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महाशिवरात्रि पूजा विधि, शुभ मुहूर्त

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भगवान शिव को महाकाल कहा गया है और वही देवों के देव महादेव हैं। उन्होंने गंगा को अपने शीष पर धारण किया है। कहते हैं कि अगर भोलेभंडारी भोलेनाथ की पूरे श्रद्धा भाव से पूजा की जाए तो वो हमारी जिंदगी की सभी समस्याओं को समाप्त करते हैं। महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त भगवान के भक्तों के लिए महाशिवरात्रि का पर्व बेहद खास होता है। हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है महाशिवरात्रि। इस दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है। महाशिवरात्रि के दिन लोग व्रत रखते हैं और पूरे विधि विधान से भगवान शिव की अराधना करते हैं। महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त 21 फरवरी 2020 (शुक्रवार) की शाम 05 बजकर 20 मिनट से 22 फरवरी 2020 (शनिवार) शाम 07 बजकर 2 मिनट तक। महाशिवरात्रि का महत्व हिंदू पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव पर जल चढ़ाने से वह प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। महाशिवरात्रि पर भक्त पूरे दिन और रात व्रत रखते हैं। अगले दिन सुबह वह व्रत का पारण करते हैं। महाशिवरात्रि पर सूर्य उत्तरायण रहता है और चंद्रमा कमजोर स्थिति में। चंद्रमा मन का कारक है इसलिए चंद्रमा को मजबूत करने के लिए महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ का अभिषेक करना चाहिए। शिवरात्रि की पूजा विधि इस दिन सबसे पहले भगवान शंकर को पंचामृत से स्नान कराएं इसके बाद शिवलिंग पर शहद, पानी और दूध के मिश्रण से भोले शंकर को स्नान कराएं। फिर बेलपत्र, धतूरा, फल और फूल भगवान शिव को अर्पित करें। धूप और दीप जलाकर भगवान शिव की आरती करें। इस दिन भोले शिव को बेर चढ़ाना भी बहुत शुभ होता है। शिव महापुराण में कहा गया है कि इन छह द्रव्यों, दूध, दही, शहद, घी, गुड़ और पानी से भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। जल से रुद्राभिषेक करने से शुद्धि गुड़ से रुद्राभिषेक करने से खुशियां घी से रुद्राभिषेक करने से जीत शहद से रुद्राभिषेक करने से मीठी वाणी दही से रुद्राभिषेक करने से समृद्धि

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महाशिवरात्रि पूजा विधि, शुभ मुहूर्त
posted Feb 21 by Deepika Maheshwary

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आज देशभर में बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जा रहा है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा का विधान बताया गया है। कला, संगीत, शिल्प और ज्ञान-विज्ञान की देवी मां सरस्वती व्यक्ति के जीवन से अज्ञानता का अंधकार दूर कर देती हैं, इसके साथ ही उसके जीवन में नए उत्साह की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि अगर इस दिन पढ़ाई में कमजोर बच्चा मां की आराधना कर ले तो सरस्वती जी की कृपा उनपर बरस जाती है। आइए जानते हैं इस बार कब होगा सरस्वती पूजन और क्या है उसका शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व। सरस्वती पूजन शुभ मुहूर्त :- पूजा मुहूर्त– सुबह 10 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर दोपहर के 12 बजकर 52 मिनट तक पंचमी तिथि प्रारंभ– 29 जनवरी बुधवार सुबह 10 बजकर 25 मिनट से शुरू (मघ शुक्ल पंचमी) पंचमी तिथि खत्म– 30 जनवरी गुरुवार दोपहर 1 बजरकर 19 मिनट तक मां सरस्वती की पूजा विधि :- इस पावन दिन सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान