top button
    Futurestudyonline Community

शनिदेव को क्यों चढ़ाते है तिल और तेल?

0 votes
468 views
शनिदेव के बारे में पुराणों में कई कथाएं प्रचलित हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि शनिदेव को न्याय का देवता कहा जाता है। शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करते हैं और सभी प्राणियों के साथ न्याय करते हैं। इनके संबंध में कई भ्रान्तियां सुनने को भी मिलती हैं जैसे- शनिदेव ही जीवन में अशुभ और दुख का कारक हैं लेकिन वास्तविकता तो ये है कि शनिदेव उतने अशुभ नहीं होते, जितना लोग उन्हें मानते हैं। कहा जाता है कि शनिदेव अपने भक्तों पर शीघ्र ही नाराज और प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यताएं है कि शनिदेव को यदि विधिवत पूजा जाए तो वे अपने भक्तों को कभी दुखी नहीं रखते हैं। शनिदेव की पूजा में तिल और तेल का विशेष महत्व है। शनिदेव की पूजा में तिल और तेल क्यों? --------------------------------------------- • काला तिल, तेल, काला वस्त्र, काली उड़द शनि देव को अत्यंत प्रिय हैं। मान्यता है कि काला तिल और तेल से शनिदेव जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं। यदि शनिदेव की पूजा इन वस्तुओं से की जाए तो ऐसी पूजा सफल मानी जाती है। • शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के से दिन शुरू कर सकते हैं लेकिन मान्यता है कि श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी होता है। इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा का विधिवत पूजा करनी चाहिए। शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवन्ती का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए। • शनिदेव को तेल चढ़ाए जाने के संदर्भ में भी एक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एकबार युद्ध के दौरान हनुमानजी ने शनि देव पर ऐसे तीखे प्रहार किए जिस कारण शनिदेव के शरीर पर काफी घाव बन गए। वह पीड़ा उनसे सहन नहीं हो रही थी। इसके बाद हनुमान जी ने शनिदेव को तिल का तेल लगाने के लिए दिया, जिससे उनका पूरा दर्द गायब हो गया। इसी कारण शनिदेव ने कहा कि जो मनुष्य मुझे सच्चे मन से तेल चढ़ाएगा मैं उसकी सभी पीड़ा हर लूंगा और सभी मनोकामनाएं पूरी करूंगा।

References

शनिदेव को क्यों चढ़ाते है तिल और तेल?
posted Feb 22, 2020 by Deepika Maheshwary

  Promote This Article
Facebook Share Button Twitter Share Button Google+ Share Button LinkedIn Share Button Multiple Social Share Button

