फूल, पीला प्रसाद, पीला चन्दन इत्यादि चढ़ाएं। भगवान विष्णु को पान-सुपारी इत्यादि चढ़ाएं और फिर धूप-दीप इत्यादि जलाएं। भगवान विष्णु की पूजा में इस मंत्र, ‘‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।” का जाप अवश्य करें। इसके बाद ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएं और उन्हें दान दें और इसके बाद ही कुछ खाएं। हालाँकि इस समय सुरक्षा के लिहाज़ से ब्राह्मणों को घर बुलाकर भोजन कराने की जगह आप उनके नाम से भोजन निकाल कर, उसे मंदिर में दे आयें तो ज्यादा बेहतर होगा। इस दिन कई जगहों पर लोग रात्रि में जागकर भगवान विष्णु की पूजा भी करते हैं। देवशयनी एकादशी के दिन पहले विष्णु भगवान को शयन कराएं और उसके बाद ही खुद सोना चाहिए।
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--- पौराणिक कथाओं कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और पार्वती के दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। भगवान शिव ने काफी सोच-विचार कर एक प्रतियोगिता आयोजित की और कहा कि जो अपने वाहन पर सवार होकर समस्त तीर्थ और संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा वही पृथ्वी पर प्रथम पूजनीय होगा। कार्तिकेय ने शिवजी एवं पार्वती जी का आशीर्वाद लिया और अपने वाहन मोर पर तुरंत सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। इधर गणेश जी सोच में पड़ गए कि मेरा वाहन तो चूहा है। चूहा थोड़ा छोटा है और हम थोडे़ मोटे हैं। इस तरह तो हमारी हार पक्की है। तब गणेश जी ने सोचा कि माता-पिता में संपूर्ण तीर्थ होते हैं यदि मैं इनकी परिक्रमा कर लूंगा तो मुझे समस्त तीर्थ और समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करने का फल मिल जाएगा। ये सोचकर श्री गणेश जी महाराज ने अपनी मां पार्वती और पिता शिव जी से आशीर्वाद लिया और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा कर शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। इधर कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार हो पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे तो श्री गणेश को स्थान पर खड़ा पाकर कार्तिकेय ने कहा कि यह प्रतियोगिता मैंने जीत ली है क्योंकि गणेश जी अभी तक यहीं खड़े हैं। तब शिव जी ने कहा- पुत्र गणेश आपसे पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा कर चुका है, वही प्रथम पूजा का अधिकारी होगा। कार्तिकेय गुस्सा होकर बोले, पिताजी, यह कैसे संभव है? गणेश अपने वाहन चूहे पर बैठकर कई वर्षों में भी पूरी परिक्रमा नहीं कर सकता है! पिताजी आप मजाक क्यों कर रहे हैं ? तब भगवान भोले नाथ बोले- नहीं बेटे! गणेश अपने माता-पिता की परिक्रमा करके यह प्रमाणित कर चुका है कि इस ब्रह्माड में मात-पिता से बढ़कर कुछ नही है। गणेश ने संपूर्ण जगत् को इस बात का ज्ञान कराया है इसलिए इस दुनिया में सबसे पहले गणेश को ही पूजा जाएगा। इस तरह गणेश प्रथम पूजनीय बन गए।
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ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म शुक्रवार को हुआ है उन पर माँ लक्ष्मी और शुक्र दोनों का शुभ प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि शुक्रवार के स्वामी शुक्र देव है और इसकी देवी लक्ष्मी है। यही कारण है कि इस दिन जन्म लने वाले व्यक्ति भौतिक सुख सुविधाओं के आदी और शौकीन मिजाज होते है l शुक्रवार को जन्मे लोग जीवन को मौज मस्ती से व्यतीत करने के पक्षधर होते है। इस दिन जन्मे लोग विरोधियों को भी अपने पक्ष में करने की कला जानते है, इनमे एक अलग ही आकर्षण होता है। जिससे ये अपने मित्रों के दायरे में काफी लोकप्रिय होते है। शुक्रवार को जन्में लोग बड़े ही खुशमिजाज होते है और जिंदगी को एक जश्न की तरह जीते है। इनको कलात्मक चीजों और कला से गहरा लगाव होता है, इसलिये ये अपना कैरियर भी संगीत, लेखन, चित्रकला, फिल्म, फैशन, ब्यूटी इंडस्ट्री में बनाना पसंद करते है। ऐसे व्यक्ति आमतौर पर प्रसन्न दिखाई देते है। इनके चेहरे पर रौनक होती है।