करें। सफेद या पीले कपड़े पहनकर मां सरस्वती के चित्र अथवा मूर्ति को घर की उत्तर पूर्व दिशा में स्थापित करें। इसके साथ ही मां को पीले-सफेद फूल और सफेद चंदन अर्पित करें। फिर माता का ध्यान कर ऊं ऐं सरस्वत्यै नम:मंत्र का 108 बार जाप पूरे करें। फिर मां सरस्वती की आरती करें। तुलसी, दूध, दही और शहद मिलाकर पंचामृत प्रसाद तैयार करें और उससे मां सरस्वती को भोग चढ़ाएं। मां सरस्वती के पूजन का महत्व :- इस दिन मां की पूजा का खास महत्व माना गया है। मां सरस्वती को विद्या की देवी कहा जाता है। मान्यता है कि मां सरस्वती की जिस भी बालक पर कृपा बरस जाए उसकी बुद्धि अन्य बालकों से अलग और बहुत ही तेज होती है। ऐसे छात्र कठिन से कठिन विद्या को भी सरल मानकर जीवन में आगे बढ़ते हैं। खासतौर पर बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की आराधना जरूर करनी चाहिए।
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भारतीय ज्योतिष कुण्डली निर्माण विधि भारतीय ज्योतिष में सूर्योदय से ही दिन बदलता है। अंग्रेजी तारीख अथवा दिन रात १२ बजे से प्रारम्भ होकर अगली रात में १२ बजे तक चलता है। अंग्रेजी में रात १२ से दिन में १२ बजे दोपहर तक ए.एम. (दिन) तथा दोपहर १२ बजे से रात १२ बजे तक पी.एम. (रात) लिखा जाता है। अंग्रेजी कैलेन्डर के अनुसार रात १२ बजे से दिन बदल जाता है। इसीलिये अंग्रेजी तारीख भी रात १२ बजे से बदल जाती है। इसलिए कुण्डली बनाते समय इसका ध्यान रखना चाहिए। रात में १२ बजे के बाद जो बालक पैदा होगा, उसके लिए अगली तारीख जैसे दिन में २० अप्रैल है, और लड़का रात १ बजे पैदा हुआ है तो २१ अप्रैल ए.एम. लिखा जायेगा। इसलिए कुण्डली बनाते समय पञ्चाङ्ग में २० अप्रैल की ही तिथि - नक्षत्र आदि लिखना चाहिये। आजकल कुण्डली में अंग्रेजी तारीख भी लिखी जाती है, अत: कुण्डली में २०/२१ अप्रैल रात्रि १ बजे लिखना चाहिए। जिससे भ्रम न हो सके। नक्षत्र कुण्डली में दिन के बाद नक्षत्र लिखा जाता है। कुल २७ नक्षत्र होते हैं - १. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी, ५. मृगशिरा, ६. आद्र्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्य, ९. अश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वा फाल्गुनी, १२. उत्तरा फाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाती, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढ़ा, २१. उत्तराषाढ़ा, २२. श्रवण, २३. धनिष्ठा, २४. शतभिषा, २५. पूर्वाभाद्रपद, २६. उत्तरा भाद्रपद तथा २७. रेवती। अभिजित नक्षत्र - यह अलग से कोई नक्षत्र नही होता है। बल्कि उत्तराषाढ़ा की अन्तिम १५ घटी तथा श्रवण की प्रारम्भ की ४ घटी के योग कुल १९ घटी का अभिजित नक्षत्र माना जाता है, किन्तु यह कुण्डली में न लिखा जाता है और न पञ्चाङ्गों में ही लिखा रहता है। नक्षत्र को ``ऋक्ष'' अथवा ``भ'' भी कहते हैं। जैसे गताक्र्ष में ऋक्ष है, जिसका अर्थ है, गतऋक्ष (नक्षत्र)। इसी तरह ``भयात'' में ``भ'' का अर्थ नक्षत्र है। पञ्चाङ्गों में प्रतिदिन का नक्षत्र तथा उसका मान (कब तक है) घटी-पल में लिखा रहता है। जिसे देखकर कुण्डली में लिखना चाहिये। चरण प्रत्येक नक्षत्र में ४-४ चरण होते हैं। कुल २७ नक्षत्र में २७×४ कुल १०८ चरण होंगे। बालक का राशि नाम निकालने के लिए नक्षत्र का चरण निकालना जरूरी है। योग कुण्डली में नक्षत्र के बाद योग लिखा जाता है। योग - सूर्य चन्द्रमा के बीच ८०० कला के अन्तर पर एक योग बनता है। कुल २७ योग होते हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं — १. विष्कुम्भ, २. प्रीति, ३. आयुष्मान, ४. सौभाग्य, ५. शोभन, ६. अतिगण्ड, ७. सुकर्मा, ८. धृति, ९. शूल, १०. गण्ड, ११. वृद्धि, १२. ध्रुव, १३. व्याघात, १४. हर्षण, १५. वङ्का, १६. सिद्धि, १७. व्यतिपात, १८. वरियान, २०. परिघ, २१. सिद्ध, २२. साध्य, २३. शुभ, २४. शुक्ल, २५. ब्रह्म, २६. ऐन्द्र तथा २७. वैधृति। पञ्चाङ्ग में योग के आगे घटी-पल लिखा रहता है। जिसका अर्थ है, सूर्योदय के बाद कब तक वह योग रहेगा। जिस तरह तिथि नक्षत्र का क्षय तथा वृद्धि होती है, उसी तरह योग का भी क्षय तथा वृद्धि होती है। जब दो दिन सूर्योदय में एक ही योग हो तो उस योग की वृद्धि होगी। जब दोनों दिन सूर्योदय के समय जो योग नहीं है, तो उस योग का क्षय माना जाता है। तिथि, नक्षत्र, योग का जो क्षय कहा गया है, उससे यह नहीं समझना चाहिए कि उस तिथि अथवा नक्षत्र अथवा योग का लोप हो गया है। वह तिथि, नक्षत्र, योग उस दिन रहेगा। केवल सूर्योदय के पूर्व समाप्त हो जायेगा। करण कुण्डली में योग के बाद करण लिखा जाता है। कुल ११ करण होते हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं — १. वव, २. वालव, ३. कौलव, ४. तैतिल, ५. गर, ६. वणिज, ७. विष्टि या भद्रा, ८. शकुनि, ९. चतुष्पद, १०. नाग, ११. किस्तुघ्न। इसमें १ से ७ तक के ७ करण चर संज्ञक हैं। जो एक माह में लगभग ८ आवृत्ति करते हैं। अन्त का चार - ८ से ११ तक शकुनि, चतुष्पद, नाग तथा विंâस्तुघ्न - करण स्थिर संज्ञक हैं। स्थिर करण सदा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध से प्रारम्भ होते हैं। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आधी तिथि के बाद शकुनि करण। अमावस्या के पूर्वार्ध में चतुष्पद करण। अमावस्या के उत्तरार्ध में नाग करण। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में िंकस्तुघ्न करण होता है। इसीलिए यह स्थिर संज्ञक है। एक तिथि में २ करण होते हैं। तिथि के आधे भाग पूर्वार्ध में १ करण तथा तिथि के आधे भाग उत्तरार्ध में दूसरा करण होता है। अर्थात `तिथि अर्धं करणं' अर्थात तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं या सूर्य चन्द्रमा के बीच १२ अंश के आधे ६ अंश को करण कहते हैं। कुण्डली में जन्म के समय जो करण हो, वही लिखा जाता है। हंसक अथवा तत्त्व षड्वर्गीय कुण्डली में ``हंसक'' लिखा रहता है। अत: हंसक जानने की विधि दी जा रही है। हंसक को तत्त्व भी कहते हैं। कुल ४ तत्त्व अथवा हंसक होते हैं — १. अग्नि तत्त्व, २. भूमि तत्त्व, ३. वायु तत्त्व तथा ४. जल तत्त्व। ये तत्त्व राशि के अनुसार होते हैं जैसे — १. मेष राशि - अग्नि तत्त्व २. वृष राशि - भूमि तत्त्व ३. मिथुन राशि - वायु तत्त्व ४. कर्वâ राशि - जल तत्त्व ५. सिंह राशि - अग्नि तत्त्व ६. कन्या राशि - भूमि तत्त्व ७. तुला राशि - वायु तत्त्व ८. वृश्चिक राशि - जल तत्त्व ९. धनु राशि - अग्नि तत्त्व १०. मकर राशि - भूमि तत्त्व ११. कुम्भ राशि - वायु तत्त्व १२. मीन राशि - जल तत्त्व जातक की जो जन्म राशि हो, उसी के तत्त्व को हंसक के खाने में लिखना चाहिए। युंजा परिचय षड्वर्गीय कुण्डली में ``युंजा'' भी लिखा होता है। कुल २७ नक्षत्र होते हैं। ६ नक्षत्र का पूर्वयुंजा १२ नक्षत्र का मध्यभाग के मध्ययुंजा तथा ९ नक्षत्र का परभाग अन्त्ययुंजा होता है। इसे ही युंजा कहते हैं। पूर्वभाग के ६ नक्षत्र रेवती, अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी तथा मृगशिरा पूर्वयुंजा - मध्यभाग के १२ नक्षत्र- आद्र्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा तथा अनुराधा मध्ययुंजा एवं परभाग के ९ नक्षत्र - ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतमिषा, पूर्वाभाद्रपद