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नव वर्ष मंगलमय हो

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आनन्द नामक सम्वत्सर 2077 का आरम्भ यद्यपि 25 मार्च बुधवार,रेवती नक्षत्र को उदयव्यापिनी तिथि में होगा किन्तु 24 मार्च 2020 को अमावस्या तिथि 14:56 बजे समाप्त हो जाएगी तथा 14:57 बजे से नववर्ष की प्रतिपदा का आरम्भ कर्क लग्न में होगा। उस समय की आकाशीय कौंसिल के अनुसार कर्क, मकर (लग्न एवं सप्तम) में शनि-मंगल का विध्वंसकारी योग तथा षष्ठ-द्वादश भाव में कालसर्प योग राष्ट्र के लिए जन-धन हानि और उपद्रव लेकर आ रहा है। हालांकि राजा बुध एवं मन्त्री चंद्र का शुभ प्रभाव सत्ता पक्ष की सूझबूझ को बल देगा। सरकार कठोर कानून लागू करेगी। दो-तीन प्रान्तों में सत्ता संघर्ष एवं परिवर्तन के योग भी बन सकते हैं। 29 मार्च से तीन ग्रह (शनि, मंगल, गुरु) का मकर राशि में अशुभ फलदायक होगा। साम्प्रदायिक दंगे होने की आशंका है। इससे जन-धन और व्‍यापक स्‍तर पर राष्ट्रीय सम्पत्ति की हानि का योग बन रहे हैं, लेकिन सरकार कठोर फैसले लेने में संकोच नहीं करेगी। देश में वर्तमान में जारी कोरोना महामारी की व्‍यापकता में कमी और कुछ बाद इसका प्रभाव खत्‍म होने के आसार हैं। आर्थिक दृष्‍टि से आगामी सम्वत्सर शुभ रहेगा। लंबे समय से व्यापारी वर्ग में चल रही निराशा दूर होगी। विदेशी पूंजी में वृद्धि होगी।

References

नया साल मुबारक
posted Mar 23 by Rakesh Periwal

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ईश्वर का नाम रोज स्मरण करने और नियमित रूप से पूजा पाठ करने से मन में आत्मिक शांति का एहसास होता है। ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव से नकारात्मक समय में भी लोग उम्मीद की एक छोटी सी किरण पर भी विश्वास कर पाते हैं। आस्था आपके मन को भीतर से मजबूत बनाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईश्वर की आराधना करते वक्त कुछ नियमों का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी होता है। कई लोग घर में पूजाघर बनाते वक्त छोटा सा मंदिर बनवाना पसंद करते हैं क्योंकि हमेशा तो मंदिर नहीं जाया जा सकता है। लेकिन इस बात का ख्याल रखें कि पूजाघर में कोई भी मूर्ति स्थापित करने से पहले मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा जरूर करें। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जिस घर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा होती है वहां प्रभु साक्षात निवास करते हैं। आपकी कुलदेवी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती हैं। ऐसी भी मान्यता है कि अगर लोग अपनी राशियों के अनुसार देवियों का पूजा पाठ करेंगे तो उनका भाग्य अच्छा रहेगा और उनके ऊपर ईश्वर की कृपा भी बरसती रहेगी। कई लोग नियमित तौर से पूजा करते वक्त तुलसी पूजन करना भूल जाते हैं जबकि हिंदू धर्म में तुलसी को भी माना गया है और तुलसी पूजन के लाभ भी बताये गए हैं। मान्यता है कि जिस घर में मां तुलसी की पूजा अर्चना होती है वहां सुख समृद्धि का वास होता है और घर की स्त्रियां और गृहस्वामी प्रसन्न रहते हैं।