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*सूर्य अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र भावार्थ सहित ,इस स्त्रोत से युधिष्ठिर को अक्षयपात्र की प्राप्ति हुयी थी!* ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव।। (ऋग्वेद ५।८२।५) समस्त संसार को उत्पन्न करने वाले (सृष्टि-पालन-संहार करने वाले) विश्व में सर्वाधिक देदीप्यमान एवं जगत को शुभकर्मों में प्रवृत्त करने वाले हे परब्रह्मस्वरूप सवितादेव! आप हमारे सभी आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक बुराइयों व पापों को हमसे दूर, बहुत दूर ले जाएं; किन्तु जो भला, कल्याण, मंगल व श्रेय है, उसे हमारे लिए–विश्व के सभी प्राणियों के लिए भली-भांति ले आवें (दें)।’ भुवन-भास्कर भगवान सूर्य!!!!!! भगवान सूर्य परमात्मा नारायण के साक्षात् प्रतीक हैं, इसलिए वे सूर्यनारायण कहलाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है–‘ज्योतिषां रविरंशुमान्’ अर्थात् मैं (परमब्रह्म परमात्मा) तेजोमय सूर्यरूप में भी प्रतिष्ठित हैं। सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं, इस ब्रह्माण्ड के केन्द्र हैं–आकाश में देखे जाने वाले नक्षत्र, ग्रह और राशिमण्डल इन्हीं की आकर्षण शक्ति से टिके हुए हैं। सभी प्राणियों और उनके भले बुरे कर्मों को निहारने में समर्थ होने के कारण वे मित्र, वरुण और अग्नि की आंख है। वे विश्व के पोषक व प्राणदाता, समय की गति के नियामक व तेज के महान पुंज हैं। उनकी उपासना से हमारे तेज, बल, आयु एवं नेत्रों की ज्योति की वृद्धि होती है। अथर्ववेद में कहा गया है कि सूर्य हृदय की दुर्बलता को दूर करते हैं। प्रात:कालीन सूर्य की किरणें विटामिन ‘डी’ का भंडार होती हैं जो मनुष्य के उत्तम स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। धर्मराज युधिष्ठिर के साथ ब्राह्मणों का वन गमन!!!!!! जिस समय भगवान श्रीकृष्ण दूर देश में शत्रुओं के विनाश में लगे थे, उस समय धर्मराज युधिष्ठिर जुए में अपना राज्य व धन-धान्यादि सब हार गए और उन्हें बारह वर्षों का वनवास जुए में हार स्वरूप मिला। दुर्योधन की कुटिल द्यूतक्रीड़ा से पराजित हुए पांचों पांडव जब द्रौपदी सहित वन को जाने लगे, तब धर्मराज युधिष्ठिर की राज्यसभा में धर्म का सम्पादन करने वाले हजारों वैदिक ब्राह्मणों का दल युधिष्ठिर के मना करने पर भी उनके साथ वन को चल दिया। युधिष्ठिर ने उन्हें समझाया–’वन की इस यात्रा में आपको बहुत कष्ट होगा अत: आप सब मेरा साथ छोड़कर अपने घर लौट जाएं।’ परन्तु ब्राह्मणों ने कहा–’हम वनवास में आपके मंगल के लिए प्रार्थना करेंगे और सुन्दर कथाएं सुनाकर आपके मन को प्रसन्न रखेंगे।’ युधिष्ठिर ब्राह्मणों का निश्चय जानकर चिन्तित हो सोचने लगे–’किसी भी सत्पुरुष के लिए अपने अतिथियों का स्वागत-सत्कार करना परम कर्तव्य है, तो ऐसी स्थिति में इन विप्रजनों का स्वागत कैसे किया जा सकेगा?’ कुछ दूर वन में जाकर युधिष्ठिर ने अपने पुरोहित धौम्य ऋषि से प्रार्थना की–’हे ऋषे! ये ब्राह्मण जब मेरा साथ दे रहे हैं, तब इनके भोजन की व्यवस्था भी मुझे ही करनी चाहिए। अत: आप इन सबके भोजन की व्यवस्था का कोई उपाय बताइए।’ तब धौम्य ऋषि ने कहा–’मैं ब्रह्माजी द्वारा कहा हुआ अष्टोत्तरशतनाम (एक सौ आठ नाम) सूर्य स्तोत्र तुम्हें देता हूँ; तुम उसके द्वारा भगवान सूर्य की आराधना करो। तुम्हारा मनोरथ वे शीघ्र ही पूरा करेंगे।’ महाभारत के वनपर्व में सूर्य अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का वर्णन!!!!!! सूर्य अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का वर्णन महाभारत के वनपर्व में तीसरे अध्याय में किया गया है– धौम्य उवाच: - सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्क: सविता रवि:। गभस्तिमानज: कालो मृत्युर्धाता प्रभाकर:।। पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्। सोमो बृहस्पति: शुक्रो बुधो अंगारक एव च।। इन्द्रो विवस्वान् दीप्तांशु: शुचि: शौरि: शनैश्चर:। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यम:।। वैद्युतो जाठरश्चाग्नि रैन्धनस्तेजसां पति:। धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदांगो वेदवाहन:।। कृतं त्रेता द्वापरश्च कलि: सर्वमलाश्रय:। कला काष्ठा मुहूर्त्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षण:।। संवत्सरकरोऽश्वत्थ: कालचक्रो विभावसु:। पुरुष: शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्त: सनातन:।। कालाध्यक्ष: प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुद:। वरुण: सागरोंऽशश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा।। भूताश्रयो भूतपति: सर्वलोकनमस्कृत:। स्रष्टा संवर्तको वह्नि: सर्वस्यादिरलोलुप:।। अनन्त: कपिलो भानु: कामद: सर्वतोमुख:। जयो विशालो वरद: सर्वधातुनिषेचिता।। मन:सुपर्णो भूतादि: शीघ्रग: प्राणधारक:। धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवो दिते: सुत:।। द्वादशात्मारविन्दाक्ष: पिता माता पितामह:। स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्।। देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुख:। चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेय: करुणान्वित:।। भगवान सूर्य के अष्टोत्तरशतनाम नाम (हिन्दी में)–ब्रह्माजी द्वारा बताए गए भगवान सूर्य के एक सौ आठ नाम जो स्वर्ग और मोक्ष देने वाले हैं, इस प्रकार हैं– १. सूर्य, २. अर्यमा, ३. भग, ४. त्वष्टा, ५. पूषा (पोषक), ६. अर्क, ७. सविता, ८. रवि, ९. गभस्तिमान (किरणों वाले), १०. अज (अजन्मा), ११. काल, १२. मृत्यु, १३. धाता (धारण करने वाले), १४. प्रभाकर (प्रकाश का खजाना), १५. पृथ्वी, १६. आप् (जल), १७. तेज, १८. ख (आकाश), १९. वायु, २०. परायण (शरण देने वाले), २१. सोम, २२. बृहस्पति, २३. शुक्र, २४. बुध, २५. अंगारक (मंगल), २६. इन्द्र, २७. विवस्वान्, २८. दीप्तांशु (प्रज्वलित किरणों वाले), २९. शुचि (पवित्र), ३०. सौरि (सूर्यपुत्र मनु), ३१. शनैश्चर, ३२. ब्रह्मा, ३३. विष्णु, ३४. रुद्र, ३५. स्कन्द (कार्तिकेय), ३६. वैश्रवण (कुबेर), ३७. यम, ३८. वैद्युताग्नि, ३९. जाठराग्नि, ४०. ऐन्धनाग्नि, ४१. तेज:पति, ४२. धर्मध्वज, ४३. वेदकर्ता, ४४. वेदांग, ४५. वेदवाहन, ४६. कृत (सत्ययुग), ४७. त्रेता, ४८. द्वापर, ४९. सर्वामराश्रय कलि, ५०. कला, काष्ठा मुहूर्तरूप समय, ५१. क्षपा (रात्रि), ५२. याम (प्रहर), ५३. क्षण, ५४. संवत्सरकर, ५५. अश्वत्थ, ५६. कालचक्र प्रवर्तक विभावसु, ५७. शाश्वतपुरुष, ५८. योगी, ५९. व्यक्ताव्यक्त, ६०. सनातन, ६१. कालाध्यक्ष, ६२. प्रजाध्यक्ष, ६३. विश्वकर्मा, ६४. तमोनुद (अंधकार को भगाने वाले), ६५. वरुण, ६६. सागर, ६७. अंशु, ६८. जीमूत (मेघ), ६९. जीवन, ७०. अरिहा (शत्रुओं का नाश करने वाले), ७१. भूताश्रय, ७२. भूतपति, ७३. सर्वलोकनमस्कृत, ७४. स्रष्टा, ७५. संवर्तक, ७६. वह्नि, ७७. सर्वादि, ७८. अलोलुप (निर्लोभ), ७९. अनन्त, ८०. कपिल, ८१. भानु, ८२. कामद, ८३. सर्वतोमुख, ८४. जय, ८५. विशाल, ८६. वरद, ८७. सर्वभूतनिषेवित, ८८. मन:सुपर्ण, ८९. भूतादि, ९०. शीघ्रग (शीघ्र चलने वाले), ९१. प्राणधारण, ९२. धन्वन्तरि, ९३. धूमकेतु, ९४. आदिदेव, ९५. अदितिपुत्र, ९६. द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों वाले), ९७. अरविन्दाक्ष, ९८. पिता-माता-पितामह, ९९. स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १००. मोक्षद्वार, १०१. देहकर्ता, १०२. प्रशान्तात्मा, १०३. विश्वात्मा, १०४. विश्वतोमुख, १०५. चराचरात्मा, १०६. सूक्ष्मात्मा, १०७. मैत्रेय, १०८. करुणान्वित (दयालु)। सूर्य के नामों की व्याख्या!!!!!!!! सूर्य के अष्टोत्तरशतनामों में कुछ नाम ऐसे हैं जो उनकी परब्रह्मरूपताप्रकट करते हैं जैसे–अश्वत्थ, शाश्वतपुरुष, सनातन, सर्वादि, अनन्त, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख, सर्वतोमुख, चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा। सूर्य की त्रिदेवरूपता बताने वाले नाम हैं–ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शौरि, वेदकर्ता, वेदवाहन, स्रष्टा, आदिदेव व पितामह। सूर्य से ही समस्त चराचर जगत का पोषण होता है और सूर्य में ही लय होता है, इसे बताने वाले सूर्य के नाम हैं–प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, जीवन, भूताश्रय, भूतपति, सर्वधातुनिषेविता, प्राणधारक, प्रजाद्वार, देहकर्ता और चराचरात्मा। सूर्य का नाम काल है और वे काल के विभाजक है, इसलिए उनके नाम हैं–कृत, त्रेता, द्वापर, कलियुग, संवत्सरकर, दिन, रात्रि, याम, क्षण, कला, काष्ठा–मुहुर्तरूप समय। सूर्य ग्रहपति हैं इसलिए एक सौ आठ नामों में सूर्य के सोम, अंगारक, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर व धूमकेतु नाम भी हैं। उनका ‘व्यक्ताव्यक्त’ नाम यह दिखाता है कि वे शरीर धारण करके प्रकट हो जाते हैं। कामद, करुणान्वित नाम उनका देवत्व प्रकट करते हुए यह बताते हैं कि सूर्य की पूजा से इच्छाओं की पूर्ति होती है। सूर्य के नाम मोक्षद्वार, स्वर्गद्वार व त्रिविष्टप यह प्रकट करते हैं कि सूर्योपासना से स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं। उत्तारायण सूर्य की प्रतीक्षा में भीष्मजी ने अट्ठावन दिन शरशय्या पर व्यतीत किए। गीता में कहा गया है–उत्तरायण में मरने वाले ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं। सूर्य के सर्वलोकनमस्कृत नाम से स्पष्ट है कि सूर्यपूजा बहुत व्यापक है। अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र के पाठ का फल!!!!!! एतद् वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजस:। नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत् स्वयंभुवा।। सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्। वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्।। सूर्योदये य: सुसमाहित: पठेत् स पुत्रदारान् धनरत्नसंचयान्। लभेत जातिस्मरतां नर: सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्।। इमं स्तवं देववरस्य यो नर: प्रकीर्तयेच्छुचिसुमना: समाहित:। विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान् मनसा यथेप्सितान्।। ये अमित तेजस्वी, सुवर्ण एवं अग्नि के समान कान्ति वाले भगवान सूर्य–जो देवगण, पितृगण एवं यक्षों के द्वारा सेवित हैं तथा असुर, निशाचर, सिद्ध एवं साध्य के द्वारा वन्दित हैं–के कीर्तन करने योग्य एक सौ आठ नाम हैं जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्मजी ने दिया है। सूर्योदय के समय इस सूर्य-स्तोत्र का नित्य पाठ करने से व्यक्ति स्त्री, पुत्र, धन, रत्न, पूर्वजन्म की स्मृति, धैर्य व बुद्धि प्राप्त कर लेता है। उसके समस्त शोक दूर हो