तथा उत्तराभाद्रपद पर या अन्त्ययुंजा होता है। जातक का जन्म नक्षत्र जिस भाग में पड़े वही भाग कुण्डली में लिखना चाहिए। वर्ग विचार षड्वर्गीय कुण्डली में ``वर्ग स्थिते'' लिखा रहता है। इसका अर्थ है, जातक की जन्म राशि का नाम किस वर्ग में आता है। कुल ८ वर्ग होते हैं। इसमें जो अक्षर आते हैं, वह इस प्रकार हैं — स्वामी १. अ - वर्ग - अ, ई, उ, ए, ओ गरुड २. क - वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ मार्जार ३. च - वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ सिंह ४. ट - वर्ग - ट, ठ, ड, ढ़, ण श्वान ५. त - वर्ग - त, थ, द, ध, न सर्प ६. प - वर्ग - प, फ, ब, भ, म मूषक ७. य - वर्ग - य, र, ल, व मृग ८. श - वर्ग - श, ष, स, ह मेष अपने से पंचम वर्ग से वैर, चतुर्थ से मित्रता तथा तीसरे से समता होती है। जातक की जन्म की राशि का पहला अक्षर जिस वर्ग में पड़े वही वर्ग लिखना चाहिए। जैसे- राशि नाम-पन्नालाल का पहला अक्षर प है, जो प वर्ग में पड़ता है। अत: कुण्डली में प वर्ग लिखना चाहिए। वर्ग-गण-नाड़ी पञ्चाङ्गों में - प्रत्येक नक्षत्र के नीचे, राशि, वर्ण, वश्य, योनि, राशिस्वामी, गण तथा नाड़ी का नाम लिखा रहता है। उसे देखकर जातक का जो जन्म नक्षत्र हो, उसके नीचे लिखे वर्ण, गण-नाड़ी आदि लिखना चाहिए। पञ्चाङ्गों में राशि स्वामी के लिए ``राशीश'' लिखा रहता है। राशि स्वामी, राशीश तथा राशिपति - का एक ही अर्थ है। उस राशि का ग्रह अर्थात् राशि का स्वामी ग्रह ही राशीश कहा जाता है। कृत्तिका नक्षत्र के नीचे १/३ लिखा है। मृगशिरा नक्षत्र में २-२ लिखा है। अत: यदि अपना जन्म नक्षत्र कृत्तिका का प्रथम चरण है, तो मेष राशि, क्षत्रिय वर्ण, भौम राशीश होगा। यदि कृत्तिका २-३-४ चरण है, तो वृष राशि, वैश्य वर्ण तथा शुक्र राशीश होगा। इसी तरह सर्वत्र समझना चाहिए। राशि और उसके स्वामी कुल २७ नक्षत्र होते हैं। १-१ नक्षत्र में ४-४ चरण होते हैं। ९-९ चरण की १-१ राशि होती है। कुल १२ राशियां हैं - जो इस प्रकार हैं — १. मेष, २. वृष, ३. मिथुन, ४. कर्वâ, ५. सिंह, ६. कन्या, ७. तुला, ८. वृश्चिक, ९. धनु, १०. मकर, ११. कुम्भ तथा १२. मीन इन १२ राशियों के स्वामी इस प्रकार है — १. मेष - मंगल, २. वृष - शुक्र, ३. मिथुन - बुध, ४. कर्वâ - चन्द्र, ५. िंसह - सूर्य, ६. कन्या - बुध, ७. तुला - शुक्र, ८. वृश्चिक - मंगल, ९. धनु - गुरु, १०. मकर - शनि, ११. कुम्भ - शनि तथा १२. मीन - गुरु। राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। ये दोनों किसी राशि के स्वामी नहीं होते हैं।
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होली का त्‍योहार बुराई पर अच्‍छाई की जीत का प्रतीक है. होली में जितना महत्‍व रंगों का है उतना ही महत्‍व होलिका दहन का भी है. रंग वाली होली से एक दिन पहले होली जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहते हैं. होलिका दहन की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं. सूखी टहनियां, लकड़ी और सूखे पत्ते इकट्ठा कर उन्‍हें एक सार्वजनिक और खुले स्‍थान पर रखा जाता है,पूर्णिमा की तिथि पर सूर्य अस्त होने के बाद प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन की अग्नि को पवित्र माना जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत की अग्नि होती है। कुछ लोग इस अग्नि में नई फसल को भूनकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और भगवान की पूजा की जाती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहे। इस शुभ दिन पर कुछ लोग भगवान के प्रति आस्था मजबूत करने के लिए व्रत भी रखते हैं और कथा पढ़ते हैं।