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ज्योतिष अनुसार द्वादश भावो से संबंधित जानकारी : #पहला_भाव : दुनिया में सब से पहली घटना व्यक्ति का जन्म है, इस लिए जन्म के समय से जो चीज़े व्यक्ति के पास होती है जन्म कुण्डली का पहला भाव उन से संबंधित होता है जैसे कि आत्मा, जाति, आचरण, कर्म, शरीर का सुख, बुद्धि, अहंकार #द्वितीय_भाव : जन्म के बाद शिशु को वस्त्र में लपेटा जाता है, उसको भोजन दिया जाता है, उस के बाकी रिश्ते जुड़ने शुरू होते हैं , उसकी इच्छायें शुरू होती हैं, बोलचाल शुरू होती है । इस लिए द्वितीय भाव से इनका सुख देखा जाता है जैसे कि परिवार, वाणी, वस्त्र, धन, घर परिवार से मिलने वाला धन संपदा और संस्कार । #तृतीय_भाव : परिवार, वस्त्र और आय की प्राप्ति के बाद इनका दिखावा शुरू होता है यानी दुनिया में खुद को एक दूसरे से बड़ा दिखाने की दौड़ शुरू होती है इसी को पराकर्म स्थान कहा जाता है , और फिर वैसे ही मित्रो की प्राप्ति होती है । इस लिए तृतीय भाव से इनके सुख देखे जाते हैं जैसे कि साहस और पराकर्म, रोज़ के मिलने वाले मित्र , आस पड़ोस, रोजाना की भाग दौड़ जैसे कि यात्राएं, छोटे भाई बहन, बाजुयो की ताकत और कला । #चतुर्थ_भाव : जातक का जितना पराकर्म होता है जैसी उसकी संगत होती है वैसी ही उसकी बुद्धि होती है फिर वही शुरुआती रुझान आदतें बन जाती हैं और वैसी ही चीज़े वह धारण करता है, वैसा ही रहन सहन, वैसा ही घर और वैसे ही खान पान की आदतें , और फिर वही आदतें कैरियर का निर्धारण करती हैं । इस लिए चतुर्थ भाव से यही सब सुख देखे जाते हैं जैसे कि ज़मीन, वाहन, शिक्षा, माता के सुख, मानसिक रूप से मजबूती । #पंचम_भाव : जातक जैसा खुद के घर परिवार के रिवाज़ों को आगे बढ़ाता है, जितनी उच्च और अच्छे स्तर की शिक्षा प्राप्त करता है , उतनी ही उस में कला और गुणों का विकास होता है जो उसको सामाजिक प्रतिष्ठा देती है । इसी लिए पंचम भाव से इन सब विषयो का विचार किया जाता है जैसे कि खुद से कुछ भी बनाना, संतान को अच्छी शिक्षा देना, खुद से प्राप्त की गई शिक्षा को समाज में बांटना जिस से दूसरों को भी सुख मिले, दूसरों से प्रेम करना । #छठा_भाव : जब जातक खुद की कला और गुण समाज को दिखाता है सम्मान की प्राप्ति करता है तो उस से जलने वाले लोगो की संख्या भी बढ़ने लगती है , फिर वही लोग शत्रु बन जाते हैं और कार्यो में बाधा देते हैं इस तरह जातक के लिए संघर्ष की शुरुआत होती है । इस लिए छठे भाव से इन विषयों का विचार किया जाता है जैसे कि शरीर का वह हिस्सा जो आपकी कमज़ोरी है इस लिए शारीरिक रोग का विचार इस भाव में आने वाली राशि से किया जाता है, रोज़ के दैनिक संघर्ष जैसे कि जिम, योगा का विचार इस भाव से किया जाता है, आमने सामने की शत्रुता जैसे कि कोर्ट कचहरी की लड़ाई झगड़े इन में होने वाली हानि और लाभ का विचार भी इसी भाव से किया जाता है । #सप्तम_भाव : तो जब आप संघर्ष में होते हैं शत्रु से लड़ रहे होते हैं भाग दौड़ कर रहे होते हैं तो आपके अपने आपके साथ होते हैं एक तरह का यह public support यही सप्तम भाव से संबंधित है । विपरीत लिंगी का विचार ( पुरूष के लिए स्त्री और स्त्री के लिए पुरूष ) इसका विचार इसी भाव से किया जाता है । इसी लिए सप्तम भाव से इन विषयों का विचार किया जाता है जैसे कि प्रेमी / प्रेमिका, जीवनसाथी, व्यवसायक साँझीदार , किसी भी तरह का public support । #अष्टम_भाव : जब प्रेम संबंध बनते हैं , रिश्ते जुड़ते हैं , support मिलता है लोग करीब आते हैं तो धोखा देने वाले लोग भी इन्ही में शामिल होते हैं , रिश्तो में झगड़े होते हैं, अपने रूठते हैं , तकरार होती है जिस से अवसाद होता है, मरने का मन करता है । इसी लिए इन सब विषयो का विचार अष्टम भाव से किया जाता है, जैसे कि दुसरों से मिलने वाले धोखे, सदमें , शरीर के वह हिस्से जो जीवन भर परेशानी देते हैं , खास कर हार्मोन्स से संबंधित