जाते हैं व सभी मनोरथों को भी प्राप्त कर लेता है। सूर्योपासना से युधिष्ठिर को अक्षयपात्र की प्राप्ति!!!!! धौम्य ऋषि द्वारा बताए इस स्तोत्र और सूर्योपासना के कठिन नियमों का युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर अक्षयपात्र देते हुए युधिष्ठिर से कहा–’मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारे समस्त संगियों के भोजन की व्यवस्था के लिए मैं तुम्हें यह अक्षयपात्र देता हूँ; अनन्त प्राणियों को भोजन कराकर भी जब तक द्रौपदी भोजन नहीं करेगी, तब तक यह पात्र खाली नहीं होगा और द्रौपदी इस पात्र में जो भोजन बनाएगी, उसमें छप्पन भोग-छत्तीसों व्यंजनों का-सा स्वाद आएगा।’ जब वह पात्र मांज-धोकर पवित्र कर दिया जाता था और दोबारा उसमें भोजन बनता था तो वही अक्षय्यता उसमें आ जाती थी। इस प्रकार इस अक्षयपात्र की सहायता से धर्मराज युधिष्ठिर के वनवास के बारह वर्ष ऋषि-मुनि, ब्राह्मणों, और वनवासी सभी व्यक्तियों की सेवा करते हुए सरलता से व्यतीत हो गए। महाभारत के उसी प्रसंग में यह कहा गया है कि जो कोई मानव या यक्ष मन को संयम में रखकर, एकाग्रतापूर्वक युधिष्ठिर द्वारा प्रयुक्त स्तोत्र का पाठ करेगा, और कोई दुर्लभ वर भी मांगेगा तो भगवान सूर्य उसे वरदान देकर पूरा करेंगे। षष्ठी और सप्तमी को सूर्य की पूजा करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। अत: सूर्य की उपासना सभी को करनी चाहिए। जिन सहस्त्ररश्मि भगवान सूर्य के सम्बन्ध में यह निर्णय नहीं हो पाता कि वे वास्तव में देवता है या पालनकर्ता पिता; अर्चना करने योग्य ईश्वर हैं या गुरु; विश्वप्रकाशक दीपक हैं या नेत्र; ब्रह्माण्ड के आदिकारण हैं या कुछ और! किन्तु इतना निश्चित है कि वे सभी कालों, देशों और सभी दशाओं में कल्याण करने वाले मंगलकारक हैं।
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एकादशी के दिन भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा विधि-विधान से की जाती है। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। साथ ही इस दिन दान करने हजारों यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। इस दिन निर्जला व्रत रहा जाता है। जो लोग इस दिन व्रत नही रख पाते। वह लोग सात्विक का पालन करते है यानी कि इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा नहीं खाएं और झूठ, ठगी आदि का त्याग कर दें। साथ ही इस दिन चावल और इससे बनी कोई भी चीज नहीं खानी चाहिए। हम पुराने जमाने से यह बात सुनते चले आ रहे कि एकादशी के दिन चावल और इससे बनी कोई भी चीज नही खाई जाती है। लेकिन इसके पीछे सच्चाई क्या है यह नहीं जानते हैं। जब भी हम यह बात सुनते होंगे कि आज एकादशी है और आज चावल नहीं खाए जाते है, तो हमारे दिमाग में एक ही बात है कि ऐसा क्यों है, जानिए इसके पीछे क्या रहस्य है। शास्त्रों में चावल का संबंध जल से किया गया हैं और जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं। एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्रा जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एकादशी के दिन चावल न खाने के पीछें वैज्ञानिक तथ्य भी है। इसके अनुसार चावल में जल की मात्रा अधिक होती है। जल पर चन्द्रमा का प्रभाव अधिक पड़ता है। चावल खाने से शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है इससे मन विचलित और चंचल होता है। मन के चंचल होने से व्रत के नियमों का पालन करने में बाधा आती है। एकादशी व्रत में मन का निग्रह और सात्विक भाव का पालन अति आवश्यक होता है इसलिए एकादशी के दिन चावल से बनी चीजे खाना वर्जित कहा गया है।
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