होलिका दहन के साथ ही बुराइयों को भी अग्नि में जलाकर खत्‍म करने की कामना की जाती है.   होलिका दहन कब है? हिन्‍दू पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात्रि ही होलिका दहन किया जाता है. यानी कि रंग वाली होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है. इस बार होलिका दहन 9 मार्च को किया जाएगा, जबकि रंगों वाली होली 10 मार्च को है. होलिका दहन के बाद से ही मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं. मान्‍यता है कि होली से आठ दिन पहले तक भक्त प्रह्लाद को अनेक यातनाएं दी गई थीं. इस काल को होलाष्टक कहा जाता है. होलाष्टक में मांगलिक कार्य नहीं होते हैं. कहते हैं कि होलिका दहन के साथ ही सारी नकारात्‍मक ऊर्जा समाप्‍त हो जाती है. होलिका दहन का शुभ मुहूर्त  जानते हैं कि होलिका दहन का शुभ मुहूर्त क्या है और इस मौके शुभ मुहूर्त देखने के लिए दो बातों को ध्यान रखा जाता है.  पहला, उस दिन “भद्रा” न हो। दूसरा, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए। इस बार 9 मार्च 2020 सोमवार को होलिका दहन के समय भद्राकाल की बाधा नहीं रहेगी। फाल्गुन माह की पूर्णिमा यानी होलिका दहन के दिन भद्राकाल सुबह सूर्योदय से शुरू होकर दोपहर करीब डेढ़ बजे ही खत्म हो जाएगा।  इसलिए शाम को प्रदोषकाल में होलिका दहन के समय भद्राकाल नहीं होने से होलिका दहन शुभ फल देने वाला रहेगा। जिससे रोग, शोक और दोष दूर होंगे।9 मार्च 2020 को सुबह 3 बजकर 3 मिनट से पूर्णिमा तिथि शुरू हो जाएगी 9 मार्च को सोमवार है और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र है वहीं पूर्णिमा तिथि सोमवार को होने से चंद्रमा का प्रभाव ज्यादा रहेगा। क्योंकि ज्योतिष के अनुसार सोमवार को चंद्रमा का दिन माना जाता है। इसके साथ ही स्वराशि धनु में स्थित देवगुरु बृहस्पति की दृष्टि चंद्रमा पर रहेगी। जिससे गजकेसरी योग का प्रभाव रहेगा।इस बार होली भद्रा रहित, ध्वज एवं गजकेसरी योग भी बन रहा है। इसके बाद 10 मार्च को रंग वाली होली में त्रिपुष्कर योग बनेगा। इस साल होली पर गुरु और शनि का विशेष योग बन रहा है। ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी राशि में रहेंगे।  तो इस बार होली का यह पावन पर्व ग्रहों के शुभ संयोग के कारण शुभ फलदाई मानी गई है होलिका दहन का शुभ मुहूर्त  होलिका दहन की तिथि: 9 मार्च 2020 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 9 मार्च 2020 को सुबह 3 बजकर 3 मिनट से  पूर्णिमा तिथि समाप्‍त: 9 मार्च 2020 को रात 11 बजकर 17 मिनट तक  होलिका दहन मुहूर्त: शाम 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 52 मिनट तक होली का दहन की महिमा रंग वाली होली से भी ज्यादा मानी गई है .भारतीय परंपरा में पुराने साल को विदाई देते हुए नए साल के आगमन की खुशियां मनाई जाती है पुराना साल जिसे संवत कहते हैं को विदाई देने के लिए होली का पावन पर्व मनाया जाता है इसलिए होलिका दहन को संवत जलाना भी कहते चैत्र शुक्ल पक्ष के पहले दिन से जब नवरात्रि शुरू होते हैं तो भारतीय नव संवत की शुरुआत हो जाती है होलिका की अग्नि में पुराने साल और संवत की यादों को समस्याओं को परेशानियों को जलाते हुए जीवन की सारी पुरानी साल की मुश्किलों से निजात पाया जाता है माना जाता है कि इस राख को घर पर लाकर उससे अपने सभी परिवार के लोग अपने माथे पर तिलक करें तो निश्चित ही पिछले साल की सारी नकारात्मकता खत्म हो जाती है पुराने साल की विदाई और नए साल की खुशियां बनाने के साथ-साथ होलिका दहन के पर्व पर किसी भी तरह की