Related Articles
0 votes
हिन्दू धर्म के शास्त्रों के अनुसार कुछ ऐसे दिन बताएं गये है जो हमारी यात्रा के अनुसार अच्छे नही माने गये है इसलिए इन दिनों में हमें भूलकर भी यात्रा नही करनी चाहिए। इस संबंध में एक धार्मिक कथा भी प्रचिलत है जो इस प्रकार है। किसी समय एक व्यक्ति अपनी पत्नी को विदा करवाने अपने ससुराल गया। कुछ दिवस रहने के पश्चात उसने सास–ससुर से अपनी पत्नी को विदा करने को कहा। किन्तु सास ससुर ने बड़े विनीत भाव से कहा आज बुधवार का दिन हैं, आज के दिन गमन (यात्रा) नहीं करते। उस व्यक्ति ने किसी की नहीं मानी और जरूरी कार्य होने की बात कहकर उसी दिन अपनी पत्नी को विदा कराकर अपने नगर की तरफ चल पड़ा। रास्ते में उसकी पत्नी को प्यास लगी तो उसने अपने पति से कहा मुझे प्यास लगी है तब पति लोटा लेकर गाड़ी से उतरकर जल लेने चला गया। जब वह जल लेकर लौटा और अपनी पत्नी के निकट आया तो उसने देखा की उसका हमशक्ल उसकी पत्नी के निकट बैठा हैं। उसने क्रोध में पूछा तुम कौन हो ? तुम मेरी पत्नी के निकट क्यों बैठे हो। दोनों में झगड़ा हो गया दुर खड़े राजा के सैनिक आये और उसके असली पति को पकड़ लिया और पत्नी को पूछा तुम्हारा पति कौन सा हैं पर पत्नी को कुछ समझ नहीं आया पत्नी शांत रही। वह व्यक्ति मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा। हे ! परमेश्वर यह क्या लीला हैं सच्चा झूठा बन रहा हैं। मुझसे कुछ भूल हुई तो क्षमा करे। तभी आकाशवाणी हुई की मुर्ख आज बुधवार के दिन तुझे गमन नहीं करना था। तूने किसी की बात नहीं मानी। यह लीला भगवान बुद्धदेव की हैं। उस व्यक्ति ने भगवान बुद्धदेव से क्षमा – याचना की। तब मनुष्य रूप में आये भगवान बुद्धदेव अंतर्ध्यान हो गये। पति प्रसन्नता पूर्वक अपनी पत्नी को लेकर अपने घर चला आया। दोनों पति – पत्नी नियम पूर्वक बुधवार का व्रत करने लगे। जों व्यक्ति नियम पूर्वक बुधवार की कथा पढ़ता, सुनता हैं उसको बुधवार के दिन यात्रा करने का दोष नही लगता तथा जो जिस मनोकामना से व्रत करता हैं भगवान गणेश उसकी सभी मनोकामनाए पूरी करते हैं।
0 votes
ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म शुक्रवार को हुआ है उन पर माँ लक्ष्मी और शुक्र दोनों का शुभ प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि शुक्रवार के स्वामी शुक्र देव है और इसकी देवी लक्ष्मी है। यही कारण है कि इस दिन जन्म लने वाले व्यक्ति भौतिक सुख सुविधाओं के आदी और शौकीन मिजाज होते है l शुक्रवार को जन्मे लोग जीवन को मौज मस्ती से व्यतीत करने के पक्षधर होते है। इस दिन जन्मे लोग विरोधियों को भी अपने पक्ष में करने की कला जानते है, इनमे एक अलग ही आकर्षण होता है। जिससे ये अपने मित्रों के दायरे में काफी लोकप्रिय होते है। शुक्रवार को जन्में लोग बड़े ही खुशमिजाज होते है और जिंदगी को एक जश्न की तरह जीते है। इनको कलात्मक चीजों और कला से गहरा लगाव होता है, इसलिये ये अपना कैरियर भी संगीत, लेखन, चित्रकला, फिल्म, फैशन, ब्यूटी इंडस्ट्री में बनाना पसंद करते है। ऐसे व्यक्ति आमतौर पर प्रसन्न दिखाई देते है। इनके चेहरे पर रौनक होती है।
0 votes
--- पौराणिक कथाओं कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और पार्वती के दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। भगवान शिव ने काफी सोच-विचार कर एक प्रतियोगिता आयोजित की और कहा कि जो अपने वाहन पर सवार होकर समस्त तीर्थ और संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा वही पृथ्वी पर प्रथम पूजनीय होगा। कार्तिकेय ने शिवजी एवं पार्वती जी का आशीर्वाद लिया और अपने वाहन मोर पर तुरंत सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। इधर गणेश जी सोच में पड़ गए कि मेरा वाहन तो चूहा है। चूहा थोड़ा छोटा है और हम थोडे़ मोटे हैं। इस तरह तो हमारी हार पक्की है। तब गणेश जी ने सोचा कि माता-पिता में संपूर्ण तीर्थ होते हैं यदि मैं इनकी परिक्रमा कर लूंगा तो मुझे समस्त तीर्थ और समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करने का फल मिल जाएगा। ये सोचकर श्री गणेश जी महाराज ने अपनी मां पार्वती और पिता शिव जी से आशीर्वाद लिया और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा कर शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। इधर कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार हो पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे तो श्री गणेश को स्थान पर खड़ा पाकर कार्तिकेय ने कहा कि यह प्रतियोगिता मैंने जीत ली है क्योंकि गणेश जी अभी तक यहीं खड़े हैं। तब शिव जी ने कहा- पुत्र गणेश आपसे पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा कर चुका है, वही प्रथम पूजा का अधिकारी होगा। कार्तिकेय गुस्सा होकर बोले, पिताजी, यह कैसे संभव है? गणेश अपने वाहन चूहे पर बैठकर कई वर्षों में भी पूरी परिक्रमा नहीं कर सकता है! पिताजी आप मजाक क्यों कर रहे हैं ? तब भगवान भोले नाथ बोले- नहीं बेटे! गणेश अपने माता-पिता की परिक्रमा करके यह प्रमाणित कर चुका है कि इस ब्रह्माड में मात-पिता से बढ़कर कुछ नही है। गणेश ने संपूर्ण जगत् को इस बात का ज्ञान कराया है इसलिए इस दुनिया में सबसे पहले गणेश को ही पूजा जाएगा। इस तरह गणेश प्रथम पूजनीय बन गए।
0 votes
एकादशी के दिन भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा विधि-विधान से की जाती है। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। साथ ही इस दिन दान करने हजारों यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। इस दिन निर्जला व्रत रहा जाता है। जो लोग इस दिन व्रत नही रख पाते। वह लोग सात्विक का पालन करते है यानी कि इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा नहीं खाएं और झूठ, ठगी आदि का त्याग कर दें। साथ ही इस दिन चावल और इससे बनी कोई भी चीज नहीं खानी चाहिए। हम पुराने जमाने से यह बात सुनते चले आ रहे कि एकादशी के दिन चावल और इससे बनी कोई भी चीज नही खाई जाती है। लेकिन इसके पीछे सच्चाई क्या है यह नहीं जानते हैं। जब भी हम यह बात सुनते होंगे कि आज एकादशी है और आज चावल नहीं खाए जाते है, तो हमारे दिमाग में एक ही बात है कि ऐसा क्यों है, जानिए इसके पीछे क्या रहस्य है। शास्त्रों में चावल का संबंध जल से किया गया हैं और जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं। एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्रा जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एकादशी के दिन चावल न खाने के पीछें वैज्ञानिक तथ्य भी है। इसके अनुसार चावल में जल की मात्रा अधिक होती है। जल पर चन्द्रमा का प्रभाव अधिक पड़ता है। चावल खाने से शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है इससे मन विचलित और चंचल होता है। मन के चंचल होने से व्रत के नियमों का पालन करने में बाधा आती है। एकादशी व्रत में मन का निग्रह और सात्विक भाव का पालन अति आवश्यक होता है इसलिए एकादशी के दिन चावल से बनी चीजे खाना वर्जित कहा गया है।
Dear friends, futurestudyonline given book now button (unlimited call)24x7 works , that means you can talk until your satisfaction , also you will get 3000/- value horoscope free with book now www.futurestudyonline.com
...