परेशानी , चोट और दुर्घटना , चरित्र पर लांछन के चलते नोकरी से या किसी विशेष अहुदे से बर्खास्त हो जाना । #नवम_भाव : तो जब हमारी गलतियों के चलते लोग हम से रिश्ते तोड़ देते हैं फिर हम उसका पश्चाताप करते हैं , धर्मस्थल जाते हैं प्रार्थना करते हैं दुआएं करते हैं , दुनियादारी और समाज के कानून को समझ कर फिर से कुछ नया सीख कर जीवन की नई शुरुआत करते हैं । तो इन सब विषयो का विचार नवम भाव से किया जाता है जैसे कि कानून और देश का संविधान, घर के बड़े, धर्मस्थल, लंबी दूरी की यात्राएं और लंबे समय के लिए किए गए वायदे , खुद के गुणों का प्रदर्शन । #दसम_भाव : तो जब हम नया सीख कर खुद में सुधार करके आते हैं तो फिर से हमें दुनियादारी में अपनी जगह बनाने के अवसर मिलने लगते हैं, लोग हमारी गलतियों को भूल कर हमारी नई पहचान से हमे जानने लगते हैं, हर कोई अपने अपने कर्म और आजीविका के अनुसार काम के लगते हैं जैसे कि कोई अस्पताल में काम करता है कोई स्कूल / कालेज में , कोई भोजन पदार्थो से जुड़े कार्य करने लगता है तो कोई वस्त्रो से जुड़े कार्य । #एकादश_भाव : तो जब हम धन और आजीविका की दौड़ में किसी ना किसी कार्य से जुड़ते हैं , भाग्य और मेहनत दोनो के दम पर उच्च पदों से भी कुछ को नवाजा जाता है, जैसे कि कोई तरक्की करते हुए लीडर बनते हैं, संस्थाओं के प्रमुख कार्यकर्ता और प्रधान बनते हैं, छोटे से होटलों से वह 3 और 5 स्टार होटल बनते हैं, कुछ ऑटो सेक्टर में होते हुए यूनियन प्रधान बनते हैं , कुछ प्रेजिडेंट बनते हैं , कुछ सीइओ बनते हैं । इस लिए एकादश भाव का संबंध इन्ही सब विषयो से होता है, मेहनत और भाग्य के दम पर जातक अपने अपने उच्च मुकामो को प्राप्त करते हैं , बड़े भाई बहनों , बड़े अधिकारी लोगो का सानिध्य , बड़े बड़े होटल और बड़ी बड़ी संस्थाओं में आना जाना इसी भाव से देखा जाता है । #द्वादश_भाव : तो जब जातक ने वह उच्च मुकाम हासिल कर लिया, ग्रहस्थ को भोग लिया तब उस के मन में धन दौलत आगे बच्चों को देते हुए खुद मोक्ष प्राप्ति की इच्छा करता है , जो कि जन्म कुण्डली का आखरी भाव यानी द्वादश भाव है । इस तरह जन्म कुण्डली के द्वादश भाव का संबंध इन विषयों से संबंधित होता है जैसे कि बाहरी स्थान , बाहरी लोक जिस में आत्मा शरीर का त्याग कर पृथ्वी लोक से गमन करती है कर्मो के अनुसार आगे की यात्रा के लिए , इसी तरह इस भाव से विदेश यात्रा का विचार भी किया जाता है, बाहरी शक्तियों से बातचीत जैसे कि एलियन से संपर्क , या किसी शक्ति की साधना उनके दर्शन और आशीर्वाद , निद्रा का सुख विचार इस भाव से किये जाते हैं Astrology can Help you as navigation for future path of life. 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10 जनवरी के चंद्र ग्रहण को लोग कंफ्यूज हैं कि इस चंद्र ग्रहण पर सूतक लगेंगे या नहीं। दरअसल 10 जनवरी को लगने वाला चंद्र ग्रहण उपच्छाया चंद्र ग्रहण होगा। धर्मशास्त्र में इसे माद्य ग्रहण कहते हैं। इस ग्रहण में चंद्रमा पर ग्रहण नहीं लगता बल्कि इसका बिंब धुंधला हो जाता है। यह चंद्र ग्रहण दूसरे चंद्र ग्रहण से काफी कमजोर होगा।  इसलिए भारत में इस ग्रहण का असर न के बराबर होगा। इस ग्रहण पर सूतक नहीं लगेंगे और मंदिरों के कपाट भी बंद नहीं होंगो। धार्णिक जानकारों के अनुसार इस ग्रहण को ग्रहण की कोटि में नही रखा जाता है।  इसलिए इस दौरान धार्मिक कार्य करने की मनाही भी नहीं होगी। 