आर्थिक समस्या व मानसिक परेशानी हो धन संबंधी समस्याओं से लेकर स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या का समाधान किया जा सकता है.. ज्योतिष के हिसाब से कुछ ऐसे उपाय होते हैं जिन्हें अगर आप होलिका दहन के अवसर पर करें और होलिका के जलने के साथ उन चीजों को अग्नि में डाले तीन बार परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें तो आपकी प्रार्थना जरूर पूरी होती है तो चलिए उन्हीं सभी छोटे-छोटे उपायों की बात करते हैं 1. बीमारी से मुक्ति के लिए और सेहत में लाभ के लिए अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए इस दिन एक मुट्ठी काले तिल होलिका की अग्नि में डाले ,कोई बीमारी से मुक्ति पाना चाहता है तो हरी इलायची और कपूर डालें तीन परिक्रमा करते हुए बीमारी से मुक्ति की प्रार्थना करें 2. धन प्राप्ति के लिए और किसी भी तरह की आर्थिक समस्या से जूझ रहे हैं. तू होली के दिन एक छोटी सी चंदन की लकड़ी होली की अग्नि में डाल देतीन बार परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें 3. अगर किसी को रोजगार की समस्या है यह व्यापार या व्यवसाय में परेशानी आ रही है तो इसके लिए एक मुट्ठी पीली सरसों के दाने होलिका की अग्नि में डालें निश्चित ही व्यापार संबंधी रोजगार संबंधी सारी समस्याएं दूर होंगी 4. अगर किसी को विवाह की समस्या आ रही है विवाह नहीं हो पा रहा, वैवाहिक जीवन में परेशानी और दिक्कतें आ रही हैं खुशहाली नहीं है तो उसके लिए हवन सामग्री लेकर जरा सा देसी घी मिलाकर उसे होलिका की अग्नि में डालें तो निश्चित ही जीवन में सभी तरह की समस्याएं दूर होती हैं 5. किसी भी तरह के तंत्र मंत्र नजर दोष और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए एक मुट्ठी काली सरसों को अपने सिर पर से एंटी क्लॉक वाइज 7 बार घुमाकर होली की जलती हुई अग्नि में डाल दिया जाए तो जीवन की सारी नकारात्मकता खत्म हो जाती हैहोलिकादहन करने या फिर उसके दर्शन मात्र से भी व्यक्ति को शनि-राहु-केतु के साथ नजर दोष से मुक्ति मिलती है। होली की भस्म का टीका लगाने से नजर दोष तथा प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है। 6. जिन लोगों को अपनी नाम राशि लग्न राशि नहीं पता यह जिनको अपनी जन्म कुंडली के बारे में ज्ञान नहीं है वह लोग होलिका दहन के दिन गोबर के उपले गेहूं की बालियां और काले तिल लेकर होलिका की जलती अग्नि में डालकर तीन बार परिक्रमा करके प्रार्थना करें तो उनके जीवन में से सभी तरह की समस्याएं विघ्न बाधाएं अपने आप खत्म हो जाते हैं ..और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है 7. किसी को मन संबंधी समस्याएं मानसिक परेशानी है या किसी की कुंडली में चंद्रमा पीड़ित है तो वह होलिका दहन के बाद घर आकर अपने हाथ पैर धोकर अगर चंद्रमा के दर्शन करते हुए चंद्रमा की रोशनी में बैठे और श्री कृष्ण के किसी भी मंत्र ओम नमो भगवते वासुदेवाय ,ओम क्लीम कृष्णाय नमः, या गीता का पाठ करें तो निश्चित रूप से उनके सभी तरह की मानसिक परेशानियां दूर होने के साथ-साथ जीवन के सभी दिक्कत और परेशानियां खत्म हो जाती है मन मजबूत होता है
