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न्याय के देवता शनि......Use My Gift CodeFS497 get 50rs in wallet

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पौराणिक कथाओं के अनुसाक एक समय सूर्यदेव जब गर्भाधान के लिए अपनी पत्नी छाया के समीप गए तो छाया ने सूर्य के प्रचंड तेज से भयभीत होकर अपनी आंखें बंद कर ली थीं। कालांतर में छाया के गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ। शनि के श्याम वर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर यह आरोप लगाया कि शनि मेरा पुत्र नहीं है तभी से शनि अपने पिता सूर्य से शत्रुता रखते हैं। शनिदेव ने अनेक वर्षों तक भूखे-प्यासे रहकर शिव आराधना की तथा घोर तपस्या से अपनी देह को दग्ध कर लिया था, तब शनिदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने शनिदेव से वरदान मांगने को कहा। शनिदेव ने प्रार्थना की- युगों-युगों से मेरी मां छाया की पराजय होती रही है, उसे मेरे पिता सूर्य द्वारा बहुत अपमानित व प्रताड़ित किया गया है इसलिए मेरी माता की इच्छा है कि मैं (शनिदेव) अपने पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली व पूज्य बनूं। तब भगवान शिवजी ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा स्थान सर्वश्रेष्ठ रहेगा। तुम पृथ्वीलोक के न्यायाधीश व दंडाधिकारी रहोगे। साधारण मानव तो क्या- देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर और नाग भी तुम्हारे नाम से भयभीत रहेंगे। ग्रंथों के अनुसार शनिदेव कश्यप गोत्रीय हैं तथा सौराष्ट्र उनका जन्मस्थल माना जाता है। • ज्योतिष के अनुसार सूर्य पुत्र शनिदेव को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं कि वह गुस्सेल, भावहीन और निर्दयी हैं। • शनिदेव न्याय के देवता हैं। आपको जानकर हैरानी भी होगी कि जिस शनि के प्रकोप से दुनिया डरती है वह भी इन देवी-देवताओं से डरते हैं। • शनि महाराज को जिनसे डर लगता है उनमें एक नाम तो हनुमान जी का है। कहते हैं हनुमानजी के दर्शन और उनकी भक्ति करने से शनि के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं और हनुमान जी के भक्तों को शनिदेव परेशान नहीं करते। • श्रीकृष्ण, शनि महाराज के ईष्ट देव माने जाते हैं। इनके दर्शन के लिए शनि महाराज ने कोकिला वन में तपस्या की थी। यहीं कोयल रूप में श्रीकृष्ण ने शनि महाराज को दर्शन दिए थे और शनि महाराज ने कहा था कि वह कृष्ण भक्तों को परेशान नहीं करेंगे।

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posted Feb 15, 2020 by Deepika Maheshwary

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ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म शुक्रवार को हुआ है उन पर माँ लक्ष्मी और शुक्र दोनों का शुभ प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि शुक्रवार के स्वामी शुक्र देव है और इसकी देवी लक्ष्मी है। यही कारण है कि इस दिन जन्म लने वाले व्यक्ति भौतिक सुख सुविधाओं के आदी और शौकीन मिजाज होते है l शुक्रवार को जन्मे लोग जीवन को मौज मस्ती से व्यतीत करने के पक्षधर होते है। इस दिन जन्मे लोग विरोधियों को भी अपने पक्ष में करने की कला जानते है, इनमे एक अलग ही आकर्षण होता है। जिससे ये अपने मित्रों के दायरे में काफी लोकप्रिय होते है। शुक्रवार को जन्में लोग बड़े ही खुशमिजाज होते है और जिंदगी को एक जश्न की तरह जीते है। इनको कलात्मक चीजों और कला से गहरा लगाव होता है, इसलिये ये अपना कैरियर भी संगीत, लेखन, चित्रकला, फिल्म, फैशन, ब्यूटी इंडस्ट्री में बनाना पसंद करते है। ऐसे व्यक्ति आमतौर पर प्रसन्न दिखाई देते है। इनके चेहरे पर रौनक होती है।
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★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। ★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। ★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। ★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। ★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। ★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। ★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। ★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। ★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। ★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, ★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। ★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। ★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। ★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। ★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए । ★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। ★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। ★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती। ★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे। ★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे। ★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। ★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। ★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। ★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। ★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। ★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे। ★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। ★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है। ★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। ★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए। ★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। ★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें। ★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।
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