10 जनवरी से माघ मेला लग रहा है और इस दिन पौष पूर्णिमा भी है इसलिए इस दौरान श्रद्धालू गंगा में डुबकी लगाएंगे। हालांकि पौष पूर्णिमा के दिन और ग्रहण के बाद दान पुण्य किया जा सकता है। शास्त्रों केअनुसार इस महीने में दान पुण्य का करोड़ों गुना फल मिलता है।  ऐसा भी माना जाता है कि पौष माह की पूर्णिमा पर स्नान और दान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए मोक्ष की कामना रखने वाले बहुत ही शुभ मानते हैं। क्योंकि इसके बाद माघ महीने की शुरुआत होती है। ऐसा माना जाता है कि यदि चंद्र ग्रहण के दौरान किसी सरोवर में स्नान किया जाए तो सभी पाप धुल जाता हैं। इसके अलावा गेहूं, चावल और गुड़ जैसी चीजों का दान भी करना चाहिए। इससे खुशहाली आती है।  दीपिका माहेश्वरी
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वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में कबूतर का घोंसला अस्थिरता के हालात पैदा करता है और साथ ही निर्धनता को भी आमंत्रण देता है। अगर आपके घर में ऐसा कुछ है तो जल्द से जल्द इसे हटाने का प्रयास करें। घर में मकड़ी क जाल बुनना दुर्भाग्य की निशानी है। इसे जल्द से जल्द हटवाएं और आगे से ऐसा ना हो इसके लिए घर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। घर में टूटा हुआ शीशा ना सिर्फ वास्तु के नियमों के विरुद्ध है बल्कि ये पूरे प्रभाव के साथ नकारात्मक ऊर्जा को प्रवेश करने के लिए रास्ता भी देता है। चमगादड़ का दिखना बहुत अशुभ माना जाता है। अगर घर में यह प्रवेश कर जाए तो यह दुर्भाग्य, निर्धनता के साथ-साथ बुरे स्वास्थ्य का भी परिचायक है।
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मीन लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना आकाश के 330 डिग्री से 360 डिग्री तक के भाग को मीन राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मीन माना जाता है. मीन लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्रमा पंचम भाव का स्‍वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. सूर्य षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी , वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. मंगल द्वितीय और नवम भाव का स्‍वामी होता है द्वितीय भाव का अधिपति होने के कारण जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है जबकि नवमेश होने के कारण यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. शुक्र तृतीय और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधि बनता है जबकि अष्टमेश होने के कारण यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. बुध चतुर्थ भाव का स्‍वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. बृहस्‍पति दशम भाव का स्‍वामी होकर जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. शनि एकादश और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. एकादश भाव का स्वामी होने के कारण यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है जबकि द्वादशेश होने के नाते यह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण.इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. राहु को मीन लग्न में सप्तमेश होने का दायित्व मिलता है जिसकी वजह से यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होत है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. केतु को मीन लग्न में लग्नेश होने का दायित्व मिलता है इस वजह से यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.
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