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चन्द्र और मनोविज्ञान ********************* चन्द्रमा और मनोविज्ञान का आपस में बड़ा गहरा सम्बन्ध है ! खगोलशास्त्र और विज्ञान के अनुसार जब जब समुद्र में ज्वारभाटा आता है या सुनामी आती है तब तब उसके पीछे चन्द्र जिसे की मून भी कहते हैं वही कारण बनता है , तो साइंस के मुताबिक भी हमारी धरती पर सूर्य के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव चन्द्र का ही माना जाता है , इसे हम सीधे तौर पर इस तरह से भी समझ सकते हैं की सूर्य जो की सौरमंडल में उर्जा का स्रोत है या कारक है उससे हमें प्रकाश मिलता है , एनेर्जी मिलती है जो के इस धरती पर रहने वाले चर अचर के लिए बहुत ही ज़रूरी है और साथ ही मून यानी चन्द्र जो के शीतलता का कारक है सूर्य से उर्जा लेकर इस धरती के चर अचर पर शीतल उर्जा की छिडकाव करता है जो की हमारे अन्तर्मन यानी मन के की खुराक की लिए ज़रूरी बनता है ! अब बात जब चन्द्र की हो रही है तो हम इसे कारक मन का ही मानेंगे और साथ ही देखेंगे की क्यों चन्द्र मन का स्वामी माना जाता है ! चन्द्र को लूनर भी कहा जाता है और जो व्यक्ति अर्धविक्षप्त हो जाता है उसे भी लुनैटिक कहा जाता है तो इसका अभिप्राय यही निकलता है की हर मानव के मन को चन्द्रमा बहुत प्रभावित करता है और पागलपन के पीछे भी चन्द्र ही कारण रहता है ! चन्द्र को काल पुरुष का मन भी कहा जाता है और जिसकी कलाएं पहले पंद्रह दिन घटती है और बाकी पंद्रह दिन बढती हैं , जिन्हें हम क्रिशन पक्ष और शुक्ल पक्ष भी कहते हैं, चन्द्र सताईस नक्षत्रों का अधिपति भी माना जाता है और रोहणी नक्षत्र में उच्च का मान जाता है क्यों की उस नक्षत्र में चन्द्र की कलाएं पूरनता की तरफ बढती हैं ! आम तौर पर ये देखने में आता है की जब जब पूरणमाशी का वक़्त आता है तो उस वक़्त समुद्र में ज्वारभाटा आता है क्यों की पानी जिसे जल भी कहते हैं उसका कारक भी चंद्रमा माना जाता है और जिस दिन पूरण चन्द्र होता है उस दिन जल अपने कारक की तरफ आकर्षित होता है और उस वक़्त जिन व्यक्तियों का चन्द्र कमजोर होता है उन्हें दिमागी परेशानी होनी शुरू हो जाती है यानी उनकी बेचैनी बढ़ जाती है , इसी प्रकार से अमावस्या के दिन भी होता है जब चन्द्र क्षीण माना जाता है तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है की चन्द्र का मन के साथ बड़ा गहरा नाता है और अगर हम किसी होरोस्कोप में चन्द्र की पोजीशन देखें तो हमें साफ़ साफ़ पता चल जाता है की हमारा मन कितना चंचल होगा या मजबूत होगा जब किसी का चन्द्र राहू , केतु के साथ होगा तो वह उसे भ्रमित रखेगा और शनि के साथ तनाव ग्रसित और अंदर से दुखी और दुनियादारी से दूर रखेगा और वही चन्द्र जब शुक्र के साथ होगा तो भौतिक सुखों की तरफ लालायित रखेगा और वृहस्पति के साथ गज केसरी योग बनाता हुआ उसे आंतरिक सुख प्रदान करता है मतलब की चन्द्र के साथ सच्ची ख़ुशी वृहस्पति के मेल से ही पौसिबल हो पाती है परन्तु इतना ही काफी नहीं चन्द्र की कलाएं और उसका अच्छे घरों में बैठना भी देखा जाता है यानी की शुक्ल पक्ष का बढ़ता हुआ चन्द्र अच्छा माना जाता है , चन्द्र का पक्ष बल इसे ही कहा जाता है तो चन्द्र के कमजोर होने पर कुंडली भी कमजोर हो जाती है मतलब की प्रकाश पुंज सूर्य और चन्द्र दोनों की किसी भी कुंडली में बलबान स्तिथि उस जातक को बलबान , शक्तिशाली और सफल बना देती है , और अंत में ये ही कहा जाएगा की हमें अपने अपने कर्मों का फल जैसे जैसे मिलता है वैसे वैसे ही कुंडली में गृह रिफ्लेक्ट करते हैं इसमें किसी और का कोई दोष नहीं दोष हमारा खुद का ही होता है क्यों की हम दुनिया दारी के भ्रम और मायाजाल में हरदम रहते हैं तो वेवजह एक दुसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं , हमारा भ्रम सिर्फ इतना ही होता है की हम बादलों से आसमा के ढकने पर ये मान लेते हैं की सूर्य है ही नहीं जब की सूर्य अमर है बादलों के पीछे है तो गृह और हमारे करम भी कुछ इसी तरह से हमें भ्रमित करते रहते हैं या ये कहना ठीक होगा की हम भ्रमित रहते हैं,तो वेवजह का भ्रम पालना हमें मानसिक तौर पर बीमार कर देता है अब ये सब कुछ हमारे हाथ में है या नहीं इस बहस में क्या पड़ना , जो है सामने है और जो सामने है उसे ठीक करने का हमारा प्रयास होना चाहिए और वो चाहे कैसे भी हो मतलब अच्छे करम , अच्छे विचार सद्व्यवहार इश्वर पर भरोसा तो सब गृह चाहे पूरी तरह से शांत न भी हों तब भी हम कुछ हद तक अच्छा जीवन जरूर गुज़ार सकते हैं पर कंडीशन वही है की कोशिश मन , वचन और क्रम से होनी चाहिए न की बनावटीपन से क्यों की उससे सिर्फ हम अपने आप को ही धोखा देते रहते हैं , तो अगर हम चाहते हैं की हमारे गृह सुधरें तो हमें उपायों से ज्यादा अच्छे कर्मों की तरफ जयादा ध्यान देना चाहिए और अच्छे करम भी दिल से करने चाहिए और निष्काम क्यों की “ हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां हमें मुखौटे लगाने पढ़ते हैं जिससे की दुनिया हमें न पहचान पाए पर ईश्वर के आगे कोई मुखौटा नहीं चलता “ जब जब हमारी कोशिश ईश्वर के आगे मुखौटा लगाने की होती है तब तब हम अपने ही मकडजाल या भ्रमजाल में उलझते जाते हैं तो ग्रहों के उपाए भी मात्र यही सन्देश देते हैं की अच्छे करम , शुभ करम और निष्काम करम करते जाओ और फिर देखो की उस परमात्मा की कैसी कृपा होती है !
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सभी माता-पिता की यही इच्छा होती है कि उनके बच्चे पढ़ाई के मामले में अव्वल रहें। इसी इच्छा को पूरा करने के लिए बच्चों की शिक्षापर विशेष ध्यान भी दिया जाता है। बच्चों का परिणाम श्रेष्ठ रहे, इसके लिए वास्तु की टिप्स का भी ध्यान रखना चाहिए। वास्तु घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म करके सकारात्मकऊर्जा बढ़ाता है। घर का वातावरण सकारात्मक रहेगा तो बच्चों का मन पढ़ाई में भी अच्छी तरह लगा रहेगा। वास्तु में स्टडी रूम के लिए भी कई बातें बताई गई हैं, जिनसे विद्यार्थियों को काफी लाभ मिल सकता है। ☆☆ विद्यार्थियों को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व काकोना) की ओर मुंह करके पढ़ाई करनी चाहिए।यदि इस दिशा में पढ़ाई करना संभव न हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके पढ़ाई कर सकते हैं। ☆☆ यदि स्टडी रूम में चाय-पानी या नाश्ता भी किया हो तो जूठे बर्तन, प्लेट आदि को पढ़ाई करने से पहले वहां से हटा देना चाहिए। ☆☆ स्टडी रूम में पूर्व-उत्तर की ओर खिड़की होगी तो श्रेष्ठ रहता है। ☆☆ पढ़ाई करते समय अपने आस-पास का वातावरण शुद्ध होना चाहिए। सुगंध वाला वातावरण होना चाहिए, कमरे में दुर्गंध नहीं होना चाहिए। ☆☆पढ़ाई की टेबल पर आवश्यक सामग्री हीहोनी चाहिए। अनावश्यक सामग्री को तुरंत हटा देना चाहिए, अन्यथा पढ़ाई के समय मन भटक सकता है। ☆☆पढ़ने का समय सबसे अच्छा समय है ब्रह्ममुहूर्त। सूर्योदय से पहले यानी सुबह 4.30 बजेसे सुबह 10 बजे तक पढ़ाई करना लाभदायक रहता है। रात को अधिक देर तक पढऩा स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। ☆☆अपने स्टडी रूम में माता सरस्वती,गणेशजी या अपने प्रिय देवी-देवता की फोटोलगा सकते हैं। स्टडी रूम में ऐसी चीजें, फोटोहोने चाहिए जो पढ़ाई से संबंधित हों।। नकारात्मक विचारों वाले फोटो, फिल्मी फोटो, प्रेम से संबंधित फोटो नहीं लगाना चाहिए। ☆☆ स्टडी रूम में किताबें दक्षिण-पश्चिम दिशा के कोने में रख सकते हैं। उत्तर-पूर्व दिशा केकोने में हल्के सामान रखना चाहिए। ☆☆इस रूम का कलर हल्का पीला या सफेद होगा तो सबसे अच्छा रहेगा। गहरे रंगों के उपयोग से बचना चाहिए। इस रूम में दर्पणनहीं रखना चाहिए।
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